मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा

मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा

गिराओ न यूँ छंद की मान्यता को,
मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा।
शब्द यदि भावना से हुए दूर ऐसे,
गीत का अर्थ भी फिर किधर जायेगा।
गिराओ न यूँ छंद की मान्यता को,
मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा।

अब वचन नीतियों में दिखावा हुआ है,
सत्य का दीप जैसे पराया हुआ है। 
सिद्धांत बिकते हैं अब कुर्सियों के लिये ,
लोकहित भी कहीं अब तमाशा हुआ है।
जब विवेकों का सौदा सियासत करेगी,
लोकतंत्रों का चेहरा बिगड़ जायेगा।
या मुखौटों के पीछे ही चेहरा छिपेगा,
और विश्वास भीतर से मर जायेगा।

गिराओ न यूँ छंद की मान्यता को,
मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा।

संस्कृति के दिए टिमटिमा तो रहे हैं,
पर हवाओं में संस्कार कम हो रहे हैं।
उत्सवों की चमक खूब बढ़ती गई है,
पर अँधियारे मन के ये बढ़ते रहे हैं।
भाव यदि मर गये रीतियाँ शेष होंगी,
और विरासत ही बस शेष रह जायेगा।
घर सजेंगे मगर वो घरौटन न होगा,
अपना आँगन ही अनजान हो जायेगा।

गिराओ न यूँ छंद की मान्यता को,
मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा।

बिक रहा आज बचपन, जवानी, बुढ़ापा,
मोल हर चीज़ का है लगा जो सको तो।
अब बाजारों ने रिश्तों को तौला ऐसे,
प्यार खुदरा हुआ है बचा जो सको तो।
माँ की ममता जो अब विज्ञापनों में सजी,
तो कौन आँचल की छाया में पल पायेगा।
जब जरूरत ही रिश्तों की पहचान होगी,
कौन अपना कहेगा, कौन रह जायेगा।

गिराओ न यूँ छंद की मान्यता को,
मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा।

भाई भाई से अब दूर होता गया है,
जाने कैसी हवा आज चलने लगी है।
एक छत के तले लोग रहते हैं लेकिन,
दूरियाँ जाने रिश्तों में बढ़ने लगी है।
रोशनी फोन की अब बहुत तेज है पर,
नेह आँखों में अब वो नहीं दिख रहा।
पास बैठा हुआ आदमी दूर इतना,
चाह कर भी कोई अब नहीं दिख रहा

दूरियों में कहीं भाव खोये अगर तो 
आत्मा-आत्मा से बिछड़ जायेगा।

फिर भी उम्मीद का दीप बुझने न देना,
अँधेरों को सूरज समझने न देना।
शब्द में सत्य हो, भाव में प्रेम हो तो,
टूटते मन को लेकिन बिखरने न देना।
मनोरंजन नहीं गीत केवल कवि का ,
यह समय का भी दर्पण, कथन हो सके।
एक सच्ची कलम जब जगाने लगे तो,
भाव मन के यहाँ फिर वचन हो सकें।

दबाओ न फिर गीत की कामना को 
भाव फिर गीतिका से बिछड़ जायेगा।


गिराओ न यूँ छंद की मान्यता को,
मर्म कविता का सारा बिखर जायेगा।
शब्द को शब्द रहने न देना अकेला,
भाव से जोड़ दो गीत बन जायेगा।

✍️ अजय कुमार पाण्डेय

बेटी- ईश्वर की मधुर ऋचा

बेटी — ईश्वर की मधुर ऋचा

वेदों की पावन श्लोकों से जिसके बोल सुहाने हैं,
रामायण की सभी पंक्तियाँ जिसके मन को भाने हैं।
गीता के श्लोकों के जैसी जिसकी बातें न्यारी हैं,
बेटी घर में जन्मे तो हर साँस लगे सुखकारी है।

उपनिषदों की ज्ञान-ज्योति सी आँखों में उजियारा है,
मंत्रों की पावन ध्वनि जैसी तुतलाता स्वर प्यारा है।
जिसके हँसने से आँगन में मंगल दीपक जलते हैं,
बेटी के नन्हे कदमों से सपने स्वयं सँवरते हैं।

वेद ग्रंथ के पुण्य कथानक उसकी छवि में बसते हैं,
देवों के आशीष सभी मृदु मुस्कानों में हँसते हैं।
जन्म-जन्म के पुण्य फलित हों बेटी जब मुस्काती है,
उसके नन्हे अधरों से तो स्वयं वंदना गाती है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

साथी बोलो क्या गाऊँ



साथी बोलो क्या गाऊँ

विकल रागिनी हुलस रही है, अंतस से बाहर आने को,
मृदुल गीत भी द्वार खड़े हैं, अधरों का आदर पाने को।
कहो भुला दूँ अंतर क्रंदन, या उनको गीतों में गाऊँ,
या शब्दों के घनीभूत से, पीड़ा सम प्रस्तर पिघलाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

विरह-वेदना साँसों में है, नयनों में जलधार बढी है,
सूनेपन की शैया पर अब, तेरी यादें साथ खड़ी हैं।
हँसता जग है, रोता मन है, किसको अपना हाल सुनाऊँ,
टूटे सपनों की किरचों से, कैसे जीवन पंथ सजाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

महलों में उत्सव की बेला, झोंपड़ियों में रात पड़ी है,
भूखे बच्चे ताक रहे हैं, रोटी पर भी मार पड़ी है।
सोने वालों के घर सोना, श्रम का मूल्य कहाँ से पाऊँ,
मेहनत की इस धूप में अब, किसको अपना क्लान्त सुनाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

अब देवों के गलियारों में, हर शब्द बहुत ही सीमित हैं,
याचक के सूने आँगन में, प्रश्न मगर अब भी जीवित हैं।
वादों की बरसात हुई पर, सूखी धरती क्या बतलाऊँ,
जो मैं सत्य नहीं लिख पाऊँ, बोलो कैसे आँख मिलाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

जाति-धर्म की दीवारों की, खाई मन के बीच हुई हैं,
नफ़रत की आँधी में जाने, कितनी साँसें रीत रही हैं।
मानवता का दीप जलाकर, किसके द्वार आज मैं जाऊँ,
बँटे हुए इस देश-हृदय को, प्रेम-सुरों से कैसे गाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

तू भी दूर देश में साथी, मैं भी अपनी पीर लिये हूँ,
तेरी यादों की गठरी में, अपना सारा नीर लिये हूँ।
तू होता तो दर्द बाँटकर, शायद थोड़ा सा मुस्काऊँ,
तेरे काँधे पर सिर रखकर, मन की गाँठें खोल सुनाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

जब तक श्रम का मान न होगा, कैसे सुख का भोर खिलेगा,
जब तक अंतिम जन न हँसेगा, कैसे भारत पूर्ण खिलेगा।
झूठ, छलावे, भेद मिटाकर, सच का सूरज फिर दिखलाऊँ,
मन की पीड़ा गीत बनाकर, मैं जन गण मन तक पहुँचाऊँ,
साथी बोलो क्या गाऊँ।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
जाग उठे हैं सोए शोले,
नस-नस में अंगार जगे,
मौन पड़े जो होंठ अभी तक,
उनमें अब हुंकार जगे।

झुकने वाली रीढ़ नहीं है,
आँखों में अब ज्वाला है,
अन्यायों की नींव हिलेगी,
अब हर योद्धा मतवाला है।

शंख नाद है युद्ध भूमि का 
नई चेतना धार चलेगी,
जो अधिकार दबे थे कल तक,
उनके हित तलवार चलेगी।

मेहनत ही पहचान बनेगी 
अब जन गण मन बोलेगा,
कुरुक्षेत्र में पार्थ खड़ा हो
अब प्रत्यंचा खोलेगा।

कुर्सी सेवा का आसन है,
सत्ता कोई ताज नहीं,
जनता से जो दूर हुआ तो
उसका कोई राज नहीं।

झूठे वादों और नारों का 
अब अंधकार भागेगा,
लोकतंत्र के मंदिर में फिर
जन-जन का स्वर गायेगा।

जाति-धर्म की दीवारों से
ऊँचा मानव धर्म रहे,
जिस भारत में श्रम का गौरव,
उस भारत का मर्म रहे।

अब न कोई भय आँखों में,
अब न कोई मौन रहेगा,
सत्य जहाँ भी दबता होगा,
वहाँ नया स्वर कौन कहेगा?

हम तूफानों से टकराएँ,
हम चट्टानों से भिड़ जाएँ,
जिस मंजिल पर न्याय खड़ा हो,
उस मंजिल तक बढ़ते जाएँ।

रक्त नहीं, संकल्प चाहिए,
भारत श्रेष्ठ बनाना है,
हर अलसाई आँखों में,
नूतन स्वप्न जगाना है।

आज समय ने द्वार खटखटाया,
अब निर्णय की घड़ी खड़ी,
कल तक जो केवल सोच रहे थे,
अब उनकी बारी आन पड़ी।

चलो उठाएँ मशाल सत्य की,
चलो जगाएँ सोया देश,
अन्यायों के अंधकार में,
नव प्रकाश का दें संदेश।

अब न कोई आवाज दबेगी,
न कोई अधिकार झुकेगा,
जिस भारत का स्वप्न सजाया,
वह भारत अब न रुकेगा।

सीने में विश्वास जगे तो
पर्वत भी झुक जाते हैं,
जनता जब संकल्प करे तो
युग के पक्ष बदल जाते हैं।

शंखनाद है राष्ट्र प्रेम का ,
पीछे कैसे हटना,
जीवन से बढ़कर है अपने,
सत्य राह पर चलना,
मुट्ठी में संकल्प लिए हम,
हर बदलेंगे अँधियारा 
जनता की हुंकार से गूँजे,
भारत का जयकारा।

आखिर कब तक

आखिर कब तक 

चल तो सकता हूँ, पर कैसे,
कह तो सकता हूँ, पर कैसे,
सह भी सकता हूँ, पर कब तक,
रह भी सकता हूँ पर कब तक,
आखिर कब तक यूँ होगा?

नारी की आँखों में आँसू,
होठों पर चुप्पी भारी है,
घर की देहरी से संसद तक,
किसकी अब जिम्मेदारी है?
जिसने जीवन भर बस झेला ,
उसका भी सम्मान तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?

पुरुष खड़ा है धूप में तनकर,
मन में कितने घाव लिए,
हँसता है दुनिया के आगे,
अंदर कितने दाव लिए।
जिस दर्द को कह न पाया,
उसका कुछ अहसास तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?

मेहनत जिसने रातें काटीं,
योग्यता को साथ रखा,
फिर भी अवसर उनसे छीना,
जिनका केवल हाथ बड़ा।
कब तक प्रतिभा द्वार खड़ी हो,
क्या प्रतिभा का सम्मान भी होगा 
आखिर कब तक यूँ होगा?

सत्ता सेवा से दूर हुई है,
राजनीति व्यापार बनी,
शब्द हुए हैं खोखले सारे,
नीयत जैसे हार बनी।
कुर्सी से ऊपर देश उठेगा,
कब ऐसा ऐलान तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?

जाति-धर्म के नाम पे बाँटें,
मन में दीवारें खींच रहे,
अपने ही घर के आँगन में,
अपने ही रिश्ते रीझ रहे।
जिस दिन मानव पहले होगा,
उस दिन नया विहान तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?

बिकता सच अखबारों में है,
झूठ सजाया जाता है,
जिसके पास नहीं है ताकत,
उसको ही दबाया जाता है।
निर्बल की आवाज सुनेगी,
ऐसा कोई प्रभात तो होगा।
आखिर कब तक यूँ होगा?

शिक्षा लेकर युवा खड़े हैं,
आँखों में अरमान लिए,
योग्य हाथ अवसर को तरसें,
कंधों पर सम्मान लिए।
मेहनत की फिर कीमत होगी,
ऐसा फिर अंदाज तो होगा,
आखिर कब तक यूँ होगा?

जो चुप हैं, उनकी चुप्पी भी
एक दिवस आवाज बनेगी,
झूठ की ऊँची दीवारों पर
सच की पहली छाप पड़ेगी।
अन्यायों की रात ढलेगी,
न्याय का फिर प्रात तो होगा
आखिर कब तक यूँ होगा?

चलना होगा, कहना होगा,
सहना भी ये कब तक होगा।
अन्याय की हर दीवारों को 
एक न एक दिन ढहना होगा 
हम बदलेंगे, पल बदलेगा,
फिर से नया विहान तो होगा,
आखिर ऐसा कब होगा?

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

कर्तव्य

कर्तव्य-एक मौलिक महाकाव्य

मंगलाचरण

वाणी! आज नहीं माँगूँ मैं केवल मधुरिम गान,
आज जगा दे शब्दों में फिर से सोया इंसान।
ऐसी अग्नि जगा दे हिय में मिटे कायरता ताप,
सत्य-पथिक के चरणों में स्वयं झुक जाये संताप।

हो नहीं विजय की कामना हो नहीं पराजय-भीति,
कर्म बने आराध्य सदा और सत्य बने संगीत।
हों पथ पर कंटक चाहे उस पथ से कभी न भागो,
कर्तव्य जहाँ पुकारता उस पथ पर राग लगाओ।

वाणी! आज जगा दे फिर वही सोया हुआ विचार,
शब्दों में फिर से भर दे भागवत का सारा सार। 
झूठ जहाँ सिंहासन पर और सत्य जहाँ लाचार,
कर्तव्य पथ पुकार बने, बने मानव का आधार।

नहीं चाहिए यश हमको, नहीं हो स्वर्णिम सम्मान,
कर्म-पथिक के चरणों में, केवल सत्य बने महान।
कंटक से पथ भले सजे, पर हो कभी नहीं विराम,
जिस पथ पर कर्तव्य रहे वहीं सदा हमारा धाम।

सर्ग 1 — प्रश्न

जीवन के चौराहे पर है मानव खड़ा अकेला,
एक तरफ सुख का सागर है दूजी ओर झमेला।
मन कहता सरल राह ले क्यों कर काँटों पर चलना,
अंतस बोला सत्य यही बिखरी माला को गुहना।

किसके हित में जीना है किसके हित में मरना है,
केवल इस सुख के पीछे कब तक यूँ ही चलना है।
जीवन यदि केवल अपना, कहो जीवन का क्या मान,
औरों के दुःख में जगे वही है सच्चा इंसान।

सुख ने अपना हाथ बढ़ाया आ मेरे संग चलो,
फूल बिछे हैं पंथ तुम्हारे काँटों पर मत चलो।
धर्म खड़ा था दूर वहीं लिये आँखों में अंगार,
फूलों से कब मिलता बस यहाँ जीवन को सत्कार।

मानव ने तब शीश उठाकर अपना हृदय टटोला,
अंतस के बंद कपाटों को धीरे-धीरे खोला।
एक प्रश्न ने जन्म लिया फिर क्या मेरा धर्म हुआ, 
यहीं से कर्तव्य-गाथा का फिर पहला जन्म हुआ।

सर्ग 2 — कर्तव्य का जन्म

माँ ने अपनी भूख भुलाकर शिशु को अन्न खिलाया,
और पिता ने जब सपनों को संतति पर बरसाया।
जब गुरु ने निद्रा त्यागी चहुँ ज्ञान-ज्योति जलवाई,
तब मानव के भीतर पहली कर्तव्य-ज्योति आई।

जब किसान ने तप्त धरा में बीज प्रेम से बोया,
और श्रमिक ने स्वेद बहाकर जग का स्वप्न सँजोया।
जब सैनिक ने सीमा पर अपना जीवन वार दिया,
कर्तव्यों ने मानवता की कश्ती को रफ्तार दिया।

कर्तव्य यहाँ बस शब्द नहीं ये जीवन की धारा है,
यह तो साँसों में बसता है जिससे जीवन न्यारा है।
इससे ही निर्बल मानव स्वयं खड़ा हो जाता है,
कर्म जहाँ कर्तव्य बना है वो जीवन ही गाथा है।

नहीं हमेशा युद्धभूमि में तलवार उठानी है,
कभी कहीं आँसू पोंछो यही वीरता जानी है।
निज सुख के ऊपर जिसने कर्तव्यों को माना है,
उसने ही मानव जीवन के सार तत्व को जाना है।

सर्ग 3 — मोह

मोह मधुर स्वर में बोला अपनों का तो मान करो,
दृढ़ हो बोला सत्य वहाँ नैतिकता का ध्यान धरो। 
दुनिया ऐसे ही चलती है कुछ समझौते होते हैं,
सत्य यहाँ बाजारों में सिक्के कम ही होते हैं।

जिससे तुमको लाभ मिले उसको ही अपना मानो,
जो बाधक हो कभी मार्ग में उसको दूजा जानो।
कर्म-वर्म सब ठीक मगर पहले अपना शुभ देखो,
दुनिया की चिंता छोड़ो पहले अपना सुख देखो।

मानव बोला मोह सत्य वाणी मधु-सी मीठी है ,
पर भीतर जो स्वार्थ छिपा बोलो कैसी रीती है।
मोह हँसा सत्य बचाकर अपनों को ही खो दोगे,
बोलो कैसे सत्य रहेगा जब खुद ही रो दोगे।

तब अंतर से स्वर निकला प्रेम अगर ये सच्चा है,
तो फिर सच के आगे झुकना ही उसका अच्छा है।
जो अपने के दोष छिपाकर न्याय मिटा देता है,
यही मोह आगे जाकर कटु को प्रश्रय देता है।


मोह गया तो मानव ने फिर निर्मल मन को पाया,
सत्य कठिन था फिर भी उसने उसको गले लगाया।
तब जाकर समझा उसने यहाँ प्रेम नहीं अधिकार,
सच्चा प्रेम वही बसता जहाँ सच का हो सत्कार।


सर्ग 4 — भय

भय आया बनकर प्रहरी देखा आगे मृत्यु खड़ी 
जिससे भिड़ने को जाते देखा उसकी शक्ति बड़ी।
जीवन प्यारा है तो फिर क्यों संकट मोल उठाते,
थोड़ा चुप रह जाते यदि ये दिन सुख से कट जाते।

मानव बोला मृत्यु अटल है इससे कौन बचा है,
लेकिन उससे पहले मरना कैसा कहो नशा है।
भय के कारण यदि सच से भी मोड़ लूँ मुँह मैं आज,
जीवित होकर भी मेरा यहाँ जीवन होगा लाज।

भय बोला अपमान मिलेगा साथी सब छूटेंगे, 
मानव बोला सच के आगे झूठे ही टूटेंगे।
 हार मिलेगी हार सही पर धर्म नहीं हारूँगा,
मृत्यु मिलेगी मृत्यु सही बन कायर ना भागूँगा।

मानव हँसा मृत्यु से डरकर अब जीवन कौन जिए,
साँस बची पर सत्य गया तो फिर जीवन किसे कहें। 
मृत्यु एक दिन आनी है यही निश्चित है संसार,
उससे पहले मर जाना यहाँ सबसे बड़ा विकार।


सर्ग 5 — पिता

मौन द्वार पर पिता खड़े मुख पर श्रम की रेख लिये,
आँखों में गत वर्षों का पूरा-पूरा लेख लिये।
बोले बेटा धन से बढ़ कर्मों की पहचान यहाँ,
जीवन छोटा हो लेकिन छोटा मत कर मान यहाँ।

मैंने केवल जन्म नहीं तुमको है संघर्ष दिया,
गिरकर फिर उठने का है मैंने तुझको हर्ष दिया।
मेरे श्रम की सच्ची कीमत तुम धन से मत आँको,
मेरी आँखों की आशा में अपना कल पहचानो।

पिता का ऋण चुकता न होगा नहीं करना अभिमान,
मेरे नाम से बढ़कर रखना अपना निज सम्मान।
अगर कभी मेरे हित में भी सत्य पड़े ठुकराना,
बेटा तब भी सच को चुनना केवल धर्म निभाना।

पुत्र झुका आँखों में अश्रु और हृदय हुआ गंभीर,
हाथ शीश पर रख कहा पिता ने न हो यूँ गंभीर। 
बोले मेरी अंतिम इच्छा बस इतनी स्वीकारो,
जिस दिन कर्म पुकारे तुझको दुविधा में मत हारो।

सर्ग 6 — माता

माँ बैठी थी दीप जलाकर साँझ उतर आई थी ,
आँचल में जैसे उसके दुनिया सभी समाई थी।
बोली बेटा मेरे कारण सत्य नहीं तुम छोडो,
ममता के कारण नाता तुम नहीं धर्म से छोडो।

दूध पिलाया नहीं इसलिए के तू सुख में सोये,
ऐसा दीप बने तू जिससे हर अँधियारा खोये।
जिसकी आँखों में आँसू हों उसको धैर्य दिलाना,
भूखे को अपना अन्न खिला फिर घर वापस आना।

माँ का ऋण क्या चुका सकेगा कहो तुम्हीं संसार,
पुष्प मुझे चढ़ाने से बढ़कर कर देना उपकार।
जहाँ किसी निर्बल को कोई आस टूटती देखो,
अपना हाथ बढ़ा देना कुछ और नहीं प्रिय सोचो।

माँ की आँखों से दो बूँदें आकर गिरीं धरा पर,
मानो गंगा उतर पड़ी हो बेटे के अंतर पर।
माँ ने कहा अब जा बेटा सत्य रहे तेरा मान,
तेरे कर्मों से जीवित हो धर्म मेरा सम्मान।

सर्ग 7 — संतान

पुत्र ने आतुर होकर पूछा दुविधा हरो तमाम,
पिता जगत में बड़ा है क्या फिर धन, वैभव या नाम।
बोले बेटा श्रेष्ठ है सबसे निर्मल निज ईमान,
जिसके आगे जग झुक जाए वही सच्चा धनवान।

धन खो जाये तो पा सकता इसको पुनः संसार,
पद छूटे तो मिल सकता यहाँ अवसर बारंबार।
लेकिन चरित्र खोया यदि तो क्या वापस आएगा,
टूट गया विश्वास अगर कैसे फिर जुड़ पायेगा।

बालक बोला अगर अकेला सत्य राह पर जाऊँ,
कहिये मुझसे आप वहाँ मै कैसे सत्य निभाऊँ।
बहुमत चाहे गलत संग हो मत उसकी तुम सुनना,
सत्य भले कम हो संख्या में उसको ही तुम चुनना।

बालक ने फिर हाथ उठाकर प्रण मन में दोहराया,
जीवन केवल स्वार्थ नहीं यह पाठ समझ में आया।
उस दिन से उस बालक ने निज मन में दीप जलाया,
कर्तव्य का बीज भविष्य ने आज गोद में पाया।

सर्ग 8 — गुरु

गुरु ने जब शिष्य से पूछा ज्ञान कहाँ तक पहुँचा,
शिष्य ने कहा शास्त्र पढ़े हैं बहुत ज्ञान है सीखा।
गुरु बोले यदि किसी दुखी का दुःख जब तक न मानो,
अक्षर सभी व्यर्थ रहेंगे यदि मानवता न जानो।

ज्ञान वही जो हाथ थाम भटके को राह दिखाए, 
विद्या वो जो अज्ञानी का हर अँधियार मिटाये। 
शक्ति वही जो निर्बल के हित अपना शीश झुकाए,
धर्म वही जो सत्य मार्ग पे स्वार्थ सभी तज जाये।

शिष्य ने कहा हे गुरुवर यदि सत्य कठिन हो जाये,
गुरु ने कहा कठिनाई ही सत्य को सत्य बनाए।
फूलों वाली राह यहाँ पर कोई भी चुन सकता,
काँटों पर जो चला उसे ही मनुज श्रेष्ठ जग कहता।

जान शिष्य ने गुरु चरणों में अपना शीश नवाया,
ज्ञान नहीं केवल पढ़ना है, जीवन में अपनाया।
गुरु मुस्काये बोले - शिक्षा ने अपना अर्थ लिया,
जब कर्तव्य ने मन के भीतर अपना घर कर लिया।

सर्ग 9 — किसान

भोर हुई जब कृषक खेत में हल लेकर फिर आया,
माटी को माथे से छूकर उसने प्रण दुहराया।
धरती बोली क्या पाओगे क्या है तेरा सपना,
बस कोई भूखा नहीं रहे सपना है बस इतना।

धूप कड़क हो कड़ी वर्षा हो फिर भी पथ न छोड़े,
कभी वो सूखा खेत जलाए फिर भी मन न तोड़े।
उसके श्रम से ही नगरों में नव जीवन हैं पाते,
उसकी उद्द्यम से लाखों हैं अन्न ग्रहण कर पाते।

हैं जिसके हाथ यहाँ हल थामे उनका मान करो,
जिसने जग को अन्न दिया है उसका सम्मान करो।
कर्तव्यों का भाव हृदय भर करता जगत खुशहाल,
अपने सुख को भूलकर भी जो भरता सबकी थाल।

फसलें जब लहराती है तब धरती मुस्काती है,
थकी हुई आँखों में तब ही ज्योति नई आती है।
उसके श्रम को नमन करे यह सारा हिंदुस्तान,
अन्नदाता के कर्तव्यों से जीवित है इंसान।

सर्ग 10 — श्रमिक

ईंटों पर ईंटें रखता वहाँ एक श्रमिक था मौन,
उसकी मेहनत से उठता था नगरों का हर कोण।
महलों की ऊँची दीवारें उसके हाथों की थीं,
पर उसकी अपनी झोंपड़ियाँ बस फूसों की थीं।

माथे से जो बहा स्वेद धरती पर गिरता जाता,
हर एक बूँद किसी भवन की नव नींव बना जाता।
जिसके श्रम पर जग चलता है उसको मत बिसराओ,
नव निर्माण करे हाथों का पहले मान बढ़ाओ।

कर्तव्य न केवल सिंहासन के इर्द-गिर्द बँधता,
कर्म श्रेष्ठ हो जिस जीवन का सदा वहीं यह रहता।
जिनके श्रम से पथ बनते और बनते घर संसार,
श्रम का सच्चा मान यही और मानवता का सार।


सर्ग 11 — सैनिक

हिम से ढकी हुई सीमा पर, प्रहरी एक खड़ा था,
दूर कहीं उसका परिवार, उसकी राह तका था।
जेब में थी बच्चों की चिट्ठी, आँख हुई कुछ नम,
फिर भी उसने सीमा देखी—“पहले मेरा धर्म।”

माँ ने पूछा था—“कब आओगे?” उत्तर उसने भेजा,
“देश सुरक्षित होगा जब ही, लौटूँगा माँ, मेरा।”
पत्नी ने लिखा—“बच्चे तुमको, रोज बहुत बुलाते,”
उसने लिखा—“उनके भविष्य की, खातिर ही तो जाते।”

गोली से अधिक भारी था, अपनों का वह प्यार,
फिर भी उसने सीना देकर, रोका हर प्रहार।
अपने जीवन से उसने, यह लिख डाला इतिहास—
कर्तव्य जहाँ पुकारे, वहाँ पीछे नहीं प्रयास।

जब तिरंगा उसके ऊपर, लहराया उस दिन,
धरती ने भी शीश झुकाया, नभ हुआ मगन।
सैनिक केवल व्यक्ति नहीं, सीमा का विश्वास,
उसके जागने से सोता है, पूरा देश-निवास।

सर्ग 12 — राष्ट्र

राष्ट्र नहीं केवल मानचित्र पर, खिंची हुई रेखा,
राष्ट्र करोड़ों प्राणों की है, आशा और अपेक्षा।
राष्ट्र खेत की हरियाली है, श्रमिक का श्रमदान,
राष्ट्र जवानों की आँखों में, जलता स्वाभिमान।

राष्ट्रभक्ति केवल नारे, केवल जय-जयकार नहीं,
जनहित से बढ़कर कोई भी, राष्ट्रधर्म का सार नहीं।
कर से लेकर कर्म तक अपना, ईमान बचाना है,
देशभक्ति का अर्थ स्वयं को, योग्य बनाना है।

जहाँ सड़क पर कूड़ा फेंको, वहाँ देश छोटा होता,
जहाँ रिश्वत देकर काम कराओ, वहाँ देश रोता।
जहाँ किसी को न्याय न मिले, वहाँ तिरंगा पूछे—
“मेरे नाम पर जीने वाले, क्या मेरा मान रखोगे?”

राष्ट्र तभी महान बनेगा, जब महान हो जन,
जब कर्तव्य निभाएँ सब मिल, निर्मल हो आचरण।
सीमा पर जो सैनिक जागे, भीतर हम भी जागें,
तभी देश की असली शक्ति को, दुनिया पहचाने।

सर्ग 13 — न्याय

न्यायासन पर बैठा था वह, सामने अपना भाई,
एक तरफ था रक्त का रिश्ता, दूजी ओर सच्चाई।
आँखों में आँसू थे लेकिन, वाणी थी गंभीर,
बोला—“रिश्ता अपनी जगह है, न्याय रहे निर्भीक।”

भाई बोला—“रक्त हमारा, क्या इतना भी व्यर्थ?”
न्याय बोला—“रक्त महान है, पर सत्य उससे अर्थ।”
यदि अपराध को ढँक दूँगा, न्याय कहाँ रह जाएगा?
कल निर्दोष का कौन यहाँ फिर, जीवन बचाएगा?

निर्णय कठिन था, हाथ काँपे, फिर भी कलम चली,
एक घर की पीड़ा लेकर, न्याय की ज्योति जली।
जिस दिन अपने विरुद्ध भी, सत्य कह सको महान,
उस दिन समझो न्याय तुम्हारे, भीतर है विद्यमान।

रिश्ते टूटे, आँखें रोईं, फिर भी मन न हारा,
सत्य बचा तो उस निर्णय ने, सबका मान सँवारा।
न्याय जहाँ निष्पक्ष रहे, वहाँ धर्म महान,
अन्यथा सिंहासन भी केवल, बन जाता श्मशान।

सर्ग 14 — सत्ता

सत्ता ने आकर मानव से, कहा—“मैं शक्ति अपार,
मेरे हाथों में है अब तो, पूरा अधिकार।”
कर्तव्य बोला—“शक्ति मिली है, सेवा करने को,
नहीं मिली है मानव को, मानव से डरने को।”

राजदंड यदि न्याय बचाए, तब वह राजदंड है,
जनहित यदि उसके भीतर हो, तभी सही प्रबंध है।
सत्ता यदि भय बन जाए तो, शासन नहीं दमन,
जनता की आँखों में आँसू हों तो, व्यर्थ है सिंहासन।

राजा वह जो पहले जनता, फिर अपना हित देखे,
जिसके द्वार पर अंतिम जन भी, अपना अधिकार लेखे।
जिसकी नींद गरीब की पीड़ा, सुनकर टूट जाए,
उस शासक के नाम से ही, राष्ट्र नया बन जाए।

सिंहासन आते-जाते हैं, सत्ता रहती नहीं,
कर्मों की गाथा लेकिन, कभी मिटती नहीं।
जिसने जन के लिए जिया, वह राजा अमर महान,
जिसने जन को भूल दिया, उसका मिटता नाम।

सर्ग 15 — स्वार्थ

स्वार्थ खड़ा था मुस्कुराता—“पहले अपना देखो,
दुनिया का दुख बाद में, पहले अपना सुख लेखो।”
मानव बोला—“अपना घर भी, जग से अलग कहाँ?
दूसरों के आँसू में भी, मेरा ही अंश यहाँ।”

यदि मेरे सुख की नींव किसी के, दुःख पर रखी जाए,
तो ऐसी समृद्धि भी मन को, कैसे सुख दे पाए?
यदि मेरी थाली भर जाए और, पड़ोसी भूखा सोए,
तो मेरे भोजन के कण भी, मुझको धिक्कारें रोए।

अपने हिस्से का थोड़ा सुख भी, बाँट सको तो बाँटो,
टूटे मन को प्रेम का कोई, छोटा दीप दिखाओ।
जीवन की संपत्ति वही है, जो जग के काम आए,
जो केवल तिजोरी में हो, वह क्या सुख दे पाए?

स्वार्थ गया तो मन के भीतर, जैसे प्रभात हुआ,
छोटा जीवन भी उस क्षण से, विशाल विराट हुआ।
अपने से ऊपर उठ जाना, मानवता का मान,
स्वार्थ जहाँ सीमित हुआ, वहीं बड़ा इंसान।

सर्ग 16 — धन

धन ने पूछा—“कितना चाहो?” मानव बोला—“इतना,
जिससे जीवन चल जाए और, भूखा न सोए कोई।”
धन हँसा—“और चाहोगे?”—“हाँ, पर अपने लिए नहीं,
इतना कि शिक्षा से कोई, वंचित रहे ही नहीं।”

धन यदि केवल धन के लिए, फिर धन क्यों कमाना?
जिससे जीवन बने सरल, वही धन कहलाना।
भूखे के हाथों में रोटी, रोगी को उपचार,
अनाथ बच्चे की आँखों में, भविष्य की झंकार।

धन साधन है, साध्य नहीं है, इतना ध्यान रहे,
धन के कारण मानवता का, मूल्य न कम हो रहे।
ईमानत की छोटी कमाई, लाखों से महान,
निर्मल श्रम से आया धन ही, सच्चा धनवान।

जिस धन से घर बने मगर, मन में शांति न आए,
जिस धन से जग छले मगर, आत्मा रोज लजाए,
ऐसे धन को त्याग सके जो, वही धनी इंसान,
धन से ऊपर धर्म रखे जो, उसका ऊँचा मान।

सर्ग 17 — लोभ

लोभ ने स्वर्णिम थाल सजाई, बोला—“बस ले लो,
जो मिला नहीं अधिकार तुम्हें, उसको भी अब ले लो।”
कर्तव्य ने दृढ़ स्वर में कहा—“हाथ यहीं रुक जाएगा,
अन्यायों से भरा हुआ धन, मुझको नहीं भाएगा।”

लोभ कहता—“थोड़ा झुकोगे, पर्वत मिल जाएगा।”
सत्य बोला—“एक बार झुका तो, मन भी बिक जाएगा।”
धन का ढेर बड़ा हो जाए, पर आत्मा छोटी हो,
ऐसी विजय से तो बेहतर, जीवन की विपदा हो।

जिस वस्तु पर अधिकार न हो, उसको लेना चोरी,
जिस श्रम का फल अपना न हो, उस पर कैसी होरी?
न्याय से जो पाया जाए, उतना ही पर्याप्त,
संतोषी मन के आगे, धनवान भी है क्षीण।

लोभ गया तो मन के भीतर, शांति उतर आई,
छोटी रोटी में भी उसको, अमृत-गंध दिखाई।
जिसने इच्छा को जीत लिया, वही हुआ धनवान,
जिसके मन में संतोष रहे, वही सच्चा इंसान।

सर्ग 18 — सत्य

सत्य कभी तलवार नहीं, फिर भी सबसे धार,
सत्य कभी सिंहासन नहीं, फिर भी सबसे पार।
सत्य अकेला हो सकता है, लेकिन हारता नहीं,
झूठ महल बनाता फिर भी, भीतर टिकता नहीं।

सत्य कहोगे तो संभव है, अपने रूठ जाएँ,
सत्य चलोगे तो संभव है, पथ में शूल आएँ।
लेकिन झूठ बचाने को यदि, सत्य मिटा दोगे,
अपने ही अंतर के आगे, कैसे आँख मिलाओगे?

सूरज बादल में छिप जाए, सूरज मरता नहीं,
सत्य कभी परिस्थितियों से, अपना स्वर खोता नहीं।
समय लगे तो लगने दो, सत्य रहेगा सत्य,
अंततः झूठे ताजों से, ऊँचा होगा सत्य।

सत्य की राह कठिन सही, फिर भी वही महान,
सत्य बचा लेता अंततः, मन का आत्मसम्मान।
जिस दिन मानव सत्य के आगे, अपना शीश झुकाए,
उस दिन उसके जीवन में, सच्चा प्रभात आए।

सर्ग 19 — असफलता

गिरा मनुष्य तो जग ने हँसकर, उसको दोष लगाया,
जिसने कल तक साथ दिया था, उसने हाथ छुड़ाया।
मानव बोला—“गिरना मेरे, जीवन का अंत नहीं,
पथ पर गिरकर उठ जाना ही, मेरी हार नहीं।”

असफलता ने पास आकर, उसको यह समझाया—
“मैंने केवल पथ रोका है, जीवन नहीं मिटाया।
जिसने मुझको गुरु माना, वह आगे बढ़ जाता,
जो मुझसे डरकर बैठ गया, वह जीवन हार जाता।”

पर्वत पर चढ़ते पथिक को, कितने पत्थर मिलते,
नदियों को भी मार्ग में कितने, बाँध रोकते मिलते।
चलते-चलते ही पथ खुलता, रुकने से क्या सार?
कदम थकें तो थमना क्षणभर, लेकिन मत स्वीकारो हार।

फिर मानव ने उठकर अपना, धूल भरा मुख धोया,
आँखों में फिर वही पुराना, दीपक उसने बोया।
असफलता भी उस दिन उसकी, गुरु बन गई महान,
गिरकर जिसने चलना सीखा, वही बना इंसान।

सर्ग 20 — संघर्ष

संघर्षों से भाग रहा था, मानव थका हुआ,
जैसे आँधी में कोई दीपक, अकेला जला हुआ।
अंतर बोला—“आग बनेगा या राख बन जाएगा?
जिससे भाग रहा है जीवन, उससे कब बच पाएगा?”

पर्वत ने कहा—“ऊँचाई का मूल्य पसीना है।”
नदिया बोली—“बहते रहना ही तो जीना है।”
सूरज बोला—“रोज उगना मेरा धर्म पुराना,
रात मिले तो भी न छोड़ूँ, जग को प्रकाश देना।”

संघर्ष कभी शत्रु नहीं है, जीवन का निर्माता,
वही मनुष्य को गढ़ता है, देता नई क्षमता।
सोने को भी तपना पड़ता, कुंदन बनने हेतु,
मानव को भी दुख सहना है, अपने होने हेतु।

मानव ने फिर बाँह चढ़ाई, माथे से पसीना पोंछा,
कहा—“संघर्षों से मैंने, अपना नाता जोड़ा।”
जिस दिन कठिनाई से मानव, मित्र बनाकर जीता,
उस दिन जीवन ने उसको अपना, सच्चा अर्थ दिया।

सर्ग 21 — त्याग

त्याग शब्द सुनते ही सबने, दुख का रूप समझा,
पर त्यागों के भीतर छिपा, जीवन का मधुर तराना।
दीपक खुद जलता है लेकिन, जग को राह दिखाता,
चंदन खुद घिसता है लेकिन, जग को गंध पहुँचाता।

माँ ने अपने सुख को त्यागा, पिता ने नींद गँवाई,
सैनिक ने घर-आँगन छोड़ा, सीमा पर जान लगाई।
किसान ने मौसम सहकर भी, अन्न उगाया खेत,
त्यागों की नींवों पर ही तो, खड़ा हुआ यह देश।

त्याग वही जो दिखावा न हो, जिसका हो न प्रचार,
जिसे स्वयं भी याद न रखे, फिर भी करे उपकार।
दाएँ हाथ से दान करे तो, बाएँ हाथ न जाने,
ऐसे त्यागों से ही जग में, मानवता मुस्काने।

अपने हिस्से की खुशियों में, थोड़ा जग को देना,
अपने मन के दीपक से भी, और दीप कर देना।
त्याग नहीं है जीवन का कोई सूना विराग,
त्याग वहीं जहाँ प्रेम बने, और प्रेम बने अनुराग।

सर्ग 22 — प्रेम

प्रेम अगर केवल पाने का, नाम हुआ तो क्या है?
प्रेम अगर अधिकार बने तो, प्रेम हुआ फिर क्या है?
प्रेम वही जो मुक्त करे और, सत्य राह दिखलाए,
जिसके सुख में अपना सुख हो, दुःख में साथ निभाए।

प्रेम कभी कर्तव्य बने तो, देवत्व उतर आता,
स्वार्थ मिटे और त्याग बचे तो, जीवन धन्य हो जाता।
जिसे बचाने हेतु मनुष्य, अपना अहं मिटा दे,
वही प्रेम इस धरती पर, अमर कहानी गा दे।

प्रेम नहीं कहता—“तुम मेरे हो, इसलिए मेरे जैसे रहो,”
प्रेम कहता—“सत्य जहाँ हो, निर्भय होकर वहीं चलो।”
बंधन से जो मुक्त करे और, मन में दीप जलाए,
ऐसा प्रेम मनुष्य को भीतर, मानव से देव बनाए।

प्रेम और कर्तव्य जब मिलकर, एक रूप हो जाते,
तब जीवन के सारे काँटे, फूलों में बदल जाते।
जिसके भीतर प्रेम बचा है, उसमें धर्म महान,
प्रेम रहित कर्तव्य भी केवल, बन जाता विधान।

सर्ग 23 — मित्रता

मित्र वही जो भूल तुम्हारी, सामने कहे निर्भय,
पीछे जाकर जय-जय बोले, वह मित्र नहीं निश्चय।
जो गिरने पर हाथ पकड़कर, फिर चलना सिखलाए,
जो अँधेरे में दीप बने और, राह नई दिखलाए।

मित्र कहे—“यह गलत है तेरा,” चाहे तुम रूठो,
सच्ची बात सुनाने वाला, कभी न तुमसे छूटे।
जो अपराध में साथ खड़ा हो, साथी हो सकता,
सच्चा मित्र अपराध रोककर, धर्म बचाता होता।

दो मित्रों के बीच न कोई, स्वार्थ खड़ा रह पाए,
एक गिरे तो दूसरा अपने, कंधे पर ले जाए।
मित्रता का अर्थ नहीं बस, सुख में साथ निभाना,
दुःख की घड़ी में मौन खड़ा हो, आँसू को सहलाना।

जिस मित्र ने सत्य बचाया, उसका ऋण महान,
जिस मित्र ने धर्म जगाया, उसका ऊँचा मान।
ऐसी मित्रता जीवन में, दीपक जैसी होती,
राह कठिन हो तब भी जिसकी, लौ कभी न सोती।

सर्ग 24 — समाज

समाज किसी और का घर नहीं, अपना ही विस्तार,
दूसरों के दुःख से भागोगे तो, कौन करेगा उद्धार?
एक घर की आग बुझाकर, क्या जग शांत रहेगा?
जब तक अंतिम दीप न जले, अँधियारा क्या मिटेगा?

जाति, वर्ग, भाषा, धन से, मनुष्य अलग नहीं होता,
रक्त सभी का लाल है, दुःख किसी का कम नहीं होता।
भूख किसी की जाति न पूछे, आँसू धर्म न पूछे,
मृत्यु किसी की उम्र न पूछे, जीवन कर्म को पूछे।

जहाँ किसी को न्याय न मिलता, वहाँ समाज अधूरा,
जहाँ किसी का पेट हो खाली, वहाँ सुख भी है झूठा।
जहाँ वृद्ध अकेला रोता हो, वहाँ उत्सव व्यर्थ,
जहाँ बच्चा शिक्षा से वंचित, वहाँ विकास भी व्यर्थ।

एक हाथ यदि दूसरे का, हाथ पकड़ ले आज,
एक मन यदि दूसरे मन का, समझ सके संताप।
तो समाज बनेगा सच में, मानवता का गाँव,
कर्तव्य जहाँ सबका होगा, वहीं मिटेगा घाव।

सर्ग 25 — वृद्ध

एक वृद्ध बैठा चौखट पर, राह निहारा करता,
जिस आँगन को उसने सींचा, वही उसे अब डरता।
बच्चे अपने व्यस्त बहुत थे, समय कहाँ दे पाते,
वृद्ध नयन हर साँझ मगर, द्वार तक लौट आते।

जिन हाथों ने उँगली पकड़कर, चलना हमें सिखाया,
जिन कंधों पर बैठाकर जग, हमको उन्होंने दिखाया,
उन काँपते हाथों को अब हम, कैसे भूल जाएँ?
उनके अंतिम दिनों में अपना, कर्तव्य क्यों भुलाएँ?

वृद्धावस्था कोई बोझ नहीं, जीवन का इतिहास,
हर झुर्री में छिपा हुआ है, वर्षों का विश्वास।
जिस घर में बुजुर्गों की आँखें, सम्मान से भरतीं,
उस घर की दीवारें भी फिर, आशीषों से झरतीं।

सेवा केवल दान नहीं है, अपना ही संस्कार,
वृद्धों का सम्मान बचाना, मानव का उपकार।
कल हम भी वृद्ध होंगे—यह बात रहे ध्यान,
आज जिसे हम देंगे सहारा, कल देगा वही मान।

सर्ग 26 — प्रकृति

वन ने पूछा—“मानव! मुझसे, इतना क्या पाया है?”
मानव बोला—“श्वास तुम्हारी, जीवन तुमने पाया है।”
नदियाँ बोलीं—“मुझको मैला करके किस धर्म में जीते?”
पर्वत बोले—“काट रहे हो, फिर किस पर घर रीते?”

पेड़ तुम्हारे पूर्वज जैसे, श्वासों के रखवाले,
नदियाँ माँ की गोद समान, जीवन की उजियाले।
धरती केवल भूमि नहीं है, आने वाली पीढ़ी,
इसके प्रति कर्तव्य तुम्हारा, सबसे पहली सीढ़ी।

एक वृक्ष लगाना पुण्य है, उसको बचाना धर्म,
जल की हर बूँद बचाना भी, मानव का सत्कर्म।
प्रकृति यदि घायल होगी तो, मानव कैसे बचेगा?
धरती का संतुलन बिगड़ा तो, जीवन कहाँ बचेगा?

जिस धरती ने जन्म दिया है, उसको मत दुख देना,
आने वाली संतानों को, स्वच्छ गगन तुम देना।
प्रकृति की रक्षा केवल, पर्यावरण विधान नहीं,
यह अपने ही भविष्य की रक्षा है—और कुछ नहीं।

सर्ग 27 — समय

समय खड़ा था सामने, बोला—“मैं चलता जाऊँगा,
जो करना है आज करो, फिर लौटकर न आऊँगा।”
मानव बोला—“कल कर लूँगा”—समय हँसा चुपचाप,
“कल की आशा में बीते हैं, कितने जीवन आप।”

कर्तव्य को टालोगे तो, अवसर भी चला जाएगा,
जो दीप आज जलना था, कल शायद बुझ जाएगा।
एक पिता को आज समय दो, कल शायद न पाएँ,
एक आँसू आज पोंछ लो, कल आँखें सूख जाएँ।

समय किसी के लिए ठहरता, ऐसा कभी न जाना,
धन, पद, यौवन, रूप सभी को, इसने है पहचाना।
जिसने समय को धर्म समझकर, जीवन में अपनाया,
उसने छोटे जीवन में भी, बड़ा काम कर दिखाया।

आज तुम्हारे हाथ में जो, क्षण का दीप जला है,
यही तुम्हारा सच्चा धन है, बाकी सब तो छला है।
कर्तव्य यदि आज पुकारे, कल पर मत टालो,
जीवन की इस साँस को ही, अपना यज्ञ बना लो।

सर्ग 28 — मृत्यु

मृत्यु सामने आई तो, मानव तनिक न काँपा,
बोला—“तू तो निश्चित थी, क्यों डरूँ तेरी छाया?”
मृत्यु बोली—“मुझसे पहले, क्या-क्या कर पाए?”
मानव बोला—“जितना संभव था, दीप जलाए।”

“कुछ आँसू थे पोंछ दिए, कुछ भूखे थे खिलाए,
जहाँ अँधेरा देखा मैंने, अपने दीप जलाए।
कुछ रिश्ते थे टूट गए, कुछ रिश्ते जोड़े मैंने,
कुछ सत्य कठिन थे फिर भी, सत्य ही बोले मैंने।”

मृत्यु बोली—“धन साथ नहीं, न पद साथ जाएगा,
जिसको तूने दिया जगत को, केवल वही रह जाएगा।”
मानव बोला—“यही चाहता, अंतिम क्षण में मान—
मेरे बाद किसी के भीतर, जीवित रहे इंसान।”

मृत्यु मुस्काई—“तू तैयार है, अब चल सकता है साथ,
जिसने कर्म निभाया हो वह, नहीं डरता रात।”
जीवन ने उस क्षण मृत्यु से, यह उपदेश सुना—
कर्तव्य निभाने वाला ही, मृत्यु के पार हुआ।

सर्ग 29 — अंतिम परीक्षा

जब सब साथी छूट गए और, कोई साथ न आया,
जब अपने ही निर्णय पर भी, जग ने प्रश्न उठाया,
तब कर्तव्य ने पूछा—“अब भी, मेरे साथ चलोगे?”
मानव बोला—“हाँ! चाहे तुम, मुझे अकेला कर दोगे।”

भीड़ गलत दिशा में जाए तो, उसके संग न जाना,
अपने भीतर सत्य जगे तो, उसको मत दबाना।
अकेलेपन से डरकर यदि, धर्म बदल दोगे,
जीते-जी अपने अंतर से, रिश्ता तोड़ दोगे।

अंतिम परीक्षा यही कि जब, कोई देख न रहा हो,
तब भी मन का न्यायाधीश, भीतर बैठा रहा हो।
जिस कर्म को दुनिया देखे बिना, तुम कर सको महान,
वही कर्म बतलाएगा, कैसा है इंसान।

मानव ने तब आँखें मूँदीं, अंतर में झाँका,
सत्य खड़ा था सामने, निर्मल और उजला।
बोला—“अब संसार चाहे, जो भी निर्णय दे,
मैं अपने अंतर के आगे, झूठ नहीं बोलूँगा।”

सर्ग 30 — अंतरात्मा

रात गहरी थी, बाहर सब सोया था संसार,
अंतर में कोई जाग रहा था, बनकर पहरेदार।
बोला—“मुझसे भागोगे तो, कहाँ छिपोगे मानव?
जग से झूठ बोल सकते हो, मुझसे कैसे बचोगे?”

“मैं मंदिर में भी हूँ तुम्हारे, मैं मस्जिद में भी हूँ,
मैं शास्त्रों की पंक्ति में हूँ, तुम्हारे हृदय में भी हूँ।
मैं वह स्वर हूँ जो अपराधों पर, भीतर से डरता,
मैं वह दीप हूँ जो अंधियारे में भी नहीं मरता।”

मानव बोला—“तू ही बता दे, सच्चा धर्म हमारा?”
अंतर बोला—“जहाँ किसी का, न हो शोषण तुम्हारा।
जहाँ सत्य से मुँह न मोड़ो, जहाँ करुणा हो प्राण,
जहाँ अपने सुख से ऊपर हो, मानव का कल्याण।”

“मुझको जीत लिया यदि तुमने, जीत लिया संसार,
मुझसे हार गए यदि मानव, व्यर्थ सभी व्यवहार।”
मानव ने अंतर की वाणी, सिर पर धारण की,
उस दिन उसने पहली बार, अपनी आत्मा जानी।

सर्ग 31 — आत्मबोध

तब मानव ने स्वयं को देखा, पहली बार भीतर,
न धन था वहाँ, न पद था कोई, न संसार का अवसर।
एक नग्न सत्य खड़ा हुआ था, उसके सामने मौन,
पूछ रहा था—“कौन हो तुम? किसके लिए थे कौन?”

मानव बोला—“मैं वह नहीं जो, दुनिया मुझको कहती,
मैं वह हूँ जो अपने कर्मों से, अपनी पहचान लिखती।
नाम नहीं हूँ, रूप नहीं हूँ, केवल एक प्रयास,
कर्तव्य निभाकर जी सकूँ—इतनी मेरी आस।”

“जो मिला उसे अपना माना, जो छूटा उसको रोया,
पर अब जाना—मैंने कितना, अपने भीतर खोया।
जिस दिन अपना धर्म मिला, उस दिन जीवन जाना,
बाहर जग जीतने से पहले, भीतर खुद को पाना।”

आत्मबोध की उस बेला में, जैसे सूरज निकला,
मन का वर्षों पुराना अंधियारा धीरे पिघला।
मानव ने फिर हाथ जोड़कर, अपना शीश झुकाया,
“मैं कर्तव्य का हूँ”—कहकर, जीवन अर्थ बनाया।

सर्ग 32 — पुनर्जन्म

यह पुनर्जन्म देह का नहीं, विचारों का था,
मृत मनुष्य के भीतर फिर, विश्वासों का था।
अब न भय था, न मोह बचा था, न स्वार्थों का जाल,
कर्तव्य उसके हाथ में था, जैसे कोई मशाल।

वह लौटा फिर उसी नगर में, जहाँ कभी झुका था,
अब उसके माथे पर साहस, आँखों में विश्वास था।
जिससे कल वह डरता था, आज उसी से बोला—
“सत्य कठिन हो सकता है, लेकिन कभी न डोला।”

जिन लोगों ने उसको रोका, उनको उसने समझाया,
“मैं बदला हूँ, तुम भी बदलो”—इतना ही दोहराया।
एक मनुष्य जब जाग गया तो, जाग उठा परिवेश,
कर्तव्य की एक लौ ने फिर, रोशन किया देश।

जीवन का पुनर्जन्म यही है—मन का जाग जाना,
गिरकर फिर उठना और अपने, सत्य को पहचानना।
जो कल था वह आज नहीं है, यह अधिकार महान,
हर मानव अपने कर्मों से, लिख सकता पहचान।

सर्ग 33 — परिवर्तन

एक मनुष्य बदला तो, वातावरण बदल गया,
एक दीप जला तो जैसे, सारा तम निकल गया।
जिसने देखा, उसने पूछा—“कहाँ से शक्ति आई?”
वह बोला—“अपने भीतर, वर्षों से सोई थी भाई।”

एक ने अन्याय के आगे, निर्भय स्वर उठाया,
दूजे ने भूखे बच्चे को, अपनी रोटी खिलाया।
तीसरे ने रिश्वत लेने से, दृढ़ होकर इनकार,
चौथे ने वृद्ध अकेले को, दिया अपना प्यार।

धीरे-धीरे नगर बदलने, लगा उसी के साथ,
लोग समझने लगे कि अपना, कर्तव्य ही है हाथ।
कोई कानून नहीं बदलता, पहले मन बदलता,
मन बदल जाए तो संसार, अपने आप बदलता।

परिवर्तन का बीज बहुत ही, छोटा होता है,
लेकिन उससे भविष्य का वन, ऊँचा होता है।
एक मन से एक समाज और, समाज से राष्ट्र,
कर्तव्य से ही संभव होता, मानव का विकास।

सर्ग 34 — नई पीढ़ी

बच्चे अब प्रश्न करने लगे—“कर्तव्य क्या होता?”
उत्तर मिला—“जो सही हो, वही करना होता।”
“यदि सब लोग गलत करें तो?”—“तुम सही रहना,
भीड़ गलत दिशा में जाए तो, अकेले आगे बढ़ना।”

“यदि हार गए?”—“फिर उठना।”
“यदि डर लगे?”—“फिर लड़ना।”
“यदि कोई साथ न दे?”—“तब सत्य को मत छोड़ना।”
“यदि सुख और धर्म में संघर्ष?”—“धर्म को चुनना।”

गुरु ने देखा बच्चों में फिर, भविष्य की ज्योति,
पिता ने देखा आँखों में, आने वाली पीढ़ी।
माँ ने उनके माथे पर तब, आशीष रख दिया,
कर्तव्य का दीपक अगली पीढ़ी को दे दिया।

बच्चों ने मिलकर हाथ उठाए, किया एक संकल्प—
“अपने कारण किसी मनुज का, न हो कभी संताप।
सत्य, श्रम, सेवा, करुणा को, जीवन में अपनाएँगे,
कर्तव्य के इस दीपक को, युगों तक जलाएँगे।”

सर्ग 35 — विरासत

धन की विरासत कितने दिन? महल कितने दिन रहते?
नाम लिखे पत्थर भी आखिर, धीरे-धीरे घिसते।
कर्मों की विरासत ही है, जो पीढ़ी तक जाती,
एक पिता की सत्यनिष्ठा, पुत्रों में बस जाती।

एक माँ का त्याग किसी की, आँखों में भरता जल,
एक सैनिक का रक्त किसी में, जगाता दृढ़ संबल।
एक गुरु का ज्ञान शिष्य के, जीवन में खिलता है,
एक किसान का श्रम हजारों, घरों में मिलता है।

विरासत सोना-चाँदी नहीं, चरित्रों की ज्योति,
जिससे आने वाली पीढ़ी, पाए अपनी ज्योति।
नाम नहीं यदि याद रहे तो, कोई बात नहीं,
कर्म तुम्हारे याद रहें तो, इससे बड़ी बात नहीं।

इसलिए ऐसी राह चुनो जो, पीछे दीप जलाए,
तुम्हारे बाद कोई बच्चा, तुमसे प्रेरित हो जाए।
जीवन की सबसे बड़ी कमाई, यही समझ लो आज—
अपने कर्मों से छोड़ो तुम, मानवता की आवाज।

सर्ग 36 — मनुष्य की विजय

न सिंहासन जीतना विजय है, न जग जीतना मान,
अपने भीतर जीत सके जो, वही बड़ा इंसान।
क्रोध जीत ले, लोभ जीत ले, भय को दे निष्कास,
मोह के ऊपर सत्य रखे—वही विजय का प्रकाश।

दुश्मन को हराना सरल है, अपने मन को जीतना,
दूसरों को दोषी कहना सरल, स्वयं को देखना कठिन।
जो अपने भीतर के राक्षस, पहचान सके पहले,
वही मनुष्य विजय का सच्चा, अर्थ समझ सके।

जिसने अधिकारों से पहले, कर्तव्य समझ पाया,
जिसने रोते मानव के हित, अपना सुख लुटाया।
जिसके कारण किसी हृदय में, आशा जन्मी फिर,
उससे सुंदर जीवन क्या हो, इससे सुंदर जीत?

विजय वही जो अंत समय में, आत्मा को न लजाए,
विजय वही जिसके कारण, कोई दीप जलाए।
ऐसी जीत नहीं मिटती, चाहे मिटे शरीर,
कर्मों से अमर हुआ मानव, मृत्यु से भी अधीर।

सर्ग 37 — अंतिम संवाद

मृत्यु पुनः आई और बोली—“अब चलने का समय,
कहो मनुष्य! क्या साथ तुम्हारे जाएगा यह क्षण?”
मानव मुस्काया—“कुछ भी मेरा, साथ नहीं जाएगा,
पर मेरे कर्मों का दीपक, पीछे जलता जाएगा।”

“मेरी साँसें रुक जाएँगी, मेरी वाणी सो जाएगी,
मेरी आँखों की ज्योति भी फिर, मिट्टी में खो जाएगी।
पर यदि किसी के जीवन में, आशा बच जाएगी,
तो समझो मेरी साँस वहाँ पर, फिर भी मुस्काएगी।”

मृत्यु बोली—“धन छोड़ो, पद छोड़ो, सब छूटेगा।”
मानव बोला—“कर्तव्य का फल, कैसे कोई लूटेगा?”
“जो जग को दे जाओगे, वही तुम्हारा है,
बाकी सब तो समय की धारा में, बहता धुआँ है।”

मृत्यु ने तब शीश झुकाया, बोली—“चलो महान,
जिसने जीवन धर्म निभाया, वह मुझसे क्यों हैरान?”
मानव हँसा—“मैं जा रहा हूँ, पर इतना सत्य रहे—
मेरे बाद किसी के भीतर, कर्तव्य जीवित रहे।”

सर्ग 38 — कर्तव्य की विजय

तलवारों से युद्ध जीतना, सरल कभी हो जाता,
मन के भीतर युद्ध जीतना, कठिन बहुत हो जाता।
जिसने अपने स्वार्थों पर ही, विजय प्राप्त कर ली,
उसने जीवन की सबसे कठिन, परीक्षा पूरी कर ली।

मोह गया तो प्रेम बचा, भय गया तो साहस,
लोभ गया तो जन्म लिया, संतोषों का आकाश।
अहं गया तो सेवा आई, क्रोध गया तो शांति,
कर्तव्य के पथ पर मिलती, मानव को निज भ्रांति।

न कोई शत्रु बचा वहाँ था, न कोई पराजित,
कर्तव्य के इस युद्ध में, दोनों हुए प्रकाशित।
जीत किसी की हार नहीं थी, हार किसी की जीत,
सत्य जहाँ स्वीकार हुआ, वहीं मिली नव-प्रीति।

मानव ने तब हाथ उठाकर, नभ की ओर निहारा,
बोला—“मैंने जीत लिया है, अपना ही अँधियारा।”
जिस दिन मनुष्य स्वयं को, अपने भीतर जीत ले,
उस दिन उसका कर्म अमर हो, जीवन अमृत पी ले।

सर्ग 39 — मानव को पुकार

हे मानव! यदि आज तुम्हारे, सामने अँधियारा,
मत कहना—“मैं अकेला हूँ, मेरा कौन सहारा?”
तेरे भीतर सत्य जगा है, उससे बड़ा कौन?
एक अकेला दीपक भी तो, हर सकता है मौन।

जहाँ अन्याय दिखे वहाँ, आवाज तुम्हारी हो,
जहाँ किसी की आँख नम हो, आँख तुम्हारी हो।
जहाँ कोई गिरता दिखे, हाथ तुम्हारा बढ़े,
जहाँ कोई भूखा सोए, अन्न तुम्हारा चढ़े।

मंदिर-मस्जिद बाद में होंगे, पहले मानव धर्म,
मनुष्य बचा रहे यदि जग में, तभी सफल सत्कर्म।
पूजा केवल दीप जलाना, इतना मत समझो,
जीवित मानव के आँसू पोंछो, फिर भगवान को खोजो।

चलो वहाँ जहाँ कठिनाई, चलो जहाँ हो पीर,
जहाँ मनुष्य पुकार रहा हो, वहीं बनो अधीर।
अपने हिस्से का दीप जलाओ, बाँटो उसका प्रकाश,
कर्तव्य की इस राह पर ही, मानवता का विकास।

सर्ग 40 — कर्तव्य अमर है

माटी से आया मानव, माटी में मिल जाएगा,
लेकिन उसका किया हुआ कर्म, युगों तक खिल जाएगा।
साँसें उसकी रुक जाएँगी, धड़कन थम जाएगी,
यदि जग को राह मिली तो, ज्योति कहाँ बुझ पाएगी?

नाम रहे या नाम मिटे, इससे क्या अभिमान?
जीवन की पहचान यही—कितना बचा इंसान।
कितने महल बनाए तुमने, यह प्रश्न नहीं संसार,
कितने टूटे मन जोड़ सके—यही असली सत्कार।

कर्तव्य पिता की आँखों में, माँ का मौन दुलार,
कर्तव्य भूखे बालक की, आँखों का अधिकार।
कर्तव्य सीमा पर सैनिक का, जागा हुआ प्राण,
कर्तव्य खेत में किसान का, धरती पर विश्वास।

कर्तव्य गुरु का ज्ञान है, श्रमिक का श्रमदान,
कर्तव्य न्यायालय का सत्य, शासन का सम्मान।
कर्तव्य वृद्ध पिता के काँपते, हाथों को थामना,
कर्तव्य मानव का मानव के, दुःख में साथ निभाना।

जब तक जग में एक मनुज भी, सत्य-पथिक बन जाएगा,
जब तक एक दिया अँधियारे में, निर्भय जलता जाएगा,
तब तक इस धरती पर मानव, सच में जीवित है,
तब तक कर्तव्य की गाथा, अक्षय, अमर, अनंत है।

चलो जहाँ कर्तव्य पुकारे,
चलो जहाँ हो राह कठिन।
अपने हिस्से की धूप सहो तुम,
बनकर जग का दीप नवीन।

सुख आए तो बाँट देना,
दुःख आए तो सह लेना।
सत्य मिले तो थाम लेना,
मृत्यु मिले तो कह देना—

“मैं आया था कर्म निभाने,
कर्म निभाकर जाता हूँ।
जो दीप मिला था जीवन से,
वह दीप जगत में बाँटता हूँ।”

यही धर्म है।
यही कर्म है।
यही मानव का मान।
यही जीवन का सत्य है—
और यही कर्तव्य महान।

॥ कर्तव्य महाकाव्य समाप्त ॥

जाने किधर गये

जाने किधर गये 

टूट गई है माला, मोती बिखर गये,
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।
कल तक जो थे पास हमारे, 
क्या जाने वो किधर गये।
टूट गई है माला, मोती बिखर गये।।

आँगन वही, दीवारें वो ही 
बस उनकी आवाज़ नहीं है।
दरवाज़े पर आँखें ठहरीं,
आने की पर आस नहीं है।
जिन राहों पर साथ चले थे,
उनपर ही हम बिछड़ गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।

सूने घर में गूँज बची है 
और हृदय में बातें,
बिन तेरे कटते हैं कैसे 
मेरे दिन और रातें।
तेरी यादें जब-जब आयें 
नयना बरबस बरस गये 
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।

अब तो बस तस्वीर से पूछें,
क्यों इतने मजबूर हुए ?
हम तो तेरे साथ थे लेकिन 
ऐसे हम क्यूँ दूर हुए?
ऐसी क्या गलती थी मेरी 
जो नैना मेरे तरस गये,
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।

रिश्तों की यह कैसी डोरी,
पल भर में जो टूट गयी।
जिससे हमने जीना सीखा 
आँचल की डोरी छूट गयी।
वक्त ने कैसी चाल चली है,
सारे सपने बिखर गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।

कहते हैं सब लौट के आते,
पर कौन लौट के आया।
कितनी बार पुकारा तुमको 
उत्तर कुछ न पाया।
बस यादों की छाँव बची है,
जिनमें आकर ठहर गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।

जब तक साँस रहेगी तन में,
तेरा नाम रहेगा।
दूर भले ही चले गए हो,
तुमपर ध्यान रहेगा।
मृत्यु भला क्या छीन सकेगी,
मन में मेरे अमर हुए
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गए।।

मन के रिश्ते कब मरते हैं,
बस आँखों से ओझल होते हैं।
जो दिल में बस कर रहते हैं,
कब आँखों में बोझल होते हैं।
माना मेरे पास नहीं हो 
पर हम तुममें ही ठहर गये।
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गये।।

टूट गई है माला, मोती बिखर गए,
दो दिन रहकर साथ, जाने किधर गए।।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

पानी जैसा जीवन अपना

पानी जैसा जीवन अपना

पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप।
कभी नदी बन, कभी धार बन धोये सब संताप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥

कभी हिमालय की गोदी में बनकर बर्फ ठहरता है,
और कभी तपती धरती पर बादल बना बरसता है।
रूप बदलता पल-पल इसका फिर भी रहता साफ।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥

पत्थर से टकराकर भी यह अपनी राह बनाये।
झुककर नीचे चलता है फिर सागर से मिल जाये।
हार नहीं स्वीकारे पथ में चाहे कितने आये ताप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥

प्यासे अधरों की मुस्कानें इसको पाकर खिलतीं,
सूखी धरती की बाँहों में आशा बनकर ढलतीं।
दूजे के मन को हर्षाये तोड़े सब अभिशाप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥

इसका न तो रंग है कोई और न इसकी जात,
जिससे मिलता ढल जाता है जैसा होता पात।
हम भी अपना अहं भूलकर हो जायें निष्पाप,
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥

अंत समय सागर में मिलकर खुद पहचान गँवाए,
बूँद-बूँद का जीवन फिर भी अनंत कथा कह जाए।
मिलना ही तो सत्य जगत का है बाकी क्षणिक विलाप।
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप॥

राह मिले तो प्रेम बनें हम मिले प्यास तो पानी,
दुख में बनें किसी की आशा बन जाएँ मुस्कानी।
अपने हिस्से का सुःख बाँटें छोड़ें मधुर प्रताप,
पानी जैसा जीवन अपना बह जाए चुपचाप।।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

शिव चलीसा

॥ श्री शिव चालीसा ॥

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥चौपाई॥

जय गिरिजेश उमापति स्वामी। सकल लोक प्रभु अंतरयामी॥
जय शिव शंकर, जय त्रिपुरारी। कृपा करहु प्रभु मंगलकारी॥

भाल विशाल चंद्रमा सोहै। देखि रूप सुर मुनि मन मोहै॥
शीश गंग जल धार सुहाई। हरि हर रूप दिव्य मन भाई॥

कंठ भुजंग विभूति विशाला। नैन विशाल, बिराजे भाला॥
कर डमरू, त्रिशूल सोहारा। हरहु भक्त का संकट सारा॥

महादेव तुम परम कृपाला। दीन अनाथन पोषन पाला॥
ओढ़ें छाल, बसें कैलासा। पूरन करहु भक्त की आसा॥

भस्म अंग शुभ सोहत भारी। जय जय जय जगपति त्रिपुरारी॥
कालकूट विष कंठ अधारा। नीलकंठ कहलाए सारा॥

दक्ष यज्ञ प्रभु आप विनासा। सुर मुनि बंदी करहिं प्रकासा॥
बाणासुर के काज सँवारे। कामदेव प्रभु भस्म निहारे॥

रावण भक्ति करी मन लाई। ताहि लंकपति पदवी पाई॥
रामेश्वर प्रभु आपहि स्थापे। श्री रघुनाथ पूजि दुख नापे॥

​ब्रह्मा विष्णु सदा सिर नावैं। नारद शारद गुनि यश गावैं॥
तुम बिनु काज सरे नहिं कोई। पावहि कृपा धन्य जग होई॥

अलख निरंजन निर्गुण रूपा। सगुण रूप अति परम अनूपा॥
​वेद पुराण बखानहिं ज्ञानी। महिमा अमित न जाइ बखानी॥

सती सती कहि नाम उचारा। देह त्यागि प्रभु शोक अपारा॥
​हिमगिरि गृह प्रगटीं गिरिजेशी। कीन्ह तपस्या अतिहिं कलेशी॥

​शिव सेवा मन दीन्ह अनूपा। ब्याहे गिरिजा शंभु अनूपा॥
​कार्तिकेय गणपति सुत पाए। सब सुर मुनि मन हरसि समाए॥

भस्म त्रिपुर दैत्यन करि डारा। सुर सिद्धन का कष्ट निवारा॥
​महामृत्युंजय मंत्र सुहावा। मार्कंडेय संकट बिसरावा॥

यमकातर जन प्राण उबारे। शरण परे के काज सँवारे॥
​भागीरथ जब ध्यान लगाया। गंग तरंगन शीश समाया॥

शिव प्रिय राम, राम प्रिय देवा। करहिं परस्पर भाव सुसेवा॥
राघव पूजन कीन्ह तिहारा। जीत्यो लंक दनुज संहारा॥

महिमा अपरंपार तिहारी। जय जय जय रामेश पुरारी॥
सोमनाथ श्री काल महाला। केदारेश्वर प्रभुहि कृपाला॥

विश्वनाथ काशी के स्वामी। घट घट के प्रभु अंतरयामी॥
मलिकार्जुन प्रभु भजहीं प्रानी। ओंकारेश्वर हैं प्रभु दानी॥

वैद्यनाथ नागेश्वर देवा। घृष्णेश्वर प्रभु करहिं सुसेवा॥
​त्र्यंबक भीमाशंकर स्वामी। शरण आय प्रभु अंतरयामी॥

द्वादश ज्योतिर्लिंग सोहाए। दर्शन करत पाप सब जाए॥
शरण परे की लाज बचाओ। महाकाल प्रभु कष्ट मिटाओ॥

पारवती पति दीन दयाला। सदा करहु संतन प्रतिपाला॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ताही शिव पद भक्ति समाई॥

नित्य नियम उठि पाठ सुनावै। सो नर जग में सब सुख पावै॥
​जो यह पढ़े चलीसा नीके। होहिं सिद्ध सब कारज जीके॥

॥ दोहा ॥
नित नियम जो पाठ करे, कृपा शंभु की होय।
मनवांछित फल पावहि सो, संकट रहे न कोय॥

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 




माँ

माँ   तुम्हारे होने न होने की बस इतनी निशानी है, तुम थीं तो सब था, अब तो बस कहानी है। तुम थीं तो घर में दीप जला करते थे, दुःख के बादल भी दूर...