द्रौपदी
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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बूँदों को वनवास मिला।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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तेरे गीत सजा रखा है।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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नेह का निमंत्रण।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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यादें।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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मुक्तक।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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मुक्तक।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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वरदान है हिंदी।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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आँसू।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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तुम भी हो औ हम भी हैं फिर कैसी ये तन्हाई है।।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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जो गीत सजल ना होते तो भावों को कैसे गाता।।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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पैसे का प्रभाव या अभाव।
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पैसे का प्रभाव या अभाव।
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दूर कहीं तेरा साहिल।
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के नींद से उठकर के
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पावस की पुरवाई लेकर आई याद तुम्हारी।।
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स्वर ने सीवन खोले।।
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इस सफर को चलो हम नया नाम दें।
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उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।
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गणपति जी पर दोहे।
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तुम बन जाओ छंद गीत का जिसको मिलकर गायें हम।।
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अब वो बात नहीं होती।
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तेरे खत को जब पढ़ते हैं।।
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पलकों में आँसू बोया था।
कुछ ने मन से किया किनारा
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तुम्हें मुबारक हार पुष्प के मुझको अश्रु धार मुबारक।।
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चल बटोही चल चलें आ इस भँवर को पार कर।।
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फिर आज सहलाने चली हैं।
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आओ जग के अँधियारे में हम इक दीपक रोज जलाएं।।
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के नींद से उठकर के
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साँसों ने जो गीत लिखे वो शब्द-शब्द सारे चंदन।।
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के नींद से उठकर के
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जागो भारत पुत्रों जागो फिर माँ ने तुम्हें पुकारा है।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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जो अश्रु सहारा न होता तो निज मन बात कहाँ कह पाता।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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अंतस की व्यथा।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
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अब जग गया हूँ।।
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फिर क्यूँ ना हो स्वीकार मुझे।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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भोर सुंदर मुस्कुराये।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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पलकों से जो बरसे गीत कहलाये।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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कहीं तो रास्ता होगा।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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आओ फिर से गीत सजा लें अपने अधरों पर मिलकर।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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बहुत लिखे हैं मधुमासों के गीत मगर अब और नहीं।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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जीवन की कितनी इच्छाएं मन में मोह जगाती हैं।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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के नींद से उठकर के
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अनगिन खुशियाँ लेकर आया राखी का त्योहार।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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तुम बिन अब तक है अधूरा इस जीवन का गान।।
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वसुधैव कुटुंबकम।
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के नींद से उठकर के
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नदिया और समंदर।
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अभिमान तिरंगा भारत का।।
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कितना दूर गाम तुम्हारा।।
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गीत गजल जो रच न पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।
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चलो उजालों को लेकर के हम सब फिर गाँवों की ओर चलें।।
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पास पाकर तुम्हें जिंदगी मिल गयी।।
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उर के शांत सरोवर में फिर छेड़ो वीणा की तान मधुर।।
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सुधियों के दो पल कागज पे लिखता हूँ मुस्काता हूँ।।
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कौन है फिर पूछता उसको यहाँ पर।।
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छाँव।
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वो थी अधूरी रात जब मृदु स्वप्न पलकों से गिरा।।
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मन जो बात नहीं कह पाता कविताओं में कह लेता हूँ।।
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लिख सके न हम मन की बातें।
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आस का दीपक जलाये द्वारे पर ठहरा हूँ मैं।।
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कुछ शब्दों में जीवन भर के मूल्य मुखर कब हो पाते हैं।।
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है प्रणय की प्यास गहरी प्रीत से आँगन सँवारो।।
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अपनी हो सूरज से यारी।।
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मेरे साथ देखो ये राहें चली हैं।।
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क्या जाने किस ओर चलूँगा।।
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काश कभी मैं तुमसे मन की बात सभी वो कह पाता।।
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मैं अब तक गीत न गा पाया।।
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मेरे नयनों का सूनापन अगर जो पढ़ लिया होता।
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के नींद से उठकर के
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लहरायें वन उपवन सारे।
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जीवन के संधि-पत्र पर।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
email-ajaykpandey197494@gmail.com
अब भी चुभ रहा बन शूल।
कुछ कहीं ऐसा है अब भी
चुभ रहा बन शूल।
अंक में मेरे सिमटकर
पाश में मेरे लिपटकर
कंठ में थे गीत के स्वर
कुछ कहा उस रोज तुमने
याद है वो आज साथी या गये हो भूल
कुछ कहीं ऐसा है अब भी चुभ रहा बन शूल।।
मौन पल में कुछ कहा था
दर्द कितना ही सहा था
शब्द अधरों से झरे कुछ
अश्रु पलकों से गिरे कुछ
याद है वो अश्रुकण या फिर गये हो भूल
कुछ कहीं ऐसा है अब भी चुभ रहा बन शूल।।
अब कहाँ मैं तुम कहाँ पर
दूर हैं हम, मौन हैं स्वर
लिख रहा पर गीत तेरे
भाव मन के, प्रीत तेरे
याद है क्या गुनगुनाना या गये हो भूल
कुछ कहीं ऐसा है अब भी चुभ रहा बन शूल।।
दूर हूँ सब बंधनों से
स्नेह के अनुरंजनों से
है नहीं अफसोस कोई
रात पलकें पर न सोईं
याद अब भी जागना है या गये हो भूल
कुछ कहीं ऐसा है अब भी चुभ रहा बन शूल।।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
16 जून, 2022
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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पीड़ा ने मुझको अपनाया।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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है कुपथ क्या औ सुपथ क्या अब कौन बोलेगा भला।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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आज अभिलाषा जगी है।।
आज अभिलाषा जगी है।।
1
चाँदनी का रथ सजा है
और तारे भी सफर में
भाव की आलोड़नाएँ
गुदगुदाती हैं डगर में
अंक में आकर मिली है
आस जो थी मनचली
देख इसको फिर खिली है
कामनाओं की कली
मौन इस व्यवहार में
आस के संसार में
प्रीत की आशा जगी है
आज अभिलाषा जगी है।।
2
नेत्र मन के आज मेरे
खुल रहे हैं पास आकर
साँस में सरगम सजी है
देख तुझको पास पाकर
रत्न आभूषण सभी अब
मोहते मन को निरन्तर
ये शिशिर ऋतु भी मुझे अब
लग रही पिय आज सुंदर
रूप के आकार में
इस मधुर संसार में
प्रीत की आशा जगी है
आज अभिलाषा जगी है।।
3
आज मन के स्वप्न सारे
फिर पलक पे आ सजे हैं
भावनाओं के दुआरे
प्रेम के तोरण सजे हैं
चाह जो थी दूर कल तक
पास लाना चाहता हूँ
कल्पनाओं के सफर में
दूर जाना चाहता हूँ
मृदु हृदय उद्गार में
मोह के आकार में
प्रीत की आशा जगी है
आज अभिलाषा जगी है।।
4
आज मन के निज नगर में
सज रहे हैं गीत के स्वर
प्रीत के पावस पवन में
गूँजते मधुमास के त्वर
है सजी ऋतु ये रसीली
हैं प्रहर सब आज पावन
गेह में पल-पल छुपा है
स्नेह का संपूर्ण गायन
देह के आधार में
कामना उपहार में
प्रीत की आशा जगी है
आज अभिलाषा जगी है।।
5
चल निकल कर मौन पल से
आज मन की कह लें सारे
अंक में जो कुछ हमारे
प्रीत पर हम क्यूँ न वारें
हाँ चलो पहचान लें अब
क्यूँ रहे मन में निराशा
दिख रही है आज हमको
प्रेम की कोमल सुभाषा
पंथ में अभिसार के
मौन के उद्गार में
प्रीत की आशा जगी है
आज अभिलाषा जगी है।।
6
लौट जाऊँ मैं यहाँ से
तो कहो कैसा लगेगा
साथ में जब हम न होंगे
भाग्य फिर कैसे जगेगा
इस निशा के निज पलों को
कौन देगा मान्यता
शुष्क भावों से कहो फिर
क्या जगेगी संज्ञान्यता
चेतना के सार में
स्वप्न के विस्तार में
प्रीत की आशा जगी है
आज अभिलाषा जगी है।।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
10जून, 2022
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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जीत सकूँ चाहे ना जग को पर जी लूँ इसको जी भरकर।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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जोड़ मन के तार सारे।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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जोड़ मन के तार सारे।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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कवि होना आसान कहाँ।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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निज अलकों के बंधन खोलो।।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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