मानसून
नील गगन की मौन शिला पर, मेघों ने संदेश लिखा,
प्यासी धरती के आँचल में, सावन ने परिवेश लिखा।
दूर क्षितिज की धुँधली रेखा, स्वप्निल होकर गाती है,
बूढ़े पीपल की हर डाली, नव यौवन अपनाती है।
शुष्क अधर पर बूँदों ने यूँ, प्रथम प्रणय का स्पर्श दिया,
सोई-सोई धड़कन को फिर, जीवन का उत्कर्ष दिया।
मंद पवन की उँगली थामे, भीनी-भीनी गंध चली,
वन की वीणा के तारों पर, मधुरिम पौन फुहार चली।
मोर मुकुट-सा नाच रहा है, पुलकित वन की साँस चली।
प्रकृति स्वयं आरती लेकर, मेघ-मुकुट की आस चली।
किसने आँसू मोती करके, नभ के आँचल में टाँके,
किसने विरही मन की पीड़ा, वर्षा-बिंदु बना आँके।
हर बूँदों में स्नेह धरा का, भूली स्मृतियाँ जाग चलीं।
टूटे सपनों की राखों से, नूतन कलियाँ जाग चलीं।
मौसम का ये रूप सुहाना, जीवन का संगीत बने,
टूटे मन के आँगन का ये, फिर से पावन मीत बने।
जब तक इस धरती पर मानव, प्रेम-सुधा का प्यासा है,
तब तक तेरी हर रिमझिम में, ईश्वर का ही वासा है।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद