ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं 

तुझे यादों में मिलता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तुझे मैं ख़त में लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तेरा चेहरा ही बस चारों तरफ़ महसूस होता है
कहीं भी जब मैं तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तेरी आहटें जब भी मैं धड़कन में पिरोता हूँ
लकीरों को परखता हूँ तो आँखें भींग जाती हैं 
सँभाले हैं किताबों में अभी भी जो फूल सूखें हैं
उन्हें छूकर जो रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
ज़माना पूछता है 'देव' क्यूँ ये हाल है तेरा
पलक जब भी झपकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

 ✍️अजय कुमार पाण्डेय

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ 

मन के सूने नील गगन में मधु प्यालों के मधुर मिलन में 
भावों के हर चपल लहर में नवल नेह के नवल नगर में 
नवल नेह के मोती चुनकर मैं नेह सेज पर बिखराऊँ।

नवल निशा में छवि मतवाली मृदुल कपोलों से चुन लाली 
ललित लता के मधुर कुंज में मंद पवन के सुखद पुंज में 
कलित क्रोण के अंतर्मन से मैं खुद से ही नेह लगाऊँ।

पल-पल साँझ पिघलती जाती जीवन नौका चलती जाती 
कुछ कहती कुछ सुनती जाती अविरल धारा बहती जाती 
ढली साँझ के सुरमित पल में मैं मधुर गीत कोई गाऊँ।

क्षणभंगुर काया की माया, जैसे ढली धूप की छाया
आना जाना खेल जगत का बन कर के निज रूप भगत का 
अपने ही मन के मधुवन में मैं बंसी की धुन सुन पाऊँ।

जैसे भी हो वैसे आओ अपने गीतों से बहलाओ 
बिन सपनों की कैसी माला तुम से ही मन का उजियाला 
अपने में तुम मुझको पाओ अपने में मैं तुमको पाऊँ।

उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ।


✍️अजय कुमार पाण्डेय 

तीर्थ मन का भाव

तीर्थ मन का भाव 

पत्थर की सीढ़ी पर कब तक मन खोजेगा विश्राम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।
अंतस में गंगा बहे जब और शांत हो हर इक शोर,
सच्चा तीर्थ वहीं है जग में जहाँ खींचे मन की डोर।
मिट जाये जब मन का पर्दा सौंप दें सब कुछ राम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।

​माथे पर चंदन का लेपन और तन पे भगवा वेश,
पर मन में यदि कपट बसा है बाकी रह गया क्लेश।
तीर्थ नहीं गंतव्य नहीं है कुछ नहीं है पक्का घाट,
है तीर्थ वही जहाँ करुणा की खुल जाए मन की हाट।
श्रद्धा के दो फूल चढ़ाकर पा लो प्रिय निज धाम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।

​दीन-दुखी के आंसू पोंछे हाथ वही तो प्रयाग है,
त्याग दे सारे स्वार्थ जगत के वो ही तो वैराग है।
पर्वत, नदियाँ, कुंड, सरोवर, सबका एक ही है सार,
शुद्ध हृदय का दर्पण ही है परमात्मा का सच्चा द्वार।
त्याग के सारे मोह पाश सब ,तज के लोभ-लगाम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

कसक बाकी बची है

कसक बाकी बची है 

पृष्ठ पर जो खो गये थे कुछ शब्द मेरे भाव थे 
आज भी उन भावनाओं की कसक बाकी बची है 

वर्जनाओं से परे भी ठोकरें खाता रहा हूँ, 
द्वार सारे बंद थे फिर भी वहाँ जाता रहा हूँ।
शून्य में ही खो गये भटके हुए उद्गार मेरे,
मौन में ही घुल गये सब गीत के आभार मेरे।

दब गये जो कंठ में ही वो गीत मन के भाव थे,
आज भी उन भावनाओं की कसक बाकी बची है।

जो रहा परित्यक्त जग में वो मेरा हिस्सा हुआ,
पीर का परितोष ही मेरे प्यार का किस्सा हुआ।
जो सज सका ना पृष्ठ पर भटका हुआ उद्गार हूँ,
जो आँसुओं में घुल गये खोया हुआ श्रृंगार हूँ।

घुल गये जो आँसूओं में वो पीर मन के भाव थे,
आज भी उन आशनाओं की कसक बाकी बची है।

इक गीत की अनुरागिनी की चाह में चलता रहा,
सब आग से बचते रहे मैं शीत में जलता रहा।
इक अधूरी चाह में भी पूर्ण का आभास पाया,
दूर था हर पल क्षितिज से पर लगा आकाश पाया।

जो विरह में गान भटके वही प्राण के प्रभाव थे,
आज भी उन वर्जनाओं की कसक बाकी बची है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

 




ग़ज़ल

ग़ज़ल

​कही जाती यहाँ हर दम वही अपनी पुरानी है
किसी की भूख लफ़्ज़ों में, किसी की मेज़ फानी है

​अमीरी ओढ़ कर सोए सुनहरे रेशमी बिस्तर
ग़रीबी के लिए बस छत टपकती और पानी है

​मजबूरी ने पैरों में बिछाई है बिसासत ये
लाचारी के चेहरे पर लिखी गहरी कहानी है

​मगर ख़ुद्दार इंसान वो जिसे अपनी ख़बर भी हो
निभानी हर क़दम पर अब उसे अपनी जु़बानी है

​सुकूँ मिलता नहीं सोने के सिक्कों को खनक कर भी
मदद की इक दुआ ही बस असल दौलत निशानी है

​उठाया बोझ काँधों पर जो पूरे घर का हँस करके
यही ज़िम्मेदारी तो असली ज़ीस्त-ए-ज़िंदगानी है

नहीं है फ़र्क कुछ 'देव' अब अमीरी और ग़रीबी में
वही रूतबा है उसका जिसने ज़िम्मेदारी जानी है

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

आन देख ली हमने

आन देख ली हमने 

महल की चकाचौंध में भी, बे-सुकूनी जान देख ली हमने
फटे लिबास में हँसती हुई, वो ऊँची आन देख ली हमने।

​किसी के दस्तरख़ान पर, छप्पन भोग सजे हैं मगर
सूखी रोटी चबाते हुए, बच्चों की मुस्कान देख ली हमने।

​सोने के निवाले भी यहाँ, भूख मिटा नहीं पाते
सड़क किनारे चैन की सोती, वो थकान देख ली हमने।

​अमीरी ने सिखाया है, रिश्तों का सौदा करना
ग़रीबी के आँचल में छिपी, सच्ची पहचान देख ली हमने।

​सजाए थे जो ख़्वाब, बड़ी हसरतों से शहर में
क़ीमत लगते ही बिकती हुई, वो दूकान देख ली हमने।

​दौलत की नुमाइश में अक्सर, लोग खुदा बन बैठते हैं
मिट्टी के ही पुतले हैं सब, ये दास्तान देख ली हमने।

बुलंदियों पे पहुँच कर 'देव', कभी पीछे मुड़ कर देखना
ज़मीं से जो दूर ले जाए, वो ऊँची उड़ान देख ली हमने।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही

चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही 

चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है,
और ख्वाब की आंच पे कब से उम्र पुरानी पक रही है।

यादों के सूखे ईंधन पे पलकों ने कुछ स्वप्न पकाये,
भावों के बरतन में रखकर उम्मीदों ने स्वाद सजाये।
पलकों के पानी से लेकिन उबल रही है कहीं जिंदगी,
और कड़ाही में प्रश्नों की सुलग रही है मौन बंदगी।

कहीं रसोई बाट जोहती कहीं रसोई महक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

धुँआ-धुँआ सा जीवन सारा अब आँखों में धुँधलापन है,
इच्छाओं की सिगड़ी पर क्यूँ झुलस रहा मन का आँगन है।
तपिश बढ़ी तो देखा हमने कुछ छलक रहा है भीतर से,
लाख छुपाये सिलवट लेकिन हर दर्द दिख रहा ऊपर से।

खाली कलछी की खन-खन से बेसब नन्ही चहक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

रिश्तों का घी मिला दिया है कुछ बातों का बना मसाला,
कड़वे सच के शोर में छुपा ख़ामोशी बन एक निवाला।
कोई परोस रहा है खुशियाँ कोई गम को चख रहा है,
वक़्त बना है मौन रसोइया सबका लेखा रख रहा है।

कड़वे सच की छौँक लगी जब बात हृदय को दहक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

पक जाएगी तब ये हांडी उस दिन होगी ये शांत आग,
इस माटी को मिल जायेगा जब नूतन कोई नेह राग।
तब तक जलना किस्मत में और तब तक इसका तपना काम,
चिंतन के चूल्हे पर जब तक हाँडी को हो पूर्ण विश्राम।

चहक रही है कहीं आग ये और कहीं पर लहक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मौन का महाकाव्य

  मौन का महाकाव्य मौन की स्याही निरंतर बह रही, पीर अंतस की अधूरी कह रही। चाह कर भी जो कभी कह न पाया, साध वो आँखों से अश्रु बन बही। शीत में भ...