पानी जैसा जीवन अपना
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप।
कभी नदी बन, कभी धार बन धोये सब संताप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥
कभी हिमालय की गोदी में बनकर बर्फ ठहरता है,
और कभी तपती धरती पर, बादल बना बरसता है।
रूप बदलता पल-पल इसका फिर भी रहता साफ।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥
पत्थर से टकराकर भी यह,
अपनी राह बनाये।
झुककर नीचे चलता है फिर सागर से मिल जाये।
हार नहीं स्वीकारे पथ में चाहे कितने आये ताप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥
प्यासे अधरों की मुस्कानें इसको पाकर खिलतीं,
सूखी धरती की बाँहों में आशा बनकर ढलतीं।
दूजे के मन को हर्षाये तोड़े सब अभिशाप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥
इसका न तो रंग है कोई और न इसकी जात,
जिससे मिलता ढल जाता है जैसा होता पात।
हम भी अपना अहं भूलकर हो जायें निष्पाप,
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥
अंत समय सागर में मिलकर खुद पहचान गँवाए,
बूँद-बूँद का जीवन फिर भी अनंत कथा कह जाए।
मिलना ही तो सत्य जगत का है बाकी क्षणिक विलाप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥
राह मिले तो प्रेम बनें हम मिले प्यास तो पानी,
दुख में बनें किसी की आशा बन जाएँ मुस्कानी।
अपने हिस्से का सुःख बाँटें छोड़ें मधुर प्रताप,
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप।।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें