सूरज उगाएंगे चले जायेंगे

सूरज उगाएंगे चले जायेंगे 

​मोहब्बत की कसम खाकर निभाएँगे, चले जायेंगे
हम अपना फर्ज़ दुनिया में बताएँगे, चले जायेंगे।

​सजाकर ख़्वाब आँखों में, ये दिल को हम सजाएँगे
मगर इक रोज़ चुपके से रुलाएँगे, चले जायेंगे।

​तुम्हारी याद की खुशबू जो इन साँसों में महकेगी
इसी एहसास को दिल में बसाएँगे, चले जायेंगे।

​ज़माने की जफ़ाओं से हमें कोई गिला कब है
दुआएँ हम लबों पर बस सजाएँगे, चले जायेंगे।

​मिलेगा चैन जिस दर पर, उसी दर पर रुकेंगे हम
थकन अपनी वहीं जाकर मिटाएँगे, चले जायेंगे।

​अंधेरी रात के साये डराये देव हमें लेकिन
हम अपने ज़ख्म से सूरज उगाएँगे, चले जायेंगे।

✍️अजय कुमार पाण्डेय

जिंदगी कब आसान नजर आती है

जिंदगी कब आसान नजर आती है 

सुलझाने निकलो तो और भी बिखर जाती है,
ये जिंदगी है कब इतनी आसान नजर आती है।

रोज सबक सिखाने को नया सवेरा आता है ,
पर शाम होते ही यादें फिर से ठहर जाती है।

किनारों की चाहत में उम्र तमाम गुज़ारी है ,
पर ये कश्ती हर बार ही बीच भँवर जाती है।

खो गई है मासूमियत भी तजुर्बों के बाज़ारों में,
ये मुस्कुराहट भी अब तो मशवरा कर आती है।

कभी धूप की शिद्दत मिली, कभी छाँव का धोखा,
हर बार नक्शा मिटा कर वक़्त की लहर जाती है।

साँसों का ये जाने कैसा गोरखधंधा है 'देव',
के जीने की कोशिश में ही ये उम्र गुज़र जाती है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 


दर्द ने जब भी छूआ है पीर के हर पोर को

दर्द ने जब भी छूआ है पीर के हर पोर को 

दर्द ने जब भी छुआ है पीर के हर पोर को, 
जिंदगी के रास्तों से तब मेरा परिचय हुआ।

धूप में नंगे बदन थे छाँव की राहत न थी,
देख कर आतप्त मन को नैन में आहट न थी।
मौन मन में तप रही थी इक उदासी रात की,
आह से परिचय हुआ तब दर्द ने जब बात की।

आह ने जब भी छुआ है दर्द के अनुरोध को,
दर्द के अहसास को तब नेह का अनुभव हुआ।

पाँव में छाले पड़े जब ताप ने उनको सुखाया, 
गीत में कैसे लिखूँ शीत ने कितना जलाया।
साँस जब फूली कहीं पर एक झूठी आस थी,
दूर से देखा क्षितिज पर इक मचलती प्यास थी।

प्यास ने जब भी छुआ है नैन के इक कोर को,
गीत के अहसास में तब बूँद का आश्रय हुआ।

कब कहाँ किसने कहा है कौन कैसे क्रंद से,
क्लांत मन उलझा रहेगा कब तलक इस द्वन्द से।
कोई तो सुबह कभी इस मुंडेरे आयेगी,
अनछुए गीत मेरे उनको फिर वो गायेगी।

नेह ने जब भी छुआ है क्लांत मन के कोर को,
हार में भी जीत का मन को तभी निश्चय हुआ।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय 

 



ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ

वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ,
मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ।

जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है,
मैं ऐसे हर सितम का भी मलाल करता हूँ।

न जात, न पंथ, न भाषा का कोई फ़र्क यहाँ,
मैं एकता की सदा ही मिसाल करता हूँ।

जो लोग डर के साए में जीने लगे हैं अब,
मैं उनके हक़ में भी खुलकर बवाल करता हूँ।

वतन रहे न टूटे यह दुआ हर दिल में रहे,
मैं इसी ख्वाब का हर दिन ख़याल करता हूँ।

 ✍️अजय कुमार पाण्डेय

कौन बचाये

कौन बचाये 

जनता के करवट लेने से यदि संसद ये घबरा जाये 
लोकतंत्र की मर्यादा को मिटने से फिर कौन बचाये 

नहीं जरूरी हर मुद्दों पे जनता की मंजूरी हो 
लेकिन हर चुभते मुद्दे की सत्ता क्यूँ आवाज दबाये 

एक हाथ में संविधान हो और दूजे भगवदगीता हो 
धृतराष्ट्र बनें जब राष्ट्र प्रमुख तो कुरुक्षेत्र से कौन बचाये 

दरबारी हो जाये व्यवस्था और मनो चेतना भारी हो 
ऐसी भीष्म व्यवस्था में द्युत क्रीड़ा से कौन बचाये 

सत्ता ही जब करे विभाजन और प्रलोभित राजनीति हो 
अपने घर की संतानों को फिर कुरुक्षेत्र से कौन बचाये 

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

संसद आवारा हो जाता है

संसद आवारा हो जाता है 

सड़कें सूनी हो जाएँ जब, संसद आवारा हो जाता है,
जनमन का विश्वास तभी, आँसू बनकर रो जाता है।

जनता ने सौंपे थे सपने, उम्मीदों की पोटली भर,
सत्ता के गलियारों में सच लेकिन अक्सर खो जाता है।

वाणी में आदर्श बहुत हों, कर्मों में जब शोर मचे,
लोकतंत्र का दीपक तब, अँधियारे में सो जाता है।

वोटों से जो सिंहासन है, सेवा का वह पावन धर्म,
जब स्वार्थों का दास बने, राष्ट्र हृदय भी रो जाता है।

सड़कें सूनी हो जाएँ जब, संसद आवारा हो जाता है,
जनता का हर एक भरोसा, धीरे-धीरे खो जाता है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

नारी का सम्मान

नारी का सम्मान 

दोहा
​नारी शक्ति महान है, जगत मूल आधार।
ममता की मूरत बनी, करे सकल उद्धार॥

​जहाँ नारि पूजी जाय, बसें वहाँ सुर देव।
सृष्टि अधूरी नारि बिन , तजहु सकल अहमेव॥

​चौपाई

​जननी रूप धरे सुखकारी। ममतामयी जगत महतारी॥
कबहु शक्ति बन असुर सँहारे । संकट में निज कुल को तारे॥

ये ​विद्या, बुद्धि, धैर्य की खान। वेद ग्रंथ सब करे बखान॥
घर की लक्ष्मी, वैभव सारा। नारी बिनु है जग अँधियारा॥

​कंधे से कंधा मिलि चालै। शिक्षा और प्रगति प्रतिपालै॥
आजु समय की यही पुकारा। पूज्यनीय नारी जग सारा॥

दोहा 

घर की लक्ष्मी, प्रेम की, पावन गंग समान।
नारी से परिवार है, नारी ही सम्मान॥

संस्कारों की नींव है, ममता का आधार।
नारी बिन सूना लगे, सारा घर-संसार॥

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ  मन के सूने नील गगन में मधु प्यालों के मधुर मिलन में  भावों के हर चपल लहर में नवल नेह के नवल नगर...