आत्ममुग्ध कविताई

आत्ममुग्ध कविताई 

सीख न पाये शब्द भाव जो कभी यहाँ जगताई में।

दिखा रहे हैं आत्म श्रेष्ठता जाने किस भगताई में।

चार जोड़कर शब्द क्या लिखे भूले छंदों की महिमा,

खुद को श्रेष्ठ समझ बैठे हैं आत्ममुग्ध कविताई में।


टीका 1

प्रस्तावना: कुरुक्षेत्र आपके भीतर है .......................................... पृष्ठ 1-5

​(गीता की प्रासंगिकता और आज का मनुष्य)

मंगलाचरण: दिव्य वंदना ........................................................... 

खंड 1: कर्म और मन का विज्ञान 

अध्याय 1: विषाद से बोध तक – अवसाद और चिंता का सामना कैसे करें? .... 

अध्याय 2: सांख्य दर्शन – आत्मा की अमरता और 'स्थितप्रज्ञ' का व्यक्तित्व .... 

अध्याय 3: कर्मयोग – बिना तनाव के कार्य करने की कला ........................... 

अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग – कर्मों में कुशलता और ज्ञान की अग्नि ..........

अध्याय 5: संन्यासयोग – कर्तापन के अहंकार से मुक्ति और समदृष्टि .............. 

अध्याय 6: आत्मसंयमयोग – ध्यान, अनुशासन और मन को मित्र बनाना .......... 

खंड 2: भक्ति और ब्रह्मांडीय चेतना 

अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग – प्रकृति के रहस्य और माया का परदा ................ 

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग – मृत्यु का भय और अंत समय की चेतना .................. 

अध्याय 9: राजविद्यायोग – अर्पण की शक्ति: शबरी के बेर और सुदामा के तंदुल ... 

अध्याय 10: विभूतियोग – हर सुंदर और श्रेष्ठ वस्तु में ईश्वर का दर्शन .............

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शन – समय का विराट चक्र और काल का स्वरूप .......... 

अध्याय 12: भक्तियोग – श्रेष्ठ साधक के लक्षण और प्रेम का मार्ग ................... 

खंड 3: तत्वज्ञान और अंतिम विजय 

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग – शरीर और चेतना के अंतर को समझना .......... 

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग – सत्व, रज और तम: अपने व्यक्तित्व को पहचानें ....

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग – संसार का अश्वत्थ वृक्ष और जड़ से जुड़ाव ...........

अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभाग – नैतिक मूल्य और नरक के तीन द्वार ............. 

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग – आहार, वाणी और दान का मनोविज्ञान .............. 

अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग – निष्कर्ष: त्याग, शरणागति और अंतिम विजय ..... 

उपसंहार: जीवन-युद्ध के लिए तैयार ........................................ 

​(नष्टो मोहः: अर्जुन का संकल्प और हमारा मार्ग)

अंतिम प्रार्थना और शांति पाठ ........................................

"जीवन-युद्ध: गीता का व्यावहारिक सार"

उप-शीर्षक: स्वयं को जानने, मन को साधने और कर्म में निखार लाने की संपूर्ण मार्गदर्शिका

ॐ श्री परमात्मने नमः

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥

भावार्थ: जिनकी कृपा से गूंगा बोलने लगता है और लंगड़ा पर्वत लांघ जाता है, उन परमानन्द स्वरूप माधव (श्रीकृष्ण) की मैं वंदना करता हूँ।

लेखक का संकल्प:

हे योगेश्वर! यह टीका मेरी बुद्धि का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आपकी वाणी का प्रसाद है। इस पुस्तक के माध्यम से जो भी ज्ञान पाठकों तक पहुँचे, वह उनके जीवन के अंधकार को मिटाकर उन्हें 'स्वधर्म' की ओर प्रेरित करे। जिस प्रकार आपने अर्जुन का विषाद दूर किया, उसी प्रकार यह शब्द हर पीड़ित मन को शांति और शक्ति प्रदान करें।


भूमिका

आज का अर्जुन और आधुनिक कुरुक्षेत्र

यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही नया भी है— मैं क्या करूँ?
यही प्रश्न महाभारत के रणक्षेत्र में अर्जुन के मुख से निकला था, और यही प्रश्न आज हर विद्यार्थी, हर युवा, प्रत्येक बुजुर्ग या यूँ कहें तो प्रत्येक मनुष्य के मन में अनकहे रूप में गूँज रहा है। फर्क केवल इतना है कि उस समय सामने धनुष, गांडीव और शत्रु दिखाई देते थे; आज सामने परीक्षा-पत्र, प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएँ, असफलता का भय, संबंधों की जतिलता और भविष्य की अनिश्चितता खड़ी है।

आज का मानव भी अर्जुन की ही तरह कुशल है, प्रतिभाशाली है, पर भीतर से विचलित है। वह जानता है कि क्या करना चाहिए, पर यह नहीं जानता कि कैसे और किस भाव से करना चाहिए। इसी बिंदु पर श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं रहती, बल्कि जीवन-मार्गदर्शक बन जाती है।

आधुनिक जीवन : एक नया कुरुक्षेत्र

आज का कुरुक्षेत्र किसी मैदान में नहीं, बल्कि हमारे मन के भीतर है। यहाँ युद्ध बाहरी नहीं, आंतरिक है।

  • आत्मविश्वास बनाम आत्म-संदेह
  • उद्देश्य बनाम भ्रम
  • कर्म बनाम परिणाम की चिंता
  • मूल्य बनाम सुविधा

एक विद्यार्थी जब परीक्षा-हॉल में बैठता है, तो वह भी अर्जुन की तरह ही प्रश्न करता है— अगर मैं असफल हो गया तो?
एक युवा जब करियर चुनता है, तो उसके मन में भी वही द्वंद्व होता है— क्या यही सही मार्ग है?
एक प्रतियोगी जब लाखों की भीड़ में स्वयं को देखकर विचलित होता है या स्वयं को छोटा अनुभव करता है, तो वही विषाद उसे घेर लेता है जो अर्जुन को रणभूमि में घेर चुका था।

संबंधों की जतिलता में उलझे व्यक्ति के मस्तिष्क में अकसर ये प्रश्न उभरता है क्यूँ, कैसे और कब तक जिसका समय रहते निवारण नहीं हुआ तो वह तनाव का रूप ले लेता है मनुष्य एक अंधकार में डूबने लगता है। समय रहते यदि उसे अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला तो वो कुंठा का शिकार हो जाता है और कुंठित मानसिकता स्वस्थ समाज के लिए किसी भी स्थिति में उचित नहीं होती है।

गीता इसी विषाद का शास्त्र नहीं, विषाद से बाहर आने का विज्ञान है।

गीता : उपदेश नहीं, संवाद

अक्सर गीता को उपदेशों की पुस्तक मान लिया जाता है—कठिन श्लोक, दार्शनिक शब्द, और जीवन से दूर की बातें। परंतु गीता का मूल स्वर उपदेश नहीं अपितु संवाद है।

हम श्रीमद्भगवद्गीता में पाते हैं कि श्री कृष्ण अर्जुन को आदेश नहीं देते अपितु वे उसे समझाते हैं। वे कहते हैं— सोचो, प्रश्न करो, समझो, और फिर निर्णय लो।

यही कारण है कि गीता आज के युवा मन के सर्वाधिक निकट है, क्योंकि आज का युवा भी आदेश नहीं तर्क चाहता है वह भय नहीं, समाधान चाहता है।

यह टीका गीता को उसी संवाद की भावना में प्रस्तुत करने का प्रयास है—जहाँ कृष्ण शिक्षक हैं, और अर्जुन हर वह मनुष्य है जो जीवन की दिशा खोज रहा है।

विद्यार्थी जीवन और गीता

विद्यार्थी जीवन केवल पढ़ाई का समय नहीं होता; यह व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला होता है। यहीं पहली बार असफलता मिलती है, यहीं पहली बार तुलना का विष चुभता है, और यहीं पहली बार जीवन की दौड़ का अनुभव होता है।

गीता विद्यार्थी को यह सिखाती है कि—

  • कर्म से भागना समाधान नहीं है
  • परिणाम को ही सब कुछ मान लेना भी बंधन है
  • असफलता व्यक्ति की योग्यता नहीं, उसकी प्रक्रिया का हिस्सा है

जब गीता कहती है— कर्मण्येवाधिकारस्ते —तो वह परीक्षा में नंबरों की अनदेखी नहीं सिखाती, बल्कि यह सिखाती है कि तुम्हारा मूल्य केवल अंक-पत्र नहीं तय कर सकता

युवाओं का संकट : उद्देश्यहीनता

आज की पीढ़ी सुविधाओं से भरपूर है, पर दिशा से रिक्त। साधन बहुत हैं, पर साध्य अस्पष्ट है। यही कारण है कि मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा युवाओं में तेजी से बढ़ रही हैं।

गीता इस संकट का समाधान आत्म-ज्ञान से करती है। वह पूछती है— तुम क्या बनना चाहते हो, उससे पहले यह जानो कि तुम हो कौन?
जब तक यह प्रश्न स्पष्ट नहीं होता, तब तक कोई भी करियर, कोई भी सफलता स्थायी संतोष नहीं दे सकती।

यह टीका किसके लिए है?

यह टीका उन विद्यार्थियों और युवाओं के लिए एवं समस्त आमजन के लिये है

  • जो पढ़ते हैं, पर भयभीत रहते हैं
  • जो आगे बढ़ना चाहते हैं, पर भ्रम में हैं
  • जो सफल दिखते हैं, पर भीतर से खाली हैं
  • जो संशयवश परिस्थितियों से सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं 
  • जो मानसिक असंतुष्टि के शिकार हैं 
  • जो किंकर्तव्यविमूढ़ हैं 

यह टीका मन पर श्लोकों का बोझ नहीं डालेगी, बल्कि उन्हें जीवन के अनुभवों से जोड़ेगी—कक्षा, कॉलेज, प्रतियोगिता, करियर, रिश्ते और आत्म-संघर्ष से।

पद्धति और दृष्टिकोण

इस टीका में:

  • श्लोकों की सरल और भावात्मक व्याख्या का प्रयास किया गया है 
  • कठिन दर्शन को जीवन के उदाहरणों से जोड़ने का प्रयास किया गया है 
  • इसमें किसी एक संप्रदाय का आग्रह नहीं किया गया है 
  • गीता को जीने योग्य बनाने का प्रयास किया गया है , केवल पढ़ने योग्य नहीं

शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और आधुनिक विचारों में संतुलन का प्रयास किया गया है, पर इसके मुख्य केंद्र हमारा मन है एवं मन में उपजते प्रश्न हैं।

गीता : जीवन की परीक्षा में मार्गदर्शक

यदि हमारा जीवन एक परीक्षा है, तो गीता उसकी उत्तर-पुस्तिका नहीं अपितु तैयारी की विधि है।
यह हमें यह नहीं बताती कि जीवन में क्या होगा, या क्या होने वाला है अपितु यह सिखाती है कि जो भी हो, उससे कैसे निपटना है।

इस भूमिका का उद्देश्य यही है कि पाठक गीता को डर से नहीं, विश्वास से खोलें और इसे मात्र ग्रंथ के रूप में नहीं अपितु मित्र की तरह पढ़ें।

यहीं से यात्रा आरंभ होती है—अर्जुन से आत्मबोध तक।


अध्याय 1 : अर्जुन विषाद योग

अर्जुन विषाद योग : आधुनिक मनुष्य के आंतरिक संघर्ष का दार्शनिक अध्ययन

भूमिका : धर्मक्षेत्र का व्यापक अर्थ

भगवद्गीता का प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग केवल महाभारत के युद्ध की प्रस्तावना नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के उस सार्वकालिक मानसिक संकट का गहन विवेचन है, जिसमें व्यक्ति अपने ही कर्तव्य, भावनाओं और संबंधों के बीच उलझकर निर्णयहीन हो जाता है। यह अध्याय यह स्पष्ट करता है कि जीवन का वास्तविक संघर्ष बाहरी युद्ध में नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में घटित होता है।

कुरुक्षेत्र को “धर्मक्षेत्र” कहा गया है, क्योंकि यहाँ होने वाला युद्ध केवल राजनीतिक सत्ता या भौतिक विजय के लिए नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म, विवेक और मोह के बीच है। यही धर्मक्षेत्र आज के युग में अनेक रूपों में विद्यमान है—विद्यार्थी के लिए परीक्षा कक्ष, कर्मचारी के लिए कार्यस्थल, गृहस्थ के लिए पारिवारिक जीवन और राजनेता के लिए सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व।

अर्जुन का विषाद : संवेदनशील चेतना का पतन

जब अर्जुन युद्धभूमि में अपने सामने खड़े योद्धाओं को देखता है, तो उसे केवल शत्रु नहीं, बल्कि अपने गुरु, पिता, भाई, पुत्र और संबंधी दिखाई देते हैं। यह दृश्य उसके भीतर करुणा, भय और नैतिक द्वंद्व उत्पन्न करता है—

“दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥”

अर्जुन के हाथ काँपने लगते हैं, मुख सूख जाता है और मन भ्रमित हो उठता है। यह अवस्था किसी दुर्बल व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील और नैतिक चेतना से युक्त मनुष्य की है। गीता इस स्थिति को नकारती नहीं, बल्कि इसे मानवीय स्वभाव के रूप में स्वीकार करती है।

विषाद : दुर्बलता नहीं, चेतना का संकेत (श्लोक 1–19 का भाव-सार)

अक्सर हम दुख, भय और भ्रम को कमजोरी मान लेते हैं। समाज हमें सिखाता है—मजबूत बनो, मत रोओ, मत डगमगाओ। पर गीता का पहला अध्याय बताता है कि विषाद कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना का संकेत है। यह संकेत है कि मन किसी गहरे मूल्य-संघर्ष से गुजर रहा है।

अर्जुन का विषाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसी से गीता का जन्म होता है। यदि अर्जुन बिना प्रश्न किए युद्ध कर लेता, तो गीता कभी प्रकट ही नहीं होती। इसी प्रकार यदि व्यक्ति अपने भीतर के प्रश्नों को दबा देता है, तो उसका विकास रुक जाता है।

यह अध्याय हमें सिखाता है कि—

  • प्रश्न करना पलायन नहीं है
  • रुकना कायरता नहीं, आत्मनिरीक्षण है
  • असमंजस स्पष्टता की पहली सीढ़ी हो सकती है

विद्यार्थी की स्थिति : अपेक्षाओं और भय का द्वंद्व

विद्यार्थी जीवन अपने आप में एक संघर्षपूर्ण काल है। परीक्षा, प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक अपेक्षाएँ और भविष्य की अनिश्चितता विद्यार्थी को मानसिक रूप से विचलित करती है। वह जानता है कि उसका कर्तव्य अध्ययन करना है, किंतु असफलता का भय उसे विचलित करता रहता है।
अर्जुन की भाँति विद्यार्थी भी परिणामों की कल्पना में उलझकर अपने कर्तव्य से विचलित हो जाता है। अर्जुन विषाद योग यह दर्शाता है कि भय से उत्पन्न विषाद स्वाभाविक है, परंतु उससे पलायन आत्मविकास को रोक देता है।

युद्धभूमि से परीक्षा-हॉल तक (श्लोक 20–27)

अर्जुन के सामने अपने ही लोग खड़े हैं—गुरु, बंधु, स्वजन। उसके लिए यह केवल युद्ध नहीं, भावनात्मक और नैतिक संघर्ष है। वह सोचता है—

  • जिनसे मैंने शिक्षा पाई, उन्हीं पर शस्त्र कैसे उठाऊँ?
  • जिनके साथ मेरा बचपन बीता, उनसे युद्ध कैसा?
  • इस विजय की नैतिक कीमत क्या होगी?

आज का विद्यार्थी भी कुछ ऐसा ही सोचता है—

  • माता-पिता की अपेक्षाएँ पूरी न कर पाने का डर
  • समाज में पीछे रह जाने की आशंका
  • मित्रों से तुलना और स्वयं को कमतर समझना

एक मेडिकल या इंजीनियरिंग की तैयारी करता छात्र जब बार-बार असफल होता है, तो उसके मन में भी यही प्रश्न उठता है—क्या यह संघर्ष उचित है?
युद्धभूमि बदल गई है, पर द्वंद्व वही है।


कर्मचारी की स्थिति : कर्तव्य और असुरक्षा का संघर्ष

कार्यस्थल आधुनिक जीवन का प्रमुख कुरुक्षेत्र है। यहाँ कर्मचारी को नैतिकता, आज्ञापालन और आत्मसम्मान के बीच संतुलन साधना पड़ता है। नौकरी की असुरक्षा और गलत निर्णय के परिणामों का भय उसे भीतर से विचलित करता है।

अर्जुन का कथन—
“न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः”

कर्मचारी की उसी मानसिक अवस्था को अभिव्यक्त करता है, जिसमें वह सही को पहचानते हुए भी निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है।

गृहस्थ की स्थिति : संबंधों का मोह

गृहस्थ जीवन में संबंध मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं, परंतु वही संबंध कभी-कभी विवेक पर आवरण भी डाल देते हैं। अर्जुन का विषाद मूलतः स्वजनों के प्रति अत्यधिक मोह से उत्पन्न होता है।
आज का गृहस्थ भी सत्य, शांति और कर्तव्य के बीच उलझ जाता है। संबंधों को बचाने की चिंता उसे आवश्यक निर्णयों से दूर कर देती है। गीता यह सिखाती है कि मोह और करुणा में अंतर करना आवश्यक है।

राजनेता की स्थिति : सत्ता और धर्म का द्वंद्व

राजनीति सबसे जटिल धर्मक्षेत्र है। यहाँ निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक परिणाम उत्पन्न करते हैं। राजनेता भी अर्जुन की भाँति यह सोचता है कि धर्म का पालन सत्ता को संकट में डाल सकता है।

अर्जुन विषाद योग यह स्पष्ट करता है कि धर्म से विमुख होकर प्राप्त सत्ता अंततः विनाश का कारण बनती है।

आत्मविश्वास का क्षय और शरीर की भाषा (श्लोक 28–30 का विस्तार)

अर्जुन कहता है कि उसके शरीर के अंग शिथिल हो रहे हैं, त्वचा जल रही है, मुख सूख रहा है, मन भ्रमित है। यह केवल काव्यात्मक वर्णन नहीं, बल्कि तनाव और चिंता के शारीरिक लक्षण हैं।

आज का मनोविज्ञान भी मानता है कि मानसिक दबाव शरीर में इसी प्रकार प्रकट होता है—घबराहट, पसीना, हृदयगति का बढ़ना, ध्यान का भटकना। गीता इन अनुभवों को नकारती नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार करती है।

यह अध्याय युवा को यह आश्वासन देता है कि—

तनाव आना असामान्य नहीं है;

उससे भागना समस्या है।


निर्णय-थकान (Decision Fatigue) (श्लोक 30–33)

अर्जुन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—निर्णय लेने की असमर्थता। वह स्पष्ट रूप से कहता है कि वह नहीं जानता कि क्या उचित है। यह स्थिति आज के युवाओं में अत्यंत सामान्य है।

करियर, कोर्स, शहर, नौकरी—हर मोड़ पर विकल्पों की भरमार है। अधिक विकल्प, कम स्पष्टता। यही निर्णय-थकान है। अर्जुन का मौन इसी थकान का प्रतीक है।

गीता यह स्वीकार करती है कि जब मन थक जाए, तब मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है


शरणागति : पराजय नहीं, प्रारंभ (श्लोक 46–47)

श्लोक 47
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

यह श्लोक केवल युद्ध से इंकार नहीं है; यह अहंकार से विराम है। अर्जुन मौन हो जाता है—और यही मौन आगे चलकर ज्ञान का द्वार बनता है।

आज के युवा के लिए यह संदेश है कि कभी-कभी रुकना, स्वीकार करना और मार्गदर्शन माँगना ही सबसे साहसिक कर्म होता है।

अध्याय का सबसे निर्णायक क्षण तब आता है जब अर्जुन धनुष रखकर कृष्ण से कहता है—मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे उपदेश दीजिए। यही क्षण अर्जुन को योद्धा से जिज्ञासु साधक बना देता है।

युवा जीवन में भी यह क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है—जब व्यक्ति स्वीकार करता है कि वह उलझा हुआ है और मार्गदर्शन चाहता है। शिक्षक, गुरु, ग्रंथ या अनुभव—यहीं से परिवर्तन आरंभ होता है।

गीता का संदेश स्पष्ट है—

  • अहंकार समाधान नहीं देता
  • सहायता माँगना दुर्बलता नहीं, परिपक्वता है
कर्तव्य से पलायन : विषाद की चरम अवस्था

अध्याय के अंत में अर्जुन धनुष-बाण त्याग देता है—
“न योत्स्य इति गोविन्द… तूष्णीं बभूव।”
यह क्षण कर्तव्य से पलायन का प्रतीक है। यही अवस्था तब आती है जब विद्यार्थी प्रयास छोड़ देता है, कर्मचारी उदासीन हो जाता है, गृहस्थ विमुख हो जाता है और राजनेता नैतिक समझौता कर लेता है।

उपसंहार : विषाद से विवेक की ओर
अर्जुन विषाद योग यह सिखाता है कि विषाद जीवन की असफलता नहीं, बल्कि आत्मबोध की भूमिका है। जब मनुष्य अपने भ्रम को स्वीकार करता है, तभी विवेक का उदय होता है।
अर्जुन हर युग का मनुष्य है और श्रीकृष्ण हर युग का विवेक। भूमिका चाहे कोई भी हो, जब तक मनुष्य धर्म के आलोक में कर्तव्य नहीं देखता, तब तक वह अर्जुन ही बना रहता है।

इस अध्याय का संदेश

सांख्य योग यह सिखाता है कि—

  • स्थिर बुद्धि का अर्थ भावनाहीन होना नहीं है
  • आत्म-नियंत्रण ही वास्तविक स्वतंत्रता है
  • इच्छाओं का दमन नहीं, उनका विवेकपूर्ण संचालन आवश्यक है

यही अध्याय अर्जुन को युद्ध के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करता है।

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अध्याय 2 (सांख्य योग)

आत्मा, कर्म और जीवन-दर्शन 

भूमिका

श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो गृहस्थ जीवन में रहते हुए पढ़ाई, नौकरी, परिवार और समाज की जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। यह अध्याय किसी संन्यासी के लिए नहीं, बल्कि उस सामान्य व्यक्ति के लिए है जो रोज़मर्रा के जीवन में तनाव, निर्णय, असमंजस और भावनात्मक उलझनों से जूझता है।

अर्जुन की तरह ही आज का विद्यार्थी परीक्षा के दबाव में, कर्मचारी नौकरी की अनिश्चितता में और गृहस्थ पारिवारिक दायित्वों के बीच अक्सर यह नहीं समझ पाता कि सही क्या है और गलत क्या। ऐसे समय में गीता का यह अध्याय जीवन को सरल भाषा में समझने का मार्ग दिखाता है।

सांख्य योग गीता का वह दार्शनिक आधार है जिसके माध्यम से आत्मा, प्रकृति और कर्म के तत्त्व को स्पष्ट किया गया है। गीता में सांख्य का अर्थ केवल एक दर्शन-शास्त्र नहीं, बल्कि तत्त्वों का विवेकपूर्ण ज्ञान है। सांख्य योग आत्मा और प्रकृति के भेद को स्पष्ट करता है और इसी विवेक के माध्यम से जीवन के सही दृष्टिकोण का निर्माण करता है।

सांख्य योग के अनुसार आत्मा नित्य, अजन्मा, अविनाशी और चेतन तत्त्व है, जबकि शरीर, मन और बुद्धि प्रकृति के विकार हैं। आत्मा न कर्म करती है और न कर्मों का फल भोगती है; वह केवल साक्षी है। कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा संपन्न होते हैं। जब आत्मा अज्ञानवश स्वयं को शरीर और मन से एक मान लेती है, तब वह स्वयं को कर्ता और भोक्ता समझने लगती है और इसी से बंधन उत्पन्न होता है।

सांख्य योग में कर्म को त्यागने की शिक्षा नहीं दी गई, बल्कि कर्म के सत्य स्वरूप को समझने की शिक्षा दी गई है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि कर्म प्रकृति में हो रहे हैं और आत्मा उनसे अछूती है, तब कर्म बंधन का कारण नहीं रहते। यह विवेक ही कर्मयोग का आधार बनता है। इस प्रकार सांख्य योग और कर्मयोग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

सांख्य योग का जीवन-दर्शन यह है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान कर संसार में स्थित रहे। सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीवन की विविध परिस्थितियाँ प्रकृति के क्षेत्र में आती हैं, आत्मा के नहीं। जब यह विवेक दृढ़ हो जाता है, तब जीवन में समत्व, शांति और निर्भयता उत्पन्न होती है। व्यक्ति कर्म करता है, पर भीतर से आसक्त नहीं होता।

गीता के अनुसार सांख्य योग का अंतिम फल आत्मबोध और ब्रह्मस्थिति है। जब आत्मा अपने साक्षीस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है, तब अज्ञान का नाश होता है और मोक्ष का द्वार खुलता है। यही सांख्य योग का परम उद्देश्य है और यही गीता का समग्र जीवन-दर्शन — ज्ञान से बंधन-निवृत्ति और विवेक से मुक्त कर्म

यह विशेष रूप से सामान्य पाठक, गृहस्थ, विद्यार्थी और कर्मचारी को ध्यान में रखकर लिखने का प्रयास है। इसमें कठिन दर्शन को सरल उदाहरणों, दैनिक जीवन की घटनाओं और सहज भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास है, ताकि इसे पढ़ते समय यह बोझ नहीं, बल्कि संवाद जैसा लगे। 

विषाद – जब मन थक जाता है (श्लोक 1–10)

कल्पना कीजिए—एक ऐसा क्षण जब आपके सामने परीक्षा का परिणाम हो, नौकरी जाने का डर हो, या परिवार से जुड़ा कोई कठिन निर्णय लेना हो। मन कहता है, “सब छोड़ दूँ”, “यह मुझसे नहीं होगा।” ठीक यही स्थिति अर्जुन की है। युद्धभूमि में खड़ा अर्जुन कोई कमजोर व्यक्ति नहीं है, फिर भी उसका मन टूट जाता है। यह हमें बताता है कि संकट बाहरी नहीं, आंतरिक होता है।

अर्जुन का शरीर काँपता है, मुँह सूखता है, धनुष हाथ से गिर जाता है। गीता यहाँ मन और शरीर के गहरे संबंध को दिखाती है। जब मन हार मान लेता है, तो शरीर भी साथ छोड़ देता है। आज इसे हम Stress Response कहते हैं। परीक्षा-भय, इंटरव्यू-एंग्ज़ायटी, ऑफिस प्रेशर—ये सब उसी अर्जुन-विषाद के आधुनिक रूप हैं।

छोटा प्रसंग : परीक्षा हॉल में बैठा विद्यार्थी

एक विद्यार्थी पूरे साल मेहनत करता है, पर परीक्षा हॉल में प्रश्नपत्र देखते ही उसका मन खाली हो जाता है। हाथ ठंडे पड़ जाते हैं, दिल तेज़ धड़कने लगता है। वह सोचता है—“सब खत्म हो गया।” जबकि ज्ञान उसके भीतर है, समस्या केवल मन की है। अर्जुन की स्थिति भी यही है—सामर्थ्य होते हुए भी मन का साथ छूट जाना।

अर्जुन के तर्क सुनने में बहुत ऊँचे लगते हैं—“मैं अपने लोगों को कैसे मारूँ?”, “ऐसा सुख किस काम का?”—पर श्रीकृष्ण समझते हैं कि यह करुणा नहीं, पलायन है। इसलिए वे अर्जुन को सहानुभूति नहीं, दिशा देते हैं।

जीवन-संदेश: जब मन अत्यधिक भावुक हो जाए, तब निर्णय नहीं लेने चाहिए। पहले मन को स्थिर करना आवश्यक है। 

शरणागति – ज्ञान की वास्तविक शुरुआत (श्लोक 11)

अर्जुन जब यह स्वीकार करता है कि उसका विवेक भ्रमित हो चुका है और वह श्रीकृष्ण की शरण में है, तभी गीता का वास्तविक उपदेश प्रारम्भ होता है। यह क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्ञान वहीं से आरम्भ होता है जहाँ अहंकार समाप्त होता है।

आधुनिक प्रशासन और नेतृत्व में भी यही सिद्धांत लागू होता है। एक सक्षम अधिकारी या नेता वही होता है, जो यह स्वीकार कर सके कि वह सब कुछ नहीं जानता और आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन ले सके। शरणागति का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि सीखने के लिए स्वयं को खोल देना है। 

आत्मा का अमर स्वरूप – शोक का दार्शनिक समाधान (श्लोक 12–30)

श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक का समाधान आत्मा के ज्ञान से करते हैं। वे कहते हैं कि न मैं कभी नहीं था, न तुम कभी नहीं थे—आत्मा का अस्तित्व कालातीत है। शरीर बदलता है, नष्ट होता है, पर आत्मा नित्य और अविनाशी है।

बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था का उदाहरण देकर श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि जैसे देह की अवस्थाएँ बदलती हैं, वैसे ही मृत्यु केवल एक परिवर्तन है, अंत नहीं। यदि आत्मा अमर है, तो उसके नाश का शोक करना अविवेक है।

आधुनिक संदर्भ में इसे पहचान (Identity) के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक व्यक्ति जीवन में छात्र, कर्मचारी, अभिभावक जैसी अनेक भूमिकाएँ निभाता है, पर उसका मूल अस्तित्व बना रहता है। इसी प्रकार आत्मा देह रूपी वस्त्र बदलती है। 

सुख-दुःख और सहनशीलता का दर्शन (श्लोक 14–15)

श्रीकृष्ण कहते हैं कि सुख और दुःख इन्द्रियों के विषय-संपर्क से उत्पन्न होते हैं और क्षणिक होते हैं। इसलिए विवेकशील व्यक्ति उन्हें सहन करता है। यह सहनशीलता कायरता नहीं, बल्कि मानसिक परिपक्वता है।

आधुनिक मनोविज्ञान में इसे Hedonic Adaptation कहा जाता है—मनुष्य हर सुख और दुःख का अभ्यस्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वह जीवन के उतार-चढ़ाव में संतुलित रहता है। 

स्वधर्म और कर्तव्य – सामाजिक उत्तरदायित्व का आधार (श्लोक 31–38)

आत्मा के ज्ञान के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके स्वधर्म की याद दिलाते हैं। क्षत्रिय के लिए न्यायपूर्ण युद्ध से बढ़कर कोई धर्म नहीं। यदि अर्जुन युद्ध से भागता है, तो वह केवल अपना नहीं, बल्कि समाज का भी अहित करेगा।

प्रशासनिक दृष्टि से यह कर्तव्य-बोध अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कोई न्यायाधीश भय या करुणा में आकर न्याय न करे, या कोई अधिकारी दबाव में आकर अपने दायित्व से पीछे हट जाए, तो व्यवस्था चरमरा जाती है। गीता यहाँ व्यक्तिगत भावना से ऊपर उठकर सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने की शिक्षा देती है। 

निष्काम कर्मयोग – काम करो, बोझ मत ढोओ (श्लोक 39–50)

इस में गीता का सबसे व्यावहारिक सूत्र सामने आता है। श्रीकृष्ण कहते हैं—तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। यह सुनकर अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं कि क्या फल की चिंता बिल्कुल छोड़ देनी चाहिए। वास्तव में गीता यह नहीं कहती। वह केवल यह सिखाती है कि फल को मानसिक बोझ मत बनने दो।

छोटा प्रसंग : ईमानदार कर्मचारी

एक कार्यालय में दो कर्मचारी थे। एक हर समय यही सोचता रहता था कि बॉस क्या कहेंगे, प्रमोशन मिलेगा या नहीं। दूसरा अपना काम पूरी निष्ठा से करता था, बिना शोर किए। वर्षों बाद पहला मानसिक रूप से थक चुका था, जबकि दूसरा शांत और सम्मानित स्थिति में था। अंतर केवल दृष्टि का था—काम को बोझ मानना या कर्तव्य।

एक विद्यार्थी यदि यह सोचकर पढ़े कि “फेल हो गया तो क्या होगा”, तो पढ़ाई बोझ बन जाती है। वही विद्यार्थी यदि यह सोचे कि “आज मुझे यह विषय समझना है”, तो पढ़ाई सहज हो जाती है। इसी प्रकार कर्मचारी यदि हर काम के साथ प्रमोशन, तारीफ़ या डर जोड़ ले, तो वह भीतर से थक जाता है।

निष्काम कर्म का अर्थ है—पूरी ईमानदारी से काम करना, पर मन को परिणाम की चिंता से मुक्त रखना। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Healthy Detachment कहता है। यह व्यक्ति को निठल्ला नहीं, बल्कि अधिक प्रभावी बनाता है।

जीवन-संदेश: काम को साधना बनाइए, तब वही काम तनाव नहीं, संतोष देगा। 

स्थितप्रज्ञ पुरुष – संतुलित जीवन का आदर्श (श्लोक 54–72)

अर्जुन का अंतिम प्रश्न बहुत मानवीय है—“जो व्यक्ति वास्तव में स्थिर बुद्धि वाला होता है, वह कैसा दिखता है? कैसे बोलता है? कैसे जीता है?” श्रीकृष्ण कोई चमत्कारी योगी का वर्णन नहीं करते, बल्कि एक ऐसे सामान्य मनुष्य की तस्वीर खींचते हैं जो भीतर से शांत है।

छोटी कहानी : समुद्र और नदियाँ

अनेकों नदियाँ समुद्र में मिलती हैं—कुछ स्वच्छ, कुछ गंदा जल लेकर। फिर भी समुद्र न उछलता है, न भर जाता है। उसकी गहराई उसे स्थिर रखती है। श्रीकृष्ण कहते हैं—स्थितप्रज्ञ व्यक्ति भी ऐसा ही होता है। विषय आते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं, पर उसका संतुलन बना रहता है।

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वह है जिसकी खुशी बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। वह सुख में उछलता नहीं और दुःख में टूटता नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि उसे दुःख होता ही नहीं, बल्कि यह कि दुःख उसे तोड़ नहीं पाता।

आज के समय में ऐसा व्यक्ति वही है जो सोशल मीडिया की तुलना, ऑफिस की राजनीति और जीवन की अनिश्चितताओं के बीच भी अपना संतुलन बनाए रखता है। वह जानता है कि क्या उसके नियंत्रण में है और क्या नहीं। यही समझ उसे स्थिर बनाती है।

जीवन-संदेश: बाहरी दुनिया को स्थिर करने से पहले भीतर की दुनिया को स्थिर करना सीखिए।

उपसंहार : सांख्य योग का समकालीन संदेश

श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय हमें यह सिखाता है कि जीवन की समस्याओं का समाधान केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि विवेक, ज्ञान और कर्तव्य-बोध से होता है। आत्मा की अमरता, कर्म की अनिवार्यता और निष्काम भाव—ये तीनों मिलकर मानव को आंतरिक शांति और बाह्य कर्तव्य दोनों में संतुलन प्रदान करते हैं।

इस प्रकार ‘सांख्य योग’ केवल आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण कला है, जो आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी महाभारत काल में थी।

स्थितप्रज्ञ : आज के विद्यार्थी और युवा के लिए 10 जीवन-सूत्र

  1. आत्म-मूल्य बाहरी परिणामों से तय न करें — परीक्षा, रैंक, चयन अस्थायी हैं; आत्मा स्थायी है।
  2. सुख में बहें नहीं, दुख में टूटें नहीं — भावनाओं का अनुभव करें, पर उनके दास न बनें।
  3. इच्छाओं का दमन नहीं, दिशा-निर्देशन करें — लक्ष्य रखें, पर लक्ष्य आपको न चलाएँ।
  4. प्रतिक्रिया से पहले विवेक रखें — तुरंत जवाब नहीं, सही जवाब दें।
  5. इंद्रियों पर अधिकार ही स्वतंत्रता है — स्क्रीन, स्वाद, संगति—सब पर सजग नियंत्रण रखें।
  6. आसक्ति से पहले चेतना रखें — जो आकर्षक है, वह आवश्यक नहीं।
  7. क्रोध को चेतावनी मानें, निर्णय नहीं — क्रोध बताए कि रुकना ज़रूरी है।
  8. कर्म करें, परिणाम पर कब्ज़ा न करें — प्रयास आपका है, फल समय का।
  9. तुलना छोड़ें, प्रगति देखें — अपनी यात्रा को दूसरों की मंज़िल से न नापें।
  10. शांति को सफलता का मानदंड बनाएँ — भीतर की स्थिरता ही जीवन की वास्तविक जीत है।

स्थितप्रज्ञ — आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता

अध्याय 2 केवल अर्जुन के शोक का समाधान नहीं करता, बल्कि आज के मनुष्य की आंतरिक उलझनों का भी उत्तर देता है। भय, असफलता, तुलना, अपेक्षा और अनिश्चितता—ये सभी आधुनिक जीवन के युद्धक्षेत्र हैं। ऐसे समय में गीता स्थितप्रज्ञ का आदर्श प्रस्तुत करती है, जो न पलायन सिखाता है, न कठोर संन्यास, बल्कि संतुलित जीवन की कला सिखाता है।

स्थितप्रज्ञ वह है जो संसार में रहते हुए संसार से बंधता नहीं। वह कर्म करता है, पर कर्म से बँधता नहीं; वह इच्छाएँ रखता है, पर इच्छाओं का दास नहीं बनता। यही कारण है कि स्थितप्रज्ञ आज के विद्यार्थी और युवा के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व बन जाता है—जो लक्ष्य भी रखता है और शांति भी।

आज सफलता को केवल उपलब्धि से मापा जाता है, पर गीता सिखाती है कि वास्तविक सफलता आंतरिक स्थिरता है। जब बुद्धि स्थिर होती है, तभी निर्णय सही होते हैं; और जब निर्णय सही होते हैं, तभी जीवन सही दिशा में बढ़ता है।

इस प्रकार सांख्य योग अर्जुन को युद्ध के लिए ही नहीं, जीवन के हर संघर्ष के लिए तैयार करता है। अध्याय 2 हमें यह बोध कराता है कि यदि भीतर की प्रज्ञा स्थिर हो जाए, तो बाहरी परिस्थितियाँ हमें विचलित नहीं कर सकतीं। यही स्थितप्रज्ञता जीवन की सबसे बड़ी साधना और सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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तीसरा अध्याय 

अध्याय 3 : कर्मयोग

कर्मयोग - बिना तनाव के कार्य करने की कला 
(कर्तव्य, कर्म और आधुनिक जीवन)

अध्याय 2 में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा का ज्ञान और स्थितप्रज्ञ की अवस्था समझाई। पर स्वाभाविक रूप से अर्जुन के मन में एक प्रश्न उठता है—यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, यदि बुद्धि की स्थिरता ही लक्ष्य है, तो फिर यह युद्ध, यह कर्म क्यों? यही प्रश्न आज का विद्यार्थी और युवा भी पूछता है—यदि शांति ही उद्देश्य है, तो संघर्ष क्यों? यदि संतुलन चाहिए, तो प्रतिस्पर्धा क्यों?

अध्याय 3 इसी द्वंद्व का समाधान है। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि कर्म से पलायन समाधान नहीं है, बल्कि सही दृष्टि से किया गया कर्म ही मुक्ति का मार्ग है

अर्जुन का प्रश्न : भ्रम की आधुनिक शक्ल (श्लोक 1–2)

श्लोक 1

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

अर्जुन पूछता है—यदि ज्ञान श्रेष्ठ है, तो मुझे इस घोर कर्म (युद्ध) में क्यों डाल रहे हैं? यह वही प्रश्न है जो आज का युवा पूछता है—यदि अंततः शांति चाहिए, तो इतना तनाव, पढ़ाई, संघर्ष क्यों?

अर्जुन श्रीकृष्ण से यह प्रश्न उस समय करता है जब उसका मन द्वंद्व और विवेक के बीच अटका हुआ है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता, शोक की निरर्थकता और समत्व-बुद्धि का उपदेश दिया था तथा यह भी कहा था कि बुद्धियोग अर्थात् विवेकयुक्त ज्ञान, साधारण कर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ है। इन वचनों को सुनकर अर्जुन के भीतर एक बौद्धिक उलझन उत्पन्न हो गई। वह यह समझ नहीं पा रहा कि यदि ज्ञान को ही श्रेष्ठ माना गया है, तो फिर कर्म का आग्रह क्यों किया जा रहा है। इसी जिज्ञासा की अभिव्यक्ति इस श्लोक में होती है।

अर्जुन कहते हैं कि हे जनार्दन, यदि आपकी दृष्टि में कर्म से अधिक श्रेष्ठ बुद्धि या ज्ञान है, तो फिर हे केशव, आप मुझे इस भयानक कर्म—युद्ध—में क्यों प्रवृत्त कर रहे हैं। यहाँ अर्जुन ज्ञान और कर्म को दो परस्पर विरोधी मार्गों के रूप में देख रहा है। उसकी धारणा यह बन गई है कि ज्ञान का अर्थ है वैराग्य, शान्ति और संसार से निवृत्ति, जबकि कर्म का अर्थ है संघर्ष, हिंसा और बन्धन। इसीलिए उसे श्रीकृष्ण का उपदेश परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होता है।

इस श्लोक में प्रयुक्त “कर्मणि घोरे” शब्द अर्जुन की मानसिक अवस्था को स्पष्ट करता है। उसके लिए यह युद्ध केवल एक कर्तव्य नहीं है, बल्कि अपनों के वध, गुरुओं के संहार और पाप की आशंका से युक्त एक अत्यन्त भयावह कर्म है। ऐसे में वह सोचता है कि यदि आत्मज्ञान ही श्रेयस्कर है, तो इस प्रकार के हिंसात्मक कर्म में प्रवृत्त होना कैसे उचित हो सकता है। उसका प्रश्न मूलतः नैतिक और दार्शनिक दोनों स्तरों पर खड़ा होता है।

वास्तव में अर्जुन की यह जिज्ञासा अज्ञानजन्य नहीं है, बल्कि अधूरे बोध से उत्पन्न है। वह ज्ञान को कर्म-त्याग से जोड़ रहा है, जबकि गीता का सिद्धान्त कर्म-त्याग नहीं, बल्कि कर्तापन और फलासक्ति के त्याग का उपदेश देता है। अर्जुन अभी इस सूक्ष्म भेद को नहीं समझ पाया है, इसीलिए उसे ज्ञान और कर्म के बीच टकराव दिखाई देता है।

यह श्लोक गीता के कर्मयोग अध्याय की भूमिका के रूप में कार्य करता है। यहीं से यह प्रश्न उभरता है कि क्या मुक्ति के लिए कर्म का परित्याग आवश्यक है या फिर कर्म करते हुए भी आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति संभव है। आगे श्रीकृष्ण इसी भ्रम को दूर करते हुए स्पष्ट करेंगे कि ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि ज्ञान से प्रकाशित कर्म ही मनुष्य को बन्धन से मुक्त करता है। इस प्रकार अर्जुन का यह प्रश्न सम्पूर्ण मानव जीवन की उस समस्या को उद्घाटित करता है, जिसमें मनुष्य ज्ञान की आकांक्षा और कर्म की अनिवार्यता के बीच स्वयं को उलझा हुआ पाता है।

श्लोक 2 में अर्जुन स्वीकार करता है कि श्रीकृष्ण की बातें उसे भ्रमित कर रही हैं। यह भ्रम नकारात्मक नहीं, बल्कि परिवर्तन का संकेत है।

श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 3, श्लोक 2 का अर्थ नीचे एक सतत, पुस्तक-शैली पैराग्राफ में प्रस्तुत है।


अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि आपके वचनों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो गई है, क्योंकि आप मानो परस्पर विरोधी बातें कह रहे हैं। एक ओर आप ज्ञान और बुद्धियोग की प्रशंसा करते हैं, और दूसरी ओर कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। अर्जुन निवेदन करता है कि आप इन दोनों में से किसी एक मार्ग को स्पष्ट रूप से निश्चित करके बताइए, जिससे वह उस मार्ग का आश्रय लेकर निश्चित रूप से कल्याण को प्राप्त कर सके। इस कथन में अर्जुन की मानसिक स्थिति स्पष्ट दिखाई देती है—वह संशयग्रस्त है, निर्णय लेने में असमर्थ है और चाहता है कि उसे एक ऐसा स्पष्ट और अविचल मार्ग बताया जाए जो उसे शोक, पाप और बन्धन से मुक्त कर दे। यह श्लोक अर्जुन की उस मानवीय प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें वह जीवन के जटिल सत्यों को सरल विकल्पों में बाँटकर समझना चाहता है—या तो ज्ञान का मार्ग, या कर्म का। परन्तु गीता का गूढ़ संदेश यही है कि सत्य इन दोनों के समन्वय में निहित है, न कि किसी एक के एकांगी चयन में। इसी भ्रम के निवारण हेतु श्रीकृष्ण आगे कर्मयोग का उपदेश देते हैं।

कर्म से कोई नहीं बच सकता (श्लोक 5)

श्लोक 5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं—कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। आज का विद्यार्थी चाहे पढ़े या न पढ़े, निर्णय तो ले ही रहा है। निष्क्रियता भी एक प्रकार का कर्म है।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण मनुष्य के कर्म से अविच्छिन्न सम्बन्ध को अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करते हैं। वे कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति कभी भी, यहाँ तक कि एक क्षण मात्र के लिए भी, पूर्णतः अकर्म करने वाला नहीं रह सकता। मनुष्य चाहे बाह्य रूप से कर्म का त्याग कर दे, चाहे वह मौन धारण कर ले या निष्क्रिय प्रतीत हो, फिर भी वह कर्म से मुक्त नहीं होता। कारण यह है कि प्रत्येक प्राणी प्रकृति से उत्पन्न गुणों—सत्त्व, रज और तम—के प्रभाव में अनिवार्य रूप से कर्म करने के लिए प्रेरित होता है। ये गुण ही मन, बुद्धि और इन्द्रियों को गतिशील रखते हैं, जिससे विचार, भावना और क्रिया निरन्तर चलती रहती है। अतः कर्म करना मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था है, न कि कोई वैकल्पिक चुनाव। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि कर्म का पूर्ण त्याग सम्भव नहीं है; वास्तविक साधना कर्म से पलायन में नहीं, बल्कि प्रकृति के गुणों के अधीन होते हुए भी कर्म के प्रति आसक्ति और अहंकार के त्याग में निहित है। यही गीता का कर्मयोग का मूल सिद्धान्त है।

कर्मयोग का मूल सूत्र (श्लोक 7–8)

श्लोक 7 बताता है कि जो व्यक्ति इंद्रियों को नियंत्रित कर कर्तव्य करता है, वही श्रेष्ठ है।
श्लोक 8 में श्रीकृष्ण आदेश देते हैं—नियतं कुरु कर्म त्वं—अपना निर्धारित कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से जीवन संभव नहीं।

कर्मयोग का मूल सिद्धांत बहुत सरल है—मनुष्य कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता, इसलिए कर्म से भागना समाधान नहीं है। समस्या कर्म में नहीं, बल्कि इस सोच में है कि “मैं ही सब कर रहा हूँ” और “मुझे इसका फल जरूर चाहिए।” जब कोई व्यक्ति अपने काम को कर्तव्य समझकर करता है, बिना फल की चिंता किए और बिना अहंकार के, तब वही कर्म उसे बाँधता नहीं, बल्कि भीतर से मुक्त करता है। कर्मयोग हमें यह सिखाता है कि पढ़ाई करना, नौकरी करना, परिवार निभाना या समाज के लिए काम करना—सब ईश्वर की इच्छा मानकर शांत मन से किया जाए। सफलता मिले या असफलता, लाभ हो या हानि, मन को बराबर रखना ही कर्मयोग है। इस तरह कर्मयोग का सार यह है कि काम छोड़ना नहीं है, बल्कि काम करते हुए मन को आसक्ति और अहंकार से मुक्त रखना है; तभी कर्म साधना बनता है और जीवन शांति की ओर बढ़ता है।

निष्काम कर्म : गीता का क्रांतिकारी विचार (श्लोक 9)

श्लोक 9
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥

यह श्लोक सिखाता है कि कर्म यदि केवल स्वार्थ के लिए किया जाए तो बंधन बनता है, पर यदि व्यापक उद्देश्य से किया जाए तो वही कर्म साधना बन जाता है। विद्यार्थी के लिए पढ़ाई जब केवल अंक के लिए हो, तो तनाव है; जब कर्तव्य और विकास के लिए हो, तो साधना।

इस श्लोक का भाव बहुत सीधा-सा है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अगर हम कोई काम सिर्फ अपने फायदे, नाम या सुख के लिए करते हैं, तो वही काम हमें बाँध देता है और बार-बार चिंता, डर और दुख देता है। लेकिन अगर वही काम हम यज्ञ की तरह, यानी ईश्वर को समर्पित भाव से या दूसरों की भलाई के लिए करते हैं, तो वह हमें बाँधता नहीं है। जीवन में काम करना तो ज़रूरी है, पर काम करते समय मन का स्वार्थ और ज़्यादा पाने की लालसा छोड़ देना ही असली बात है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरी लगन से करो, पर उससे चिपको मत। जब इंसान बिना आसक्ति के, शुद्ध मन से अपना काम करता है, तो वही कर्म उसे तनाव से नहीं, बल्कि शांति और भीतर की आज़ादी की ओर ले जाता है।

कर्मयोग और आज का युवा

कर्मयोग पलायन नहीं सिखाता। यह सिखाता है कि—

  • कर्म अनिवार्य है
  • आसक्ति वैकल्पिक है
  • कर्तव्य गरिमा देता है
  • निष्कामता शांति देती है

श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय, जिसे 'कर्मयोग' कहा जाता है, आधुनिक युग की सबसे बड़ी समस्या—'तनाव' (Stress)—का अचूक इलाज है। आज का मनुष्य भाग रहा है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि वह पहुँच कहाँ रहा है। विद्यार्थी ग्रेड्स के पीछे है, युवा करियर के पीछे, गृहस्थी ईएमआई (EMI) के पीछे और कर्मचारी प्रमोशन के पीछे।
इस भागदौड़ में हम कर्म तो कर रहे हैं, लेकिन शांति खो चुके हैं। कृष्ण यहाँ समझाते हैं कि कर्म बंधन नहीं है, बल्कि मुक्ति का मार्ग है—यदि उसे 'कला' की तरह किया जाए।

1. विद्यार्थी: परिणाम के डर से मुक्ति (Focus over Fear)

विद्यार्थियों के लिए सबसे बड़ा तनाव परीक्षा का परिणाम है। कृष्ण कहते हैं:

 "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" 
 (तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर कभी नहीं।) 

उदाहरण और संदर्भ

एक विद्यार्थी जब पढ़ता है, तो उसका आधा मन इस बात में होता है कि "अगर फेल हो गया तो क्या होगा?" या "पड़ोसी के लड़के के ज्यादा नंबर आ गए तो?" इसे 'भविष्य का तनाव' कहते हैं।

अर्जुन की स्थिति: अर्जुन भी एक विद्यार्थी की तरह उलझा हुआ था। वह युद्ध (कर्म) के परिणाम को लेकर इतना डरा हुआ था कि उसने धनुष रख दिया। कृष्ण ने उसे समझाया कि युद्ध का परिणाम (हार या जीत) उसके हाथ में नहीं है, लेकिन 'गांडीव उठाना' उसके हाथ में है।

छोटी कहानी: दो चित्रकार

दो शिष्यों को एक गुरु ने 'शांति' का चित्र बनाने को कहा। एक ने शांत झील का चित्र बनाया। दूसरे ने कड़कती बिजली और गिरते झरने के बीच एक पेड़ की टहनी पर चहचहाते पक्षी का चित्र बनाया। गुरु ने दूसरे को चुना।
सीख: शांति एकांत में नहीं, बल्कि चुनौतियों के बीच शांत रहकर अपना काम करने में है। विद्यार्थियों को सिलेबस को 'बोझ' नहीं, 'जिज्ञासा' मानना चाहिए।

2. युवा: ऊर्जा का सही निवेश (Passion vs. Obsession)

युवाओं के सामने आज 'विकल्पों' का पहाड़ है। सोशल मीडिया की तुलना उन्हें हीन भावना (Inferiority Complex) से भर देती है।

स्वधर्म का महत्व

कृष्ण कहते हैं—"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्" (अपना साधारण कर्तव्य दूसरे के असाधारण कर्तव्य से बेहतर है)।
 
चुनौती: आज का युवा 'FOMO' (छूट जाने का डर) का शिकार है। वह वह बनना चाहता है जो समाज उसे दिखाना चाहता है।

इस वाक्य का अर्थ बहुत ही सरल है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपना कर्तव्य, भले ही वह पूरी तरह सही न हो या उसमें कुछ कमी हो, फिर भी दूसरे के कर्तव्य को बहुत अच्छे ढंग से करने से बेहतर होता है। हर व्यक्ति की क्षमता, परिस्थिति और जीवन-भूमिका अलग होती है, इसलिए जो काम हमारे स्वभाव और स्थिति के अनुसार है, वही हमारे लिए उचित होता है। किसी और का काम हमें बाहर से अच्छा या आसान लग सकता है, लेकिन वह हमारे लिए सही नहीं होता। दूसरे की नकल में किया गया काम हमें उलझन, डर और असंतोष दे सकता है। इसलिए गीता यह सिखाती है कि व्यक्ति को अपने रास्ते पर ईमानदारी से चलना चाहिए, चाहे उसमें कठिनाई हो या थोड़ी कमी ही क्यों न हो। अपने स्वधर्म पर टिके रहना ही मन को शांति देता है और जीवन को सही दिशा में ले जाता है।

 इस वाक्य को समझाने के लिए एक छोटी कहानी और कुछ रोज़मर्रा के उदाहरण बहुत स्पष्ट कर देते हैं।

एक गाँव में दो मित्र रहते थे। एक किसान था और दूसरा लोहार। किसान सुबह से शाम तक खेत में मेहनत करता, पर उसकी खेती बहुत उन्नत नहीं थी—कभी बारिश कम पड़ती, कभी फसल ठीक नहीं होती। दूसरी ओर लोहार अपने काम में बहुत निपुण था और लोग उसकी कारीगरी की तारीफ़ करते थे। किसान यह देखकर सोचने लगा कि उसका काम तो कठिन है और फल भी अनिश्चित है, जबकि लोहार का काम साफ़-सुथरा और सम्मानजनक है। उसने लोहार का काम सीखने का निश्चय किया और खेती छोड़ दी। पर कुछ समय बाद वह न तो औज़ार ठीक से बना पाया, न लोगों का विश्वास जीत पाया। उसका मन अशान्त रहने लगा और जीवन बिखरने लगा। अंत में उसे समझ आया कि जो काम उसके स्वभाव और क्षमता के अनुसार था—भले ही उसमें कठिनाई थी—वही उसके लिए सही था। यही बात श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपना काम, चाहे साधारण हो, दूसरों के श्रेष्ठ काम की नकल से बेहतर है।

इसी बात को हम रोज़मर्रा के जीवन में भी देख सकते हैं। जैसे कोई विद्यार्थी विज्ञान में सामान्य हो, लेकिन कला या खेल में अच्छा हो। यदि वह केवल दूसरों को देखकर जबरदस्ती विज्ञान में आगे बढ़ने की कोशिश करे, तो वह तनाव और असफलता झेलेगा। लेकिन यदि वह अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत करे, तो भले ही शुरुआत में कठिनाई हो, अंत में संतोष और सफलता मिलती है। इसी तरह किसी शांत स्वभाव वाले व्यक्ति का नेतृत्व की नकल करना उसे भीतर से परेशान कर सकता है, जबकि पर्दे के पीछे सहयोग देना उसका स्वधर्म हो सकता है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि गीता हमें तुलना और नकल से दूर रहने की शिक्षा देती है। श्रीकृष्ण का संदेश यही है कि जीवन में सबसे सही रास्ता वही है जो हमारे स्वभाव, परिस्थिति और जिम्मेदारी के अनुसार हो। उसी रास्ते पर ईमानदारी से चलना—भले ही वह कठिन लगे—दूसरों के चमकदार रास्ते की नकल करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

कर्मयोग सिखाता है कि अपनी प्रकृति (Nature) को पहचानो। यदि आप चित्रकार बनने के लिए बने हैं, तो सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनकर आप कभी तनावमुक्त नहीं रह सकते।

3. गृहस्थी: 'यज्ञ' भाव से सेवा (Life as an Offering)

एक गृहस्थ के लिए घर की जिम्मेदारियां, बिल भरना और बच्चों का पालन-पोषण करना अक्सर एक चक्की की तरह महसूस होता है।
एक गृहस्थ दो पीढ़ियों के मध्य संतुलन बनाने का प्रयास करता है एक बीतती हुई दूसरी आने वाले भविष्य अर्थात माता-पिता की सेवा उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए कई बार अपने संतान और पत्नि के साथ कहीं घूमने जाने, या फिर मनोरंजन के लिये समय न निकाल पाने पर मन में उत्पन्न होने वाले द्वन्द से अकसर सामना होता रहता है। अर्थात अपने निजी सुखों का त्याग करना पड़ता है। ऐसे में भगवदगीता कहती है कि-

गृहस्थ जीवन में माता-पिता की सेवा करते समय अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति को अपने निजी सुखों का त्याग करना पड़ता है। दोस्तों के साथ घूमना-फिरना, मनचाही जगहों की यात्राएँ, तीर्थ-दर्शन या नियमित पूजन-पाठ—इन सबके लिए समय नहीं निकल पाता। ऐसी स्थिति में मन में यह भावना जन्म लेती है कि “मेरे जीवन का आनंद छिन गया”, “मैं अपनी इच्छाएँ पूरी नहीं कर पा रहा हूँ।” यही भावना धीरे-धीरे मानसिक अशांति, खीझ और कभी-कभी अपराधबोध का कारण बन जाती है। गीता का कर्मयोग और यज्ञ-भाव इसी मानसिक उलझन से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

यदि माता-पिता की सेवा को बोझ या त्याग समझकर किया जाए, तो मन बार-बार उसी छूटी हुई खुशी की ओर भागता रहता है। व्यक्ति बाहर से सेवा करता है, पर भीतर असंतोष पलता रहता है। इसके विपरीत, जब यही सेवा “यज्ञ” के भाव से की जाती है—अर्थात् यह मानकर कि यह ईश्वर द्वारा मुझे दिया गया कर्तव्य और अवसर है—तब दृष्टि बदल जाती है। तब यह समझ विकसित होती है कि जो समय माता-पिता के साथ बिताया जा रहा है, वही सबसे बड़ा पूजन है और उनकी सेवा ही साक्षात् दर्शन है। इस भाव से की गई सेवा में कमी नहीं, बल्कि पूर्णता का अनुभव होता है।

जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि इस जीवन-काल में मेरी भूमिका अभी यही है, तो तुलना और शिकायत स्वतः कम हो जाती है। यह बोध आता है कि हर जीवन-चरण में सब कुछ संभव नहीं होता। जैसे विद्यार्थी जीवन में कमाई नहीं होती और नौकरी के समय पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होती, वैसे ही सेवा के समय निजी इच्छाओं का पीछे रह जाना स्वाभाविक है। यह कोई अन्याय नहीं, बल्कि जीवन का क्रम है। इस स्वीकार्यता से मन हल्का होता है और अशांति धीरे-धीरे शान्ति में बदलने लगती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईश्वर सेवा के भाव को देखता है, स्थान या विधि को नहीं। जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा में लगा है, वह यदि यह समझ ले कि मेरी सेवा ही मेरी साधना है, तो उसे यह पीड़ा नहीं रहती कि मैं मंदिर नहीं जा पा रहा या तीर्थ नहीं घूम पा रहा। उसके लिए घर ही तीर्थ बन जाता है और सेवा ही पूजा। इस प्रकार यज्ञ-भाव से की गई सेवा व्यक्ति को यह सिखाती है कि सच्ची शांति इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि कर्तव्य की स्वीकृति और समर्पण से आती है। यही मानसिक अशांति से मुक्ति का सबसे गहरा और स्थायी मार्ग है।


यज्ञ का सिद्धांत

तीसरे अध्याय में कृष्ण 'यज्ञ' की बात करते हैं। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल हवन कुंड नहीं है, बल्कि 'निःस्वार्थ सेवा' है। यदि एक पिता यह सोचे कि "मैं बोझ उठा रहा हूँ", तो वह तनाव में रहेगा। लेकिन यदि वह सोचे कि "मैं समाज और परिवार की सेवा रूपी यज्ञ कर रहा हूँ", तो वही काम 'योग' बन जाता है। कृष्ण कहते हैं कि जैसे जल में कमल रहता है लेकिन भीगता नहीं, वैसे ही संसार में रहो पर उसमें डूबो मत।

4. कर्मचारी: कार्यस्थल पर कुशलता (Skill in Action)

कॉर्पोरेट जगत में 'बर्नआउट' (Burnout) बहुत सामान्य है। कृष्ण कर्मयोग को "योगः कर्मसु कौशलम्" कहते हैं—कर्मों में कुशलता ही योग है।
लोकसंग्रह (नेतृत्व की कला)
कर्मचारी और मैनेजर के लिए कृष्ण 'लोकसंग्रह' का सिद्धांत देते हैं। महापुरुष जो आचरण करते हैं, सामान्य लोग उसी का अनुसरण करते हैं।

आज के कार्यजीवन में डेडलाइन का दबाव, पहचान न मिलना और ऑफिस की राजनीति जैसी समस्याएँ लगभग हर व्यक्ति को मानसिक तनाव में डाल देती हैं। कर्मयोग इन समस्याओं से भागने का नहीं, बल्कि उन्हें सही दृष्टि से देखने और संभालने का रास्ता सिखाता है। जब काम की समय-सीमा का दबाव होता है, तब भविष्य की चिंता मन को अशान्त करती है। कर्मयोग कहता है कि भविष्य के परिणामों में उलझने के बजाय पूरे मन से वर्तमान क्षण में काम किया जाए। जब व्यक्ति पूरी एकाग्रता से काम में डूब जाता है, तो मन स्वतः शांत हो जाता है और काम बोझ नहीं, बल्कि प्रवाह (Flow) का अनुभव देने लगता है। यही स्थिति तनाव को कम करने की पहली कुंजी है।

अक्सर ऑफिस में पूरी मेहनत करने के बाद भी व्यक्ति को अपेक्षित श्रेय नहीं मिलता। ऐसे में मन में निराशा और गुस्सा पैदा होता है। कर्मयोग इस स्थिति में कर्तापन के अहंकार को छोड़ने की सीख देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रयास व्यर्थ है, बल्कि यह समझ विकसित करना है कि मैं अकेला सब कुछ करने वाला नहीं हूँ। परिस्थितियाँ, टीम, समय और ईश्वर—सब मिलकर परिणाम बनाते हैं। जब यह भाव आ जाता है कि “मैंने अपना कर्तव्य किया, अब परिणाम मेरे हाथ में नहीं,” तब श्रेय न मिलने का दुःख मन को बाँध नहीं पाता।

ऑफिस पॉलिटिक्स, तुलना और प्रतिस्पर्धा भी मानसिक अशांति का बड़ा कारण होती है। कर्मयोग यहाँ निष्काम भाव सिखाता है—अर्थात् दूसरों की चालों या बातों में उलझने के बजाय अपने काम को ही अपनी पूजा मान लेना। जब व्यक्ति यह ठान लेता है कि मेरा काम ही मेरी पहचान है और मैं उसे ईमानदारी से करूँगा, तो बाहरी शोर का प्रभाव कम हो जाता है। तब व्यक्ति दूसरों को बदलने की बजाय अपने कर्म की गुणवत्ता पर ध्यान देता है, जिससे मन अधिक स्थिर रहता है।

इन सभी बातों का सार यही है कि तनावमुक्ति का कोई जादुई उपाय बाहर नहीं, बल्कि सोच के भीतर छिपा है। वर्तमान में रहकर काम करना, परिणाम और श्रेय से अनावश्यक आसक्ति छोड़ना, और अपने कर्तव्य को पूजा की तरह करना—यही कर्मयोग का सरल और प्रभावी सूत्र है। जब यह दृष्टि जीवन में उतर जाती है, तो काम का दबाव कम नहीं भी होता, फिर भी मन भारी नहीं होता। यही कर्मयोग का “सीक्रेट फार्मूला” है, जो व्यक्ति को व्यस्त जीवन में भी भीतर से शांत बनाए रखता है।


कृष्ण ने तीसरे अध्याय में तनाव खत्म करने के 3 मुख्य सूत्र दिए हैं:

 * नियतं कुरु कर्म त्वं: जो अनिवार्य है, उसे करो। टालमटोल (Procrastination) तनाव का सबसे बड़ा कारण है।

 * तस्मादसक्तः सततं: आसक्ति छोड़ो। काम करो, लेकिन उसके नतीजे से चिपक मत जाओ।

 * इन्द्रियाणि पराण्याहुः: अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण। तनाव तब होता है जब मन बाहरी दुनिया की इच्छाओं के पीछे भागता है।

 जीवन एक खेल की तरह सोचिए, यदि आप फुटबॉल खेल रहे हैं और केवल स्कोरबोर्ड (परिणाम) को देखते रहें, तो आप कभी गोल नहीं कर पाएंगे। गोल करने के लिए आपका पूरा ध्यान 'गेंद' (वर्तमान कर्म) पर होना चाहिए। भगवदगीता का कर्मयोग हमें "प्रोसेस्ड ओरिएंटेड" (Process Oriented) बनाता है, "रिजल्ट ओरिएंटेड" (Result Oriented) नहीं। जब फल की चिंता मर जाती है, तब कर्म का आनंद जन्म लेता है।

कर्मयोग का विस्तार केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे दैनिक जीवन की छोटी-छोटी उलझनों को सुलझाने का एक वैज्ञानिक तरीका है। भगवान कृष्ण ने तीसरे अध्याय में जो सूत्र दिए हैं, वे आज के 'कॉर्पोरेट बर्नआउट', 'रिलेशनशिप स्ट्रेस' और 'करियर एंग्जायटी' के लिए सटीक एंटीबायोटिक की तरह काम करते हैं।

​अब हम इसे जीवन के विभिन्न पहलुओं के आधार पर इसे और अधिक गहराई से समझते हैं:

1.कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance) और 'अनासक्ति'

​अक्सर लोग समझते हैं कि अनासक्ति (Detachment) का मतलब है काम में रुचि न लेना या घर-बार छोड़ देना। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है।​

कृष्ण का दृष्टिकोण: कृष्ण कहते हैं कि अनासक्ति का अर्थ है—"काम में 100% डूबना, लेकिन परिणाम को खुद पर हावी न होने देना।"​ 

एक डॉक्टर जब ऑपरेशन करता है, तो उसे उस समय पूरी तरह 'सजग' और 'संलग्न' (Attached to the process) होना चाहिए। लेकिन अगर वह परिणाम (मरीज बचेगा या नहीं) के डर से कांपने लगे, तो वह कभी सफल सर्जरी नहीं कर पाएगा।​

अमल कैसे करें: जब आप ऑफिस में हों, तो ऑफिस के काम को 'यज्ञ' मानकर करें। जैसे ही लैपटॉप बंद हो, उस भूमिका (Role) को वहीं छोड़ दें। तनाव तब होता है जब हम ऑफिस का 'बॉस' या 'कर्मचारी' बनकर घर में प्रवेश करते हैं।

2. 'स्वधर्म' और करियर का चुनाव: तुलना का अंत

​आज के युवाओं में तनाव का सबसे बड़ा कारण 'सोशल कंपेरिजन' है। इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर दूसरों की सफलता देखकर हम अपने 'स्वधर्म' को भूल जाते हैं।​

"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।" (3.35)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को उसके कर्तव्य का बोध कराने के लिए कहा गया है। इसका सरल अर्थ यह है कि अपना स्वधर्म भले ही कुछ कमियों वाला क्यों न हो, फिर भी वह किसी दूसरे के धर्म को पूरी तरह सही ढंग से निभाने से श्रेष्ठ है

अर्थात्: दूसरों के मार्ग पर चलकर सफलता पाने से बेहतर है कि अपने स्वाभाविक मार्ग पर चलते हुए साधारण सफलता प्राप्त करना।​

सरल शब्दों में समझें तो स्वधर्म वह कर्तव्य है जो हमारी प्रकृति, क्षमता, परिस्थिति और जीवन-भूमिका के अनुसार होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप कार्य करता है, चाहे उसमें पूर्णता न भी हो, तो वह उसके आत्मिक विकास के लिए सुरक्षित और उचित होता है। इसके विपरीत, किसी और का मार्ग देखकर उसकी नकल करना बाहर से भले ही अच्छा लगे, पर भीतर असंतोष, भय और विघटन पैदा करता है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि दूसरों जैसा बनने की दौड़ छोड़कर अपने मार्ग पर ईमानदारी से चलो—क्योंकि परधर्म का आकर्षण अंततः पतन का कारण बन सकता है, जबकि स्वधर्म का पालन आत्मबल और स्थिरता देता है

उदाहरण: यदि आपकी प्रकृति सृजनात्मक (Creative) है, लेकिन आप केवल पैसों के लिए कोडिंग कर रहे हैं, तो आपका आंतरिक संघर्ष (Internal Conflict) कभी खत्म नहीं होगा।​

समाधान: अपनी प्रकृति को पहचानें। जब आपका काम आपकी प्रकृति के अनुकूल होता है, तो वह 'काम' नहीं रहता, 'योग' बन जाता है। उसमें थकान नहीं, बल्कि ऊर्जा मिलती है।

3-नेतृत्व और टीम मैनेजमेंट (Leadership & Teamwork)

कृष्ण: इतिहास के पहले और सबसे महान 'मैनेजमेंट गुरु'

जब हम 'मैनेजमेंट' शब्द सुनते हैं, तो हमें लगता है कि यह आधुनिक कॉर्पोरेट दुनिया की देन है। लेकिन यदि हम सूक्ष्मता से देखें, तो श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को जो सिखाया, वह 'सेल्फ-मैनेजमेंट' (स्व-प्रबंधन) का सबसे बड़ा पाठ था।

आज के लीडर्स को सिखाया जाता है कि संकट के समय शांत कैसे रहें, लेकिन कृष्ण ने इसे जिया। जब चारों ओर शंखनाद हो रहा था, सेनाएं मरने-मारने को उतारू थीं, तब कृष्ण मुस्कुरा रहे थे (प्रहसन्निव भारत)। उनकी यह मुस्कान ही उनकी सबसे बड़ी शिक्षा है—कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी भयावह क्यों न हों, आपका आंतरिक केंद्र (Internal Core) विचलित नहीं होना चाहिए।

इस टीका में हम कृष्ण के उन गुणों को देखेंगे जो हमें सिखाते हैं कि:

 * संसाधनों का सही उपयोग: कृष्ण के पास अपनी नारायणी सेना थी, लेकिन उन्होंने खुद को चुना—निहत्थे। यह सिखाता है कि युद्ध हथियारों से नहीं, 'विज़न' से जीते जाते हैं।

 * इमोशनल इंटेलिजेंस: अर्जुन जब भावनाओं में बहकर तर्क दे रहा था, तो कृष्ण ने उसे दबाया नहीं, बल्कि उसे बोलने दिया (Active Listening)। उन्होंने तब तक उपदेश नहीं दिया जब तक अर्जुन ने हार मानकर यह नहीं कह दिया कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे राह दिखाएं'।

 अर्जुन: हम सबके भीतर का एक 'द्वंद'

 हमें यह समझना होगा कि अर्जुन कोई अलग व्यक्ति नहीं, बल्कि हमारी ही एक 'अवस्था' है। अर्जुन एक विजेता है, उसने बड़े-बड़े युद्ध जीते हैं, लेकिन जब अपनों के विरुद्ध खड़े होने की बात आती है, तो वह टूट जाता है।

आज का मनुष्य भी इसी 'अर्जुन अवस्था' में है। हमारे पास डिग्रियां हैं, पैसा है, पद है, लेकिन जैसे ही जीवन में कोई व्यक्तिगत संकट या नैतिक दुविधा (Ethical Dilemma) आती है, हम 'डिप्रेशन' का शिकार हो जाते हैं। अर्जुन का रथ के पिछले भाग में बैठ जाना इस बात का प्रतीक है कि हमने जीवन की बागडोर छोड़ दी है।

इस पुस्तक का उद्देश्य आपको उस रथ के पिछले हिस्से से उठाकर फिर से 'गांडीव' (आपका कर्म/कर्तव्य) थामने के लिए प्रेरित करना है। हम चर्चा करेंगे कि कैसे अर्जुन के सवाल असल में हमारे ही सवाल हैं:

 * "मैं यह क्यों कर रहा हूँ?"

 * "क्या इस संघर्ष का कोई अंत है?"

 * "अगर मैं हार गया तो क्या होगा?"

 कर्मयोग का व्यावहारिक अर्थ: परिणाम के दबाव से मुक्ति

कर्मयोग का व्यावहारिक अर्थ यह है कि हम अपने कर्म पर पूरा ध्यान दें, लेकिन उसके परिणाम को लेकर मन को बोझिल न करें। आज के जीवन में पढ़ाई, नौकरी, परीक्षा, प्रमोशन या मान-सम्मान—हर जगह परिणाम का दबाव बना रहता है। यह दबाव हमें वर्तमान क्षण से काट देता है और काम को बोझ बना देता है। कर्मयोग सिखाता है कि हमारा अधिकार केवल कर्म करने में है, परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं। जब हम यह समझ लेते हैं, तो डर, चिंता और असफलता का भय धीरे-धीरे कम होने लगता है।

व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है—पूरी ईमानदारी, बुद्धि और परिश्रम से काम करना, लेकिन मन में यह जिद न पालना कि फल मेरी इच्छा के अनुसार ही आए। जब परिणाम को ही सब कुछ मान लिया जाता है, तब काम तनाव देता है; लेकिन जब कर्म को ही पूजा मान लिया जाता है, तब वही काम साधना बन जाता है। इस दृष्टि से कर्मयोग “परिणाम” से भागना नहीं सिखाता, बल्कि परिणाम के दबाव से मुक्त होकर बेहतर कर्म करना सिखाता है—और विडंबना यह है कि ऐसे निःस्वार्थ और एकाग्र कर्म से परिणाम अक्सर स्वयं बेहतर हो जाते हैं।

​इस प्रकार इस भाग में 'लोकसंग्रह' (जन कल्याण के लिए कार्य करना) का सिद्धांत दिया गया है। यह आज के प्रबंधकों (Managers) के लिए नेतृत्व की सबसे बड़ी सीख है।​

अहंकार का त्याग: कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के गुणों द्वारा ही सारे कार्य किए जा रहे हैं, लेकिन अहंकारी व्यक्ति खुद को 'कर्ता' मान बैठता है।​

सीख: एक अच्छा लीडर वह है जो टीम की सफलता का श्रेय खुद नहीं लेता, बल्कि यह समझता है कि वह केवल एक निमित्त (Instrument) है। जब आप 'मैं' (Ego) को काम से हटा देते हैं, तो असफलता का डर और सफलता का अहंकार—दोनों ही गायब हो जाते हैं। इससे टीम में ईर्ष्या की जगह सहयोग की भावना पैदा होती है।

4. तनावमुक्ति की कहानी: 'जनक' का उदाहरण

कृष्ण अर्जुन को राजा जनक का उदाहरण देते हैं। जनक एक सम्राट थे, महल में रहते थे, युद्ध लड़ते थे और न्याय करते थे, फिर भी उन्हें 'विदेह' (देह से मुक्त) कहा जाता था।

कहानी: एक बार एक जिज्ञासु जनक के पास आया और पूछा, "आप इतने ऐश्वर्य के बीच अनासक्त कैसे रहते हैं?" जनक ने उसे एक तेल से लबालब भरा कटोरा दिया और कहा, "इसे लेकर पूरे महल का चक्कर लगाओ, लेकिन याद रहे एक बूंद भी तेल बाहर नहीं गिरना चाहिए।"

वह व्यक्ति महल घूमा। वापस आने पर जनक ने पूछा, "महल में क्या-क्या देखा? चित्रकारी कैसी थी?" व्यक्ति ने कहा, "महाराज, मेरा पूरा ध्यान तो तेल बचाने में था, मैंने कुछ और देखा ही नहीं।"

निष्कर्ष: जनक ने समझाया कि जैसे तुम्हारा ध्यान तेल (कर्तव्य) पर था, वैसे ही मेरा ध्यान 'ईश्वर' और 'धर्म' पर होता है, महल के सुखों पर नहीं।


5. 'प्रसाद' बुद्धि: विफलता को स्वीकार करने की कला

​कर्मयोग का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है—प्रसाद बुद्धि। जब हम मंदिर में प्रसाद लेते हैं, तो हम यह नहीं देखते कि वह मीठा है या नहीं, कम है या ज्यादा, हम उसे सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं।​ अर्थात इसका का अर्थ है—जो भी परिणाम मिले, उसे ईश्वर या जीवन की ओर से मिला हुआ प्रसाद समझकर स्वीकार करना। सरल शब्दों में कहें तो यह वह मानसिक दृष्टि है, जिससे हम विफलता को अपमान या अंत नहीं, बल्कि अनुभव और सीख के रूप में देखते हैं। जब हम पूरी निष्ठा से प्रयास करते हैं और फिर भी मनचाहा परिणाम नहीं मिलता, तब मन टूटता है। प्रसाद बुद्धि हमें सिखाती है कि परिणाम हमारे प्रयास का मूल्यांकन नहीं, बल्कि जीवन की व्यापक योजना का एक हिस्सा है।

इस दृष्टि से विफलता का अर्थ “मैं अयोग्य हूँ” नहीं होता, बल्कि “मुझे अभी और सीखना है” हो जाता है। जैसे मंदिर में मिला प्रसाद मीठा हो या सादा—हम उसे श्रद्धा से स्वीकार करते हैं, वैसे ही जीवन के परिणामों को भी स्वीकार करना ही प्रसाद बुद्धि है। इससे मन में कड़वाहट, ईर्ष्या और आत्मग्लानि नहीं आती। विफलता हमें तोड़ती नहीं, बल्कि परिपक्व बनाती है, और यही स्वीकार करने की कला हमें भीतर से शांत, स्थिर और आगे बढ़ने के लिए सक्षम बनाती है।

व्यावसायिक जीवन में: यदि आपने पूरी ईमानदारी से प्रोजेक्ट पर काम किया (कर्मयोग), और फिर भी क्लाइंट ने उसे अस्वीकार/रिजेक्ट कर दिया, तो उस फीडबैक को 'प्रसाद' की तरह स्वीकार करें।​

लाभ: इससे 'रिएक्शन' (प्रतिक्रिया) की जगह 'रिस्पॉन्स' (प्रतिसाद) देने की क्षमता बढ़ती है। आप तनाव में आकर हार नहीं मानते, बल्कि सुधार की ओर बढ़ते हैं।


6-स्थितप्रज्ञ: आधुनिक जीवन में मानसिक संतुलन का 'ब्लूप्रिंट'

आज की दुनिया 'हाइपर-कनेक्टेड' है। हर पल एक नई सूचना, एक नई तुलना और एक नया तनाव हमारे सामने होता है। ऐसे में गीता का 'स्थितप्रज्ञ' का सिद्धांत किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। स्थितप्रज्ञ का अर्थ यह नहीं है कि आप पत्थर बन जाएं या भावनाओं को मार दें। इसका व्यावहारिक अर्थ है—"इमोशनल स्टेबिलिटी"।

कल्पना कीजिए कि आप एक समुद्र हैं। नदियाँ उसमें गिरती रहती हैं, लहरें उठती रहती हैं, लेकिन समुद्र की गहराई कभी विचलित नहीं होती।

 * जब आपको पदोन्नति मिले, तो क्या आप अहंकार में आसमान पर पहुँच जाते हैं?

 * और जब कोई आपकी आलोचना करे, तो क्या आप हफ्तों तक उदास रहते हैं?

कृष्ण हमें सिखाते हैं कि सफलता और असफलता, मान और अपमान—ये सब बाहरी मौसम हैं। यदि आपकी खुशी दूसरों की प्रशंसा पर टिकी है, तो आप हमेशा उनके गुलाम रहेंगे। स्थितप्रज्ञ वह है जो अपनी 'रिमोट कंट्रोल' अपने हाथ में रखता है। इस टीका में हम सीखेंगे कि कैसे रोजमर्रा की आपाधापी के बीच भी हम अपने भीतर एक शांत केंद्र (Silent Center) विकसित कर सकते हैं।

7. गीता और आधुनिक मनोविज्ञान (Psychology)

आधुनिक मनोविज्ञान जिसे 'कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी' (CBT) कहता है, उसके बीज गीता के दूसरे अध्याय में मिलते हैं। कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि दुख का कारण वस्तुएं या लोग नहीं हैं, बल्कि उनके प्रति हमारा 'जुड़ाव' (Attachment) और हमारी 'सोच' (Perception) है।

जब हम किसी चीज के बारे में लगातार सोचते हैं, तो उसके प्रति आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से इच्छा (Desire) जन्म लेती है, और इच्छा पूरी न होने पर क्रोध आता है। क्रोध बुद्धि को भ्रमित कर देता है, और भ्रमित बुद्धि हमें विनाश की ओर ले जाती है। यह एक चेन रिएक्शन है। गीता हमें सिखाती है कि कैसे इस श्रृंखला को शुरुआती स्तर पर ही तोड़ा जाए। यह पुस्तक आपको मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाने का प्रयास करेगी कि आप अपनी भावनाओं के शिकार होने के बजाय उनके स्वामी बन सकें।

8-विज्ञान और आध्यात्मिकता का संगम

अक्सर लोग विज्ञान और धर्म को अलग-अलग मानते हैं, लेकिन गीता का दर्शन बहुत वैज्ञानिक है। यहाँ 'श्रद्धा' का अर्थ अंधविश्वास नहीं है। कृष्ण अर्जुन को सब कुछ समझाने के बाद अंत में कहते हैं—"यथेच्छसि तथा कुरु" (जैसा तुम्हें ठीक लगे, वैसा करो)।

यह एक गुरु द्वारा अपने शिष्य को दी गई पूर्ण स्वतंत्रता है। कृष्ण दबाव नहीं डालते, वे तर्क देते हैं, वे 'डेटा' देते हैं और फिर अर्जुन को विश्लेषण करने के लिए कहते हैं। गीता 'क्वांटम फिजिक्स' की तरह ऊर्जा की अविनाशीता की बात करती है—"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि..." (आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते)। जैसे ऊर्जा अपना रूप बदलती है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है। यह दृष्टिकोण हमें मृत्यु के भय से मुक्त करता है और जीवन को एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखने की दृष्टि देता है।


यदि आप सोचते हैं कि यह किताब केवल बुजुर्गों के लिए है, तो आप गलत हैं। वास्तव में, गीता की सबसे ज्यादा जरूरत युवाओं को है।

 * एक विद्यार्थी के लिए: यह एकाग्रता (Focus) का विज्ञान है।

 * एक उद्यमी (Entrepreneur) के लिए: यह रिस्क लेने और परिणाम से न डरने का दर्शन है।

 * एक दुखी व्यक्ति के लिए: यह सांत्वना और नई शुरुआत की आशा है।


गीता का वैश्विक संदेश: धर्म से परे जीवन का दर्शन

अक्सर लोग गीता को एक 'हिंदू ग्रंथ' के रूप में देखते हैं, लेकिन इसकी गहराई में जाने पर पता चलता है कि यह किसी जाति या संप्रदाय की नहीं, बल्कि 'मनुष्य मात्र' की पुस्तक है। जिस तरह न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम केवल ईसाइयों के लिए नहीं हैं, उसी तरह गीता के सिद्धांत केवल हिंदुओं के लिए नहीं हैं।

दुनिया भर के महान विचारकों ने गीता से प्रेरणा ली है:

 * अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि जब वे गीता पढ़ते हैं, तो उन्हें बाकी सब कुछ बहुत छोटा लगने लगता है।

 * हेनरी डेविड थोरो और राल्फ वाल्डो इमर्सन जैसे दार्शनिकों ने इसे 'मानव जाति का सबसे महान ज्ञान' माना।

इस टीका में हमारा दृष्टिकोण भी यही रहेगा। हम कृष्ण को एक 'यूनिवर्सल मेंटर' के रूप में देखेंगे। चाहे आप किसी भी धर्म को मानते हों या नास्तिक हों, 'कर्म', 'कर्तव्य' और 'मानसिक शांति' की जरूरत सबको है। गीता हमें सिखाती है कि धर्म का अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि वह आचरण है जो समाज और स्वयं को जोड़कर रखता है।

​निष्कर्ष: कर्मयोग का 3-चरणीय अभ्यास

यदि आप आज से ही बिना तनाव के कार्य करना चाहते हैं, तो इन तीन चरणों को अपनाएं:​

पूर्ण उपस्थिति (Mindfulness): तनावमुक्त और सार्थक बनाने का एक सरल मार्ग है। इसका पहला चरण है—कर्म पर पूरा ध्यान। यानी जो भी काम हमारे सामने है, उसे ईमानदारी, एकाग्रता और पूरी क्षमता के साथ करना। आधा-अधूरा प्रयास या टालमटोल यहाँ कर्मयोग नहीं है; कर्मयोग का अर्थ है वर्तमान क्षण में रहकर अपना कर्तव्य निभाना। अर्थात जो काम कर रहे हैं, बस वही करें। चाय पी रहे हैं तो सिर्फ चाय पिएं, ईमेल लिख रहे हैं तो सिर्फ ईमेल लिखें।​

फलाकांक्षा का त्याग (Letting Go): परिणाम के बारे में सोचना बंद करें। इसका मतलब यह नहीं कि हम परिणाम की परवाह न करें, बल्कि यह कि परिणाम को ही अपनी खुशी या दुख का आधार न बनाएं। हम प्रयास करें, योजना बनाएं, लेकिन मन को परिणाम की चिंता से बाँधें नहीं। इससे भय, तनाव और तुलना की भावना कम होती है। खुद से कहें, "मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है, अब जो होगा वह ब्रह्मांड की व्यवस्था है।"​

सेवा भाव (Contribution):

सोचें कि आपका काम किसी और के जीवन में क्या मूल्य जोड़ रहा है। जब स्वार्थ छोटा होता है, तो तनाव अपने आप कम हो जाता है।प्रसाद बुद्धि से परिणाम को स्वीकार करना। सफलता मिले तो अहंकार न हो, और असफलता मिले तो निराशा न हो। दोनों को सीख और अनुभव के रूप में स्वीकार करना ही कर्मयोग की पूर्णता है। इन तीन चरणों के अभ्यास से कर्म बोझ नहीं रहता, बल्कि साधना बन जाता है—और यही कर्मयोग का वास्तविक निष्कर्ष है।

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 चतुर्थ अध्याय “ज्ञान–कर्म–संन्यास योग” 

​यहीं कृष्ण अपने प्रसिद्ध श्लोक कहते हैं, जो धर्म की स्थापना के बारे में हैं:​

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् || (4.7)

भावार्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।



भारतीय दर्शन में कर्म और ज्ञान के समन्वय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति केवल कर्मत्याग से नहीं, बल्कि ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म से होती है। यह अध्याय मानव को यह सिखाता है कि संसार में रहते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी आत्मिक उन्नति संभव है।

श्रीकृष्ण इस अध्याय की शुरुआत दिव्य ज्ञान की परंपरा से करते हैं और कहते हैं कि यह योग अत्यंत प्राचीन है—

“इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।”
(गीता 4.1)

अर्थात यह ज्ञान सूर्यदेव को प्रदान किया गया था और परंपरा से आगे बढ़ा। इससे यह स्पष्ट होता है कि गीता का ज्ञान किसी एक काल तक सीमित नहीं, बल्कि शाश्वत और सार्वकालिक है।अर्थात यह ज्ञान अविनाशी है और युगों से चला आ रहा है। इससे यह सिद्ध होता है कि गीता का उपदेश केवल युद्धकालीन परिस्थिति तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक युग के मानव जीवन के लिए समान रूप से उपयोगी है। आज का विद्यार्थी, कर्मचारी और गृहस्थ भी उसी प्रकार कर्म और द्वंद्व से जूझ रहा है, जैसे अर्जुन जूझ रहा था।

ज्ञान–कर्म–संन्यास योग का मूल उद्देश्य कर्म के रहस्य को समझाना है। श्रीकृष्ण कर्म को अत्यंत सूक्ष्म बताते हुए कहते हैं—

“किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।”(गीता 4.16)

कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: |
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् || (4.18)

भावार्थ: जो मनुष्य 'कर्म' में 'अकर्म' देखता है और 'अकर्म' में 'कर्म' देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है और वही सब कर्मों को करने वाला योगी है।

अर्थात कर्म क्या है और अकर्म क्या है, कर्म और अकर्म का भेद इतना सूक्ष्म है कि विद्वान भी भ्रमित हो जाते हैं।यहाँ श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि केवल कर्म का बाह्य स्वरूप नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना ही उसके बंधनकारी या मुक्तिदायक होने का निर्णय करती है।
 महाभारत में अर्जुन युद्ध को पाप समझकर छोड़ना चाहता है, परंतु श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं कि धर्म की रक्षा हेतु किया गया कर्म पाप नहीं, बल्कि अकर्म है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म का मूल्यांकन उसके उद्देश्य और भावना से होता है।

आइये इसे धीरे-धीरे, उदाहरण, कहानी और गीता के संदर्भ के साथ समझते हैं।

सामान्य दृष्टि से हम जिसे कर्म कहते हैं, वह केवल कार्य है—पढ़ाई करना, नौकरी करना, सेवा करना, युद्ध करना या बोलना। पर गीता के अनुसार कर्म का वास्तविक स्वरूप मन की स्थिति से तय होता है। यदि कोई व्यक्ति कार्य करते समय यह सोचता है—“मैं कर रहा हूँ”, “मुझे ही श्रेय मिलना चाहिए”, “फल मेरे अनुसार क्यों नहीं आया”—तो वह कर्म उसे बाँध देता है। यही बंधन जन्म-जन्मांतर का कारण बनता है। इसके विपरीत, जब वही कार्य कर्तव्य भावसमर्पण और निष्कामता से किया जाता है, तब वह बाहर से कर्म होते हुए भी भीतर से अकर्म बन जाता है। इसलिए अकर्म का अर्थ काम न करना नहीं, बल्कि बंधन पैदा न करने वाला कर्म है।

गीता का संदर्भ

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—


“कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥
 (गीता 4.17)

अर्थात—कर्म, अकर्म और विकर्म —तीनों को समझना आवश्यक है, क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गूढ़ है। यहाँ अकर्म वही स्थिति है जहाँ कर्म करते हुए भी आत्मा अकर्ता बनी रहती है।

कर्म अकर्म और विकर्म का गूढ़ अर्थ

 श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय — ज्ञानकर्मसंन्यास योग  में अत्यंत गहराई से समझाया गया है। यह अध्याय विशेष रूप से इस प्रश्न का उत्तर देता है कि मनुष्य कर्म करते हुए भी बंधन में क्यों पड़ता है और कैसे उसी कर्म के माध्यम से मुक्त हो सकता है। गीता यहाँ कर्म को केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था के रूप में प्रस्तुत करती है।

 कर्म वह है जो शास्त्रसम्मत, समाजोचित और कर्तव्यभाव से किया गया हो। विद्यार्थी का अध्ययन करना, गृहस्थ का परिवार चलाना, कर्मचारी का ईमानदारी से कार्य करना—ये सभी कर्म हैं। किंतु जब यही कर्म फल की तीव्र आकांक्षा, अहंकार और कर्तापन के भाव से किया जाता है, तब वह मन को बाँध देता है। ऐसे कर्म से व्यक्ति बाहरी रूप से सफल होते हुए भी भीतर से अशांत रहता है। इसलिए गीता कहती है कि केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं, यह समझना आवश्यक है कि कर्म किस भाव से किया जा रहा है

इसके आगे गीता जिस सूक्ष्म तत्त्व को प्रकट करती है, वह है अकर्म। सामान्य भाषा में अकर्म को “कुछ न करना” समझ लिया जाता है, किंतु गीता में अकर्म का अर्थ है—कर्म करते हुए भी अकर्ता बने रहना। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को ईश्वरार्पण या धर्म मानकर करता है और परिणाम को स्वीकारभाव से ग्रहण करता है, तब वही कर्म अकर्म बन जाता है। बाहर से देखने पर ऐसा व्यक्ति सक्रिय दिखाई देता है, पर भीतर से वह शांत, निर्लिप्त और मुक्त होता है। राजा जनक जैसे उदाहरण गीता में इसी सिद्धांत को स्पष्ट करते हैं—वे राजकर्म करते थे, पर आसक्ति से रहित थे।

इसके विपरीत, विकर्म वह कर्म है जो धर्म, शास्त्र और नैतिकता के विरुद्ध किया जाता है। जब कोई व्यक्ति स्वार्थ, लोभ, क्रोध या भय के कारण अन्यायपूर्ण कार्य करता है—जैसे छल, शोषण, हिंसा या भ्रष्टाचार—तो वह विकर्म कहलाता है। विकर्म न केवल समाज को हानि पहुँचाता है, बल्कि कर्ता के अंतःकरण को भी भारी अशांति और पतन की ओर ले जाता है। गीता स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि विकर्म से उत्पन्न फल दुखदायी और बंधनकारी होते हैं।

इस प्रकार गीता का केंद्रीय संदेश यह है कि कर्म को छोड़ना समाधान नहीं है। समाधान यह है कि विकर्म से बचते हुए, सामान्य कर्म को अकर्म में परिवर्तित किया जाये। जब कर्म अहंकार से मुक्त होकर, कर्तव्य और समर्पण भाव से किया जाता है, तब वही कर्म साधना बन जाता है। यही कारण है कि ज्ञानकर्मसंन्यास योग कर्म और ज्ञान के बीच कोई विरोध नहीं दिखाता, बल्कि दोनों का समन्वय कर जीवन को योगमय बना देता है।

संक्षेप में कहा जाये तो—
विकर्म पतन की ओर ले जाता है, कर्म बंधन में बाँध सकता है, और अकर्म कर्म करते हुए भी मुक्ति प्रदान करता है।

उदाहरण 1: विद्यार्थी का उदाहरण

मान लीजिये एक छात्र परीक्षा की तैयारी कर रहा है।

पहला छात्र पढ़ते समय लगातार सोचता है—“रैंक आनी ही चाहिए, वरना मेरा क्या होगा?” वह तनाव में रहता है, डरता है, और परिणाम आते ही टूट जाता है। यह बंधनकारी कर्म है।

दूसरा छात्र पूरी ईमानदारी से पढ़ता है, जानता है कि पढ़ना उसका कर्तव्य है। वह परिणाम को ईश्वर या व्यवस्था पर छोड़ देता है। परिणाम जैसा भी आये, उसका मन संतुलित रहता है। यही कर्म में अकर्म है।

कहानी: राजा जनक की कथा

राजा जनक को गीता में विदेह कहा गया—जिसका शरीर तो संसार में है, पर मन उससे बँधा नहीं। एक बार उनके महल में आग लगने की खबर आई। दरबार में सभी लोग घबरा गये, लेकिन जनक शांत बैठे रहे। किसी ने पूछा—“राजन! आपका महल जल रहा है और आप विचलित नहीं?”
जनक बोले—“महल मेरा है, पर मैं महल का नहीं हूँ।”
राजा होकर भी उन्होंने राजकर्म किया, शासन चलाया, निर्णय लिये—पर भीतर से वे अकर्ता रहे। उनका कर्म अकर्म बन गया।

उदाहरण 2: नौकरी और सेवा का अंतर

एक कर्मचारी केवल वेतन, प्रमोशन और तारीफ के लिये काम करता है। थोड़ा भी अपमान या अनदेखी हुई तो भीतर जलने लगता है। यह कर्म बंधन पैदा करता है।
वहीं दूसरा कर्मचारी अपने काम को कर्तव्य और सेवा मानकर करता है। प्रशंसा मिले या न मिले, उसका संतोष काम की शुद्धता में होता है। वह बाहर से उतना ही काम कर रहा है, पर भीतर से मुक्त है—यह अकर्म है।

जीवन का सूत्र

इस प्रकार समझिये—

कर्म = काम + अहंकार + फल की आसक्ति → बंधन

अकर्म = काम + समर्पण + निष्कामता → मुक्ति

गीता हमें कर्म छोड़ने को नहीं, बल्कि बंधन छोड़ने को कहती है। जब जीवन का हर कार्य पूजा बन जाये, और “मैं” की जगह “कर्तव्य” आ जाये—तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।

यही कर्म, अकर्म और विकर्म का वास्तविक भेद है।

कर्म में कुशलता को श्रीकृष्ण योग की संज्ञा देते हैं

“योगः कर्मसु कौशलम्।”(गीता 2.50)

कर्म में कुशलता का अर्थ केवल दक्षता नहीं, बल्कि कर्तव्य को अहंकार और फल की आसक्ति से मुक्त होकर करना है। ऐसा कर्म मनुष्य को शुद्ध करता है, न कि बाँधता है।
कर्म में कुशलता का अर्थ है—कर्तव्य को सही दृष्टि, सही भावना और सही विवेक के साथ करना। एक व्यक्ति बाहर से बहुत व्यस्त है, ऑफिस के सौ काम कर रहा है, लेकिन उसका मन भीतर से बिल्कुल शांत और तटस्थ है। वह परिणामों से नहीं चिपका। इसे कहते हैं 'कर्म के भीतर अकर्म' (शांत केंद्र)।​जबकि एक व्यक्ति बाहर से चुपचाप बैठा है (अकर्म), लेकिन उसका मन भीतर से षड्यंत्र रच रहा है या चिंताओं में भाग रहा है। यह बाहर से अकर्म दिखते हुए भी 'कर्म' का बोझ ढोना है।​
अर्थात असली सफलता तब है जब आप काम के सबसे ऊँचे दबाव (High Pressure) में भी भीतर से उतने ही शांत हों जैसे कोई गहरी नींद में हो।
इसे राजा जनक के उदाहरण से भलीभाँति समझा जा सकता है। राजा जनक मिथिला के शासक थे, उनके पास अपार वैभव था, किंतु वे आत्मज्ञानी थे। वे राजकार्य करते हुए भी आसक्ति से मुक्त थे। इसलिए उन्हें विदेह कहा गया—अर्थात देहभाव से परे। राजा जनक का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गृहस्थ रहते हुए भी ज्ञानयुक्त संन्यास संभव है।

इस अध्याय में ज्ञान को सर्वोच्च साधन बताया गया है। श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं—

​कृष्ण एक बहुत ही शक्तिशाली बिम्ब (Metaphor) का उपयोग करते हैं:​

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन |

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा || (4.37)

भावार्थ: हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि लकड़ियों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सभी कर्मों (और उनके बंधनों) को भस्म कर देती है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान की शक्ति को अत्यंत सरल और प्रभावशाली उपमा के माध्यम से समझाते हैं।

इस श्लोक में कहा गया है कि जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखी लकड़ियों को पूरी तरह जला कर राख बना देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि मनुष्य के समस्त कर्मों को—अर्थात् उनके बंधनकारी प्रभाव को—भस्म कर देती है। यहाँ “कर्म” का अर्थ केवल वर्तमान जीवन के कर्म नहीं, बल्कि वे सभी कर्म-संस्कार हैं जो अहंकार, अज्ञान और फलासक्ति से जुड़े हुए हैं और जिनके कारण मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में बँधा रहता है। जब आत्मज्ञान प्रकट होता है, तब यह अज्ञान का नाश कर देता है और कर्मों की वह शक्ति समाप्त हो जाती है जो आत्मा को बाँधती थी।

सरल शब्दों में समझें तो जब तक मनुष्य स्वयं को केवल शरीर और कर्ता मानता है, तब तक उसके कर्म उसे बाँधते रहते हैं। पर जैसे ही उसे यह बोध हो जाता है कि मैं शरीर नहीं, शुद्ध चेतना हूँ; कर्म प्रकृति में हो रहे हैं—उसी क्षण कर्मों का बंधन टूटने लगता है। ज्ञान यहाँ केवल किताबों का ज्ञान नहीं है, बल्कि स्वयं के सत्य स्वरूप की अनुभूति है। यह ज्ञान भीतर ऐसी स्पष्टता और जागरूकता लाता है कि पुराने कर्मों के प्रभाव वैसे ही निष्प्रभावी हो जाते हैं जैसे आग में पड़ी लकड़ी की अपनी पहचान नहीं बचती।

इस श्लोक का व्यावहारिक संदेश यह है कि मोक्ष के लिए कर्मों का ढेर उठाकर डरने की आवश्यकता नहीं। यदि ज्ञान का प्रकाश जागृत हो जाये, तो वही ज्ञान जीवन भर के कर्मबंधनों को समाप्त करने में सक्षम है। इसलिए गीता कर्म त्याग नहीं सिखाती, बल्कि अज्ञान त्याग सिखाती है। जब अज्ञान जल जाता है, तब कर्म अपने-आप अकर्म बन जाते हैं और मनुष्य संसार में रहते हुए भी भीतर से मुक्त हो जाता है।

उदाहरण: एक व्यक्ति ने भूतकाल में बहुत गलतियाँ कीं। लेकिन जैसे ही उसे 'ज्ञान' (Self-realization) हुआ कि वह कौन है और उसका वास्तविक कर्तव्य क्या है, उसकी पुरानी सोच और उसकी पुरानी पहचान (Identity) तुरंत खत्म हो जाती है। ​सही समझ (Right Understanding) एक माचिस की तीली की तरह है, जो आपके जन्मों-जन्मों के अज्ञान के अंधेरे को एक पल में खत्म कर सकती है।


“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”(गीता 4.38)

अर्थात इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है। ज्ञान मनुष्य को यह बोध कराता है कि वह नाशवान शरीर नहीं, बल्कि अविनाशी आत्मा है। यही बोध कर्म को साधना में परिवर्तित कर देता है।
ज्ञान के समान पवित्र इस संसार में कुछ भी नहीं है। ज्ञान मनुष्य को यह बोध कराता है कि वह शरीर नहीं, आत्मा है। एक संत कथा के अनुसार, एक व्यक्ति जीवनभर धन कमाता रहा, परंतु असंतोष बना रहा। जब उसे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ, तो वही धन सेवा और दान का माध्यम बन गया। कर्म वही रहे, पर ज्ञान ने उसके जीवन की दिशा बदल दी। यही ज्ञान की शुद्धि शक्ति है।

ज्ञान को अग्नि के रूप में प्रस्तुत करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं—

“यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥”(गीता 4.37)

जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान की अग्नि समस्त कर्मों के बंधन को नष्ट कर देती है। इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी व्यक्ति के कर्म उसे पुनर्जन्म के बंधन में नहीं बाँधते।

एक कथा के अनुसार, एक लकड़हारा जीवनभर कठोर श्रम करता रहा, परंतु संतोष नहीं मिला। जब उसने एक संत से ज्ञान प्राप्त किया, तो वही श्रम सेवा बन गया। उसके कर्म वही थे, पर ज्ञान की अग्नि ने उसके दुख और असंतोष को भस्म कर दिया। यही ज्ञान की अग्नि का प्रभाव है।

संशय: सबसे बड़ा शत्रु

​अध्याय के अंत में कृष्ण 'संदेह' (Doubt) पर चोट करते हैं:​

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशय़ात्मा विनश्यति | 

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशय़ात्मनः || (4.40)

भावार्थ: विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त (Doubtful) मनुष्य का विनाश हो जाता है। संशययुक्त व्यक्ति के लिए न यह लोक है, न परलोक और न ही सुख।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय (ज्ञानयोग) का 40वाँ श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण श्रद्धा, ज्ञान और संशय के संबंध को बहुत स्पष्ट रूप से बताते हैं।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अज्ञानी है, श्रद्धाहीन है और जिसके मन में लगातार संदेह बना रहता है, उसका पतन निश्चित होता है। यहाँ अज्ञान का अर्थ केवल पढ़ा-लिखा न होना नहीं है, बल्कि जीवन के सत्य, कर्तव्य और आत्मतत्त्व को न समझ पाना है। अश्रद्धा का अर्थ है—न तो शास्त्रों पर विश्वास, न गुरु पर, और न ही अपने ही प्रयास पर भरोसा। वहीं संशयात्मा वह व्यक्ति है जो हर समय “यह सही है या नहीं?”, “इससे क्या लाभ होगा?” जैसे प्रश्नों में उलझा रहता है और किसी भी मार्ग पर दृढ़ता से आगे नहीं बढ़ पाता।

भगवान आगे कहते हैं कि ऐसे संशय से भरे व्यक्ति के लिए न यह लोक सुखद होता है और न ही परलोक। क्योंकि जो मन से डगमगाता रहता है, वह न तो इस जीवन में शांति और संतोष प्राप्त कर पाता है, और न ही आध्यात्मिक उन्नति कर पाता है। संशय उसकी बुद्धि को स्थिर नहीं होने देता, जिससे उसके कर्म अधूरे रह जाते हैं और उसका जीवन असंतुलित हो जाता है। परिणामस्वरूप, सुख, शांति और मुक्ति—तीनों उससे दूर हो जाते हैं।

आज के दौर में सबसे बड़ी समस्या 'Over-analysis' है। हम किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले इतना शक करते हैं कि हम 'एक्शन' ही नहीं ले पाते।​

 एक बिजनेसमैन जो हर कदम पर शक करता है, वह कभी निवेश नहीं कर पाएगा। एक प्रेमी जो हर बात पर शक करता है, वह कभी शांति नहीं पाएगा।

इस प्रकार यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रद्धा आवश्यक है और संशय को विवेकपूर्ण प्रश्नों द्वारा शांत करना चाहिए, न कि मन को नकारात्मक संदेहों में डुबो देना चाहिए। श्रद्धा, ज्ञान और निश्चय—ये तीनों मिलकर ही मनुष्य को जीवन में स्थिरता, सुख और कल्याण की ओर ले जाते हैं।

सीख: ज्ञान प्राप्त करो, विचार करो, लेकिन एक बार जब रास्ता चुन लो, तो पूरे विश्वास के साथ आगे बढ़ो।संशय को मन में पनपने मत दो क्यूँकि संशय मन को खा जाता है।

विद्यार्थी जीवन में इस अध्याय का विशेष महत्त्व है। विद्यार्थी के लिए अध्ययन उसका स्वधर्म है। श्रीकृष्ण कर्म करने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”(गीता 2.47)

विद्यार्थी को केवल अध्ययन कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। जो विद्यार्थी ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से अध्ययन करता है, वह असफलता से विचलित नहीं होता। उसका अध्ययन ज्ञान यज्ञ बन जाता है, जो उसके व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

विद्यार्थी जीवन के संदर्भ में यह अध्याय अत्यंत उपयोगी है। एक विद्यार्थी सामान्यतः पढ़ाई को केवल परीक्षा, अंक और भविष्य की नौकरी से जोड़कर देखता है। इससे उसमें तनाव, भय और प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न होती है। ज्ञान–कर्म–संन्यास योग विद्यार्थी को यह सिखाता है कि अध्ययन उसका कर्तव्य है, फल ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। यदि विद्यार्थी पूरे मनोयोग से अध्ययन करे, बिना यह सोचे कि परिणाम क्या होगा, तो उसका अध्ययन कर्म योग बन जाता है। उदाहरण के लिए, जो छात्र केवल अंक के लिए पढ़ता है, वह असफल होने पर टूट जाता है, जबकि जो ज्ञान के लिए पढ़ता है, वह असफलता से भी सीखता है। यही ज्ञान की अग्नि है, जो निराशा और भय को जला देती है।

कर्मचारी और कार्यरत व्यक्ति के लिए ज्ञान–

कर्म–संन्यास योग जीवन में संतुलन प्रदान करता है। श्रीकृष्ण ऐसे कर्मयोगी का वर्णन करते हैं—

“निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।”(गीता 4.21)

अर्थात जो आशा, संग्रह और अहंकार से मुक्त होकर कर्म करता है, वह कर्म करते हुए भी बंधन में नहीं पड़ता। ऐसा कर्मचारी अपने कार्य को सेवा समझकर करता है, जिससे उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है।

कर्मचारी या कार्यरत व्यक्ति के जीवन में भी यह अध्याय अत्यंत प्रासंगिक है। आज का कर्मचारी लक्ष्य, पदोन्नति, वेतन और प्रतिस्पर्धा के दबाव में मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है। ज्ञान–कर्म–संन्यास योग उसे यह सिखाता है कि कर्म को ईमानदारी और निष्ठा से करना ही उसका धर्म है, परिणाम की चिंता अनावश्यक है। जब कोई कर्मचारी अपने कार्य को केवल धन या पद के लिए करता है, तो उसमें असंतोष बना रहता है। किंतु जब वही कार्य सेवा-भाव और कर्तव्य-बोध से किया जाए, तो मानसिक शांति प्राप्त होती है। इस संदर्भ में श्रीकृष्ण का यह विचार अत्यंत सार्थक है कि जो व्यक्ति कर्म करते हुए फल का त्याग करता है, वही सच्चा योगी है।

अर्थात कर्म का त्याग करके कोई निष्कर्मता को प्राप्त नहीं कर सकता। गृहस्थ अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए भी निष्काम भाव से कर्म करके संन्यासी बन सकता है। गृहस्थ जीवन में ज्ञान–कर्म–संन्यास योग और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गृहस्थ के जीवन में परिवार, समाज, धन और संबंधों की अनेक जिम्मेदारियाँ होती हैं। इन जिम्मेदारियों से भागना न तो संभव है और न ही उचित। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि घर-परिवार का पालन करते हुए भी व्यक्ति संन्यासी बन सकता है, यदि वह अपने कर्तव्यों को अहंकार और स्वार्थ से मुक्त होकर निभाए। उदाहरण के रूप में, माता-पिता का बच्चों के प्रति दायित्व केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि यज्ञ के समान है। जब यह दायित्व प्रेम, त्याग और समझदारी से निभाया जाता है, तब वही कर्म साधना बन जाता है।

इस अध्याय में यज्ञ की अवधारणा को भी आध्यात्मिक रूप दिया गया है—

“एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।”(गीता 4.32)

अर्थात विभिन्न प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं, जिनमें ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है। जब मनुष्य अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करता है, तब उसका संपूर्ण जीवन ही यज्ञ बन जाता है।

यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि अपने अहंकार, इच्छाओं और स्वार्थ की आहुति देना है। विद्यार्थी का अध्ययन, कर्मचारी की सेवा और गृहस्थ का पारिवारिक दायित्व—यदि यज्ञ भावना से किया जाए—तो वह जीवन को पवित्र बना देता है। श्रीकृष्ण के अनुसार, सभी यज्ञों में ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि वही मनुष्य को सत्य का बोध कराता है।
ज्ञान की अग्नि का प्रभाव यह होता है कि मनुष्य कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता। जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से नहीं भीगता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष संसार में रहकर भी संसार से बँधता नहीं। 

यह उदाहरण विद्यार्थी, कर्मचारी और गृहस्थ—तीनों के लिए समान रूप से प्रेरणादायक है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे अपने दायित्वों से अलग हो जाएँ, बल्कि यह कि वे उन्हें आसक्ति के बिना निभाएँ।

श्रद्धा बनाम अंधविश्वास: एक गहरा विश्लेषण

श्रद्धा और अंधविश्वास देखने में समान प्रतीत हो सकते हैं, किंतु उनके स्वरूप, उद्देश्य और परिणाम मूलतः भिन्न होते हैं।
श्रद्धा का अर्थ है—सत्य, ज्ञान और विवेक के प्रति गहन विश्वास। यह ऐसा विश्वास है जो अनुभव, तर्क और शास्त्रीय मार्गदर्शन से पुष्ट होता है तथा मनुष्य को आत्मविकास और कल्याण की दिशा में अग्रसर करता है। श्रद्धा मन को स्थिर करती है, कर्म में दृढ़ता लाती है और जीवन में अनुशासन एवं आशा का संचार करती है। गीता के अनुसार, श्रद्धा ज्ञान की जननी है; क्योंकि जब मन में श्रद्धा होती है, तभी व्यक्ति सीखने, समझने और आत्मोन्नति के मार्ग पर चलने के लिए तैयार होता है।
अंततः श्रीकृष्ण श्रद्धा के महत्व को बताते हुए कहते हैं—

“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”(गीता 4.39)
(श्रद्धा रखने वाला ही ज्ञान प्राप्त करता है) लेकिन यहाँ श्रद्धा का अर्थ आँखें मूंद लेना नहीं है।​श्रद्धा का अर्थ है—"सत्य के प्रति एक सकारात्मक झुकाव।" * उदाहरण: जब आप किसी नए शहर जाते हैं, तो आप मैप (GPS) पर श्रद्धा रखते हैं। यह अंधविश्वास नहीं है, बल्कि एक 'वर्किंग हाइपोथेसिस' है। आप मानते हैं कि यह मैप सही हो सकता है, और फिर आप उस दिशा में कदम बढ़ाते हैं। जैसे-जैसे आप मंजिल के करीब पहुँचते हैं, आपकी श्रद्धा 'अनुभव' में बदल जाती है।​

विशेषता: श्रद्धा प्रश्न पूछने से नहीं रोकती। अर्जुन श्रद्धा रखता है, इसीलिए वह कृष्ण से सैकड़ों सवाल पूछता है। श्रद्धा में 'विवेक' (Logic) साथ रहता है। श्रद्धा, गुरु-सेवा और विनय के बिना ज्ञान संभव नहीं। श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है और उसी ज्ञान से कर्मबंधन से मुक्त होता है।

2. अंधविश्वास (Blind Belief): एक मानसिक आलस्य

​अंधविश्वास का अर्थ है—"बिना सोचे-समझे किसी बात को मान लेना और उसे चुनौती न देना।"

​अर्थात अंधविश्वास वह स्थिति है जो विवेक और तर्क से रहित होता है। इसमें व्यक्ति बिना समझे, परखे और अनुभव किए किसी धारणा को सत्य मान लेता है। अंधविश्वास भय, अज्ञान या परंपरा के जड़ अनुकरण से उत्पन्न होता है और अक्सर व्यक्ति को निर्बल, पराश्रित तथा निष्क्रिय बना देता है। जहाँ श्रद्धा मनुष्य को प्रश्न करने और उत्तर खोजने की प्रेरणा देती है, वहीं अंधविश्वास प्रश्नों को दबा देता है और विवेक की स्वतंत्रता को समाप्त कर देता है। परिणामस्वरूप, अंधविश्वास विकास के स्थान पर रूढ़ियों को जन्म देता है और समाज को प्रगति के मार्ग से दूर ले जाता है।

उदाहरण: यह सोचना कि केवल एक विशेष ताबीज पहनने से बिना मेहनत किए परीक्षा में सफलता मिल जाएगी, अंधविश्वास है। यहाँ मनुष्य अपनी जिम्मेदारी ईश्वर या किसी वस्तु पर डाल देता है।​

विशेषता: अंधविश्वास भय (Fear) पर आधारित होता है। इसमें सवाल पूछने की मनाही होती है। यह मनुष्य की बुद्धि को सुला देता है, जबकि श्रद्धा बुद्धि को जाग्रत करती है।

अतः कहा जा सकता है कि श्रद्धा विवेकपूर्ण विश्वास है, जबकि अंधविश्वास विवेकहीन स्वीकार्यता। सच्ची श्रद्धा कभी भी तर्क और ज्ञान से भयभीत नहीं होती; वह उन्हें और अधिक सुदृढ़ बनाती है। इसके विपरीत, अंधविश्वास तर्क से बचता है क्योंकि उसका आधार सत्य नहीं, बल्कि भ्रम होता है। जीवन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य श्रद्धा को अपनाए, परंतु अंधविश्वास से स्वयं को मुक्त रखे—क्योंकि श्रद्धा हमें ऊँचा उठाती है और अंधविश्वास हमें बाँध देता है।

कृष्ण का व्यावहारिक दृष्टिकोण

​कृष्ण अर्जुन को डराते नहीं हैं। वे उसे तर्क देते हैं, सृष्टि का विज्ञान समझाते हैं, और फिर अंत में कहते हैं—"विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु" (इस ज्ञान पर पूरी तरह विचार करो और फिर जो तुम्हें ठीक लगे वह करो)।

​यही असली अध्यात्म है। यह अंधविश्वास की नींव पर नहीं, बल्कि परीक्षण और अनुभव की नींव पर खड़ा है। अर्थात आप यहाँ मान सकते हैं कि गीता हमें 'बिलीवर' (Believer) नहीं, बल्कि 'सीकर' (Seeker यानी खोजकर्ता) बनाती है।

अंततः श्रीकृष्ण श्रद्धा के महत्व को बताते हुए कहते हैं—
“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”(गीता 4.39)

श्रद्धा, गुरु-सेवा और विनय के बिना ज्ञान संभव नहीं। श्रद्धावान व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है और उसी ज्ञान से कर्मबंधन से मुक्त होता है।
इस प्रकार भगवद्गीता का चतुर्थ अध्याय यह सिद्ध करता है कि ज्ञान, कर्म और संन्यास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। विद्यार्थी, कर्मचारी और गृहस्थ—तीनों के लिए यह अध्याय जीवन को संतुलित, सार्थक और शांत बनाने का मार्गदर्शन करता है।

इस प्रकार भगवद्गीता का चतुर्थ अध्याय यह सिद्ध करता है कि ज्ञान, कर्म और संन्यास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। विद्यार्थी, कर्मचारी और गृहस्थ—तीनों के लिए यह अध्याय जीवन को संतुलित, सार्थक और शांत बनाने का मार्गदर्शन करता है।
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अध्याय 5 : सन्यास योग

भूमिका : सन्यास योग का तात्त्विक विश्लेषण

सन्यास योग श्रीमद्भगवद्गीता के उस गहन दार्शनिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ त्याग का अर्थ बाह्य कर्मों का परित्याग न होकर अंतरात्मा में कर्तापन और आसक्ति का त्याग है। सामान्य धारणा में सन्यास को संसार से पलायन या कर्मों के पूर्ण त्याग के रूप में देखा जाता है, किंतु गीता इस संकीर्ण अर्थ का विस्तार करती है। यहाँ सन्यास का तात्पर्य है—अहंकार, फलाकांक्षा और बंधनकारी प्रवृत्तियों का त्याग, जिससे मनुष्य कर्म करते हुए भी आंतरिक रूप से मुक्त रह सके। इस प्रकार सन्यास योग कर्म और त्याग के बीच सेतु का कार्य करता है।

इस अध्याय की भूमिका के रूप में यह समझना आवश्यक है कि अर्जुन के मन में उत्पन्न संशय केवल युद्ध से संबंधित नहीं है, बल्कि वह समस्त मानव जीवन के मूल प्रश्न को स्पर्श करता है—क्या कर्म करते रहना श्रेयस्कर है या कर्मों से विरक्त होकर ज्ञान के मार्ग पर चलना? इसी द्वंद्व का समाधान प्रस्तुत करता है सन्यास योग। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मों का परित्याग नहीं, बल्कि कर्मों में आसक्ति का परित्याग ही सच्चा सन्यास है। जो व्यक्ति समभाव, संयम और विवेक के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करता है, वही वास्तविक संन्यासी और योगी कहलाता है।

सन्यास योग मनुष्य को यह बोध कराता है कि मुक्ति का मार्ग जीवन से भागने में नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से जीने में है। यह योग बताता है कि जब कर्म ईश्वरार्पण भाव से किए जाते हैं और उनके फल को समत्व भाव से स्वीकार किया जाता है, तब वही कर्म साधना बन जाते हैं। अतः सन्यास योग अध्याय का प्रारंभ हमें इस उच्च सत्य के लिए तैयार करता है कि आंतरिक वैराग्य और बाह्य कर्म—दोनों का समन्वय ही गीता का केन्द्रीय संदेश है, और यही मनुष्य को शांति, स्थिरता तथा आत्मबोध की ओर ले जाता है।


कर्तापन के अहंकार से मुक्ति और समदृष्टि

गीता के अनुसार मनुष्य के बंधन का मूल कारण कर्म नहीं, बल्कि कर्मों के साथ जुड़ा हुआ “मैं करता हूँ” का भाव, अर्थात् कर्तापन का अहंकार है। जब व्यक्ति स्वयं को ही प्रत्येक कर्म का एकमात्र कर्ता मान लेता है, तब वह स्वाभाविक रूप से फल की अपेक्षा, भय, गर्व और निराशा से बँध जाता है। इसके विपरीत, कर्तापन के अहंकार से मुक्ति का अर्थ है यह बोध कि कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं और आत्मा केवल साक्षी रूप में स्थित रहती है। यह दृष्टि मन को हल्का करती है और कर्म करते हुए भी आंतरिक स्वतंत्रता प्रदान करती है।

कर्तापन के अहंकार से मुक्त होने पर समदृष्टि का उदय होता है। समदृष्टि का तात्पर्य है—सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान तथा मित्र-शत्रु में समान भाव रखना। ऐसा व्यक्ति परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, क्योंकि उसका केंद्र बाह्य परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक स्थिरता होता है। वह जानता है कि सभी प्राणी एक ही आत्मतत्त्व से अभिन्न हैं, इसलिए वह दूसरों के प्रति करुणा, सहिष्णुता और न्यायपूर्ण व्यवहार विकसित करता है।

इस प्रकार कर्तापन के अहंकार से मुक्ति और समदृष्टि परस्पर गहराई से जुड़ी हुई हैं। जहाँ अहंकार का क्षय होता है, वहीं समत्व का विकास होता है। यही अवस्था गीता में स्थितप्रज्ञ और योगयुक्त पुरुष की कही गई है, जो कर्म में संलग्न रहते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है। जीवन में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह दृष्टि अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही मनुष्य को कर्मयोग और सन्यास योग—दोनों का सार समझने योग्य बनाती है।

कर्म और त्याग का द्वंद्व-

यह अध्याय यह स्पष्ट करता है कि संन्यास वस्त्र बदलने का नाम नहीं, बल्कि अहंकार त्यागने का नाम है। गीता के दार्शनिक प्रवाह में यह अध्याय एक अत्यंत सूक्ष्म और निर्णायक स्थान रखता है। यह अध्याय कर्म और संन्यास के बीच उपस्थित प्रतीत होने वाले विरोध को समाप्त करता है और यह स्पष्ट करता है कि संन्यास वस्तुतः बाह्य कर्म-त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक अहंकार-त्याग है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बोध कराते हैं कि मनुष्य कर्म किए बिना रह नहीं सकता, किंतु वह कर्म करते हुए भी मुक्त हो सकता है, यदि वह अपने भीतर से कर्तापन की भावना को विसर्जित कर दे।

अध्याय का आरंभ अर्जुन के प्रश्न से होता है।

अर्जुन के मन में भी यह द्वंद्व है। युद्धभूमि में खड़े होकर वह सोचता है—

“यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों?”
“यदि कर्म आवश्यक है तो संन्यास क्यों?”

मानव जीवन का भी सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
“कर्म करूँ या त्याग करूँ?”

इसी प्रश्न का समाधान भगवान श्रीकृष्ण पाँचवें अध्याय में करते हैं।

 अर्जुन यह जानना चाहता है कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग में से कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है। यह प्रश्न केवल अर्जुन का व्यक्तिगत प्रश्न नहीं है, बल्कि समस्त मानवता का प्रश्न है, क्योंकि प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के मन में यह द्वंद्व उठता है कि क्या संसार के कर्मों में उलझे रहकर आत्मिक शांति संभव है। श्रीकृष्ण उत्तर देते हुए स्पष्ट करते हैं कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों ही मोक्षदायक हैं, परंतु कर्मयोग अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि वह जीवन से पलायन नहीं सिखाता, बल्कि जीवन को ही साधना बना देता है। यहाँ कर्मयोग का अर्थ कर्म करते हुए फलासक्ति और अहंकार का त्याग है।

इस संदर्भ में श्रीकृष्ण सच्चे संन्यासी की परिभाषा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की कामना करता है, वही नित्य संन्यासी है। यह कथन संन्यास की पारंपरिक बाह्य अवधारणा को तोड़ देता है। यहाँ संन्यास का संबंध वस्त्र, आश्रम या स्थान से नहीं, बल्कि मन की अवस्था से है। द्वेष और आकांक्षा—ये दोनों ही मन को बाँधने वाली वृत्तियाँ हैं। जब मन इनसे मुक्त हो जाता है, तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।

आगे श्रीकृष्ण कर्मयोग और ज्ञानयोग के संबंध को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि अज्ञानी लोग कर्म और ज्ञान को अलग-अलग मार्ग मानते हैं, किंतु ज्ञानी जानते हैं कि दोनों एक ही सत्य तक पहुँचाते हैं। कर्मयोग चित्त की शुद्धि करता है और शुद्ध चित्त में ही ज्ञान का उदय संभव होता है। इस प्रकार कर्म ज्ञान का विरोधी नहीं, बल्कि उसका सहायक बन जाता है। यह दृष्टि गीता को एक समन्वयवादी दर्शन बनाती है, जिसमें कर्म, ज्ञान और संन्यास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

अध्याय का केंद्रीय दार्शनिक विषय कर्तापन के अहंकार का निषेध है। श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि न आत्मा कर्ता है, न वही कर्मों की रचना करती है और न कर्मफल का संयोग कराती है। ये सब प्रकृति के गुणों द्वारा संपन्न होते हैं। आत्मा केवल साक्षी है। यहाँ सांख्य दर्शन का पुरुष–प्रकृति विवेक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कर्तापन की भावना अविद्या से उत्पन्न होती है और यही भावना मनुष्य को बंधन में डालती है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि कर्म शरीर, इंद्रियों और मन के स्तर पर हो रहे हैं, तब आत्मा स्वतः ही उनसे असंग हो जाती है।

इसी भाव को श्रीकृष्ण ‘कर्म करते हुए अकर्म’ के रूप में व्यक्त करते हैं। ज्ञानी पुरुष चलते, बोलते, देखते और कर्म करते हुए भी यह जानता है कि वास्तव में वह कुछ नहीं कर रहा। यह कथन अत्यंत सूक्ष्म है और इसका अभिप्राय निष्क्रियता नहीं, बल्कि साक्षीभाव है। शरीर कर्म करता है, किंतु आत्मा उनमें लिप्त नहीं होती। यह अवस्था अभ्यास, विवेक और वैराग्य के द्वारा प्राप्त होती है।

अध्याय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण शिखर ‘समदृष्टि’ का सिद्धांत है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चांडाल—इन सभी में ज्ञानी पुरुष समान दृष्टि रखता है। यह समदृष्टि केवल नैतिक सहिष्णुता नहीं, बल्कि अद्वैतबोध का परिणाम है। जब आत्मा को एक और अविभाज्य सत्य के रूप में देखा जाता है, तब ऊँच-नीच, जाति, पद और स्थिति के भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

इस दार्शनिक अवस्था का फल आंतरिक शांति है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष भीतर ही सुख का अनुभव करता है, भीतर ही रमण करता है और भीतर ही प्रकाश को देखता है, वही ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है। ब्रह्मनिर्वाण का अर्थ मृत्यु के बाद की कोई स्थिति नहीं, बल्कि जीवित अवस्था में ही अहंकार का क्षय और आत्मस्वरूप में स्थित होना है। यही अवस्था वेदांत में जीवन्मुक्ति कहलाती है।

आचार्य परंपरा के अनुसार इस अध्याय का दार्शनिक निष्कर्ष यह है कि आत्मा अकर्ता और असंग है, कर्तापन अज्ञानजन्य है, और ज्ञान से इस अज्ञान का नाश होता है। शंकराचार्य इसे ‘अध्यास’ कहते हैं—अर्थात आत्मा पर शरीर और मन के गुणों का मिथ्या आरोप। जब यह अध्यास मिटता है, तब समदृष्टि, शांति और ब्रह्मनिष्ठा स्वतः प्रकट होती है।

इस प्रकार संन्यास योग जीवन के विरुद्ध नहीं, बल्कि जीवन के भीतर मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत करता है। यह अध्याय सिखाता है कि कर्म करना अनिवार्य है, परंतु कर्म में अहंकार जोड़ना अनिवार्य नहीं। जो मनुष्य कर्म करते हुए अपने को अकर्ता जान लेता है, वही सच्चा संन्यासी, सच्चा योगी और सच्चा ज्ञानी है। 

मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन कर्म से भरा हुआ है। जन्म से मृत्यु तक वह कुछ-न-कुछ करता ही रहता है—पढ़ता है, कमाता है, संबंध निभाता है, निर्णय लेता है, संघर्ष करता है। परन्तु इसी कर्म के साथ जुड़ जाता है अहंकार, और अहंकार से जन्म लेते हैं—बंधन, तनाव, भय, अपेक्षा और दुःख।

अर्जुन का प्रश्न केवल युद्धभूमि का प्रश्न नहीं है; वह हर विद्यार्थी, हर कर्मचारी, हर गृहस्थ और हर नेतृत्वकर्ता का प्रश्न है—

"क्या कर्म करते हुए शांति संभव है? या फिर शांति के लिए कर्म छोड़ना पड़ेगा?"

भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में स्पष्ट करते हैं कि सच्चा संन्यास कर्म का त्याग नहीं, कर्तापन के अहंकार का त्याग है।

यह प्रश्न गीता के केन्द्रीय द्वंद्व को स्पर्श करता है—क्या कर्म जीवन का बंधन हैं या मुक्ति का मार्ग? सामान्यतः मनुष्य यह मान लेता है कि अशांति का कारण कर्म हैं, इसलिए शांति पाने के लिए कर्मों का त्याग आवश्यक है। किंतु श्रीमद्भगवद्गीता इस धारणा को उलट देती है और बताती है कि अशांति का कारण कर्म नहीं, बल्कि कर्मों के साथ जुड़ी हुई आसक्ति, अहंकार और फल की चिंता है। जब मनुष्य “मैं करता हूँ” और “मुझे यह परिणाम चाहिए” की भावना से कर्म करता है, तब वही कर्म उसे तनाव और असंतोष में बाँध देते हैं।

गीता के अनुसार कर्म करते हुए भी शांति पूर्णतः संभव है, यदि कर्म निष्काम भाव से किए जाएँ। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को ईश्वरार्पण समझकर करता है और फल को प्रसाद-बुद्धि से स्वीकार करता है, तब मन परिणामों के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित रहता है। ऐसी अवस्था में कर्म बोझ नहीं, साधना बन जाते हैं। शांति तब आती है जब मन वर्तमान कर्म में पूर्ण रूप से संलग्न होता है, न कि भविष्य के फल या अतीत की असफलताओं में उलझा रहता है।

इसके विपरीत, केवल कर्म छोड़ देना शांति की गारंटी नहीं है। यदि मन के भीतर वासनाएँ, इच्छाएँ और असंतोष बने रहते हैं, तो बाह्य संन्यास भी अशांति को समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए गीता सिखाती है कि शांति का मार्ग कर्म-त्याग नहीं, बल्कि आसक्ति-त्याग है। जब कर्म भीतर के बंधन से मुक्त होकर किए जाते हैं, तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी शांत, संतुलित और मुक्त जीवन जी सकता है। यही कर्मयोग और सन्यास योग का संयुक्त और व्यावहारिक निष्कर्ष है।

यह प्रश्न—“क्या कर्म करते हुए शांति संभव है?”—विद्यार्थी, कर्मचारी और गृहस्थ—तीनों के जीवन में समान रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि तीनों ही निरंतर कर्म में संलग्न रहते हैं। गीता का उत्तर है कि शांति कर्म छोड़ने से नहीं, बल्कि कर्म के प्रति हमारी दृष्टि बदलने से आती है।

विद्यार्थी के परिप्रेक्ष्य में, पढ़ाई स्वयं में अशांति का कारण नहीं है, बल्कि परिणाम की अत्यधिक चिंता—अंक, रैंक, तुलना और भविष्य का भय—मन को अशांत करता है। जब विद्यार्थी अध्ययन को केवल सफलता का साधन मान लेता है, तब असफलता उसे तोड़ देती है। किंतु यदि वह पढ़ाई को अपने विकास और कर्तव्य के रूप में, पूरे मनोयोग से करता है और परिणाम को शांत भाव से स्वीकार करता है, तो पढ़ते हुए भी मन स्थिर रहता है। इस प्रकार विद्यार्थी कर्म में लगे रहकर भी मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है।

कर्मचारी के जीवन में, कार्यस्थल की समय-सीमा, प्रतिस्पर्धा, पदोन्नति और मान-अपमान अक्सर तनाव का कारण बनते हैं। यदि कर्मचारी यह मान ले कि उसका मूल्य केवल परिणाम या प्रशंसा से निर्धारित होता है, तो अशांति बढ़ती जाती है। परंतु जब वह अपने कार्य को ईमानदारी और निष्ठा से करना अपना कर्तव्य समझता है, और फल को व्यक्तिगत अहंकार से नहीं जोड़ता, तब वही कार्य साधना बन जाता है। ऐसी अवस्था में कार्य के बीच भी मन संतुलित रहता है और व्यक्ति आंतरिक शांति का अनुभव करता है।

गृहस्थ के परिप्रेक्ष्य में, परिवार, संबंध और उत्तरदायित्व जीवन का अभिन्न अंग हैं। अनेक बार अपेक्षाएँ, अधिकार-बोध और ‘मेरे अनुसार होना चाहिए’ की भावना तनाव उत्पन्न करती है। जब गृहस्थ अपने कर्तव्यों को प्रेम, सेवा और समर्पण भाव से निभाता है, और दूसरों को अपने सुख का साधन नहीं बनाता, तब संबंध बंधन नहीं रहते। इस दृष्टि से गृहस्थ जीवन में भी कर्म करते हुए शांति संभव हो जाती है।

इस प्रकार विद्यार्थी हो, कर्मचारी हो या गृहस्थ—तीनों के लिए गीता का संदेश एक ही है: कर्म छोड़े बिना शांति पाई जा सकती है, यदि कर्म अहंकार और आसक्ति से मुक्त होकर किए जाएँ। शांति जीवन से भागने में नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से जीने में निहित है।

इस अध्याय का मूल निष्कर्ष है—

कर्म से पलायन नहीं, कर्म में पवित्रता ही मुक्ति का मार्ग है

सन्यास कर्मयोग का समन्वय

अर्जुन का द्वंद्व स्वाभाविक है। वह देखता है कि संन्यास में शांति प्रतीत होती है और कर्म में हिंसा, अशांति और उलझन। श्रीकृष्ण इस भ्रम को तोड़ते हैं—

संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। (5.2)

दोनों ही कल्याणकारी हैं, पर कर्मयोग अधिक व्यावहारिक और सर्वसुलभ है।

संन्यास = बाह्य त्याग (यदि अहंकार शेष है तो निष्फल)

कर्मयोग = आंतरिक त्याग (अहंकार का क्षय)

श्रीमद्भगवद्गीता का एक मौलिक और व्यावहारिक संदेश यह है कि सन्यास और कर्मयोग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पूरक आयाम हैं। सामान्य दृष्टि में सन्यास को कर्मों के त्याग और कर्मयोग को कर्मों में संलग्न रहने के रूप में देखा जाता है, जिससे यह भ्रम उत्पन्न होता है कि दोनों मार्ग अलग-अलग और विरोधी हैं। किंतु गीता इस द्वैत को समाप्त करते हुए स्पष्ट करती है कि सच्चा सन्यास बाह्य कर्मत्याग नहीं, बल्कि आंतरिक आसक्ति और कर्तापन के अहंकार का त्याग है, और यही भाव जब कर्म में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो वही कर्मयोग बन जाता है।

कर्मयोग व्यक्ति को सिखाता है कि वह अपने कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा से करे, परंतु कर्मफल पर अधिकार का त्याग करे। वहीं सन्यास यह बोध कराता है कि आत्मा अकर्ता और साक्षी है; कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा संपन्न होते हैं। जब यह ज्ञान कर्मयोग के साथ जुड़ जाता है, तब व्यक्ति कर्म करता हुआ भी भीतर से मुक्त रहता है। इस अवस्था में न कर्म बंधन बनते हैं और न ही कर्म से पलायन की आवश्यकता रहती है। यही वह बिंदु है जहाँ सन्यास और कर्मयोग का सच्चा समन्वय स्थापित होता है।

गीता के अनुसार ऐसा व्यक्ति ही वास्तविक संन्यासी और योगी है, जो न तो कर्मों से घृणा करता है और न ही कर्मों में आसक्त होता है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से बँधा नहीं रहता। उसका जीवन सेवा, कर्तव्य और समत्व पर आधारित होता है। इस प्रकार सन्यास का वैराग्य और कर्मयोग की सक्रियता—दोनों मिलकर मनुष्य को शांति, स्थिरता और आत्मबोध की ओर ले जाते हैं। यही समन्वय गीता का केन्द्रीय दर्शन है और यही मानव जीवन के लिए सर्वाधिक संतुलित और साध्य मार्ग है।

कर्मयोग वह संन्यास है जो जीवन को छोड़े बिना मुक्त करता है।

2. नित्य संन्यासी की परिभाषा

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। (5.3)

जो न द्वेष करता है, न आकांक्षा—वह सदा संन्यासी है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय (सन्यास योग) का तृतीय श्लोक है और यह सन्यास की गीता-सम्मत परिभाषा को अत्यंत संक्षेप में स्पष्ट करता है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति न किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की कामना करता है, वही सदा संन्यासी जानने योग्य है। यहाँ संन्यास का अर्थ बाह्य वेश, आश्रम या कर्मों का त्याग नहीं है, बल्कि मन की उस अवस्था का नाम है जहाँ राग-द्वेष का क्षय हो चुका हो। द्वेष का त्याग व्यक्ति को नकारात्मक भावनाओं—क्रोध, ईर्ष्या और विरोध—से मुक्त करता है, जबकि कांक्षा  का अभाव मन को असंतोष और लालसा के बंधन से छुड़ाता है।

भगवान यह संकेत देते हैं कि जो मनुष्य परिस्थितियों, व्यक्तियों या परिणामों के प्रति आकर्षण और विरोध से ऊपर उठ चुका है, वही वास्तव में बंधनमुक्त है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी अशांत नहीं होता, क्योंकि उसके भीतर अपेक्षा और प्रतिरोध की ग्रंथियाँ नहीं रहतीं। वह जीवन को जैसा है वैसा स्वीकार करता है और समत्व भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है।

इस प्रकार यह श्लोक यह स्थापित करता है कि संन्यास कोई बाहरी अवस्था नहीं, बल्कि आंतरिक स्वतंत्रता की स्थिति है। जो न चाहता है और न घृणा करता है, वह सदा मुक्त है—वह गृहस्थ हो या कर्मयोगी, उसका जीवन स्वयं में संन्यास का सजीव रूप बन जाता है।मनोवैज्ञानिक पक्ष

द्वेष = अतीत का बोझ

आकांक्षा = भविष्य की चिंता

जो वर्तमान में स्थित है, वही मुक्त है

मनोविज्ञान की दृष्टि से द्वेष और कांक्षा मन के दो सबसे शक्तिशाली तनाव-उत्पादक तत्त्व हैं। कांक्षा भविष्य से जुड़ी होती है—कुछ पाने की तीव्र चाह, अपेक्षा और परिणाम की चिंता। यह मन को लगातार अधूरापन महसूस कराती है और असंतोष, भय तथा चिंता को जन्म देती है। वहीं द्वेष अतीत या वर्तमान से जुड़ा होता है—किसी व्यक्ति, परिस्थिति या अनुभव के प्रति विरोध। यह क्रोध, ईर्ष्या, ग्लानि और आक्रोश के रूप में मन में तनाव बनाए रखता है। इस प्रकार मन या तो भविष्य की लालसा में खिंचा रहता है या अतीत के विरोध में उलझा रहता है; वर्तमान क्षण में टिक ही नहीं पाता।

जब व्यक्ति न द्वेष करता है और न कांक्षा, तब मनोवैज्ञानिक रूप से उसका मन emotional reactivity से मुक्त होने लगता है। उसकी भावनाएँ परिस्थितियों के अधीन नहीं रहतीं, बल्कि उसके भीतर से नियंत्रित होती हैं। ऐसी अवस्था में मन स्थिर, संतुलित और स्पष्ट हो जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान जिसे emotional regulation, cognitive flexibility और inner resilience कहता है, वही गीता यहाँ संन्यास की स्थिति के रूप में वर्णित करती है।

इस दृष्टि से “नित्यसंन्यासी” वह व्यक्ति है जो बाहरी संसार में सक्रिय रहते हुए भी आंतरिक रूप से स्वतंत्र है। उसका आत्म-मूल्य बाहरी स्वीकृति, सफलता या असफलता पर निर्भर नहीं करता। परिणामस्वरूप, उसका तनाव स्तर कम होता है, निर्णय क्षमता बेहतर होती है और संबंध अधिक स्वस्थ बनते हैं। इस प्रकार यह श्लोक केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और आंतरिक शांति का मनोवैज्ञानिक सूत्र प्रस्तुत करता है।


3. कर्म और ज्ञान : एक ही सत्य के दो पथ

श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म और ज्ञान को प्रायः अलग-अलग मार्गों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही सत्य तक पहुँचने के दो पूरक पथों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कर्म जीवन की अनिवार्यता है—मनुष्य बिना कर्म किए रह ही नहीं सकता, जबकि ज्ञान जीवन की दिशा है, जो यह बोध कराता है कि कर्म करते हुए भी आत्मा अकर्ता और साक्षी है। जब कर्म ज्ञान से रहित होता है, तब वह बंधन बन जाता है; और जब ज्ञान कर्म से रहित होता है, तब वह निष्क्रियता या पलायन का कारण बन सकता है। इसलिए गीता दोनों के समन्वय पर बल देती है।

कर्मयोग मनुष्य को सिखाता है कि वह अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करे, फल की आसक्ति को त्यागकर। वहीं ज्ञानयोग यह स्पष्ट करता है कि कर्ता वास्तव में प्रकृति के गुण हैं, आत्मा नहीं। जब यह ज्ञान कर्म में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब कर्म करते हुए भी व्यक्ति भीतर से मुक्त रहता है। इस अवस्था में कर्म शुद्ध होते हैं और ज्ञान जीवन में उतर आता है। अतः कर्म बिना ज्ञान के अंधा है और ज्ञान बिना कर्म के अधूरा।

गीता के अनुसार पूर्णता तब आती है जब ज्ञान कर्म को दिशा देता है और कर्म ज्ञान को साकार करता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को न तो केवल ज्ञान का उपदेश देते हैं और न ही केवल कर्म का, बल्कि दोनों के संतुलित अभ्यास की ओर प्रेरित करते हैं। इस प्रकार कर्म और ज्ञान विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पथ हैं, जो अंततः मनुष्य को शांति, मुक्तिबोध और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाते हैं।

बाल बुद्धि वाले लोग कर्म और ज्ञान को अलग मानते हैं। ज्ञानी जानते हैं—

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्। (5.4)

कर्म बिना ज्ञान अंधा है, और ज्ञान बिना कर्म निष्क्रिय।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति इन दोनों—कर्मयोग और सन्यास (ज्ञानयोग)—में से किसी एक में भी सही प्रकार से स्थित हो जाता है, वह दोनों का ही फल प्राप्त कर लेता है। यहाँ “सम्यग् आस्थितः” का अर्थ है—केवल बाह्य रूप से नहीं, बल्कि सही समझ और आंतरिक निष्ठा के साथ उस मार्ग पर स्थित होना। इसका आशय यह है कि यदि व्यक्ति कर्मयोग को ठीक से अपनाता है, तो वही उसे ज्ञान की परिपक्वता तक पहुँचा देता है; और यदि कोई ज्ञान में स्थित है, तो उसका ज्ञान स्वाभाविक रूप से कर्मों को शुद्ध और बंधनरहित बना देता है।

भगवान इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि कर्म और ज्ञान में वास्तविक विरोध नहीं है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—बंधन से मुक्ति और आत्मशांति। मार्ग भिन्न प्रतीत होते हैं, किंतु अंततः वे एक ही सत्य में विलीन हो जाते हैं। अतः जो साधक किसी एक मार्ग को पूरी ईमानदारी और सही दृष्टि से अपनाता है, उसे दूसरे मार्ग का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार यह श्लोक साधक के मन से यह भ्रम दूर करता है कि मुक्ति के लिए अनेक मार्गों में भटकना आवश्यक है। गीता का संदेश यह है कि एक मार्ग में भी यदि सम्यक् रूप से स्थित हो जाएँ, तो जीवन का परम उद्देश्य सिद्ध हो जाता है

4. कर्तापन का अहंकार : बंधन का मूल

अध्याय 5 का केन्द्रीय दर्शन कर्तापन के अहंकार का निषेध है—

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। (5.14)

आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता—वह साक्षी है।

आधुनिक जीवन में

"मैंने किया" ये भाव सांसारिक जीवन में तनाव उत्पन्न करता है। मैंने किया ये भाव आते ही मन में श्रेय लेने का वास्तविक भाव उत्पन्न हो जाता है। सफलता का श्रेय हम स्वतः ही स्वीकार करना चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग उसे स्वीकार करें परन्तु असफलता सदैव डराती है उस स्थिति में मन में जो भय उत्पन्न होता है वो है मेरे कारण।

"मेरे कारण" जब किसी कार्य में, कर्ता में ये भाव आता है वहीं पर मन में भय का प्रवेश होता है। वो परिणाम की चिंता करने लगता है। यदि कुछ अच्छा हुआ तो लोग क्या कहेंगे यदि कुछ बुरा अथवा गलत हुआ तो लोग क्या कहेंगे। हम इसी लोग क्या कहेंगे के भय में उलझ कर अपना स्वाभाविक कर्म भूलने लगते हैं और इसमें उलझने से हमारा स्वाभाविक व्यवहार बदलने लगता है और मन में भय रूपी विकार आ जाता है।इससे मुक्त होने का दूसरा कोई उपयुक्त मार्ग नहीं है बनिस्पत हम केवल अपने कर्म प्रणाम ध्यान दें, अपने प्रयास को सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारी से करें एवं सबकुछ ईश्वर को समर्पित कर दें।

"ईश्वर के द्वारा"  शांति

 जब हमारे मन में ये भाव आता है उसी क्षण हम शोक, चिंता, विषाद, मैंने किया, मेरे कारण इत्यादि सभी भाव से मुक्त होने लगते हैं। अंतर्मन में एक असीम शांति का अनुभव होने लगता है। जिस प्रकार पानी यदि एक जगह स्थिर हो जाये तो कुछ समय पश्चात उसमें कीटाणू पड़ जाते हैं, उसमें दुर्गन्ध आने लगती है जबकि नदी सदैव प्रवाहित होती रहती है इस कारण पानी रुकता नहीं है और सदैव शुद्ध व साफ बना रहता है। उसी प्रकार जब हम सब कुछ परम ईश्वर पर छोड़ देते हैं तो हमारे मन में जिस शांति भाव का आगमन होता है वो मस्तिष्क में जड़वत विकारों को हटा देता है और अपना स्थान बना लेता है। जब हम अपने कर्म को ईश्वर को ध्यान में रख कर अर्पित करते हैं उसी क्षण में शांति आने लगती है।

5. कर्म करते हुए अकर्म

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। (5.8)

इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं—

जो व्यक्ति योग में स्थित है, यानी जिसका मन संयमित है और जो तत्त्व को जानने वाला है, वह अपने मन में यह भाव रखता है कि

“मैं वास्तव में कुछ भी नहीं कर रहा हूँ।”

इसका भावार्थ क्या है? 

यहाँ “मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ” का अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति काम छोड़ देता है।

बल्कि इसका अर्थ है— वह समझता है कि देखना, सुनना, बोलना, चलना, खाना, सोना ये सब शरीर और इंद्रियों के कार्य हैं,

आत्मा (मैं) तो केवल साक्षी है। यानी कार्य हो रहा हैं, लेकिन अहंकार नहीं है कि “मैं ही करता हूँ”।

सरल उदाहरण से समझिए

जैसे— एक ड्राइवर गाड़ी चला रहा है, लेकिन समझता है कि “इंजन, पहिए और मशीन काम कर रही है, मैं केवल मार्गदर्शन कर रहा हूँ।” वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि— प्रकृति (शरीर-मन) काम कर रही है, और आत्मा केवल देखने वाली है।

जीवन से जुड़ा अर्थ-ऐसा व्यक्ति काम करता है लेकिन अहंकार से मुक्त रहता है। सफलता मिले तो घमंड नहीं, असफलता आए तो दुख नहीं।इसलिए वह बंधन में नहीं पड़ता, और भीतर से शांत रहता है।

 अर्थात जो व्यक्ति सत्य को जान चुका है और योग में स्थित है, वह अपने भीतर यह दृढ़ भाव रखता है कि वास्तव में वह कुछ भी नहीं करता। ऐसा व्यक्ति अपने सभी कार्यों—जैसे देखना, सुनना, बोलना, चलना, खाना या सोना—को शरीर, इंद्रियों और मन की स्वाभाविक क्रियाएँ मानता है। वह यह समझता है कि ये सभी कार्य प्रकृति के गुणों के द्वारा संपन्न होते हैं, जबकि आत्मा इन सबकी केवल साक्षी होती है। इसलिए उसके मन में “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” ऐसा अहंकार नहीं रहता। कर्म करते हुए भी वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता, और इसी कारण वह कर्मों के बंधन में नहीं पड़ता। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह शिक्षा देते हैं कि जब मनुष्य अपने कर्मों को अहंकार और आसक्ति से मुक्त होकर करता है, तब वह भीतर से शांत, संतुलित और मुक्त जीवन जीता है।

सार एक पंक्ति में  ज्ञानी व्यक्ति कर्म करता हुआ भी स्वयं को कर्ता नहीं मानता, इसलिए वह मुक्त और शांत रहता है। यह कथन अत्यंत सूक्ष्म है। ज्ञानी कर्म करता है, पर जानता है कि वह साक्षी है। यह अवस्था अभ्यास, विवेक और वैराग्य से आती है।

6. समदृष्टि : ज्ञान की पराकाष्ठा

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय के १८वें श्लोक का अंश "पण्डिताः समदर्शिनः" भारतीय दर्शन के सबसे गहरे और उदार सिद्धांतों में से एक को व्यक्त करता है। इसका शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ नीचे विस्तार से समझाया गया है:

पूरा श्लोक इस प्रकार है: 

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

 मुख्य अर्थ और व्याख्या

"पण्डिताः समदर्शिनः" का अर्थ है कि जो वास्तविक ज्ञानी (पण्डित) होते हैं, वे सभी के प्रति समान दृष्टि रखते हैं। यहाँ 'पण्डित' का अर्थ केवल किताबी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह है जिसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया हो।

भेदभाव का अभाव: एक आत्मज्ञानी व्यक्ति एक विद्वान ब्राह्मण, एक गाय, एक हाथी, एक कुत्ता और एक चाण्डाल (पोषित या उपेक्षित वर्ग) में कोई आध्यात्मिक भेद नहीं देखता। वह जानता है कि बाहरी शरीर (नाम और रूप) कर्मों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनके भीतर निवास करने वाली आत्मा और परमात्मा का अंश एक समान है।

 दृष्टिकोण की शुद्धता: जैसे सोने के अलग-अलग गहनों (अंगूठी, हार, चूड़ी) में सुनार केवल सोने को देखता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष विभिन्न योनियों और सामाजिक स्तरों के पीछे छिपे 'चेतन तत्व' को देखता है।

करुणा और समता: यह विचार हमें सिखाता है कि श्रेष्ठता का अहंकार और हीनता का भाव, दोनों ही अज्ञान की उपज हैं। जब हम सबमें एक ही ईश्वर का वास देखते हैं, तो घृणा और द्वेष स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

यह सूत्र सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक एकता का आधार है। यह सिद्ध करता है कि ज्ञान का चरमोत्कर्ष 'विद्वत्ता' नहीं, बल्कि 'समता' है। एक सच्चा ज्ञानी परिस्थितियों या व्यक्तियों के बाहरी आवरण से विचलित नहीं होता, बल्कि सबके साथ न्याय और प्रेम का व्यवहार करता है।

 जीवन के विविध क्षेत्रों में संन्यास योग

विद्यार्थी 

परिणाम नहीं, प्रक्रिया पर ध्यान

तुलना से मुक्ति

एक विद्यार्थी प्रतिदिन पढ़ता है, परीक्षा देता है, प्रतिस्पर्धा में भाग लेता है और भविष्य के सपने देखता है। यदि वह यह सोचकर पढ़े कि “मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ, मेरा परिणाम ही मेरी पहचान है”, तो उसके मन में भय, तनाव, ईर्ष्या और निराशा जन्म लेती है। गीता कहती है—

“नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।” 

जो तत्त्व को जानता है, वह कर्म करते हुए भी स्वयं को कर्ता नहीं मानता।

विद्यार्थी के लिए इसका अर्थ है—

मैं ईमानदारी से अध्ययन करूँ, परंतु परिणाम को अपने अहंकार या भय से न बाँधूँ।

सन्यास योग यह नहीं सिखाता कि विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ दे, बल्कि यह सिखाता है कि वह बिना मानसिक बोझ के पढ़े। जब विद्यार्थी फल की चिंता छोड़कर केवल कर्म पर ध्यान देता है, तब उसकी एकाग्रता बढ़ती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है और आत्मविश्वास स्थिर होता है।

आज का विद्यार्थी अक्सर तुलना की आग में जलता है—किसी के अंक अधिक हैं, कोई कोचिंग में आगे है, कोई सोशल मीडिया पर चमक रहा है। सन्यास योग कहता है—

“दूसरों से नहीं, स्वयं से प्रतिस्पर्धा करो।”

यह दृष्टि विद्यार्थी को भीतर से स्वतंत्र बनाती है।

सन्यास योग विद्यार्थी को वैराग्य नहीं, विवेक देता है। वह सिखाता है कि असफलता आने पर स्वयं को दोषी मानकर टूटना नहीं है, और सफलता मिलने पर अहंकार में बहना भी नहीं है। दोनों स्थितियों में संतुलन ही योग है।

एक विद्यार्थी यदि सन्यास योग को जीवन में उतार ले, तो वह परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न नहीं बनाता, बल्कि उसे एक साधना मानता है। ऐसी साधना से निकला विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि चरित्रवान, स्थिर और जागरूक नागरिक बनता है।

अतः विद्यार्थी के जीवन में सन्यास योग का सार यही है—

पूरे मन से पढ़ो, पर मन को परिणाम की बेड़ियों में मत बाँधो।

यही शिक्षा को तपस्या बनाता है और विद्यार्थी को भविष्य का सशक्त निर्माता।

गृहस्थ के जीवन में सन्यास योग 

अधिकार नहीं, कर्तव्य

अपेक्षा नहीं, स्वीकार

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, संन्यास का अर्थ घर-बार छोड़ना या गेरुए वस्त्र धारण करना मात्र नहीं है। भगवान कृष्ण ने 'कर्म संन्यास' और 'कर्म योग' को जोड़कर गृहस्थों के लिए एक बहुत ही व्यावहारिक मार्ग बताया है।

गृहस्थ जीवन में संन्यास योग को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

१. फल की आसक्ति का त्याग (Detachment from Results)

एक गृहस्थ के लिए असली संन्यास तब शुरू होता है जब वह अपने कर्तव्यों (नौकरी, व्यापार, परिवार का पालन) को पूरी निष्ठा से करता है, लेकिन उनके परिणामों (फलों) से चिपका नहीं रहता।

 "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" — यही गृहस्थ का संन्यास है।

२. 'ममत्व' (मेरा-पन) से ऊपर उठना संसार में रहते हुए यह भाव रखना कि "सब कुछ ईश्वर का है और मैं केवल एक ट्रस्टी (निमित्त) हूँ," संन्यास योग की पराकाष्ठा है। जब एक व्यक्ति अपने घर, धन और परिवार को 'मेरा' मानने के बजाय 'ईश्वर की अमानत' समझने लगता है, तो वह घर में रहकर भी संन्यासी के समान निर्लिप्त हो जाता है।

३. सेवा भाव (Spirit of Service)

गृहस्थ जीवन में संन्यास का अर्थ है स्वार्थ का त्याग। जब एक व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण (परोपकार) के लिए कार्य करता है, तो उसके सारे कर्म 'यज्ञ' बन जाते हैं। परिवार की सेवा को भगवान की सेवा समझना ही संन्यास योग है। 

४. समत्व भाव (Equanimity)

जैसा कि आपने पहले पूछा था—"पण्डिताः समदर्शिनः"। गृहस्थ जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि और मान-अपमान आते रहते हैं। इन दोनों स्थितियों में विचलित न होकर मानसिक संतुलन बनाए रखना ही एक गृहस्थ का 'योग' है।

अर्थात गृहस्थ जीवन में संन्यास का अर्थ पलायन (भागना) नहीं, बल्कि जागरूकता है। कर्तव्यों को निभाते हुए भीतर से मुक्त रहना ही सच्चा संन्यास योग है।

अर्जुन के पूछने पर भगवान कृष्ण ने 'स्थितप्रज्ञ' (जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है) के जो लक्षण बताए हैं, वे एक गृहस्थ के लिए बहुत ही प्रेरणादायक और व्यावहारिक हैं।

​एक स्थितप्रज्ञ गृहस्थ वह है जो संसार की भीड़ में रहकर भी भीतर से शांत रहता है। 

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति अपनी इंद्रियों का गुलाम नहीं होता। वह अपनी खुशी के लिए बाहरी वस्तुओं या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अपने अंतरात्मा में ही संतुष्ट रहता है। एक गृहस्थ के नाते, वह सुख-सुविधाओं का उपयोग तो करता है, लेकिन उनके अभाव में दुखी नहीं होता।

वह व्यक्ति जो दुखों के आने पर उद्विग्न (परेशान) नहीं होता और सुखों की प्राप्ति में बहुत अधिक हर्षित या आसक्त नहीं होता, वह स्थितप्रज्ञ है। गृहस्थ जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं; ज्ञानी व्यक्ति इन दोनों को जीवन का हिस्सा मानकर अपना संतुलन बनाए रखता है।

गीता में एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया गया है:

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

जैसे एक कछुआ संकट आने पर अपने अंगों को अपने खोल के भीतर समेट लेता है, वैसे ही एक स्थितप्रज्ञ गृहस्थ विषय-भोगों के सामने आने पर अपनी इंद्रियों को वश में करना जानता है। वह जानता है कि उसे कहाँ रुकना है।

​जो व्यक्ति 'ममता' (मेरा-पन) और 'अहंकार' (मैं-पन) को त्याग देता है, उसे ही परम शांति प्राप्त होती है। गृहस्थ जीवन में 'मैं' को 'हम' और 'ईश्वर' में बदल देना ही बुद्धि की स्थिरता है।

एक गृहस्थ के लिए स्थितप्रज्ञ होने का अर्थ यह नहीं है कि वह भावनाओं से शून्य हो जाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह अपनी भावनाओं का स्वामी बन जाए।

कर्मचारी के लिये सन्यास योग 

एक कर्मचारी (Employee) के लिए संन्यास योग का अर्थ कार्य को छोड़ना नहीं, बल्कि कार्य करने के तरीके को बदलना है। आधुनिक कॉर्पोरेट जगत या किसी भी कार्यक्षेत्र में रहते हुए संन्यास योग को अपनाना न केवल मानसिक शांति देता है, बल्कि कार्यक्षमता (Productivity) को भी बढ़ाता है।

एक कर्मचारी के लिए इसके मुख्य सिद्धांत इस प्रकार हैं:

1. 'कर्तव्य' को 'यज्ञ' बनाना

गीता के अनुसार, जब आप अपने काम को केवल वेतन के लिए नहीं, बल्कि एक आहुति या सेवा के रूप में करते हैं, तो वह कर्म योग बन जाता है। एक कर्मचारी के लिए उसकी डेस्क, उसका कंप्यूटर या उसकी फाइलें ही उसकी पूजा की सामग्री हैं। जब आप 'ऑफिस के काम' को 'ईश्वर के काम' की तरह पूर्ण शुद्धता से करते हैं, तो आप कार्यस्थल पर ही संन्यासी हैं।

2. परिणाम की चिंता से मुक्ति (Performance without Anxiety)

एक कर्मचारी अक्सर डेडलाइन्स, प्रमोशन या इंक्रीमेंट के तनाव में रहता है। संन्यास योग सिखाता है कि आप अपना शत-प्रतिशत (100%) प्रयास करें, लेकिन उसके परिणाम के साथ अपनी खुशी को न जोड़ें।

 सूत्र: यदि परिणाम मनचाहा न मिले, तो उसे 'ईश्वर की इच्छा' मानकर स्वीकार करें और यदि सफल हों, तो उसे 'प्रसाद' समझकर विनम्र रहें।

3. अहंकार का विसर्जन (Doership vs. Being an Instrument)

अक्सर "मैंने यह प्रोजेक्ट पूरा किया" या "मेरी वजह से कंपनी चल रही है" जैसे विचार अहंकार पैदा करते हैं। संन्यास योग कहता है कि आप स्वयं को एक 'निमित्त' (Instrument) समझें। यह भाव रखने से कि "ईश्वर मेरी योग्यताओं के माध्यम से यह कार्य करवा रहा है," काम का बोझ (Mental Pressure) कम हो जाता है।

4. कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance)

संन्यास योग सिखाता है कि कार्य के समय पूर्णतः कार्य में रहें और घर आने पर कार्य के विचारों का त्याग कर दें। मानसिक रूप से कार्यों का त्याग करना ही वास्तविक संन्यास है।

5. सहकर्मियों के प्रति समदृष्टि

जैसा कि आपने पहले चर्चा की—"पण्डिताः समदर्शिनः"। एक कर्मचारी के रूप में अपने जूनियर, सीनियर और प्रतिस्पर्धी (Competitor) के प्रति ईर्ष्या रखने के बजाय, सबमें एक ही ऊर्जा का दर्शन करना और सबके साथ न्यायप्रिय व्यवहार करना ही श्रेष्ठ योग है।

एक कर्मचारी के लिए संन्यास योग का अर्थ है— "कौशल के साथ कार्य करना और परिणामों से मुक्त रहना।" यह दृष्टिकोण बर्नआउट (Burnout) से बचाता है और कार्यस्थल पर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है।

नेतृत्वकर्ता के लिये सन्यास योग 

नेतृत्व के क्षेत्र में निर्णय शक्ति, अधिकार और प्रभाव स्वाभाविक रूप से आते हैं। यहीं अहंकार का जन्म होता है—“मेरे कारण यह हुआ”, “मेरी योजना सफल हुई”। सन्यास योग नेतृत्वकर्ता को सिखाता है कि वह कर्तव्य निभाये, पर परिणाम से बँधे नहीं। ऐसा नेतृत्व न भय से संचालित होता है, न लोभ से; वह धर्म, विवेक और लोक-कल्याण से संचालित होता है।

सन्यास योग से युक्त नेतृत्वकर्ता अपने पद को साधन मानता है, साध्य नहीं। उसके लिये सत्ता सेवा का अवसर है। वह प्रशंसा में उन्मत्त नहीं होता और आलोचना में विचलित नहीं होता। गीता का यह भाव—

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्

नेतृत्वकर्ता को भीतर से स्थिर करता है। वह जानता है कि प्रकृति अपने गुणों से कार्य कर रही है; मैं केवल जागरूक साक्षी और उत्तरदायी माध्यम हूँ।

ऐसा नेता निर्णय लेते समय निजी लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक हित देखता है। संकट में भी उसका मन संतुलित रहता है, क्योंकि वह जानता है कि परिणाम उसके वश में नहीं, कर्म उसके वश में है। यही सन्यास योग नेतृत्व को निष्काम कर्म में रूपांतरित करता है।

अतः नेतृत्वकर्ता के लिये सन्यास योग पलायन नहीं, बल्कि उच्चतम सक्रियता है—अहंकार रहित, आसक्ति रहित, पर पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ। यही योग नेतृत्व को सत्ता से उठाकर साधना बना देता है।

8. अंतःशांति और ब्रह्मनिर्वाण

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः (5.24)

जो बाहर नहीं, भीतर आनंद खोजता है—वही मुक्त होता है।

अंतःशांति और ब्रह्मनिर्वाण

यहाँ श्रीकृष्ण ब्रह्मनिर्वाण की दार्शनिक परिभाषा देते हैं। ब्रह्मनिर्वाण कोई मृत्यु के बाद मिलने वाली अवस्था नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए अहंकार की निवृत्ति है।

अंतःशांति वह अवस्था है जहाँ मन की चंचल तरंगें शांत हो जाती हैं और चेतना अपने स्वभाव में स्थिर हो जाती है। यह शांति बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती—न सफलता से बढ़ती है, न असफलता से घटती है। गीता के अनुसार यह शांति योगयुक्त चित्त की देन है, जहाँ व्यक्ति इच्छाओं, भय और अहंकार से क्रमशः मुक्त होता जाता है। जब मन इन्द्रियों के पीछे भागना छोड़ देता है और विवेक के प्रकाश में स्थित हो जाता है, तभी अंतःशांति का उदय होता है।

ब्रह्मनिर्वाण अंतःशांति की पराकाष्ठा है। यह केवल मृत्यु के बाद की अवस्था नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए ब्रह्म में लीन हो जाने की अनुभूति है। गीता कहती है कि जो व्यक्ति राग-द्वेष से मुक्त, आत्मसंयमी और समदर्शी है, वह इसी जीवन में ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त कर लेता है। यहाँ ‘निर्वाण’ का अर्थ शून्यता नहीं, बल्कि सीमित अहंकार का लय और अनंत सत्य में प्रतिष्ठा है।

अंतःशांति ब्रह्मनिर्वाण की भूमिका है। जब मन शांत होता है, तब आत्मा का स्वरूप स्पष्ट होने लगता है। जैसे स्थिर जल में ही आकाश का प्रतिबिंब दिखाई देता है, वैसे ही शांत चित्त में ब्रह्म का बोध होता है। इस अवस्था में व्यक्ति कर्म करता हुआ भी बँधता नहीं, क्योंकि उसका केंद्र अब देह या मन नहीं, बल्कि आत्मा होती है।

ब्रह्मनिर्वाण में स्थित व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उससे परे होता है। उसके लिये सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान समान हो जाते हैं। यही वह स्थिति है जिसे गीता स्थितप्रज्ञ और ब्रह्मभूत अवस्था कहती है। यहाँ अंतःशांति स्थायी हो जाती है, क्योंकि अब वह किसी बाह्य आधार पर टिकी नहीं रहती।

इस प्रकार, अंतःशांति साधना का पथ है और ब्रह्मनिर्वाण उसका चरम लक्ष्य। शांति से निर्वाण तक की यह यात्रा मनुष्य को सीमित व्यक्तित्व से उठाकर सार्वभौमिक चेतना में प्रतिष्ठित कर देती है—यही गीता का गूढ़ संदेश है।

अर्थात, जब चैतन्य वासनाओं से मुक्त होता है, वही ब्रह्मनिर्वाण है।

दार्शनिक दृष्टि से संन्यास योग

दर्शन के अनुसार 'संन्यास' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: 'सम्' (भली-भांति/पूर्ण) और 'न्यास' (त्याग या रख देना)।

इसका अर्थ है—अज्ञान का त्याग और सत्य में स्थिति। दार्शनिक रूप से, संन्यास का अर्थ दुनिया को छोड़ना नहीं है, बल्कि दुनिया को देखने के गलत नजरिए (Perspective) को छोड़ना है। जब मनुष्य 'अहंकार' (मैं-पन) और 'ममत्व' (मेरा-पन) को त्याग देता है, तो वह संन्यासी हो जाता है।

कर्म और संन्यास का अद्वैत (Unity of Action and Renunciation)

​आमतौर पर लोग समझते हैं कि कर्म करना 'योग' है और कर्म छोड़ना 'संन्यास'। लेकिन गीता के पांचवें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान कहते हैं:

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।(अज्ञानी लोग सांख्य/संन्यास और कर्मयोग को अलग-अलग बताते हैं, ज्ञानी नहीं।) 

यह पंक्ति श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 5, श्लोक 4 का पूर्वार्ध है और यह गीता के अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक निष्कर्ष को संक्षेप में प्रकट करती है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सांख्य (ज्ञानयोग) और योग (कर्मयोग) को अलग-अलग मानना केवल अल्पबुद्धि लोगों की धारणा है, न कि पण्डितों की। यहाँ “बालाः” शब्द से तात्पर्य आयु से नहीं, बल्कि अपरिपक्व विवेक से है—ऐसे लोग जो बाह्य रूपों को देखकर भेद कर लेते हैं, परंतु तत्त्व को नहीं समझ पाते। वे ज्ञान को कर्म से और कर्म को ज्ञान से अलग मानकर किसी एक को श्रेष्ठ ठहराने लगते हैं।

वास्तविक पण्डित वह है जो यह समझता है कि सांख्य और योग का लक्ष्य एक ही है—बंधन से मुक्ति और आत्मबोध। सांख्य आत्मा के अकर्ता और साक्षी स्वरूप का ज्ञान देता है, जबकि कर्मयोग उसी ज्ञान को जीवन के कर्मक्षेत्र में उतारने की विधि सिखाता है। जहाँ ज्ञान कर्म को शुद्ध करता है, वहीं कर्म ज्ञान को परिपक्व बनाता है। इसलिए इनके बीच भेद करना वैचारिक भ्रांति है।

इस पंक्ति के माध्यम से गीता यह स्पष्ट करती है कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग किसी एक पक्ष को पकड़ने में नहीं, बल्कि समन्वित दृष्टि अपनाने में है। जो व्यक्ति कर्म करते हुए ज्ञान में स्थित है, वही सच्चा पण्डित और योगयुक्त पुरुष है।

​दार्शनिक दृष्टि से, सच्चा संन्यास वह है जो कर्म करते हुए भी घटित हो। यदि आप हाथ-पांव रोककर बैठ जाएं लेकिन मन में इच्छाएं चलती रहें, तो वह 'मिथ्याचार' है। असली संन्यास वह है जहाँ कर्म तो हो रहे हैं, लेकिन कर्ता (Doer) का भाव समाप्त हो गया है।

३. तीन प्रकार के त्याग (The Three Dimensions of Renunciation)

​दर्शन के अनुसार संन्यास योग को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:

भौतिक स्तर (Physical): वस्तुओं का संग्रह कम करना।

मानसिक स्तर (Mental): इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग।​

बौद्धिक स्तर (Intellectual): इस बोध में जीना कि "मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।"

४. ज्ञान की अग्नि में कर्मों का दाह

​दार्शनिक दृष्टि कहती है कि जैसे अग्नि लकड़ी को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि कर्मों के बंधन को जला देती है।ओ

प्रारब्ध: जो कर्म फल देना शुरू कर चुके हैं।​

संचित: जो कर्म जमा हैं।​

आगामी: जो भविष्य में होने वाले हैं। एक संन्यासी वह है जो ज्ञान के माध्यम से इन तीनों के प्रभाव से मुक्त होकर 'साक्षी' (Observer) बन जाता है।

 'अकर्ता' भाव (The Sense of Non-Doership)

संन्यास योग का सबसे बड़ा दार्शनिक सिद्धांत है—नैव किंचित्करोमीति (मैं कुछ नहीं करता)।

ज्ञानी यह देखता है कि इंद्रियां अपने विषयों में वर्त रही हैं, शरीर अपना धर्म निभा रहा है, प्रकृति के गुण कार्य कर रहे हैं, लेकिन 'स्वयं' (आत्मा) निर्लिप्त है। यह 'तटस्थता' ही दर्शन की दृष्टि में संन्यास है।

अंततः संन्यास योग आत्मा को सीमित “मैं” से मुक्त कर ब्रह्म में प्रतिष्ठित करता है। जब ज्ञानी यह देख लेता है कि “मैं शरीर-मन नहीं, शुद्ध चेतना हूँ”, तब कर्म स्वतः प्रकृति में विलीन हो जाते हैं और आत्मा ब्रह्मनिर्वाण की शांति में स्थित हो जाती है। दार्शनिक दृष्टि से यही संन्यास योग का परम सार है। 

बंधन और मुक्ति का दार्शनिक सूत्र

दार्शनिक दृष्टि से बंधन और मुक्ति कोई बाह्य स्थितियाँ नहीं, बल्कि चेतना की अवस्थाएँ हैं। आत्मा स्वभावतः नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है; बंधन उसका वास्तविक स्वरूप नहीं, बल्कि अविद्या से उत्पन्न अनुभूति है। जब आत्मा स्वयं को देह, मन और इन्द्रियों के साथ अभिन्न मान लेती है, तब कर्तापन, भोक्तापन और भोगेच्छा का जन्म होता है—यही बंधन का मूल सूत्र है।

बंधन का सूत्र यह है:

अविद्या → अहंकार → कर्तापन → आसक्ति → कर्मफल → पुनर्बंधन

अविद्या आत्मा को उसके सत्य स्वरूप से विमुख कर देती है। अहंकार “मैं” और “मेरा” की सीमाएँ रचता है। कर्तापन की भावना कर्म को जन्म देती है और आसक्ति कर्मफल की अपेक्षा बाँध देती है। फलस्वरूप आत्मा सुख-दुःख के चक्र में फँस जाती है। यह चक्र ही संसार-बंधन कहलाता है।

इसके विपरीत मुक्ति का सूत्र है:

विवेक → वैराग्य → साक्षीभाव → निष्काम कर्म → ज्ञान → ब्रह्मस्थिति

विवेक आत्मा और अनात्मा का भेद स्पष्ट करता है। वैराग्य आसक्ति को शिथिल करता है। साक्षीभाव से कर्तापन का क्षय होता है। निष्काम कर्म कर्म को शुद्ध करता है और अंततः आत्मज्ञान प्रकट होता है। जब ज्ञानी यह जान लेता है कि वह न कर्ता है, न भोक्ता—केवल साक्षी चेतना है—तभी बंधन स्वतः विलीन हो जाता है।

दार्शनिक रूप से मुक्ति किसी नई उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि अज्ञान के आवरण का हट जाना है। जैसे रस्सी को साँप मानने से भय होता है और ज्ञान होने पर भय स्वतः मिट जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर संसार-बंधन समाप्त हो जाता है। आत्मा न कहीं जाती है, न कुछ प्राप्त करती है; वह केवल अपने सत्य में प्रतिष्ठित होती है।

इस प्रकार बंधन और मुक्ति का दार्शनिक सूत्र यह घोषित करता है कि बंधन मन का भ्रम है और मुक्ति आत्मा का स्वाभाविक प्रकाश। यही वेदान्त का परम निष्कर्ष और गीता का मौन उपदेश है।

कर्मयोग बनाम पलायनवादी संन्यास

गीता के दर्शन में कर्मयोग और पलायनवादी संन्यास के बीच का अंतर केवल आचरण का नहीं, बल्कि चेतना के स्तर का अंतर है। कर्मयोग जीवन को स्वीकार करता है, जबकि पलायनवादी संन्यास जीवन से बचने का प्रयास है। श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट करते हैं कि संन्यास का वास्तविक अर्थ कर्म का त्याग नहीं, बल्कि आसक्ति और कर्तापन का त्याग है।

पलायनवादी संन्यास वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ मनुष्य कर्म के दायित्व, संघर्ष और परिणामों से भयभीत होकर कर्मभूमि से हट जाना चाहता है। यह संन्यास बाह्य होता है—वस्त्र, स्थान और भूमिका का परिवर्तन—पर भीतर राग-द्वेष, वासना और अहंकार यथावत रहते हैं। ऐसा संन्यास कर्म से तो दूर भागता है, पर मन से नहीं; इसलिए यह मुक्ति नहीं, बल्कि सूक्ष्म बंधन को जन्म देता है।

इसके विपरीत कर्मयोग संसार के मध्य रहकर आत्मिक स्वतंत्रता की साधना है। कर्मयोगी कर्म करता है, पर फल की कामना से मुक्त रहता है। वह जानता है कि कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं और आत्मा साक्षी मात्र है। इस बोध से कर्म बोझ नहीं रहता, साधना बन जाता है। कर्मयोग पलायन नहीं, बल्कि साहस है—कर्तव्य के क्षेत्र में टिके रहकर अहंकार का विसर्जन।

दार्शनिक रूप से देखें तो पलायनवादी संन्यास तमोगुण से प्रेरित होता है—भय, जड़ता और भ्रम से। जबकि कर्मयोग सत्त्व की अभिव्यक्ति है—विवेक, संतुलन और समदर्शिता। इसलिए गीता कर्मयोग को श्रेष्ठ ठहराती है, क्योंकि वह चित्त को शुद्ध करता है और अंततः ज्ञान के लिये पात्र बनाता है।

अतः गीता का संदेश स्पष्ट है: कर्म से भागना संन्यास नहीं, और कर्म में फँस जाना भी योग नहीं। कर्म करते हुए भीतर से मुक्त रहना—यही कर्मयोग है और यही सच्चा संन्यास। यही जीवन के रणक्षेत्र में प्राप्त होने वाली मुक्ति का मार्ग है।

दार्शनिक रूप से श्रीकृष्ण निष्क्रिय मोक्ष के विरोधी हैं। कर्म छोड़ना यदि अज्ञान से प्रेरित है, तो वह बंधन ही बनता है।

आचार्य-स्तरीय दार्शनिक विवेचन : संन्यास योग का तत्त्वमीमांसा पक्ष

यहाँ से अध्याय 5 को केवल व्याख्यात्मक न मानकर तत्त्वमीमांसा (Metaphysics) के स्तर पर देखा जाता है। आचार्य परम्परा में गीता को स्मृति-प्रस्थान कहा गया है, और अध्याय 5 उसी परम्परा में आत्मतत्त्व का गहन उद्घाटन करता है।

संन्यास योग का तत्त्वमीमांसा पक्ष गीता-दर्शन का वह सूक्ष्म स्तर है जहाँ नैतिक उपदेश और साधना-विधि से आगे बढ़कर सत्ता (Being) और कर्ता-भाव (Agency) की मूल समस्या का समाधान किया जाता है। यहाँ संन्यास को न तो सामाजिक पलायन के रूप में ग्रहण किया गया है, न ही केवल मनोवैज्ञानिक वैराग्य के रूप में, बल्कि आत्मा और प्रकृति के यथार्थ सम्बन्ध के दार्शनिक विवेचन के रूप में स्थापित किया गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता का संन्यास योग  केवल आचार-प्रधान या नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि एक गहन तत्त्वमीमांसा प्रस्तुत करता है, जहाँ आत्मा, कर्म, कर्तृत्व और मुक्ति के प्रश्नों का सूक्ष्म दार्शनिक समाधान किया गया है। यहाँ संन्यास को कर्म-त्याग के व्यवहारिक अर्थ में न लेकर, अविद्या-जनित कर्तृत्वाभिमान के निरसन के रूप में स्थापित किया गया है। यही गीता का विशिष्ट योगदान है—संन्यास को कर्म के विरोध में नहीं, बल्कि कर्म के तात्त्विक शोधन के रूप में देखना।

तत्त्वमीमांसा की दृष्टि से गीता का मूल प्रतिपाद्य यह है कि आत्मा न कर्ता है, न भोक्तानैव किंचित्करोमीति (5.8)। कर्म का अधिष्ठान प्रकृति है और उसके संचालन का कारण गुणत्रय हैं। जब जीव अविद्या के कारण आत्मा पर कर्तृत्व का आरोप करता है, तब बंधन उत्पन्न होता है। संन्यास योग इसी अध्यास (superimposition) का निराकरण करता है। आचार्य शंकर के अनुसार यह संन्यास बुद्धि-निष्ठ वैराग्य है, जहाँ आत्मा-अनात्मा विवेक द्वारा कर्तृत्व-भोक्तृत्व का मिथ्यात्व जाना जाता है।

रामानुजाचार्य की परम्परा में संन्यास योग का तत्त्वमीमांसा पक्ष कर्तृत्व-त्याग नहीं, कर्तृत्व-समर्पण है। आत्मा अकर्ता नहीं, बल्कि भगवदधीन कर्ता है। अतः यहाँ संन्यास का अर्थ है—स्वतंत्र कर्तृत्व के अहंकार का परित्याग और कर्मों को नारायणार्पण भाव से संपन्न करना। इस दृष्टि में संन्यास योग और कर्मयोग का समन्वय शरणागति के तत्त्व में सिद्ध होता है।

माध्वाचार्य के द्वैत दर्शन में संन्यास योग आत्मा और ईश्वर के भेद को अक्षुण्ण रखते हुए यह प्रतिपादित करता है कि कर्म बंधनकारी तब होते हैं जब वे अहंकार और अविद्या से प्रेरित हों। ज्ञान द्वारा ईश्वर की सर्वकर्तृत्व-स्वीकृति और जीव की आश्रित-कर्तृत्व भावना ही संन्यास की दार्शनिक भूमि है। इस प्रकार संन्यास योग यहाँ भी कर्म-त्याग नहीं, बल्कि अहं-त्याग बन जाता है।

तत्त्वमीमांसा की चरम अवस्था में संन्यास योग यह स्थापित करता है कि मुक्ति कोई क्रिया-जन्य फल नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा है। कर्म केवल चित्तशुद्धि का साधन हैं; वे मुक्ति के उत्पादक नहीं, बल्कि अविद्या के क्षय के सहायक हैं। जब ज्ञान उदित होता है, तब कर्म स्वतः बंधनरहित हो जाते हैं—न कर्म का परित्याग आवश्यक रहता है, न कर्म में आसक्ति।

इस प्रकार संन्यास योग का तत्त्वमीमांसा पक्ष यह निर्णायक निष्कर्ष देता है कि संन्यास कोई सामाजिक स्थिति नहीं, बल्कि अस्तित्वगत बोध है। यह बोध कर्म करते हुए भी संभव है, और वही गीता का दार्शनिक वैशिष्ट्य है—जहाँ संन्यास और कर्म एक ही तत्त्व के दो व्यावहारिक आयाम बन जाते हैं। यही दृष्टि आचार्य-परम्परा में संन्यास योग को उच्चतम दार्शनिक गरिमा प्रदान करती है। 

 सरल और सहज शब्दों में

तत्त्वमीमांसा का अर्थ होता है—वास्तविक सत्य की जाँच। जब हम संन्यास योग को तत्त्वमीमांसा की दृष्टि से समझते हैं, तो प्रश्न यह नहीं रह जाता कि क्या करना चाहिए या क्या छोड़ना चाहिए, बल्कि यह बन जाता है कि वास्तव में “मैं” कौन हूँ और कर्म कौन करता है। गीता यहीं से संन्यास योग की बात शुरू करती है।

सबसे सरल शब्दों में गीता यह कहती है कि आत्मा स्वयं कर्म नहीं करती। देखना, चलना, बोलना, सोचना—ये सब शरीर, मन और बुद्धि के स्तर पर होते हैं। आत्मा तो केवल देखने-समझने वाली चेतना है। लेकिन अज्ञान के कारण हम यह मान लेते हैं—“मैं ही सब कर रहा हूँ।” यही मान्यता कर्तापन का अहंकार है और यही बंधन का मूल कारण है। संन्यास योग इस भ्रम को तोड़ता है।

संन्यास का अर्थ इसलिए काम-धंधा छोड़ना नहीं है, बल्कि इस गलत धारणा को छोड़ना है कि मैं ही सब कुछ हूँ और सब कुछ मेरे कारण हो रहा है। जब यह समझ आ जाती है कि कर्म प्रकृति के नियमों से हो रहे हैं और मैं केवल उनका साक्षी हूँ, तब भीतर एक गहरी हल्कापन और शांति आती है। यही तत्त्वमीमांसा की सरल बात है—कर्म होते हैं, पर आत्मा अकर्ता रहती है

गीता आगे यह भी स्पष्ट करती है कि मुक्ति कोई नई चीज़ पाने से नहीं मिलती, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने से मिलती है। जैसे बादल हटने पर सूर्य नया नहीं बनता, केवल दिखाई देने लगता है—वैसे ही ज्ञान से आत्मा मुक्त नहीं बनती, बल्कि पहले से मुक्त होने का बोध होता है। कर्म केवल मन को शुद्ध करने का साधन हैं, ताकि यह सत्य स्पष्ट दिखाई दे सके।

इस प्रकार संन्यास योग का तत्त्वमीमांसा पक्ष बहुत सीधा है:
👉 समस्या कर्म नहीं है, समस्या “मैं करता हूँ” की गलत पहचान है।
👉 समाधान कर्म छोड़ना नहीं, अहंकार और भ्रम को छोड़ना है।

यही कारण है कि गीता कहती है—जो व्यक्ति भीतर से यह समझ लेता है, वह संसार में रहते हुए भी सदा संन्यासी है। यही संन्यास योग का सबसे सरल, गहरा और जीवनोपयोगी सत्य है।

1. कर्तृत्व-मीमांसा और संन्यास

गीता की तत्त्वमीमांसा का केंद्रीय प्रश्न है—कर्म का कर्ता कौन है?
उपनिषद् उद्घोष करते हैं कि आत्मा अकर्ता, अविकारी और असंग है; पर अनुभव में कर्म होता दिखाई देता है। गीता इस द्वैत को सुलझाते हुए कहती है कि कर्म प्रकृति में घटित होता है, आत्मा केवल साक्षी है। अज्ञानवश आत्मा कर्तृत्व का अध्यारोपण कर लेती है—यहीं से बंधन आरम्भ होता है।

संन्यास योग का तत्त्व यही है कि आत्मा से कर्तृत्व-अध्यास का निरसन कर दिया जाए। यह निरसन कर्म के निषेध से नहीं, बल्कि ज्ञान से होता है। अतः संन्यास यहाँ क्रिया-विरति नहीं, कर्तृत्व-विरति है।

 बहुत सरल शब्दों में

कर्तृत्व-मीमांसा का मतलब बस इतना है—यह समझना कि “काम कौन कर रहा है?”
हम आम तौर पर कहते हैं, मैं पढ़ रहा हूँ, मैं काम कर रहा हूँ, मैंने यह किया। लेकिन गीता पूछती है—क्या सच में “मैं” (आत्मा) यह सब कर रहा है, या शरीर-मन यह काम कर रहे हैं?

सोचिए—आँख देखती है, हाथ लिखता है, दिमाग सोचता है। ये सब शरीर और मन के काम हैं। आत्मा तो सिर्फ यह जानती है कि “देखा जा रहा है, लिखा जा रहा है, सोचा जा रहा है।” आत्मा बिजली की तरह है—बिजली खुद पंखा नहीं घूमाती, पर उसके बिना पंखा घूम भी नहीं सकता। इसी तरह आत्मा की मौजूदगी से कर्म होते हैं, पर आत्मा खुद कर्म नहीं करती।

अब संन्यास का मतलब क्या हुआ?
संन्यास का मतलब नौकरी, पढ़ाई या परिवार छोड़ना नहीं है। संन्यास का असली मतलब है—“मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ” वाला घमंड छोड़ देना। जब हम यह समझ लेते हैं कि काम शरीर-मन कर रहे हैं और मैं सिर्फ देखने-समझने वाला हूँ, तो भीतर से बोझ हल्का हो जाता है।

जब “मैं करता हूँ” का भाव कम हो जाता है, तो
– ज़्यादा तनाव नहीं रहता
– असफलता में टूटते नहीं
– सफलता में अहंकार नहीं आता

बस काम होता रहता है, लेकिन मन बँधता नहीं। यही सच्चा संन्यास है।

तो एक लाइन में समझिए—
👉 कर्तृत्व-मीमांसा = यह समझना कि असली कर्ता मैं नहीं हूँ
👉 संन्यास = इस समझ को जीवन में जी लेना

गीता यही सिखाती है कि काम करते हुए भी मन से मुक्त रहा जा सकता है। यही संन्यास है, और यही सबसे सरल सत्य है।

2. सत्त्वमीमांसा : आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति

सत्त्वमीमांसा का अर्थ है—वास्तविक सत्ता (Reality) की जाँच। अर्थात् यह समझना कि इस जगत में वास्तव में कौन-सा तत्त्व सत्य है, कौन परिवर्तनशील है और कौन केवल आधार रूप में स्थित है। गीता की दृष्टि में यह जाँच तीन मुख्य तत्त्वों के माध्यम से होती है—आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति

आत्मा वह चेतन तत्त्व है जो प्रत्येक जीव के भीतर स्थित है। वही देखने, सुनने, सोचने और अनुभव करने का आधार है। शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, लेकिन आत्मा नहीं बदलती। वह जन्म-मरण, सुख-दुःख और लाभ-हानि से परे रहती है। आत्मा न तो कर्म करती है और न ही कर्मों के फल से बँधती है; वह केवल साक्षी भाव से सबको प्रकाशित करती है। गीता में इसी को जीवात्मा कहा गया है।

ब्रह्म उस परम सत्य का नाम है जो सर्वत्र व्याप्त है और सभी आत्माओं का मूल आधार है। सरल शब्दों में, ब्रह्म वह असीम चेतना है जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है, जिसमें सब कुछ स्थित रहता है और जिसमें सब कुछ अंततः लीन हो जाता है। आत्मा उसी ब्रह्म का अंश या प्रतिबिंब है—जैसे समुद्र की एक बूँद में भी समुद्र का ही स्वभाव होता है। आत्मा और ब्रह्म में भेद अनुभव का है, सत्य का नहीं।

प्रकृति वह शक्ति है जिससे यह दृश्य संसार प्रकट होता है। शरीर, मन, बुद्धि, इंद्रियाँ और समस्त भौतिक जगत—सब प्रकृति के अंतर्गत आते हैं। प्रकृति गुणों (सत्त्व, रज, तम) से संचालित होती है और उसी के अनुसार कर्म, प्रवृत्ति और स्वभाव बनते हैं। प्रकृति स्वयं अचेतन है, पर आत्मा की चेतना से सक्रिय प्रतीत होती है—जैसे बिजली से मशीन चलती है।

सत्त्वमीमांसा का निष्कर्ष यह है कि आत्मा और ब्रह्म शाश्वत सत्य हैं, जबकि प्रकृति परिवर्तनशील माध्यम है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब आत्मा स्वयं को प्रकृति मान लेती है—यानी शरीर और मन को ही “मैं” समझ लेती है। इसी भ्रम से बंधन पैदा होता है। ज्ञान का उद्देश्य इसी भ्रम को दूर करना है।

ठीक है, अब इसे एकदम रोज़मर्रा के उदाहरण से समझते हैं, जैसे आप घर या गली में हो।

सत्त्वमीमांसा : आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति — आसान उदाहरण के साथ

आत्मा (मैं) सोचिए, आप घर में बैठे हैं और कोई टीवी चला रहा है। आप टीवी देख रहे हैं। टीवी की आवाज़ आती है, तस्वीर दिखती है। अब सवाल—कौन देख रहा है?

 टीवी नहीं देख रहा, घर नहीं देख रहा।

जो देख रहा है, वही असली “मैं” है।यही आत्मा है।

ब्रह्म (बड़ी चेतना)अब सोचिए, उस घर में कई लोग हैं—आप, आपका भाई, आपकी माँ। हर कोई देख रहा है, महसूस कर रहा है। लेकिन सबकी चेतना अलग नहीं, बल्कि एक बड़ी चेतना का हिस्सा है। जैसे हर बूंद पानी समुद्र से आई है।

 यही ब्रह्म है—सभी आत्माओं की बड़ी चेतना।

प्रकृति (सब बदलता रहता है)अब घर में चीज़ों को देखें—किताब, टीवी, कुर्सी। ये सब समय के साथ बदलते हैं—टीवी खराब हो जाता है, कुर्सी टूट जाती है। इसी तरह हमारा शरीर, दिमाग, भावनाएँ भी बदलती रहती हैं। यही प्रकृति है—जो सब चलता रहता है, पर स्थिर नहीं।

समस्या का उदाहरण:
अगर आप सोचते हैं, “मैं यह शरीर हूँ, यह मेरा टीवी है, मेरा घर है, मेरा सुख है”, तो जैसे ही टीवी टूटता है या शरीर बीमार होता है—आप दुखी हो जाते हैं। यही बंधन है।

गीता का सरल उपाय:
– समझो कि सच्चा मैं (आत्मा) देख रहा हूँ, शरीर या चीज़ें नहीं।
सबकी चेतना (आत्माएँ) उसी ब्रह्म से आई हैं, हम सब जुड़े हैं।
– चीज़ें और शरीर बदलते रहते हैं (प्रकृति)।

जब आप यह समझ जाते हैं, तो चीज़ें बदलें या कोई ग़लत हो, मन शांत रहता है, दुख कम होता है।सरल रूप में कहा जाए तो—

आत्मा = देखने वाली चेतना
ब्रह्म = उस चेतना का परम, असीम स्वरूप
प्रकृति = वह साधन जिसके माध्यम से सब कुछ होता दिखाई देता है

यही सत्त्वमीमांसा का सार है और यही गीता के दर्शन की आधारशिला है।

3. कारणता और दायित्व का समाधान

एक गम्भीर दार्शनिक आपत्ति यह उठती है कि यदि आत्मा अकर्ता है, तो नैतिक दायित्व कैसे टिकेगा? गीता का समाधान सूक्ष्म है।
व्यवहारिक स्तर (व्यवहारिक सत्ता) पर कर्तृत्व मान्य है—धर्म, कर्तव्य और उत्तरदायित्व वहीं चलते हैं। परमार्थिक स्तर (परमार्थिक सत्ता) पर आत्मा अकर्ता है। संन्यास योग इन दोनों स्तरों को भ्रमित नहीं करता, बल्कि समन्वित करता है।

कारणता (Causation) प्रकृति के गुणों का खेल है, जबकि दायित्व (Liability) हमारे 'जुड़ाव' (Attachment) का परिणाम है। कृष्ण समझाते हैं कि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है और यह समझ जाता है कि देखना, सुनना, छूना या काम करना केवल इंद्रियों का अपने विषयों में बरतना है, वह यह जान लेता है कि "मैं वास्तव में कुछ नहीं कर रहा हूँ" (नैव किंचित्करोमीति)। जब व्यक्ति स्वयं को 'कर्ता' (Doer) मानना बंद कर देता है, तो उस पर किसी भी कर्म का कानूनी या आध्यात्मिक दायित्व नहीं बनता।

​इसका सबसे सुंदर समाधान कृष्ण 'कमल के पत्ते' के उदाहरण से देते हैं। जिस प्रकार कमल का पत्ता पानी में रहते हुए भी उससे गीला नहीं होता, उसी प्रकार जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल को ईश्वर को समर्पित कर देता है, वह पाप या दायित्व से वैसे ही मुक्त रहता है। यहाँ मुख्य बात यह है कि कार्य (Cause) तो शरीर और मन द्वारा होता रहता है, लेकिन क्योंकि 'अहंकार' वहां मौजूद नहीं है, इसलिए उस व्यक्ति पर कोई लायबिलिटी नहीं आती। अंततः यह हमें सिखाता है कि दायित्व से मुक्ति का रास्ता कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि कर्म के साथ जुड़ा अपना 'अहंकार' छोड़ना है।

इस प्रकार संन्यास योग नैतिक शून्यता नहीं, बल्कि अहंकार-शून्यता है। कर्तव्य बना रहता है, पर कर्ता-अहं समाप्त हो जाता है।

4. बंधन-मुक्ति की तत्त्वमीमांसा

बंधनों का कारण कर्म नहीं, बल्कि कर्म का आत्मा पर आरोपण है। गीता यहाँ सांख्यीय विवेक और वेदान्तीय ज्ञान को एक सूत्र में बाँध देती है।
संन्यास योग में मुक्ति कोई कालान्तर में घटने वाली घटना नहीं, बल्कि ज्ञानोदय से प्रकट होने वाली स्थिति है। आत्मा न मुक्त होती है, न बँधती है—बंध और मुक्ति दोनों उपाधिगत हैं।

बंधन और मुक्ति – तात्त्विक परिचय

बंधन और मुक्ति जीवन के दो मूल अनुभव हैं। बंधन का अर्थ है – वह अवस्था जिसमें आत्मा संसार, इच्छाओं, कर्मों और मोह में उलझी रहती है। मुक्ति का अर्थ है – उस बंधन से स्वतंत्र होना, आत्मा का वास्तविक स्वरूप जानना और स्थायी आनंद की प्राप्ति। भगवद्गीता और वेदांत दर्शन इस विषय को सबसे गहराई से समझाते हैं।

बंधन की मुख्य प्रकृति यह है कि यह अज्ञान और कर्मों से उत्पन्न होता है। जब हम अपने जीवन को केवल इच्छाओं, भय और असत्यबद्धताओं से संचालित करते हैं, तब हमारा मन और बुद्धि दोनों बंधन में रहते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी व्यक्ति की खुशियाँ केवल पैसों या पदों पर निर्भर हैं, तो उसकी खुशी अस्थायी है और उसे हमेशा डर रहता है कि कहीं यह न छूट जाए। यही बंधन है।

मुक्ति का तात्त्विक अर्थ है – आत्म-ज्ञान और निष्काम कर्म के माध्यम से बंधनों से ऊपर उठना। भगवद्गीता (अध्याय 5, 5.12) में कहा गया है कि जो व्यक्ति संसार में रहते हुए कर्म करता है, लेकिन उसका मन और बुद्धि आसक्ति से मुक्त है, वही वास्तव में मुक्त कहलाता है। मुक्ति का उद्देश्य केवल बंधनों से बाहर निकलना नहीं, बल्कि सत्य और आनंद का अनुभव करना है।

बंधन और मुक्ति की प्रक्रिया

आत्म-बोध (Self-awareness): पहले यह समझना जरूरी है कि हमारा असली स्वरूप आत्मा है, न कि शरीर या मन। जब यह बोध होता है, तो व्यक्ति जानता है कि सांसारिक सुख और दुःख केवल अस्थायी हैं। 

“आत्म-बोध का अर्थ है — अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होना। सामान्यतः मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, जाति, पद, विचार या भावनाओं के रूप में मान लेता है, पर गीता और वेदांत कहते हैं कि यह सब आत्मा नहीं हैं। आत्म-बोध तब होता है जब मनुष्य यह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि “मैं शरीर नहीं हूँ, न मन हूँ, न बुद्धि हूँ, बल्कि इन सबका साक्षी चेतन तत्व हूँ।” यह जानना केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि गहरी अनुभूति है।

आत्म-बोध का मूल कारण अज्ञान का नाश है। जब तक आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर स्वयं को शरीर और कर्मों से जोड़ लेती है, तब तक वह सुख-दुःख, भय और आसक्ति के बंधन में रहती है। गीता कहती है कि यही अज्ञान बंधन का कारण है और आत्म-बोध ही मुक्ति का द्वार है। जैसे अंधकार केवल प्रकाश से ही दूर होता है, वैसे ही अज्ञान केवल ज्ञान से ही मिटता है।

गीता के अनुसार आत्म-बोध का अर्थ संसार का त्याग नहीं है। आत्म-बोध वह अवस्था है जिसमें मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे बँधा नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति कर्म करता है, पर कर्तापन का अहंकार नहीं रखता। वह जानता है कि शरीर कर्म करता है, मन विचार करता है, पर आत्मा केवल साक्षी है। इस बोध के कारण उसके कर्म बंधन नहीं बनते।

आत्म-बोध होने पर मनुष्य के दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन आ जाता है। सुख-दुःख उसे विचलित नहीं करते, प्रशंसा-निंदा उसे बाँध नहीं पाती और लाभ-हानि में उसकी शांति बनी रहती है। इसका कारण यह है कि उसने अपने को बदलने वाले तत्वों से अलग, अपरिवर्तनीय आत्मा के रूप में पहचान लिया होता है।

गीता की दृष्टि में आत्म-बोध ही साधना, ध्यान और ज्ञान का अंतिम फल है। जब आत्म-बोध होता है, तब मन शांत हो जाता है, इच्छाएँ क्षीण हो जाती हैं और जीवन में स्वाभाविक वैराग्य उत्पन्न होता है। यही अवस्था ब्रह्मनिर्वाण की ओर ले जाती है, जहाँ आत्मा अपने परम सत्य — ब्रह्म — के साथ एकत्व का अनुभव करती है।

संक्षेप में कहा जाए तो आत्म-बोध स्वयं को जानने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्वयं में स्थित हो जाने की अवस्था है। यही मनुष्य जीवन की परम उपलब्धि है।

कर्मयोग (योग के माध्यम से निष्काम कर्म): बंधन तब कम होता है जब हम कर्म करते हैं लेकिन उनके परिणामों से आसक्ति नहीं रखते। जैसे किसी शिक्षक का कर्तव्य है बच्चों को पढ़ाना, लेकिन वह बच्चों की सफलता या असफलता पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं रख सकता।

“कर्मयोग गीता का वह प्रधान मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य संसार में रहते हुए भी बंधन से मुक्त हो सकता है। गीता के अनुसार कर्म से बचा नहीं जा सकता, क्योंकि कर्म करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। परंतु कर्म तब बंधन बनता है जब उसमें फल की आसक्ति और कर्तापन का अहंकार जुड़ जाता है। जब वही कर्म योग के भाव से, अर्थात् निष्काम भाव से किया जाता है, तब वह कर्मयोग बन जाता है।

कर्मयोग का मूल सिद्धांत यह है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। फल की चिंता, अपेक्षा और अधिकार की भावना मन को अशांत करती है और कर्म को बंधन में बदल देती है। गीता सिखाती है कि कर्म करते समय फल को ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए और अपने कर्तव्य को ही अपना धर्म मानकर करना चाहिए। यही भाव कर्म को योग बनाता है।

कर्मयोग में संन्यास का अर्थ कर्म का त्याग नहीं, बल्कि आसक्ति का त्याग है। गीता स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति बाह्य रूप से कर्म करता है, परंतु भीतर से फल-आकांक्षा से मुक्त रहता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है। ऐसा व्यक्ति संसार में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता। उसका कर्म शुद्ध होता है और वह स्वयं कर्मों से बँधता नहीं।

कर्मयोग का सबसे बड़ा फल चित्त-शुद्धि है। जब मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करता है, तब उसका मन धीरे-धीरे शांत और निर्मल हो जाता है। अहंकार ढीला पड़ने लगता है और “मैं करता हूँ” की भावना कम होने लगती है। इसी शुद्ध चित्त में ध्यान स्थिर होता है और आत्म-बोध संभव होता है। इस प्रकार कर्मयोग ध्यान और ज्ञान की आधारभूमि बनता है।

गीता के अनुसार कर्मयोग केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिए है। विद्यार्थी का अध्ययन, गृहस्थ का कर्तव्य, कर्मचारी का कार्य और शासक का शासन — यदि कर्तव्य-बुद्धि और निष्काम भाव से किया जाए, तो वही कर्मयोग है। इस प्रकार कर्मयोग जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को योगमय बनाने की विद्या है।

अंततः गीता यह सिखाती है कि निष्काम कर्म के द्वारा ही मनुष्य ब्रह्मनिर्वाण की ओर अग्रसर होता है। जब कर्म आसक्ति रहित हो जाते हैं, तब वे आत्मा को बाँधते नहीं, बल्कि मुक्त करते हैं। यही कर्मयोग का परम उद्देश्य और गीता का व्यावहारिक दर्शन है।

साधना और ध्यान (Meditation): मन को शांति और स्थिरता देने के लिए ध्यान और साधना आवश्यक है। यह मन को इच्छाओं और भय से मुक्त कर मुक्ति की दिशा में ले जाता है।

“साधना और ध्यान भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आत्मोन्नति के दो मूल आधार हैं। साधना का अर्थ है अपने जीवन, आचरण और विचारों को धीरे-धीरे शुद्ध और संयमित करना, जबकि ध्यान का अर्थ है उस शुद्ध चित्त को आत्मा या परम सत्य में स्थिर करना। गीता के अनुसार साधना बिना ध्यान के अधूरी है और ध्यान बिना साधना के अस्थिर। दोनों मिलकर ही मनुष्य को आत्म-बोध और अंततः मुक्ति की ओर ले जाते हैं।

गीता के अनुसार साधना केवल बाह्य क्रियाओं तक सीमित नहीं है। यह जीवन की संपूर्ण दिशा को योगमय बनाने की प्रक्रिया है। जब मनुष्य अपने कर्तव्यों को निष्काम भाव से करता है, इंद्रियों को संयम में रखता है और अहंकार का क्षय करता है, तब उसकी साधना आरंभ होती है। साधना का मुख्य उद्देश्य चित्त की शुद्धि है, क्योंकि अशुद्ध और चंचल मन ध्यान के योग्य नहीं बन सकता।

ध्यान गीता में किसी क्षणिक अभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थिर अवस्था के रूप में प्रस्तुत है। ध्यान का अर्थ है मन को बार-बार विषयों से हटाकर आत्मा में स्थापित करना। जब मन इच्छाओं, भय और विक्षेपों से मुक्त होकर शांत हो जाता है, तब आत्मा का साक्षात्कार संभव होता है। गीता इस स्थिति की तुलना उस दीपक से करती है जो वायु रहित स्थान में बिना हिले स्थिर जलता है।

गीता ध्यान के लिए संतुलित जीवन को आवश्यक मानती है। न अति भोग और न अति तप—दोनों ही ध्यान में बाधक हैं। संयमित आहार, नियमित दिनचर्या, शुद्ध आचरण और संतुलित निद्रा से साधक का मन ध्यान के योग्य बनता है। गीता यह भी सिखाती है कि मन को बलपूर्वक दबाने के स्थान पर अभ्यास और वैराग्य से शांति से वश में करना चाहिए।

साधना और ध्यान का अंतिम फल आत्म-शांति और आत्म-बोध है। जब साधना से मन शुद्ध हो जाता है और ध्यान से आत्मा में स्थिर हो जाता है, तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे बँधा नहीं रहता। सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान उसे विचलित नहीं करते। यही अवस्था ब्रह्मनिर्वाण की ओर ले जाती है, जिसे गीता जीवन की परम सिद्धि मानती है।

संक्षेप में कहा जाए तो साधना जीवन को शुद्ध करने की प्रक्रिया है और ध्यान आत्मा में स्थित होने की अवस्था। दोनों का समन्वय ही गीता का वास्तविक योगमार्ग है और यही मनुष्य को स्थायी शांति और मुक्ति की ओर ले जाता है।

भक्ति और समर्पण: 

भक्ति का अर्थ केवल भावनात्मक प्रेम या पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि अपने संपूर्ण अस्तित्व को ईश्वर या परम सत्य से जोड़ देना है। गीता के अनुसार भक्ति वह स्थिति है जिसमें मन, बुद्धि और कर्म — तीनों ईश्वर में समर्पित हो जाते हैं। जब मनुष्य अपने सीमित अहंकार से ऊपर उठकर परम सत्ता को जीवन का केंद्र बना लेता है, तभी सच्ची भक्ति का जन्म होता है। भक्ति में डर नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम होता है।

समर्पण भक्ति का प्राणतत्त्व है। समर्पण का अर्थ है अपने कर्तापन और फल-आकांक्षा का त्याग कर देना। गीता सिखाती है कि मनुष्य कर्म करता रहे, परंतु यह माने कि वह परम सत्ता का माध्यम मात्र है। जब “मैं करता हूँ” की भावना क्षीण होती है और “तेरी इच्छा” का भाव प्रबल होता है, तभी समर्पण सच्चा बनता है। यही समर्पण मन को हल्का और शांत करता है।

गीता के अनुसार भक्ति और ज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। भक्ति से अहंकार गलता है और ज्ञान से अज्ञान मिटता है। जब मनुष्य ईश्वर में श्रद्धा रखता है और उसके साथ आत्मीय संबंध अनुभव करता है, तब उसका मन स्वाभाविक रूप से शुद्ध और एकाग्र हो जाता है। ऐसी अवस्था में ध्यान सहज हो जाता है और आत्म-बोध का मार्ग प्रशस्त होता है।

भक्ति का सबसे बड़ा फल निर्भयता और शांति है। जो व्यक्ति ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखता है, वह भविष्य की चिंता और परिणामों के भय से मुक्त हो जाता है। सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीवन की अनिश्चितताएँ उसे विचलित नहीं करतीं, क्योंकि उसने अपने जीवन का भार परम सत्ता को सौंप दिया होता है। यही आंतरिक स्वतंत्रता भक्ति की वास्तविक उपलब्धि है।

गीता में भक्ति को अत्यंत सरल और सार्वभौमिक मार्ग बताया गया है। न इसमें कठोर तप की अनिवार्यता है और न जटिल दर्शन का बोझ। प्रेम, विश्वास और समर्पण — यही भक्ति का सार है। जब मनुष्य भक्ति के साथ कर्म करता है और समर्पण के भाव से जीवन जीता है, तब वह संसार में रहते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है और धीरे-धीरे ब्रह्मनिर्वाण की ओर अग्रसर होता है।

संक्षेप में कहा जाए तो भक्ति प्रेम है और समर्पण उस प्रेम की पूर्णता। दोनों मिलकर मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर परम शांति और मुक्ति की अवस्था तक पहुँचा देते हैं।

तात्त्विक सार

बंधन = कर्म, मोह, इच्छाएँ, अज्ञान

मुक्ति = आत्म-ज्ञान, निष्काम कर्म, भक्ति, ध्यान

साधन = ज्ञान, योग, भक्ति, ध्यान

उद्देश्य = स्थायी सुख और शांति

संक्षेप में, बंधन- मुक्ति की तत्त्वमीमांसा यही बताती है कि संसार में रहते हुए भी हम बंधनों को पहचानकर उनसे ऊपर उठ सकते हैं। मुक्ति का मार्ग केवल पलायन या संन्यास में नहीं, बल्कि जीवन में कर्म करते हुए भी मन और बुद्धि को बंधनों से मुक्त रखने में है।

ब्रम्हनिर्वाण : संन्यास का परमार्थ

ब्रह्मनिर्वाण का अर्थ है आत्मा का अपने परम सत्य, अर्थात् ब्रह्म, में पूर्ण रूप से स्थित हो जाना। यह वह अवस्था है जिसमें आत्मा अज्ञान, अहंकार और कर्मबंधनों से पूर्णतः मुक्त हो जाती है। गीता के अनुसार ब्रह्मनिर्वाण कोई मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाली स्थिति नहीं है, बल्कि जीवित रहते हुए प्राप्त होने वाली परम शांति और स्थिरता की अवस्था है। यही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है।

संन्यास का वास्तविक अर्थ बाह्य रूप से कर्मों या संसार का त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक आसक्ति और कर्तापन के भाव का त्याग है। गीता स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति कर्म करते हुए भी फल-आकांक्षा और अहंकार से मुक्त रहता है, वही सच्चा संन्यासी है। ऐसा संन्यास जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को आत्मज्ञान से आलोकित करने की प्रक्रिया है।

गीता के अनुसार संन्यास का परमार्थ ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति है। जब मनुष्य अपने कर्मों को निष्काम भाव से करता है, मन को साधना और ध्यान द्वारा शुद्ध करता है और भक्ति तथा समर्पण के भाव से अहंकार का विसर्जन करता है, तब उसका चित्त पूर्णतः शांत हो जाता है। इसी शांत चित्त में ब्रह्म का साक्षात्कार संभव होता है। इस प्रकार संन्यास साधन है और ब्रह्मनिर्वाण उसका फल है।

ब्रह्मनिर्वाण की अवस्था में मनुष्य सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान से ऊपर उठ जाता है। संसार उसके लिए न आकर्षण का कारण रहता है, न भय का। वह संसार में रहते हुए भी उससे बँधा नहीं रहता। उसके कर्म स्वतः शुद्ध होते हैं और वे उसे बंधन में नहीं बाँधते। यही संन्यास की सिद्ध अवस्था है।

गीता यह सिखाती है कि ब्रह्मनिर्वाण केवल कठोर तप या वनवास से नहीं मिलता, बल्कि संतुलित जीवन, निष्काम कर्म, ध्यान और भक्ति के समन्वय से प्राप्त होता है। जब मनुष्य अपने सीमित अहंकार को त्यागकर ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तब वही अवस्था संन्यास का परमार्थ कहलाती है।

संक्षेप में कहा जाए तो संन्यास का अंतिम उद्देश्य ब्रह्मनिर्वाण है—आत्मा की वह अवस्था जिसमें वह ब्रह्म के साथ एकत्व का अनुभव करती है और शाश्वत शांति में स्थित हो जाती है।

 संन्यास योग का अंतिम सिद्धांत सूत्र (आचार्य परम्परा)

  1. आत्मा अकर्ता है (उपनिषद् साक्ष्य)
  2. कर्तापन अज्ञानजन्य है (शंकराचार्य)
  3. कर्म प्रकृति में घटित होते हैं (सांख्य)
  4. ज्ञान से अहंकार लय होता है (वेदांत)
  5. अहंकार-लय से समदृष्टि (गीता 5.18)
  6. समदृष्टि से शांति (गीता 5.24)
  7. शांति से ब्रह्मनिष्ठा (जीवन्मुक्ति)

आचार्य परम्परा—विशेषतः उपनिषद्, गीता-भाष्य (शंकर, रामानुज, मध्व की समन्वित दृष्टि) और तत्त्वमीमांसा—संन्यास योग के जिस अंतिम सिद्धांत-सूत्र पर आकर ठहरती है, उसे संक्षेप में इस प्रकार सूत्रबद्ध किया जा सकता है—

“कर्तृत्व-भोक्तृत्वाभिमानस्य निवृत्तिः एव संन्यासः,

कर्म तु प्रकृतौ प्रवर्तते, आत्मा ब्रह्मैव।”

अर्थात्—
कर्तापन और भोक्तापन के अहंकार की निवृत्ति ही संन्यास है; कर्म प्रकृति में होता है, आत्मा तो ब्रह्मस्वरूप ही है।

इस सूत्र का सीधा और सरल अर्थ है कि “मैं ही करता हूँ” और “मैं ही भोगता हूँ” — इस भाव का पूर्ण निवृत्त होना ही वास्तविक संन्यास है। कर्म वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं और आत्मा अपने सत्य स्वरूप में ब्रह्म ही है। अर्थात् संन्यास का अर्थ कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्तृत्व और भोक्तृत्व के अहंकार का त्याग है।

दार्शनिक दृष्टि से मनुष्य तब बँधता है जब वह स्वयं को शरीर, मन और इंद्रियों से एक मान लेता है। शरीर कर्म करता है, इंद्रियाँ विषयों का अनुभव करती हैं और मन सुख-दुःख का भोग करता है, परंतु अज्ञानवश आत्मा स्वयं को इन सबका कर्ता और भोक्ता मान लेती है। यही भ्रांति “कर्तृत्व-भोक्तृत्वाभिमान” कहलाती है और यही बंधन का मूल कारण है।

गीता स्पष्ट रूप से कहती है कि समस्त कर्म प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — द्वारा संपन्न होते हैं। आत्मा न कर्म करती है, न कर्मों का फल भोगती है; वह केवल साक्षी है। जब यह सत्य अनुभव में उतर जाता है कि कर्म प्रकृति में हो रहे हैं और आत्मा उनसे अछूती है, तब कर्तापन का अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।

इस बोध के उत्पन्न होते ही संन्यास घटित होता है। यह संन्यास न तो वस्त्र बदलने से आता है और न संसार छोड़ने से, बल्कि आत्मा के ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाने से आता है। जब आत्मा स्वयं को ब्रह्म के रूप में जान लेती है, तब कर्म होते हुए भी कोई बंधन नहीं बनता। कर्म जल में कमलपत्र की भाँति होते हैं — संपर्क में रहते हुए भी लिप्त नहीं करते।

गीता-दृष्टि से यही ब्रह्मनिर्वाण की अवस्था है। इसमें मनुष्य कर्म करता हुआ भी मुक्त रहता है, क्योंकि “मैं करता हूँ” और “मैं भोगता हूँ” — ये दोनों भ्रांत धारणाएँ नष्ट हो चुकी होती हैं। यही कारण है कि गीता सच्चे संन्यास को ज्ञानजन्य संन्यास मानती है, न कि कर्मत्याग को।

अतः इस सूत्र का निष्कर्ष यह है कि संन्यास कोई बाह्य अवस्था नहीं, बल्कि आंतरिक बोध है — जहाँ कर्तृत्व और भोक्तृत्व का अभिमान लुप्त हो जाता है और आत्मा अपने ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। यही संन्यास का परम तत्त्व और मोक्ष का द्वार है।

1. सूत्र का दार्शनिक आशय

यह सूत्र घोषित करता है कि संन्यास का अंतिम लक्ष्य कर्म का लोप नहीं, बल्कि अहंकार का लय है। आचार्य शंकर के अनुसार बंधन का मूल “मैं करता हूँ” की भ्रान्ति है। जब यह भ्रान्ति ज्ञान द्वारा नष्ट हो जाती है, तब कर्म रहते हुए भी संन्यास सिद्ध हो जाता है।

रामानुजाचार्य इस सूत्र को ईश्वरार्पित कर्तव्य के रूप में व्याख्यायित करते हैं—कर्तृत्व का त्याग नहीं, स्वामित्व का त्याग। मध्व परम्परा में यही सूत्र आत्मा की परतंत्रता और ईश्वर की स्वतंत्र कर्तृत्व सत्ता में प्रतिष्ठा पाता है।

2. परमार्थिक और व्यवहारिक समन्वय

यह अंतिम सूत्र स्पष्ट करता है कि—

व्यवहारिक स्तर पर कर्म अनिवार्य है (धर्म, लोकसंग्रह, कर्तव्य)।

परमार्थिक स्तर पर आत्मा अकर्ता, असंग और ब्रह्मस्वरूप है।

संन्यास योग इन दोनों को विरोधी नहीं, पूरक बनाता है। यही आचार्य परम्परा की गहनता है—जहाँ दर्शन जीवन से कटता नहीं, बल्कि उसे प्रकाशित करता है।

मुक्ति का स्वरूप

इस सूत्र के अनुसार मुक्ति कोई भविष्यगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अज्ञान-निवृत्ति से प्रकट आत्मस्थिती है।
न आत्मा कर्म से बँधती है, न कर्म से मुक्त होती है—बंध और मुक्ति दोनों अभिमानजन्य हैं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि आत्मा को प्राप्त नहीं करना पड़ता, बल्कि आत्मा सदा से विद्यमान है। केवल अज्ञान के कारण वह ढकी हुई प्रतीत होती है। जब अज्ञान नष्ट होता है, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में स्वयं प्रकट हो जाती है। जैसे बादल हटने पर सूर्य नया उत्पन्न नहीं होता, बल्कि पहले से ही विद्यमान सूर्य दिखाई देने लगता है।

दार्शनिक दृष्टि से अज्ञान का अर्थ है आत्मा का स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों के साथ एक मान लेना। इसी अज्ञान से “मैं करता हूँ”, “मैं भोगता हूँ”, “मैं सुखी हूँ” या “मैं दुःखी हूँ” जैसे भाव उत्पन्न होते हैं। वास्तव में ये सभी अवस्थाएँ प्रकृति और मन की हैं, आत्मा की नहीं। जब यह भ्रान्ति दूर होती है, तब आत्मा अपने साक्षीस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है — यही आत्मस्थिति है।

गीता के अनुसार आत्मस्थिति किसी नये अनुभव का सृजन नहीं, बल्कि सत्य की पहचान है। आत्मा न उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है, न कर्म करती है और न कर्मों से बँधती है। अज्ञान के कारण आत्मा स्वयं को सीमित और कर्ता-भोक्ता मानती है। जैसे ही यह अज्ञान निवृत्त होता है, आत्मा अपने ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाती है। यही कारण है कि गीता मुक्ति को “प्राप्ति” नहीं, बल्कि “बोध” कहती है।

जब अज्ञान-निवृत्ति होती है, तब जीवन की दृष्टि ही बदल जाती है। सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान आत्मा को स्पर्श नहीं करते। कर्म होते रहते हैं, पर भीतर कर्तापन का भाव नहीं रहता। यह अवस्था प्रयास से नहीं, बल्कि सत्य-बोध से आती है। इसी को आत्मस्थिति, स्थितप्रज्ञता और ब्रह्मनिर्वाण कहा गया है।

अतः निष्कर्ष यह है कि आत्मस्थिति कोई साध्य नहीं, बल्कि स्वाभाविक सत्य है; अज्ञान के हटते ही वह स्वयं प्रकाशित हो जाती है। यही वेदान्त का मूल सिद्धान्त और गीता का गहन उपदेश है।

 अंतिम निष्कर्ष (महावाक्यात्मक रूप)

आचार्य परम्परा संन्यास योग को अंततः इस महावाक्य में समेट देती है—

“न त्यागः कर्मणां मोक्षः, त्यागोऽहंकार एव हि।”

अर्थात्—इसका सरल अर्थ है कि कर्मों का त्याग मोक्ष का साधन नहीं है, बल्कि अहंकार का त्याग ही वास्तविक मोक्ष है। अर्थात् केवल कर्म छोड़ देने से मुक्ति नहीं मिलती; जब तक “मैं करता हूँ” की भावना बनी रहती है, तब तक बंधन बना रहता है।

दार्शनिक दृष्टि से कर्म स्वयं बंधन नहीं होते। बंधन तब उत्पन्न होता है जब आत्मा स्वयं को कर्मों का कर्ता मान लेती है। शरीर, मन और इंद्रियाँ प्रकृति के अंतर्गत कर्म करती हैं, पर अज्ञानवश आत्मा उस कर्म को अपना मान लेती है। यही कर्तृत्वाभिमान अहंकार है और यही बंधन का मूल कारण है। इसलिए कर्मों का बाह्य त्याग भी यदि अहंकार सहित हो, तो वह मुक्ति नहीं दे सकता।

गीता स्पष्ट करती है कि संसार में रहते हुए कर्म करना अनिवार्य है। कोई भी क्षणभर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। अतः कर्म त्याग की अपेक्षा कर्तापन के भाव का त्याग आवश्यक है। जब मनुष्य कर्म करता है, पर यह जानता है कि कर्म प्रकृति में हो रहे हैं और आत्मा साक्षी मात्र है, तब वही कर्म बंधन नहीं बनते। यही कर्मयोग और संन्यास का वास्तविक स्वरूप है।

व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि मोक्ष जीवन से पलायन में नहीं, बल्कि जीवन के भीतर अहंकार के विसर्जन में है। जब “मेरे कर्म”, “मेरी उपलब्धि” और “मेरा फल” — इन भावों का त्याग हो जाता है, तब मन हल्का, शांत और मुक्त हो जाता है। यही अवस्था आत्मस्थिति और ब्रह्मनिर्वाण की ओर ले जाती है।

अतः निष्कर्ष यह है कि मोक्ष कर्म छोड़ने से नहीं, बल्कि अहंकार छोड़ने से प्राप्त होता है। यही गीता का केन्द्रीय उपदेश और संन्यास का परम तत्त्व है।

अंतिम सूत्र का सार: 'पूर्णोऽहम्'

संन्यास योग का अंतिम 'महावाक्य' अनुभव है— "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ)। आचार्य परंपरा मानती है कि जब "मैं" (अहंकार) पूरी तरह विलीन हो जाता है, तब जो शेष बचता है, वही संन्यास है।​

“पूर्णोऽहम्” यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वेदान्त का परम अनुभूति-वाक्य है। “पूर्णोऽहम्” का शाब्दिक अर्थ है — “मैं पूर्ण हूँ”। इसका आशय यह नहीं है कि शरीर, मन या व्यक्तित्व पूर्ण है, बल्कि इसका तात्त्विक अर्थ यह है कि मैं आत्मा के रूप में पूर्ण हूँ, अखण्ड हूँ, अपरिवर्तनीय हूँ और ब्रह्मस्वरूप हूँ। इसमें किसी प्रकार की कमी, अभाव या अपूर्णता नहीं है। जो जन्मता है, बदलता है और नष्ट होता है, वह कभी पूर्ण नहीं हो सकता; पूर्ण वही है जो नित्य, अविनाशी और सर्वव्यापक हो।

दार्शनिक दृष्टि से मनुष्य अपने जीवन में जो दुःख, असंतोष और भय अनुभव करता है, उसका मूल कारण यह है कि वह स्वयं को अपूर्ण मानता है। “मुझे यह चाहिए”, “मुझमें यह कमी है”, “मैं कुछ बन जाऊँ तब पूर्ण होऊँगा” — यही अज्ञान है। “पूर्णोऽहम्” का बोध इस अज्ञान का नाश करता है। जब यह सत्य स्पष्ट होता है कि आत्मा को न कुछ प्राप्त करना है और न कुछ बनना है, तब भीतर से खोज और चिंता समाप्त हो जाती है।

वेदान्त के अनुसार पूर्णता कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि स्वरूप-सिद्ध सत्य है। आत्मा न किसी से जुड़कर पूर्ण होती है, न किसी वस्तु के अभाव से अपूर्ण होती है। जैसे आकाश में कुछ रखने या हटाने से आकाश न बड़ा होता है, न छोटा, वैसे ही आत्मा कर्म, सुख-दुःख और अनुभवों से अछूती रहती है। अज्ञान के कारण आत्मा स्वयं को सीमित मानती है; ज्ञान होने पर वही आत्मा स्वयं को पूर्ण रूप में पहचान लेती है।

“पूर्णोऽहम्” का बोध आते ही कर्तृत्व और भोक्तृत्व का अहंकार शिथिल पड़ जाता है। जब आत्मा स्वयं को पूर्ण जान लेती है, तब कर्म किसी अभाव की पूर्ति के लिए नहीं होते, बल्कि सहज रूप से होते हैं। ऐसे व्यक्ति का जीवन शांति, स्थिरता और निर्भयता से भर जाता है। यही आत्मस्थिति, स्थितप्रज्ञता और ब्रह्मनिर्वाण की अवस्था है।

अतः निष्कर्ष यह है कि “पूर्णोऽहम्” कोई विचार नहीं, बल्कि आत्मा का स्वाभाविक घोष है। अज्ञान हटते ही यह सत्य स्वयं प्रकट हो जाता है —
मैं न कुछ चाहता हूँ, न कुछ खोता हूँ, क्योंकि मैं पूर्ण हूँ

महत्वपूर्ण सूत्र: "संन्यासः कर्मणां न्यासो न, अपितु संकल्पत्यागः।"

संन्यास केवल कर्मों का त्याग नहीं है, बल्कि मन के भीतर उठने वाले संकल्पों और इच्छाओं का त्याग है।

इसका सरल अर्थ है कि संन्यास कर्मों को छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि कर्मों के पीछे रहने वाले संकल्प और इच्छा-आसक्ति का त्याग ही संन्यास है। अर्थात् बाह्य कर्म चलते रह सकते हैं, पर आंतरिक कामना और फल-आकांक्षा का विसर्जन आवश्यक है।

दार्शनिक दृष्टि से कर्म अपने आप में न तो बंधन है और न मुक्ति का साधन। कर्म तब बंधन बनता है जब उसके मूल में “मैं चाहता हूँ”, “मुझे यह फल चाहिए” और “मेरे लिए यह कर्म है” — यह संकल्प विद्यमान रहता है। यही संकल्प आत्मा को कर्ता और भोक्ता के रूप में बाँध देता है। जब यह संकल्प नष्ट होता है, तब कर्म होते हुए भी आत्मा अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व में स्थित रहती है।

गीता का यह स्पष्ट मत है कि कर्मों का पूर्ण त्याग न तो संभव है और न आवश्यक। शरीर, मन और बुद्धि प्रकृति के गुणों के अनुसार कर्म करते रहते हैं। संन्यास का वास्तविक अर्थ यह जान लेना है कि आत्मा इन कर्मों की कर्ता नहीं है। जब संकल्प का त्याग हो जाता है, तब कर्म स्वतः शुद्ध हो जाते हैं और वे बंधन नहीं उत्पन्न करते।

व्यावहारिक जीवन में इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करे, पर भीतर से फल-आकांक्षा, अधिकार-बुद्धि और अहंकार को छोड़ दे। ऐसा करने पर कर्म तनाव का कारण नहीं रहते, बल्कि साधना बन जाते हैं। जीवन हल्का, शांत और सहज हो जाता है।

अतः निष्कर्ष यह है कि संन्यास कर्मों के त्याग से नहीं, बल्कि संकल्प के त्याग से सिद्ध होता है। यही सच्चा आंतरिक संन्यास है और यही आत्मबोध तथा ब्रह्मनिर्वाण की भूमिका बनाता है।

यही संन्यास योग का अंतिम सिद्धांत-सूत्र है—जहाँ योग, ज्ञान और संन्यास एक ही सत्य में विलीन हो जाते हैं।

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अध्याय 6-आत्मसंयमयोग

आधुनिक जीवन में मन की विजय

​श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में वर्णित आत्मसंयमयोग केवल एक प्राचीन आध्यात्मिक दर्शन नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत अनुशासन का एक उत्कृष्ट 'ब्लूप्रिंट' है। आज के डिजिटल युग में, जहाँ हमारा ध्यान (Attention) निरंतर बाहरी उत्तेजनाओं और सूचनाओं के प्रवाह से खंडित हो रहा है, आत्मसंयम का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस योग का मूल सिद्धांत मन को मित्र बनाना है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने अपने मन को जीत लिया है, उसका मन उसका सबसे अच्छा मित्र है, लेकिन जो ऐसा करने में विफल रहता है, उसका मन ही उसका सबसे बड़ा शत्रु बना रहता है। आधुनिक संदर्भ में, यह 'शत्रु मन' चिंता (Anxiety), एकाग्रता की कमी और भावनात्मक अस्थिरता के रूप में प्रकट होता है।

​अनुशासन और ध्यान का सामंजस्य

​आत्मसंयमयोग की सिद्धि के लिए अनुशासन प्राथमिक शर्त है। यह अनुशासन केवल शारीरिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आहार, विहार (मनोरंजन), चेष्टा (प्रयास) और निद्रा का संतुलन भी सम्मिलित है।

​आधुनिक उदाहरण: आज की जीवनशैली में 'बर्नआउट' और मानसिक थकान का मुख्य कारण अतिशयता है। आत्मसंयम सिखाता है कि जो बहुत अधिक खाता है या बिल्कुल नहीं खाता, जो बहुत सोता है या रात भर जागता है, वह ध्यान में सफल नहीं हो सकता। इसे आज के 'डिजिटल डिटॉक्स' और 'वर्क-लाइफ बैलेंस' के रूप में देखा जा सकता है। जब हम अपने स्क्रीन-टाइम और विश्राम के घंटों को अनुशासित करते हैं, तभी हम अपने भीतर झाँकने की ऊर्जा जुटा पाते हैं।

​ध्यान: मन को स्थिर करने की प्रक्रिया

​ध्यान (Meditation) इस योग की वह तकनीक है जिसके माध्यम से बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है। गीता में इसे एक वायु रहित स्थान पर रखे दीपक की लौ के समान बताया गया है, जो कभी डगमगाती नहीं है।

​"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।"

​जब साधक इस प्रकार की स्थिरता प्राप्त कर लेता है, तब वह बाहरी सफलताओं या विफलताओं से विचलित नहीं होता। आधुनिक जीवन में इसका अनुप्रयोग 'माइंडफुलनेस' (Mindfulness) के रूप में किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, एक कॉर्पोरेट प्रोफेशनल के लिए ध्यान का अर्थ केवल आँखें बंद करके बैठना नहीं, बल्कि दबाव की स्थितियों में भी अपने विवेक को स्थिर रखना और तात्कालिक प्रतिक्रिया (Reaction) के बजाय सोच-समझकर प्रत्युत्तर (Response) देना है।

 अशांत युग में शांति की खोज

आज का मनुष्य एक ऐसे युग में जी रहा है जहाँ 'कनेक्टिविटी' तो बढ़ गई है, लेकिन 'सेल्फ-कनेक्शन' (स्वयं से जुड़ाव) लुप्त होता जा रहा है। हम बाहरी दुनिया को नियंत्रित करने के लिए परमाणु ऊर्जा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग कर रहे हैं, किंतु अपने ही भीतर उठने वाले विचारों के ज्वार को नियंत्रित करने में असमर्थ हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का छठा अध्याय, जिसे 'आत्मसंयमयोग' कहा गया है, इसी आंतरिक अव्यवस्था को व्यवस्थित करने का शास्त्र है। यह हमें सिखाता है कि युद्ध केवल कुरुक्षेत्र के मैदान में नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क की कोशिकाओं में हर क्षण चल रहा है।

2. मन: मित्र या शत्रु? (एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण)

भगवान कृष्ण एक क्रांतिकारी बात कहते हैं:

  "आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः" 

अर्थात् मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

मन अपने-आप में न अच्छा है, न बुरा। वह तो एक औज़ार है—जैसे चाकू। सही हाथ में हो तो सब्ज़ी काटता है, गलत हाथ में हो तो चोट पहुँचा देता है। मन भी वैसा ही है। जब हम उसे समझते नहीं, तब वही मन डर, चिंता, क्रोध और तुलना पैदा करके हमारा शत्रु बन जाता है। और जब हम उसे पहचान लेते हैं, तब वही मन हमें साहस, स्पष्टता और शांति देता है—तब वह हमारा मित्र बन जाता है।

मन शत्रु कब बनता है?

मनोविज्ञान कहता है कि मन लगातार सोचता रहता है—भूत की यादें, भविष्य की आशंकाएँ। जब हम बिना सोचे-समझे हर विचार को सच मान लेते हैं, तब समस्या शुरू होती है। जैसे—“मैं असफल हूँ”, “लोग क्या कहेंगे”, “मैं कभी सफल नहीं हो पाऊँगा।” ये विचार बार-बार दोहराए जाएँ तो मन हमें डराने लगता है। परीक्षा से पहले घबराहट, नौकरी में असुरक्षा, रिश्तों में शक—ये सब मन के शत्रु रूप के उदाहरण हैं। असल में घटना नहीं, घटना के बारे में हमारी सोच हमें परेशान करती है।

उदाहरण : परीक्षा का डर

एक छात्र परीक्षा से पहले सोचता है—

“अगर मैं फेल हो गया तो सब खत्म हो जाएगा।”

असल में अभी परीक्षा हुई भी नहीं, लेकिन मन भविष्य की कहानी बनाकर डर पैदा कर देता है। दिल तेज़ धड़कता है, याद किया हुआ भी भूलने लगता है। यहाँ मन शत्रु बन गया, क्योंकि उसने डर फैलाया, समाधान नहीं दिया।

उदाहरण : तुलना की बीमारी

एक व्यक्ति सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता देखता है और सोचता है—

“सब आगे निकल गए, मैं ही पीछे रह गया।”

यहाँ मन तुलना करके आत्मविश्वास तोड़ देता है। मनोविज्ञान कहता है कि लगातार तुलना करने से self-worth कम होती है। यह भी मन का शत्रु रूप है।

उदाहरण : बीती गलती का बोझ

कोई व्यक्ति बार-बार सोचता है—

“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, मैं कभी ठीक नहीं हो सकता।”

घटना बीत चुकी है, लेकिन मन उसे बार-बार दोहराकर व्यक्ति को मानसिक सज़ा देता रहता है। यहाँ मन सुधार की जगह पीड़ा बढ़ा रहा है—इसलिए शत्रु है।

मन मित्र कब बनता है?

जब हम यह समझ लेते हैं कि “मैं मन नहीं हूँ, मेरे पास मन है”, तब बदलाव शुरू होता है। मनोविज्ञान में इसे Observer Mind कहते हैं—यानी अपने विचारों को बाहर से देख पाना। जैसे बादल आते-जाते रहते हैं, वैसे ही विचार भी आते-जाते हैं। जब हम हर नकारात्मक विचार से चिपकते नहीं, बल्कि उसे देखते हैं, तब मन हल्का होने लगता है। वही मन हमें योजना बनाना, सीखना, रचनात्मक होना और सही निर्णय लेना सिखाता है—तब वह हमारा सच्चा मित्र बन जाता है।

आम जीवन का उदाहरण

मान लीजिए किसी व्यक्ति की नौकरी चली गई। मन कहता है—“सब खत्म हो गया।” यही मन शत्रु है। लेकिन वही व्यक्ति यदि रुककर सोचे—“यह एक स्थिति है, मेरी पहचान नहीं”—तो मन नए विकल्प खोजने लगता है। वही मन अब मित्र बन गया। फर्क घटना में नहीं, सोचने के ढंग में है।

उदाहरण : वही परीक्षा, अलग दृष्टि

अब वही छात्र सोचता है—

“मैंने जितनी तैयारी की है, उतना अपना पूरा प्रयास करूँगा। बाकी परिणाम बाद में देखा जाएगा।”

डर कम होता है, ध्यान बढ़ता है। यहाँ मन सहयोगी बन गया—यानी मित्र।

उदाहरण : असफलता के बाद उठ खड़ा होना

एक व्यक्ति बिज़नेस में असफल होता है।

मन कह सकता था—“तुम बेकार हो।”

लेकिन यदि वह सोचे—“यह अनुभव है, सबक है, अंत नहीं।” तो वही मन नई योजना बनाता है। अब मन मित्र है, क्योंकि वह रास्ता दिखा रहा है।

उदाहरण : रिश्तों में समझदारी

किसी ने आपसे कठोर शब्द कह दिए।

मन तुरंत कहता है—“उसने मेरा अपमान किया, बदला लो।”

लेकिन यदि आप रुककर सोचें—“शायद वह खुद तनाव में था।” तो क्रोध शांत हो जाता है। यह मन का मित्र रूप है, जो शांति देता है।

मान लीजिए मन कहता है—“मैं कुछ नहीं कर सकता।”

खुद से पूछिए—“क्या यह 100% सच है?” अक्सर जवाब होगा—नहीं। यहीं से मन पर आपकी पकड़ शुरू होती है।

मन से दोस्ती-जैसे किसी बच्चे को डाँटने से वह और ज़िद्दी हो जाता है, वैसे ही मन भी है।यदि आप खुद से कहें—“ठीक है, डर लग रहा है, लेकिन मैं संभाल लूँगा,” तो मन शांत होने लगता है। 

वर्तमान में लौटना- जब मन बहुत भागे, तब बस इतना करें—“अभी मैं साँस ले रहा हूँ।” यह छोटा-सा ध्यान मन को वर्तमान में लाकर मित्र बना देता है।

आधुनिक संदर्भ:

मनोविज्ञान कहता है कि हमारा अवचेतन मन (Subconscious mind) एक शक्तिशाली सॉफ्टवेयर की तरह है। यदि इसमें 'आत्म-विनाशकारी' विचार (Self-sabotaging thoughts) भरे हों, तो व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी अवसाद में जा सकता है।

मन हमारा सबसे बड़ा शत्रु भी बन सकता है और सबसे अच्छा मित्र भी। फर्क सिर्फ इतना है—क्या हम मन के गुलाम हैं, या मन हमारे मार्गदर्शक? जब मन पर समझ और सजगता का प्रकाश पड़ता है, तब वही मन जो हमें बाँधता था, वही हमें मुक्त करना शुरू कर देता है। यही सच्चा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है।

3. योगारूढ़ होने की सीढ़ियाँ– एक सरल और जीवनोपयोगी व्याख्या

योग की अवस्था तक पहुँचने के लिए 'शम' (शांति) और 'कर्म' का संतुलन आवश्यक है। प्रारंभ में, व्यक्ति को कर्म का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन जैसे-जैसे वह परिपक्व होता है, शांति ही उसका साधन बन जाती है।

योगारूढ़ होने का अर्थ है—योग में स्थिर हो जाना, अर्थात् ऐसा मनुष्य बन जाना जो कर्म करता है, पर कर्म से बँधता नहीं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि योग की यह अवस्था अचानक प्राप्त नहीं होती, बल्कि मनुष्य को धीरे-धीरे कई सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। प्रारम्भ में व्यक्ति को अपने कर्तव्यों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें स्वीकार करना चाहिए। जब मनुष्य अपने जीवन की ज़िम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाने लगता है—चाहे वह पढ़ाई हो, नौकरी हो या पारिवारिक दायित्व—तभी वह योग के मार्ग पर पहला कदम रखता है। यही कर्म में प्रवेश योग की आधारशिला है।

कर्म में लगे रहने के बाद अगली सीढ़ी है—फल की अत्यधिक चिंता से मुक्त होना। सामान्य जीवन में हम काम कम और परिणाम की चिंता अधिक करते हैं, जिससे मन सदा बेचैन रहता है। योग का अभ्यास सिखाता है कि कर्म हमारा अधिकार है, पर परिणाम पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं। जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि उसका काम ईमानदारी से प्रयास करना है, न कि परिणाम को पकड़कर बैठ जाना, तब मन पर बोझ हल्का होने लगता है। यही अवस्था धीरे-धीरे मानसिक स्वतंत्रता की ओर ले जाती है।

इसके बाद इन्द्रिय-संयम की आवश्यकता आती है। इन्द्रियाँ स्वभाव से बाहर की ओर भागती हैं—आँख दृश्य चाहती है, कान ध्वनि, मन निरन्तर उत्तेजना। आज के समय में मोबाइल, सोशल मीडिया और अनियंत्रित दिनचर्या इस चंचलता को और बढ़ा देती है। योगारूढ़ होने की दिशा में बढ़ता व्यक्ति इन्द्रियों को दबाता नहीं, बल्कि समझदारी से सीमित करता है। वह जान लेता है कि आवश्यकता और आदत में फर्क है। यह संयम मन को स्थिर करने में सहायक बनाता है।

जब इन्द्रियाँ कुछ हद तक नियंत्रित हो जाती हैं, तब साधक का सबसे बड़ा कार्य होता है—मन को मित्र बनाना। प्रारम्भ में मन शंका, डर और नकारात्मक विचारों से व्यक्ति को परेशान करता है। लेकिन अभ्यास के द्वारा व्यक्ति यह समझने लगता है कि हर विचार सत्य नहीं होता। वह मन से लड़ने के बजाय उसे समझाने लगता है। जैसे कोई समझदार व्यक्ति अपने भयभीत मित्र को धैर्य देता है, वैसे ही साधक अपने मन को सहारा देता है। इसी बिंदु पर मन शत्रु से मित्र बनना शुरू करता है।

मन के मित्र बनते ही ध्यान में स्थिरता आने लगती है। ध्यान का अर्थ केवल बैठकर आँखें बंद करना नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण में सजग रहना है। आरम्भ में मन बार-बार भटकेगा, लेकिन साधक धैर्यपूर्वक उसे वापस लाता है। यही अभ्यास धीरे-धीरे मन को शांत और केंद्रित बनाता है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने भीतर एक ऐसी शांति अनुभव करता है, जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती।

अंततः वैराग्य प्रकट होता है, जिसका अर्थ संसार छोड़ देना नहीं, बल्कि अत्यधिक आसक्ति से मुक्त होना है। व्यक्ति सुख में अति-उत्साहित और दुःख में अत्यधिक टूटता नहीं। सफलता उसे अहंकारी नहीं बनाती और असफलता उसे निराश नहीं करती। यही मानसिक संतुलन योगारूढ़ अवस्था की पहचान है। इस अवस्था में कर्म चलता रहता है, पर कर्तापन का अहंकार समाप्त हो जाता है। मन शांत रहता है, बुद्धि स्पष्ट रहती है और जीवन एक बोझ नहीं, बल्कि साधना बन जाता है। यही योगारूढ़ होने की पूर्णता है, जिसे गीता जीवन के मध्य रहकर प्राप्त करने का मार्ग बताती है।

आधुनिक जीवन का उदाहरण:

एक खिलाड़ी जब खेल सीखना शुरू करता है, तो उसे तकनीक और कड़े अभ्यास (कर्म) की आवश्यकता होती है। लेकिन जब वह 'ज़ोन' (Zone) में होता है, तो वह बिना किसी तनाव के, सहज भाव से (शम) सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है। यही योगारूढ़ होने की स्थिति है—जहाँ कर्म और शांति एकाकार हो जाते हैं।

4. आहार, विहार और अनुशासन का महत्व

गीता स्पष्ट करती है कि योग न तो बहुत अधिक खाने वाले के लिए है, न ही भूखे रहने वाले के लिए।

आहार, विहार और अनुशासन का महत्व

मनुष्य का मन जैसा होता है, वैसा ही उसका जीवन बनता है, और मन पर सबसे गहरा प्रभाव उसके आहार, विहार और अनुशासन का पड़ता है। श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि योग उसी के लिए संभव है जो अपने खाने-पीने, सोने-जागने और कर्म करने में संतुलन रखता है—

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥"6.17)

जो व्यक्ति खाने-पीने, घूमने-फिरने, काम करने और सोने-जागने—हर बात में संतुलन रखता है, उसी के लिए योग दुःखों को नष्ट करने वाला बनता है। अर्थात असंतुलित जीवन-शैली से न मन शांत रह सकता है, न बुद्धि स्थिर हो सकती है। इसलिए आत्मविकास और मानसिक शांति के लिए आहार, विहार और अनुशासन तीनों का समन्वय अनिवार्य है।

आहार केवल भोजन नहीं है, बल्कि वह सब कुछ है जिसे हम ग्रहण करते हैं—भोजन, विचार, दृश्य और सूचनाएँ। जैसा भोजन होता है, वैसा ही मन बनता है। अत्यधिक तला-भुना, नशायुक्त या अनियमित भोजन शरीर को भारी और मन को आलसी बनाता है। इसी प्रकार नकारात्मक समाचार, अशांत दृश्य और कटु शब्द भी मानसिक आहार को दूषित करते हैं। सरल, स्वच्छ और संतुलित भोजन शरीर को स्वस्थ रखता है और मन को हल्का व शांत बनाता है। आधुनिक जीवन में जब फास्ट-फूड और जंक-सूचना दोनों की भरमार है, तब सजग आहार आत्मसंयम का पहला कदम बन जाता है।

विहार का अर्थ है—जीने का ढंग, दिनचर्या और व्यवहार। अनियमित सोना-जागना, अत्यधिक स्क्रीन-टाइम और शारीरिक निष्क्रियता मन को चंचल और थका हुआ बना देती है। इसके विपरीत, समय पर सोना-जागना, थोड़ी शारीरिक गतिविधि, प्रकृति के संपर्क में रहना और संतुलित मनोरंजन मन को प्रसन्न और स्थिर बनाता है। विहार का संतुलन व्यक्ति को जीवन की भागदौड़ में भी भीतर से जुड़ा रहने की शक्ति देता है।

इन दोनों को सही दिशा देने वाला तत्व है अनुशासन। अनुशासन का अर्थ कठोरता या स्वयं पर अत्याचार नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति जिम्मेदारी है। जब व्यक्ति अपने समय, ऊर्जा और आदतों को सजगता से संचालित करता है, तब जीवन में क्रम और स्पष्टता आती है। अनुशासन के बिना अच्छा आहार और सही विहार भी स्थायी लाभ नहीं दे पाते। छोटा-सा नियमित अभ्यास—जैसे समय पर उठना, निश्चित समय पर कार्य करना और थोड़े समय का आत्मचिंतन—धीरे-धीरे व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है।

इस प्रकार आहार शरीर को, विहार मन को और अनुशासन जीवन को संतुलन प्रदान करता है। जब ये तीनों सही अनुपात में होते हैं, तब मन शांत रहता है, इन्द्रियाँ संयमित होती हैं और योग का मार्ग सहज हो जाता है। यही कारण है कि गीता और योगदर्शन दोनों में आहार-विहार-अनुशासन को आध्यात्मिक उन्नति का अनिवार्य आधार माना गया है।

चेष्टा और निद्रा — संतुलित जीवन की दो आधारशिलाएँ

आधुनिक कॉर्पोरेट जगत में 'हसल कल्चर' (Hustle Culture) ने नींद और आराम को विलासिता मान लिया है, जबकि योग इसे आध्यात्मिक प्रगति का आधार मानता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक “युक्तचेष्टस्य कर्मसु, युक्तस्वप्नावबोधस्य” में भगवान् श्रीकृष्ण जीवन के दो अत्यन्त व्यावहारिक पक्षों पर ध्यान दिलाते हैं—चेष्टा और निद्रा। ये दोनों मिलकर मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और आत्मिक प्रगति का आधार बनते हैं।

चेष्टा का अर्थ केवल शारीरिक प्रयास नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और शरीर से किया गया समस्त कर्म है। जब चेष्टा असंतुलित होती है—या तो व्यक्ति अत्यधिक काम करता है, स्वयं को निरन्तर दबाव में रखता है, या फिर कर्म से पलायन कर आलस्य में डूब जाता है—तो दोनों ही स्थितियाँ दुःख का कारण बनती हैं। अत्यधिक परिश्रम से थकान, चिड़चिड़ापन और वैराग्यहीनता आती है, जबकि अल्प प्रयास से आत्मग्लानि और पतन। गीता का संदेश है कि कर्म पूरी निष्ठा से किया जाए, पर स्वयं को जलाकर नहीं। संतुलित चेष्टा वह है जिसमें परिश्रम और विश्राम, दोनों का समन्वय हो।

निद्रा शरीर और मन की मरम्मत का स्वाभाविक साधन है। नींद केवल विश्राम नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन का आधार है। बहुत कम सोने से मन अस्थिर, क्रोधी और एकाग्रता-हीन हो जाता है, जबकि अत्यधिक सोना आलस्य और जड़ता को जन्म देता है। इसलिए गीता में युक्तस्वप्नावबोध—अर्थात् सोने और जागने में संतुलन—पर बल दिया गया है। नियमित और पर्याप्त नींद मन को स्पष्ट, शांत और सजग बनाती है, जिससे व्यक्ति कर्म में स्थिर और ध्यान में समर्थ होता है।

आधुनिक जीवन में देर रात तक स्क्रीन पर जागना और दिन में थकान महसूस करना आम हो गया है। ऐसी दिनचर्या में न चेष्टा संतुलित रहती है, न निद्रा। इसके विपरीत, जो व्यक्ति कार्य के समय पूरी लगन से काम करता है और विश्राम के समय सचमुच विश्राम करता है, वही मानसिक रूप से स्वस्थ और कर्मशील रहता है।

इस प्रकार चेष्टा और निद्रा का संतुलन योग का व्यावहारिक आधार है। जब प्रयास और विश्राम सही अनुपात में होते हैं, तब मन शान्त रहता है, बुद्धि स्पष्ट होती है और योग वास्तव में दुःखहा—दुःखों को दूर करने वाला—बन जाता है।

5. अभ्यास और वैराग्य: स्थिरता के दो स्तंभ

मन स्वभाव से चंचल है। वह बार-बार भटकता है, कभी भूत में, कभी भविष्य में। इसलिए केवल इच्छा कर लेने से मन स्थिर नहीं होता।अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं कि यह मन तो वायु की तरह चंचल है, इसे रोकना कठिन है। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं— 

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥” (6.35)।

 अर्थात् मन को वश में करना कठिन अवश्य है, पर असंभव नहीं; यह अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही सम्भव होता है। यही दोनों मन की स्थिरता के मुख्य स्तंभ हैं।

अभ्यास का अर्थ है—बार-बार प्रयास करना, बिना थके और बिना निराश हुए। जब मन ध्यान में भटकता है, तो उसे डाँटना नहीं, बल्कि शान्ति से फिर उसी केंद्र पर लौटाना ही अभ्यास है। यह प्रक्रिया वैसी ही है जैसे बच्चा चलना सीखता है—बार-बार गिरता है, पर हर बार उठकर फिर चलने का प्रयास करता है। आधुनिक जीवन में भी, जब कोई व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिन्तन, ध्यान या संयम का अभ्यास करता है, तो प्रारम्भ में कठिनाई होती है, पर धीरे-धीरे मन में स्थिरता आने लगती है। अभ्यास हमें निरन्तरता सिखाता है।

वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि अत्यधिक आसक्ति से मुक्त होना है। जब मन किसी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम से अत्यधिक चिपक जाता है, तब वही चिपकाव बेचैनी और दुःख का कारण बनता है। वैराग्य हमें यह समझ सिखाता है कि जो कुछ भी है, वह क्षणिक है। इस बोध से मन हल्का हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति प्रशंसा में अत्यधिक सुखी और आलोचना में अत्यधिक दुखी होता है, तो वह आसक्ति के कारण डगमगाता है। वैराग्य उसे संतुलन प्रदान करता है।

अभ्यास और वैराग्य एक-दूसरे के पूरक हैं। केवल अभ्यास हो और वैराग्य न हो, तो मन फिर-फिर भोग की ओर खिंच जाता है। और केवल वैराग्य हो, अभ्यास न हो, तो स्थिरता टिक नहीं पाती। जैसे पक्षी को उड़ने के लिए दो पंख चाहिए, वैसे ही मन की स्थिरता के लिए अभ्यास और वैराग्य दोनों आवश्यक हैं।

इस प्रकार, अभ्यास मन को दिशा देता है और वैराग्य उसे हल्का बनाता है। इन दोनों के संतुलन से ही व्यक्ति आन्तरिक स्थिरता, शान्ति और योग की अवस्था की ओर अग्रसर होता है। यही स्थिरता जीवन के उतार-चढ़ाव में भी मनुष्य को भीतर से अडिग बनाए रखती है। 

6. ध्यान की प्रविधि और एकाग्रता

ध्यान केवल आँख बंद करना नहीं, बल्कि चेतना को अनुशासित करना है। गीता वर्णन करती है कि कैसे एक ऊँचे स्थान पर कुशा और मृगछाला (आज के संदर्भ में योग मैट) बिछाकर, शरीर को सीधा रखकर दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर स्थिर करना चाहिए।

ध्यान मन को रोकने का प्रयास नहीं, बल्कि मन को समझकर उसे एक दिशा में स्थिर करने की कला है। सामान्यतः लोग ध्यान को कोई कठिन या रहस्यमय प्रक्रिया मान लेते हैं, जबकि वास्तव में यह अत्यन्त सरल और स्वाभाविक अभ्यास है। मन स्वभाव से विचार करता है; इसलिए ध्यान में विचारों का आना असफलता नहीं, बल्कि अभ्यास का प्रारम्भ है। ध्यान की प्रविधि हमें यह सिखाती है कि विचारों के प्रवाह में बहना नहीं है, बल्कि उनके प्रति सजग रहकर उन्हें शान्त होने देना है।

ध्यान की सबसे सरल प्रविधि श्वास पर ध्यान केंद्रित करना है। शांत स्थान पर सहज आसन में बैठकर आँखें बन्द कर ली जाती हैं और ध्यान स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास पर रखा जाता है। श्वास भीतर जा रही है, बाहर आ रही है—बस इस अनुभव को बिना किसी प्रयास के देखा जाता है। जब भी मन किसी विचार, स्मृति या कल्पना की ओर भागे, तब स्वयं को दोष दिए बिना फिर से श्वास पर लौटा दिया जाता है। यही लौटना ध्यान का वास्तविक अभ्यास है। इस निरन्तर लौटने से मन धीरे-धीरे शांत और एकाग्र होने लगता है।

एकाग्रता का अर्थ मन को जबरन बाँधना नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा को बिखरने से बचाना है। जैसे सूर्य की किरणें फैली हों तो केवल गर्मी देती हैं, पर जब लेंस से होकर एक बिन्दु पर एकत्र होती हैं तो अग्नि उत्पन्न कर देती हैं—वैसे ही मन की शक्ति एकाग्र होने पर प्रखर हो जाती है। ध्यान के अभ्यास से मन की यह बिखरी हुई शक्ति धीरे-धीरे एक केन्द्र पर टिकने लगती है। इसका प्रभाव केवल ध्यान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अध्ययन, कार्य और निर्णय—सभी में स्पष्टता आने लगती है।

आधुनिक जीवन में एकाग्रता का ह्रास एक सामान्य समस्या बन गया है। मोबाइल, सोशल मीडिया और निरन्तर बदलते उत्तेजक दृश्य मन को बार-बार तोड़ते हैं। ऐसे में ध्यान एक मानसिक व्यायाम की तरह कार्य करता है, जो मन की एकाग्रता की क्षमता को पुनः विकसित करता है। उदाहरणतः जो विद्यार्थी प्रतिदिन कुछ समय ध्यान करता है, वह पढ़ते समय कम भटकता है और विषय को अधिक गहराई से समझ पाता है। इसी प्रकार कार्यस्थल पर भी ध्यान का अभ्यास निर्णय क्षमता और धैर्य को बढ़ाता है।

अन्ततः ध्यान और एकाग्रता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। ध्यान एक प्रक्रिया है और एकाग्रता उसका फल। नियमित अभ्यास से मन वर्तमान में टिकना सीखता है, जिससे तनाव कम होता है और भीतर एक स्थायी शान्ति का अनुभव होने लगता है। यही ध्यान की वास्तविक सिद्धि है—मन को शांत, स्पष्ट और सजग बना देना।

कार्यस्थल पर ध्यान:

एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के लिए 'डीप वर्क' (Deep Work) ही ध्यान है। जब वह घंटों तक बिना विचलित हुए कोडिंग करता है, तो वह आत्मसंयमयोग के एक अंश का अभ्यास कर रहा होता है। लेकिन योग इसे एक कदम आगे ले जाती है—उस कार्य को ईश्वर या समष्टि की सेवा मानकर करना।

7. समत्व योग: सुख-दुख में समानता

आत्मसंयम का चरम लक्ष्य 'समत्व' है।

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥

सरल अर्थ (सीधे शब्दों में)

जो व्यक्ति मित्र, शत्रु, अपने, पराये, तटस्थ, द्वेष करने वाले, संबंधी, सज्जन और दुष्ट—सबके प्रति समान बुद्धि रखता है, वही वास्तव में योग में श्रेष्ठ माना जाता है।

शब्दार्थ (आसान भाषा में)

  • सुहृत् – हित चाहने वाला
  • मित्र – दोस्त
  • अरि – शत्रु
  • उदासीन – तटस्थ व्यक्ति
  • मध्यस्थ – झगड़े में बीच का, निष्पक्ष
  • द्वेष्य – जिससे विरोध या घृणा हो
  • बन्धु – संबंधी
  • साधु – अच्छा, सज्जन व्यक्ति
  • पापी – दुष्ट या गलत आचरण वाला
  • समबुद्धि – सबके प्रति समान दृष्टि
  • विशिष्यते – श्रेष्ठ कहा जाता है                                                                     

यह श्लोक सिखाता है कि सच्चा योगी वह नहीं है जो केवल ध्यान में बैठता है, बल्कि वह है जिसकी दृष्टि लोगों के प्रति संतुलित हो जाती है। सामान्यतः हम अपने मित्रों से पक्षपात करते हैं, शत्रुओं से द्वेष रखते हैं, और अपने-पराये में भेद करते हैं। यही भेदभाव मन को अशांत करता है।

योग में स्थित व्यक्ति यह समझ जाता है कि सब मनुष्य अपने-अपने स्वभाव और परिस्थितियों से संचालित हैं। इसलिए वह मित्र से अत्यधिक आसक्त नहीं होता और शत्रु से घृणा में नहीं चलता। वह सज्जन का सम्मान करता है, पर दुष्ट से भी वैर नहीं पालता। इसका अर्थ यह नहीं कि वह गलत का समर्थन करता है, बल्कि वह भावनात्मक प्रतिक्रिया से मुक्त रहता है।

आधुनिक जीवन से उदाहरण

ऑफिस में एक व्यक्ति है जो आपकी मदद करता है और दूसरा जो आपकी आलोचना करता है। सामान्यतया व्यक्ति पहले से जुड़ जाता है और दूसरे से चिढ़ जाता है। लेकिन समबुद्धि वाला व्यक्ति दोनों के साथ शिष्ट, संतुलित और निष्पक्ष व्यवहार करता है। वह न प्रशंसा में फूलता है, न आलोचना में टूटता है।

इसी प्रकार परिवार में किसी सदस्य का व्यवहार अच्छा न हो, तब भी योगी उसे समझ के साथ देखता है, क्रोध के साथ नहीं। वह गलत को गलत कहता है, पर मन में द्वेष नहीं पालता।

इसका सार यह है कि समदृष्टि ही योग की पराकाष्ठा है। जब मनुष्य व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्य और कर्तव्य के आधार पर सोचने लगता है, तब उसका मन स्थिर हो जाता है। यही समबुद्धि योग में श्रेष्ठता का वास्तविक लक्षण है।

8. योगभ्रष्ट और ईश्वर का आश्वासन

अध्याय के अंत में अर्जुन की शंका मानवीय है और यही योग के मार्ग पर चलने वाले सभी साधकों के मन की भी स्वाभाविक शंका है

 "अगर मैं योग के मार्ग पर चलकर बीच में ही भटक गया तो?" यदि अभ्यास अधूरा रह जाए, यदि जीवन में विघ्न आ जाए या साधना बीच में छूट जाए, तो क्या उसका सब प्रयत्न व्यर्थ हो जाता है? 

इसका उत्तर देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण योगभ्रष्ट साधक के विषय में अत्यन्त करुण और आश्वस्त करने वाला सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। श्री कृष्ण आश्वासन देते हैं कि कल्याणकारी कार्य करने वाले का कभी बुरा नहीं होता। वे स्पष्ट कहते हैं कि योग का मार्ग कभी नष्ट नहीं होता और इस मार्ग पर किया गया कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता।

योगभ्रष्ट का अर्थ है—वह व्यक्ति जो योग, संयम या आत्मविकास के मार्ग पर चला, पर किसी कारणवश पूर्ण सिद्धि प्राप्त न कर सका। कारण अनेक हो सकते हैं—जीवन की बाधाएँ, पारिवारिक उत्तरदायित्व, मानसिक दुर्बलता या अकस्मात मृत्यु। सामान्य दृष्टि से ऐसा व्यक्ति असफल प्रतीत होता है, पर गीता की दृष्टि से वह असफल नहीं है। भगवान् कहते हैं—“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति”—जो कल्याण के मार्ग पर चला है, उसका कभी पतन नहीं होता। यह ईश्वर का स्पष्ट आश्वासन है।

गीता के अनुसार योगभ्रष्ट साधक का अर्जित संस्कार नष्ट नहीं होता, बल्कि उसके साथ आगे की यात्रा करता है। यदि साधक इस जीवन में पूर्ण योग सिद्धि प्राप्त न कर सके, तो अगली परिस्थितियों में उसे पुनः वही प्रवृत्ति, वही जिज्ञासा और वही आन्तरिक झुकाव प्राप्त होता है। यह ऐसे है जैसे कोई विद्यार्थी आधी पढ़ाई पूरी कर ले—वह अगले वर्ष शून्य से नहीं, बल्कि वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ से उसने छोड़ा था। यही सिद्धान्त आत्मिक विकास पर भी लागू होता है।

ईश्वर का यह आश्वासन साधक को भय से मुक्त करता है। यह मार्ग डर का नहीं, भरोसे का है। भगवान् यह नहीं कहते कि साधक से कभी भूल नहीं होगी, बल्कि यह कहते हैं कि भूल के बाद भी उसका हाथ थामे रखा जाएगा। इसलिए योग का मार्ग कठोर दंड नहीं, बल्कि करुणा और धैर्य का मार्ग है। यह साधक को साहस देता है कि वह पुनः उठे, पुनः प्रयास करे और आत्मविकास की यात्रा जारी रखे।

आधुनिक जीवन में भी यह सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक है। कोई व्यक्ति ध्यान, संयम या आत्मअनुशासन का अभ्यास करता है, पर निरन्तरता नहीं रख पाता। यदि वह यह माने कि “सब व्यर्थ हो गया”, तो वह हतोत्साहित हो जाएगा। पर गीता सिखाती है कि किया गया हर छोटा प्रयास भी भीतर संस्कार बनकर जमा होता है और समय आने पर पुनः जाग्रत होता है। इस प्रकार योगभ्रष्ट का सिद्धान्त मनुष्य को निराशा से बचाकर आशा और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

अन्ततः योगभ्रष्ट और ईश्वर का आश्वासन यह सिखाता है कि आत्मिक मार्ग पर कोई भी प्रयास नष्ट नहीं होता। ईश्वर साधक की नीयत और प्रयास को देखता है, पूर्णता की मजबूरी नहीं रखता। यही करुणामय आश्वासन योग को जीवन के लिए सुरक्षित, सहज और मानवोचित मार्ग बनाता है।

विफलता से सीख:

आधुनिक जीवन में हम अक्सर 'परफेक्शन' (पूर्णता) के पीछे भागते हैं। आत्मसंयमयोग हमें सिखाता है कि गिरना बुरा नहीं है, गिरकर प्रयास छोड़ देना बुरा है। हर प्रयास अगले जन्म (या अगले अवसर) के लिए संचित होता है। 

विफलता सामान्यतः भय और निराशा का कारण मानी जाती है, पर जीवन-दर्शन की दृष्टि से वह एक आवश्यक शिक्षक है। मनुष्य प्रायः सफलता को ही उपलब्धि मानता है, जबकि असफलता उसे भीतर से परिपक्व बनाती है। श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश भी यही है कि जीवन केवल परिणामों का नहीं, बल्कि निरन्तर सीख और आत्मविकास की यात्रा है। जहाँ सफलता अहंकार को जन्म दे सकती है, वहीं विफलता मनुष्य को विनम्र, जागरूक और विवेकशील बनाती है।

विफलता हमें अपनी सीमाओं और कमजोरियों से परिचित कराती है। जब कोई प्रयास सफल नहीं होता, तब मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है—कहाँ चूक हुई, क्या सुधारा जा सकता है। यही आत्ममूल्यांकन वास्तविक प्रगति की शुरुआत है। उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी परीक्षा में अपेक्षित अंक नहीं ला पाता। यदि वह केवल स्वयं को दोष दे, तो टूट जाएगा; लेकिन यदि वह यह समझे कि उसकी तैयारी की विधि या अनुशासन में कमी थी, तो वही विफलता अगली सफलता की नींव बन जाती है।

विफलता सहनशक्ति और धैर्य भी सिखाती है। जीवन में हर परिस्थिति अनुकूल नहीं होती, पर जो व्यक्ति विपरीत स्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है, वही भीतर से मजबूत बनता है। गीता का कर्मयोग यही सिखाता है कि कर्म करते रहो, परिणाम से भयभीत न हो। असफलता इस सिद्धान्त को व्यवहार में उतारने का अवसर देती है। जब व्यक्ति बार-बार गिरकर भी उठता है, तब उसके भीतर आत्मविश्वास गहराता है।

आधुनिक जीवन में असफलता को अक्सर व्यक्तिगत कमी समझ लिया जाता है, जबकि वास्तव में वह एक प्रक्रिया का हिस्सा है। व्यवसाय, करियर या रिश्तों में आई असफलताएँ यह संकेत देती हैं कि परिवर्तन और सुधार आवश्यक है। जो व्यक्ति विफलता से भागता नहीं, बल्कि उसे सीख के रूप में स्वीकार करता है, वही जीवन में स्थायी प्रगति करता है।

अन्ततः विफलता यह सिखाती है कि हमारा मूल्य केवल सफलता से निर्धारित नहीं होता। मनुष्य का मूल्य उसके प्रयास, नीयत और सीखने की क्षमता में निहित है। जब विफलता को शिक्षक की तरह देखा जाता है, तब वह निराशा नहीं, बल्कि जागरूकता और आत्मबल का कारण बनती है। यही दृष्टि जीवन को गहराई और सार्थकता प्रदान करती है।

अंततः आत्मसंयमयोग केवल मोक्ष का मार्ग नहीं है, बल्कि यह 'सर्वश्रेष्ठ जीवन' जीने की कला है। यह हमें बताता है कि शांति हिमालय की कंदराओं में नहीं, बल्कि मन के उन विचारों के बीच है जिन्हें हमने अनुशासन से जीते हैं। आत्मसंयमयोग हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता का अर्थ अपनी इंद्रियों की गुलामी नहीं, बल्कि उन पर विजय प्राप्त करना है। जब हम आत्म-अनुशासन के माध्यम से अपने मन को मित्र बना लेते हैं, तो हमारे भीतर का 'आत्म' ही हमारा मार्गदर्शक बन जाता है। आधुनिक संघर्षों के बीच यह योग हमें स्थिरप्रज्ञ बनने की राह दिखाता है, जहाँ शांति किसी बाहरी परिस्थिति पर निर्भर न होकर हमारे भीतर से उत्पन्न होती है।

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आत्ममुग्ध कविताई

आत्ममुग्ध कविताई  सीख न पाये शब्द भाव जो कभी यहाँ जगताई में। दिखा रहे हैं आत्म श्रेष्ठता जाने किस भगताई में। चार जोड़कर शब्द क्या लिखे भूले छ...