मन के गीत
ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
email-ajaykpandey197494@gmail.com
उम्मीदों के हार पिरोकर मैं स्वयं गले पहनाऊँ
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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तीर्थ मन का भाव
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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कसक बाकी बची है
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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ग़ज़ल
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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आन देख ली हमने
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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सूरज उगाएंगे चले जायेंगे
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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जिंदगी कब आसान नजर आती है
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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दर्द ने जब भी छूआ है पीर के हर पोर को
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
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ख़याल करता हूँ
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
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के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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कौन बचाये
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
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अब जग गया हूँ।।
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संसद आवारा हो जाता है
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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नारी का सम्मान
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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॥ श्रीगीता (अवधी चौपाई) ॥
॥ श्रीगीता (अवधी चौपाई) ॥
🌿 मंगलाचरण (दोहा)
वंदन करउँ सो सत्य हि, जेहि जगत आधार। कृष्ण वचन गीता बनहिं, जीवन के विस्तार॥
धर्मभूमि मँह जब उठे, संशय के अति धूल। तब प्रकटे गीता सुधा, हरै हिये के शूल॥
🌸 प्रस्तावना (चौपाई)
शारद गणपति चरण मनाऊँ, गुरु पद पंकज शीश झुकाऊँ।
गीता ज्ञान सुधा रस बरसे, जिसका पान जगत मन तरसे।
कृष्ण मुखारविन्द की वानी, सकल शास्त्र की सार बखानी।
पढ़त मिटत अज्ञान अँधेरा, होत हृदय में ज्ञान सवेरा।
जब-जब जीवन रण बनि जाई। मन उलझे जब मोह सहाई॥ होहिं परस्पर द्वंद्व अपारा। नयन भरहिं जब नीर की धारा॥ धर्म पुकारे सत के राहा। ममता बाँधे मन के चाहा॥ तब गीता कर दीप जलावे। मोह-तमस को दूर भगावे॥
कुरुक्षेत्र नहिं केवल भूमी। मानुष तन मँह द्वंद्व अहूमी॥ भीतर चलत निरंतर युद्धा। आत्मा दर्पण करहिं विशुद्धा॥ इक तो मोह-पाश दुखदाई। दूजी मन में कठिन लड़ाई॥ स्वार्थ जाल इक ओर पसारा। दूजे सत्य-दुआर पियारा॥
पार्थ रूप सब जीव खड़ा है। संशय के अँधियार पड़ा है॥ नाते-रिश्ते बंधन भारी। व्याकुल मन गलियारे भारी॥ तब माधव कर गूँजे बानी। अमृत धार बहे जिमि जानी॥ चेतन सुरुज उगे तब नीका। मिटे तमस जो हृदय सतीका॥
🌸 ज्ञान संदेश (चौपाई)
आतम अजर अमर अविनासी। मरत न जनमत यह सुखरासी॥ जैसे नर तज वस्त्र पुराना। देह बदलत त्यों जानु सयाना॥ दुख-सुख लाभ-हानि सब माया। आवत जावत जैसे छाया॥ समता भाव धरे मन माँही। सत्य लखत सोई जन-माँही॥
धरम हेतु तुम कर्म कराऊ। फल की चिंता दूर बहाऊ॥ करहु समर्पण हरि के चरणा। तजहु मान प्रभु की बस शरणा॥ ज्ञान-दीप अज्ञान नसावे। भक्ति-प्रेम अनुराग बढ़ावे॥ कर्मयोग के पथ पर धाये। सफल जनम सोई नर पावे॥
🌸 गीता महत्त्व (चौपाई)
गीता शास्त्र मात्र नहिं जानहु। जीवन तत्व सार पहिचानहु॥ मानुष के अंतस कर बाता। भाव-विस्तार सकल सुखदाता॥ पढ़ने वाले पावत पंथा। कर्मयोग कर आधार यह ग्रंथा॥ ज्ञानी भक्त और जे योगी। पावत दिव्य प्रकास निरोगी॥
अमर ज्ञान युग-युग हरसावा। संकट मँह जो राह दिखावा॥ जाके मन मँह गीता बसिहें। सोई सत्य पथ सहजहिं गहिहें॥ जो गीता जिय मँह उपजावे। भय से मुक्त परम सुख पावे॥ आतम से परमात्मा ताईं। पावहिं पंथ कवनु कठिनाई॥
जय श्री कृष्ण जगत के स्वामी, अज अविनाशी अन्तरयामी।
कुरुक्षेत्र की पावन धरती, मोह नाशिनी मंगल करती।
अर्जुन शोक मगन जब भययो, गांडीव हाथ छूटत गययो।
तब प्रभु ने उपदेश सुनाया, आत्म तत्त्व का भेद बताया।
वेद पुरानन का यह सारा, जैसे नदियन मध्य किनारा।
सत्तर सौ है श्लोक अनूपा, अट्ठारह अध्याय स्वरूपा।
कर्म योग की राह दिखावे, फल की आशा दूर भगावे।
सांख्य ज्ञान की जोति जगावे, भक्ति मार्ग से प्रभु को पावे।
मिटहि देह आतम अविनाशी, तुम हो ब्रह्म परम सुख रासी।
अस्त्र काट नहिं पावें जाको, आग जला नहिं पावे ताको।
विश्वरूप प्रभु जब दिखलाया, कोटि सूर्य सम तेज दिखाया।
सकल चराचर प्रभु के माहीं, द्वैत भाव तब रहत न नाहीं।
त्रिविध गुणन् की माया भारी, ताहि तरे जो शरण तिहारी।
स्थितप्रज्ञ जेइ लक्षण गाए, संयम पथ पर कदम बढ़ाए।
श्रद्धा धरि जो पाठ करावे, जन्म मरण से मुक्ती पावे।
पढ़ें पढ़ावें जो यह गीता, पावन होये जैसे सीता।
अन्तिम वचन शरण का प्यारा, मिटा दे जो भव सिन्धु धारा।
त्याग और सन्यास बखाना, मोक्ष द्वार को जिसने जाना।
जित योगेश्वर कृष्ण विराजे, उत कल्याण शंख शुभ बाजे।
पार्थ धनुर्धर जहाँ खड़े हैं, विजय प्राप्ति के भाग्य बड़े हैं।
शुद्ध भाव से पुस्तक खोलें, हरि ॐ तत्सत् मुख से बोलें।
मन को कर लो प्रभु के अर्पण, ज्ञान बने जीवन का दर्पण।
अजय विजय की राह यही है, शाश्वत धर्म पनाह यही है।
आओ मिलकर पाठ अरम्भें, कृष्ण नाम अवलंबहि थम्भें।
🌼 समापन (दोहा)
गीता जाके मन बसे, मिटे सकल जंजाल। भक्ति ज्ञान अरु कर्म से, जीवन हो खुशहाल॥
शांति समर्पण त्याग मँह, बसे मान कल्यान। गीता कर संदेस यह, जग हित अमृत दान॥
॥ श्रीमद्भगवद्गीता: प्रथम अध्याय (सरल हिंदी सार) ॥
युद्ध की शुरुआत (धृतराष्ट्र का प्रश्न):
धर्म भूमि कुरुक्षेत्र मँझारी। जुटे युद्ध सब वीर विचारी॥ धृतराष्ट्र पूँछि संजय बाता। पांडु पुत्र क्या करते ताता॥ धृतराष्ट्र पुनहि संजय पूछा। रण भूमी महँ का विधि सूझा॥ मम सुत पांडु पुत्र मिलि भाई। करत युद्ध का नीति बनाई॥ संजय बोले धीरज धारी। पांडव सैन्य खड़ी है भारी॥
दुर्योधन का अभिमान और सेना वर्णन:
देखि पांडवहिं सैन्य विशाला। दुर्योधन तब भयू बिहाला॥ देखि सैन्य व्याकुल चित भयऊ। दुर्योधन समीप गुरु गयऊ॥ गुरु द्रोण पहिं जाइ सुनाई। भीष्म रक्षित सेना दिखाई॥ द्रोण! देखिये पाण्डव सेना। सजी खड़ी जो बुद्धि प्रवीणा॥ भीम, अर्जुन अरु वीर विराट। द्रुपद खड़ा ज्यों महा सम्राट॥ चेकितान, काशिनरेश बली। कुन्तिभोज अरु वीर अति भली॥
कौरव दल के योद्धा:
अपने भी योद्धा सुन लीजै। नायक नाम ध्यान अब दीजै॥ गंगा सुत भीषण रणधीरा। जिमि सागर अति गहर गभीरा॥ इहा(इच्छा)मृत्यु वरदान सुहावा। कालहु देखि देखि डरि जावा॥ द्रोण चतुर धनु विद्या धारी। शस्त्र अस्त्र के ज्ञाता भारी॥ पाण्डव कौरव गुरु कहलाए। अद्भुत कौशल रण में लाए॥ सूर्य पुत्र कर्ण महादानी। समर वीर सम कोउ न ज्ञानी॥ कंचुक(कवच) कुंडल सोभा पावा। रिपु दल देखि देखि थर्रावा॥ दुर्योधन अभिमान बढ़ावहिं। अनीति पथ पर पैर बढ़ावहिं॥ दुःशासन बल बुद्धि विहीना। कुल कलंक दुख साहस कीना॥ अश्वत्थामा काल समाना। शिव अंसा अति महा बवाना॥ अमर वीर नहिं मृत्यु डराई। भीषण अस्त्र काल सम आई॥
पांडव योद्धा वर्णन
धर्म राज अति धीर सुजाना। सत्य वचन जिन्ह के प्रवाना॥ यम के अंश शांत मति धारी। नीति निपुण सब जग हितकारी॥ पवनसुत भीम महबलवंता। गदा युद्ध महँ कोउ न अंता॥ दस सहस्र गज शक्ति शरीरा। रिपु दल दलन वीर रणधीरा॥ पार्थ धनुष गांडीव सँभारे। कपि ध्वज रथ पर प्रभु पगु धारे॥ सव्यसाचि अस्त्रन के ज्ञाता। महाबाहु जय विजय विधाता॥ नकुल रूप अति सुंदर सोहे। अश्व विधा लखि मुनि मन मोहे॥ सहदेव सुज त्रिकाल विचारी। ज्योतिष विद्या निपुण अपारी॥ सुभद्र सुत अति वीर किशोरा। चक्रव्यूह महुँ कीन्ह मरोरा॥ अल्प आयु यश कीर्ति कमाई। समर भूमि अद्भुत गति पाई॥
शंखों की गूँज:
भीष्म पितामह शंख बजाया। सिंह नाद सम गगन गुँजाया॥ फिर माधव ने शंख बजाया। अर्जुन ने भी स्वर फैलाया॥ पाञ्चजन्य गूँजा देवदत्त। गूँज उठा युद्ध क्षेत्र प्रमत्त॥ काँप उठे सुन रिपु के तन मन। गूँज उठी धरती और गगन॥
अर्जुन का मोह और विषाद:
कपि ध्वज रथ पर पार्थ विराजे। अच्युत! से तब विनती साजे॥ दोनों सेना बीच खड़ाऊँ। अपने जन के देखन चाहूँ॥ देखि स्वजन अर्जुन मन मोहा। हृदय शोक उपजा अति छोहा॥ सब अपने हन कर क्या पाऊँ। राज्य भोग तजि वन को जाऊँ ॥ काँपत अंग नैन भरि बारी। गांडीव नाहि जात सँभारी॥
अर्जुन का विलाप:
केशव! अंग शिथिल हैं सारे। मुख सूखा, सब धीरज हारे॥ अपनों को किस कारन मारूँ। ऐसा राज्य नहीं मैं चाहूँ।। गुरु, पितामह, पुत्र अरु सखा। इन पर कैसे उठाऊँ शखा॥ कुल का नाश अधर्म बढ़ावे। कुल यश कीर्ति नरक में जावे॥
त्याग और शोक:
कुल के नास अधर्म पसारा। धर्म लोप होइहिं संसारा॥ कुल के नाशे धर्म नशाहीं। नारि दूषित नरक महुँ जाहीं॥ पितर गिरहिं अरु वंश विनासा। नरक वास कर होत तमासा॥ पाप लगे हमका प्रभु भारी। बंधु मारि का होय सुखारी॥ मारहिं भल सब हमका आके। कैसे शस्त्र उठाऊँ जाके॥ कहिके अर्जुन रथ पर बैठा। शोक मग्न हो मन में ऐंठा॥ धनुष बाण सब नीचे डाले। आँखों में आँसू भर पाले॥ अश्रु भरत नयनन अस भारी। बैठ्यु पार्थ धनुष तजि डारी॥ कायरता वश बुद्धि भुलानी। का श्रेयस्कर कहहु बखानी॥ शिष्य भाव प्रभु शरण तिहारी। संशय हरहु कृष्ण बनवारी॥
बिहँसि मंद प्रभु बचन उचारे। सुनु अर्जुन तुम मोह पधारे ॥
पण्डित जैसी बात बनाओ। मृतक शोक तजि ज्ञान जगाओ ॥
जैसे बालक वृद्ध कहावे। देह बदलती देही गावे ॥
तैसे ही यह तत्व सुजाना। मोह न करई धीर सयाना ॥
आत्मा का बोध (अमरता का ज्ञान)
अविनाशी यह आत्मा जानो। घट-घट व्यापक सत्य बखानो ॥ नयन छिन्दति शस्त्राणि गाई। शस्त्र काटि नहिं सके सखाई ॥ पावक जारि सके नहिं ताही। जल न भिगोवे, पवन सुखाही ॥ जैसे जीर्ण वसन नर त्यागे। नूतन लेइ प्रेम अनुरागे॥ तैसे देह तजत यह देही। नूतन रूप धरत बिनु देही ॥
कर्तव्य का बोध (निष्काम कर्म)
धर्म युद्ध क्षत्रिय सुखकारी। तजे रण होय अपयश भारी ॥ हारे स्वर्ग, जीत महि भोगा। तस्मादुत्तिष्ठ तज सब शोगा ॥
कर्महिं में अधिकार तिहारा। फल की इच्छा तज संसारा ॥ सिधि-असिधि सम कर चित्त धारे। योगयुक्त हो भव-निधि तारे ॥ जो नर राग द्वेष मद त्यागे। आत्म माहिं जो नित अनुरागे ॥ जैसे नदियाँ सागर जाहीं। अचल रहे सागर घबराहीं ॥ तैसे विषय मुनिहिं नहिं डोले। ब्रह्म-शांति सोई मुख बोले ॥ ममता गर्व मोह जो खोवे। परम मोक्ष अधिकारी होवे ॥
॥ दोहा ॥
मोह जनित विषाद तजी, पाय ज्ञान परकाश।कृष्ण चरण शरणागती, भयो भरम का नाश ॥
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॥ श्रीमद्भगवद्गीता: द्वितीय अध्याय
दोहे
मन महँ बोले हरि वचन, तजि मोहक मृदु बैन।मोह-तिमिर सब मिटि गया, मिला पार्थ को चैन।।
ज्ञान-दीप प्रज्वालिया, हरण हृदय का ताप। सांख्य योग केशव कहें, मिटे सकल संताप।।
॥ सांख्य योग सार - चौपाई ॥
अर्जुन की व्याकुलता और शरणागति:
देखि स्वजन अर्जुन अकुलाने। मोह वश सब अस्त्र गिराने॥ बिहँसि मंद प्रभु बोले बानी। सुनु अर्जुन तुम अति अज्ञानी॥ करुण वचन कहि कृष्ण सुनाये। कायरता तजि रण चित लाये॥ देखि पार्थ कहूँ कृष्ण बुझाई। तजहु मोह यह कुमति सहाई॥ पण्डित जैसी बात उचारो। मृतक शोक तजि हृदय विचारो॥ नीति नहीं यह कायरताई। वीर पुरुष क नहीं सोहाई॥
हिरदय की दुर्बलता त्यागो। उठहु पार्थ! निज कर्म मँ जागो॥ देही नित्य अजर अविनाशी। घट-घट व्यापक पूरन राशी॥ जैसे वस्त्र जीर्ण नर त्यागे। नूतन लेइ प्रेम अनुरागे॥ तैसे देही देह बिहावे। दूजी देह तुरत फिर पावे॥ कि नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणी। पावक जारि सके नहिं प्रानी॥ न मारि सके न पवन सुखावे। जल नहिं कबहुँ भिगोवन पावे॥ मरे वीर जो स्वर्ग सिधारे। जीते मही भोग सुख सारे।। तस्मादुतिष्ठ पार्थ सुजानो। निश्चय युद्ध हेतु मन ठानो।।
नहिं अस समय कि मैं नहिं रहऊँ। तुम व भूप न रहहु जो कहऊँ॥ जैसे देह अवस्था पावे। बाल, युवा अरु वृद्ध कहावे॥ तैसे देही देह विहावे। धीर पुरुष जो मोह न पावे॥शीत, उष्ण, दुख, सुख जो होई। इन्द्रिय जनित अनित है सोई॥ जो नर सम दुख-सुख फल जाने। व्याकुल होय न सत्य पिछाने॥ अमृत पद सो पावन हारा। कटे मोह का सब अँधियारा॥
असत वस्तु के अस्तितु नाहीं। सत्य सदा व्यापक जग माहीं॥ अविनाशी जो सब में व्यापा। मिटे नहीं हो कोउ प्रतापा॥ स्वधर्म देखि न कबहुँ डराना। धरम पथ नहीं कोउ समाना ॥ खुलै स्वर्ग के द्वार अपारा। भाग्यवान पावे रण भारा॥ जौ नहिं करिहौ युद्ध विचारी। पाप लगै अरु कीर्ति बिगारी॥ मरे स्वर्ग, जीते महि भोगा। अब उठि वीर तजहु सब शोगा॥
अचल सनातन अव्यय जानो। सत्य तत्त्व यह हृदय बखानो॥ क्षत्रिय धर्म युद्ध सुखकारी। तजि रण होइ अपयश भारी॥ कर्म किये जा फल तजि प्यारे। जीत हार सम करि चित धारे॥ स्वत्व तिहारा कर्महिं माही। फल की इच्छा राखहु नाही॥ |
अर्जुन उवाच विनय सों भाई। केशव! मोहे देहु सुनाई॥ स्थितप्रज्ञ के लक्षण केते। समाधिस्थ पुरुष हैं जेते॥ का भाषा तिन्ह की जग माहीं। स्थिर बुद्धि कहिये जेहि ताहीं॥ कैसा वचन सो पुरुष उचारे। लक्षण मोहिं बतावहु सारे॥ किमि भाषेत पुरुष सो होई। धीर गंभीर शब्द कह सोई॥ कैसे बोलत जगत मझारी। संशय मेटहु कृष्ण मुरारी॥
(अर्थात विपरीत परिस्थितियों में वह अपनी वाणी पर कैसे नियंत्रण रखता है?)
(सांसारिक विषयों के बीच वह स्वयं को कैसे थामकर रखता है?) किमासीत कहहु भगवाना। कैसे बैठत पुरुष सुजाना॥ स्थिर चित्त किमि आसन लावै। मन के भटकावहिं रुकवावै॥ व्रजेत किम् प्रभु मोहे बतावो। चलन ढाल तिन्ह की समझावो॥ विषय मध्य किमि विचरत सोई। निर्विकार जन कैसे होई॥
(इस मायारूपी संसार में वह व्यवहार कैसे करता है?)
श्री भगवान उवाच
कर्महिं में अधिकार तिहारा। फल की इच्छा तजु संसारा ॥ फल हेतू जनि कर्म कमाओ। तजि अकर्म आसक्ति मिटाओ ॥ सिधि-असिधि सम करि चित्त राखो। योगयुक्त रस निशदिन चाखो ॥ जय अरु हारि समान हि जानो। विचलित होय न मनहिं बखानो ॥ बुद्धि योग अति श्रेष्ठ कहावे। फल की तृष्णा दुख उपजावे ॥ कर्मज फल जो नर तजि देई। जन्म बंध छूटे सुख लेई ॥ अर्पण करि प्रभु पद सब कर्मा। सोई जानत असली धर्मा ॥ ममता गर्व मोह सब त्यागे। परम शांति सोई अनुरागे ॥ जब मन काम सकल तजि देई। आत्म माहिं संतुष्ट सुहेई॥ स्थितप्रज्ञ सोई मुनि जानो। दुख-सुख राग-द्वेष सम मानो॥
इन्द्रिय संयम जो जन पावे। ताकी मन में स्थिरता आवे॥ विषय विलास आसक्ति उपजे। काम क्रोध विवेक जहाँ भजे॥ जो नर ममता, गर्व विहावे। शांति परम सोई नर पावे॥ एहि स्थिति जेहिं अंतहु पावे। मन निर्वाण मोक्ष सो पावे॥ फल इच्छा नहिं कर्म कमाओ। तजि अकर्म आसक्ति मिटाओ ॥ सुख की चाह नहिं जेहि माहीं। दुख आये ते विचलित नाहीं।। राग, क्रोध अरु भय जो त्यागे। मुनि स्थिर प्रज्ञा सोई जागे॥ प्रिय-अप्रिय कछु जो भी पावै। हर्ष-शोक नहिं मुख सों लावै॥
जैसे कछुआ अंग समेटे। तैसे मुनि विषयन को मेटे॥ इन्द्रिय द्वार बंद जो राखे। रसना स्वाद कभी नहिं चाखे॥ बाहर विषय भले ही आवें। स्थिर चित नहीं तनिक डोलावें॥ राग-द्वेष सों रहित विचारी। विचरत विषय मध्य संसारी॥ जेकर इन्द्रिय वश में होई। शांति परम पद पावत सोई॥ जो मन स्थिर प्रभु चरणन माहीं।कृपा मिलत दुख सब मिट जाहीं।
बुद्धि योग अति श्रेष्ठ कहावे। फल की तृष्णा दुख उपजावे ॥ कर्मज फल जो नर तजि देई। जन्म बंध छूटे सुख लेई ॥ अर्पण करि प्रभु पद सब कर्मा। सोई जानत असली धर्मा ॥ ममता गर्व मोह सब त्यागे। परम शांति सोई अनुरागे ॥ जैसे नदियाँ सागर माहीं। मिलत जाहिं पर क्षोभ कराहीं॥ नहिं सागर मर्यादा तोड़े। तैसे मुनि नहिं धीरज छोड़े॥
॥ दोहा ॥ कर्तापन का मद तजहु, करि निज धर्म विचार।कृष्ण चरण चित लाय के, बेड़ा होवत पार ॥
स्थितप्रज्ञ के लक्षण कहि, दीन्हा परम प्रकाश।विषय वासना त्यागि सब, कीन्हा भ्रम का नाश।।
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अध्याय 3 कर्मयोग
दोहा
संशय व्याकुल पार्थ मन, तजे क्षात्र निज धर्म। पूछत केशव सों तदा, श्रेष्ठ ज्ञान के कर्म॥
ज्ञान-कर्म की संधि का, सुलभ पंथ दिखलाय।कर्मयोग महिमा प्रभू, अर्जुन को समुझाय॥
पार्थ प्रश्न (अर्जुन का संशय):
जौ तुम मानत ज्ञानहिं श्रेष्ठा। तौ क्यों मोहिं जुद्ध महँ चेष्टा॥
घोर कर्म महँ काहे लावत। संशय मोरे मन उपजावत॥
मिले-जुले वच कहहु विधाता। व्याकुल होवत मेरो गाता॥
(भावार्थ: अर्जुन कहते हैं—हे केशव! यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो मुझे इस घोर युद्ध (कर्म) में क्यों झोंक रहे हैं? आपकी मिली-जुली बातों से मेरा मन भ्रमित हो रहा है, मुझे कोई एक निश्चित मार्ग बताइए।)
श्रीकृष्ण उत्तर (भगवान का समाधान):
बिहँसि बोले प्रभु सुनु कुरुनंदन। दो विधि निष्ठा जग दुख-भंजन॥
सांख्य योगिहिं ज्ञान सुहावा। कर्म योगिहिं कर्म लुभावा॥
बिनु कर्म सिद्धि न कोऊ पावै। प्रकृति वश सबहिं कर्म कमावै॥
(भावार्थ: भगवान मुस्कुराकर बोले—हे अर्जुन! इस संसार में कल्याण के दो ही मार्ग हैं। ज्ञानियों के लिए 'ज्ञान योग' (सांख्य) और कर्मशीलों के लिए 'कर्म योग'। याद रखो, कर्म का त्याग करने मात्र से कोई सिद्धि नहीं पाता, क्योंकि प्रकृति के गुण हर जीव से निरंतर कर्म करवाते हैं।)
।। शत्रु रूपी काम (इच्छा) का नाश: चौपाई संकलन ।।
अर्जुन पूछत प्रभु समुझावा। पाप करत नर किस वश आवा॥
अनिच्छा तदपि जो करि पापा। कौन शक्ति दै अति संतापा॥
हँसि बोले प्रभु सुनु रे भाई। काम क्रोध रिपु अति कठिनाई॥
रजोगुण सोय उपजत ईहा। महाशत्रु यह जानहु तीहा॥
महापाप और महा-अहारी। काम रूप है वह रिपु भारी॥
पावक सम यह तृप्त न होई। ज्ञानहिं ढांकत जानहु सोई॥
जैसे धुँआ आग को ढँकता। दर्पण धूलि सों मलिन दिखता॥
जेहि विधि गर्भ झिल महँ सोहे। काम विवेकहिं तैसे मोहे
ज्ञानी का यही नित्य वैरी। काम रूप जो विपदा घेरी॥
इन्द्रिय मन अरु बुद्धि निवासा। यहाँ बैठि यह करहिं विनाशा॥
इन्द्रिय मन सों ज्ञानहिं मारे। जनहिं मोह के जाल पँधारे॥
यहि कारण इन्द्रिय को रोको। काम पाप सब मन के टोको॥
ज्ञान विवेक विनासक एहा। त्यागहु पार्थ मोह यह नेहा॥
इन्द्रिय श्रेष्ठ देह सों जानो। मन इन्द्रिय सों श्रेष्ठ बखानो॥
बुद्धि श्रेष्ठ है मन सों भाई। आत्म बुद्धि सों परे सुहाई॥
बुद्धि सों भले आतम जानो। आतम बल सों कामहिं हानो॥
मन को बुद्धि सों स्थिर कीन्हा। आतम ज्ञान माहिं चित दीन्हा॥
दुर्जय शत्रु काम यह भारी। जीति लेहु एहि धनुष धारी॥
इच्छा रूपी सर्प विशाला। डसत ज्ञान को करि विकराला॥
विषय भोग की तृष्णा त्यागौ। जागृत होइ सत्य महुँ लागौ॥
अतृप्त अग्नि काम कहावै। जितना डालो उतना बावै॥
संयम की जब धार चलावे। तबहीं काम शत्रु मिट जावे॥
आतम बोध दीप जब बारै। काम अँधेरा तबहीं हारै॥
परम लक्ष्य महुँ मन को लावो। काम जीत कर अमरत पावो॥
।। निष्काम कर्म महिमा: चौपाई संकलन ।।
तजहु असक्ति कर्म फल आसा। हृदय राखि हरि पद विश्वासा॥
फल की इच्छा जो मन माही। कर्म बंध सो छूटत नाही॥
सिद्धि असिधि समान जो मानै। सोय पुरुष असली सुख जानै॥
बिन कर्म कोउ रहि नहिं पावा। प्रकृति स्वभाव सबहिं नचावा॥
नियत कर्म तू कर रे भाई। कर्महीनता दोष सदाई॥
यज्ञ हेतु जो कर्म कराहीं। बंधन मुक्त सोय नर आहीं॥
स्वार्थ त्यागि जो सेवा ठानै। जग में सोई ज्ञानी जानै॥
मनुज देह केवल कर्माहीं। आलस में कछु सिद्धि न पाहीं॥
परहित बस जो करइ उपाई। ताकी प्रभु नित करहिं सहाई॥
ज्ञानी सो जो कर्म न त्यागै। मोह त्यागि जो रण में जागै॥
जैसे जल महँ कमल निराला। तैसे कर्म करहु जग पाला॥
इन्द्रिय वश में जो नर राखे। सोय परम रस अमृत चाखे॥
कर्म करो पर चित न डलावो। ईश्वर अर्पण सब फल पावो॥
कर्तव्य भाव हृदय समाई। दुख की छाया निकट न आई॥
श्रेष्ठ पुरुष जो अचरन करहीं। सकल लोक वहिके अनुसरहीं॥
मोह त्यागि जो पुरुष विचारे। जीवन नैया भव से तारे॥
कर्म ज्ञान की सुन्दर जोड़ी। मोह कंचन जंजीर तोड़ी॥
अपना धर्म सदा सुखकारी। और धर्म महँ भय है भारी॥
चित शुद्धि निष्काम से होई। आत्मज्ञान पावै नर सोई॥
कर्मयोग पावन सुख राशी। मिलत अंत होवे अविनाशी॥
अहंकार जब मन से जाई। तब निष्काम शक्ति प्रकटा़ई॥
नहीं अपेक्षित कीर्ति बखानी। कर्म ईश सेवा सम जानी॥
सुख-दुख में जो अडिग रहावे। कर्मयोग वह सिद्ध कहावे॥
मा फलेषु का मंत्र विधाता। कर्महि बस तेरा सुखदाता॥
।। कर्म बनाम संन्यास: चौपाई संकलन ।।
अर्जुन मन में संशय भारी। कर्म तजूं कि बनूं संसारी॥
ज्ञान श्रेष्ठ या कर्म विधाना। केशव मोहि देहु समझाना॥
हँसि बोले तब श्री जगदीशा। सुनहु पार्थ तुम अति मति धीशा॥
सांख्य अरु योग एकहि भाई। मूढ़ कहत हैं इसे जुदाई॥
कर्म त्याग से सिद्धि न होई। ज्ञान बिना नहिं तिरता कोई॥
पर संन्यास कठिन अति भाई। कर्मयोग पथ सुलभ सदाई॥
इन्द्रिय रोके ध्यान लगावै। मन विषयान्तर भटकत जावै॥
बाहर यति अरु भीतर कामी। मिथ्याचारी अधमी स्वामी॥
नियत कर्म जो वीर न त्यागै। आसक्ति तजे रण में जागै॥
सो संन्यासी सच्चा जानो। जो नहिं द्वेष न इच्छा ठानो॥
कर्म करत जो ईश उचारे। सोय जगत में काज सँवारे॥
जैसे जल में नाव रहत है। पै जल भीतर नाहिं बहत है॥
ज्ञानी कर्म करै बिनु आशा। लोक काज की मन महँ पासा॥
अजानी ज्यों मोह वश करहीं। ज्ञानी तैसे जग हित चरहीं॥
बिनु संन्यास न योग सधै है। बिनु संकल्प न कर्म बँधे है॥
त्याग वही जो मन से होई। वेश बदल सन्यास न कोई॥
पाप पुन्य से ऊपर उठकर। कर्म समर्पण प्रभु को देकर॥
ज्ञानी कर्म बीच सुख पावै। संन्यासी सम शांति बढ़ावै॥
प्रकृति जस गुण कर्म करावै। अहंकार बस जीव भुलावै॥
कर्तापन का मद जो त्यागै। सो संन्यास मार्ग में जागै॥
सांख्य योग फल एकहि देवा। जो देखै सो पावै भेवा॥
कर्म योग बिनु दुख दुख भाई। संन्यास बिना न शांति आई॥
कर्म हि पूजा कर्म हि भक्ती। तजहु पार्थ तुम केवल शक्ती ॥
कर्मठ होकर मन संन्यासी। होत अंत में वह अविनाशी॥
।। यज्ञ और कर्तव्य भाव: चौपाई संकलन ।।
यज्ञ चक्र ईश ने बनाया। सृष्टि हेतु यह पंथ दिखाया॥
सहयज्ञ प्रजा रचि विधाता। कह्यो कर्म ही सुख की दाता॥
यज्ञ हेतु जो कर्म कराहीं। बंधन मुक्त सोई नर आहीं॥
स्वार्थ लागि जो काज सँवारे। सोइ जीव भव जाल पँधारे॥
अन्न उपजत वर्षा के नीरा। वर्षा यज्ञ सों मिटत अधीरा॥
यज्ञ कर्म से होत प्रसूता। कर्म ब्रह्म से उपजे दूता॥
देव लोक को मख(यज्ञ) तृप्तावै। देव लोक फिर फल पहुँचावै॥
परस्पर भाव बढ़ावत दोऊ। परम श्रेय पावत है कोऊ॥
जो न चलत यह चक्र अनूपा। इन्द्रिय लोलुप पाप स्वरूपा॥
व्यर्थ जन्म सोई नर पावै। जो न यज्ञ हित कर्म कमावै॥
अपना पेट भरत जो केलि। भुंजत पाप कुबुद्धि अहेलि॥
यज्ञ अवशेष जो अन्न चखाहीं। सब पापन से मुक्त सो आहीं॥
जैसे सूर्य प्रकाश लुटावत। बदले में कुछ माँगन नावत॥
तैसे मनुज यज्ञ मन धारे। निज कर्तव्य को ही विस्तारे॥
ज्ञानी कर्म करै बिनु मोहा। जैसे यज्ञ अग्नि जग सोहा॥
अहंकार की संिध लगावै। ममत्व स्वाहा करि सुख पावै॥
सेवा यज्ञ धरम अनुसारी। मिटत सकल जगत की दुखारी॥
दान मान अरु सत्य सुभावा। यज्ञ रूप ये कटत विलावा॥
कर्तव्य ही पावन समिधा है। धर्म काज ही शुद्ध विधा है॥
लोक संग्रह हित जो कछु कीन्हा। यज्ञ भाव से प्रभु को दीन्हा॥
नहीं स्वार्थ की तनिक कामना। प्रभु चरणों में लो लौ लाना॥
यज्ञ पुरुष प्रभु श्री भगवाना। तिनकइ हेतु करहु कल्याणा॥
कर्म यज्ञ जो सिद्ध करावै। अन्त काल में शान्ती पावै॥
यज्ञमयी यह जीवन सारा। बहै भक्ति की निर्मल धारा॥
।। लोक-संग्रह और आदर्श आचरण: चौपाई संकलन ।।
लोक-संग्रह हेतु कर कामा। श्रेष्ठ पुरुष का यही प्रणामा॥
ज्ञानी सो जो मार्ग दिखावे। वही जगत सन्मार्ग लियावे॥
श्रेष्ठ जन जो आचरन करहीं। सकल लोक अनुसरन करहीं॥
जो नीति और नियम बनावें। साधारण जन ताहि मनावें॥
देखहु पार्थ मोरि गति भाई। तीन लोक कछु शेष न आई॥
नहिं अप्राप्त कछु मोहि निहारा। तदपि कर्म महुँ रहूँ सँवारा॥
यदि मैं आलस बस रुक जाऊँ। कर्म मार्ग को तज बिसराऊँ॥
लोग सकल मम पंथ धरेंगे। पतन गर्त में सबहि गिरेंगे॥
वर्णसंकर जगत जो होई। धर्म नाश का कारण सोई॥
प्रजा विनासक मैं कहलाऊँ। तज कर्तव्य यदि मैं सुख पाऊँ॥
अज्ञानी आसक्ति वश करहीं। ज्ञानी तैसे जग हित चरहीं॥
बिनु आसक्ति कर्म जो ठाने। लोक-संग्रह सोई नर जाने॥
बुद्धि-भेद नहिं करै सयाना। सुघर देइ मतिहीनहिं ग्याना॥
स्वयं कर्म महुँ युक्त रहावे। औरन को भी मार्ग लगावे॥
राखइ पावन लोक मरजादा। ज्ञानी मेटत मन कइ बाधा॥
जैसे जल बिनु मीन न जीवे। तैसे धर्मज अमृत पीवे॥
अनुशासन अरु शील सुभावा। लोकहि -संग्रह मूल प्रलावा॥
धर्म ध्वजा को ऊँच उठावे। तबहिं समाज प्रगति पथ पावे॥
करतब ही हो लक्ष्य हमारा। राष्ट्र धर्म सबसे है प्यारा॥
अहंकार तजि सेवा कीन्हा। लोक-संग्रह हेतु मन दीन्हा॥
सत्य राह पर जो पग धारे। कोटि-कोटि जन ताको प्यारे॥
परहित बस जो जीवन देवै। सोई जग महँ श्रद्धा लेवै॥
प्रभु अर्पण सब कर्म करीजै। लोक-संग्रह हेतु बल दीजै॥
समरसता का दीप जलावे। अंधकार जग का मिट जावे॥
।। शत्रु रूपी काम (इच्छा) का नाश: चौपाई संकलन ।।
अर्जुन पूछत प्रभु समुझावा। पाप करत नर किस वश आवा॥
अनिच्छा तदपि करै जो पापा। कौन शक्ति दै अति संतापा॥
हँसि बोले प्रभु सुनु रे भाई। काम क्रोध रिपु अति कठिनाई॥
रजगुन जिससे उपजत ईहा। महाशत्रु यह जानहु तीहा॥
महापाप अरु महा-अहारी। काम रूप यह बैरी भारी॥
अग्नि समाना तृप्त न होई। ज्ञानहिं ढाँकत जानहु सोई॥
जैसे धुँआ आग को ढँकता। दर्पण धूलि सों मलिन दिखता॥
जेहि विधि गर्भ झिल्ली महँ सोहे। काम विवेकहिं तैसे मोहे॥
ज्ञानी का यह नित्य वैरी। काम रूप जो विपदा घेरी॥
इन्द्रिय मन और बुद्धि निवासा। यहाँ बैठि यह करहिं विनाशा॥
इन्द्रिय मन सों ज्ञानहिं मारे। जीवहिं मोह के जाल पँधारे॥
तस्मात् प्रथमहिं इन्द्रिय रोको। काम क्रोध पापी को टोको॥
ज्ञान विज्ञान नासक एहा। त्यागहु पार्थ मोह यह नेहा॥
इन्द्रिय श्रेष्ठ देह सों जानो। मन इन्द्रिय सों श्रेष्ठ बखानो॥
बुद्धि श्रेष्ठ है मन सों भाई। आत्मा बुद्धि सों पर सुहाई॥
बुद्धि सों अधिक आतम जानो। आतम बल सों कामहिं हानो॥
मन को बुद्धि सों स्थिर कीन्हा। आतम ज्ञान माहिं चित दीन्हा॥
दुर्जय शत्रु काम यह भारी। जीति लेहु इहिके धनु धारी॥
इच्छा रूपी सर्प विशाला। डसत ज्ञान को करि विकराला॥
विषय भोग की तृष्णा त्यागौ। जागृत होइ सत्य महुँ लागौ॥
अतृप्त अग्नि इ काम कहावै। जितना डालो उतना बावै॥
संयम की जब धार चलावे। तबहीं काम शत्रु मिट जावे॥
आतम बोध दीप जब बारै। काम अँधेरा तबही हारै॥
परम लक्ष्य महुँ मन को लावो। काम जीत कर अमरत पावो॥
दोहा
इन्द्रिय मन अरु बुद्धि तजि, आतम रूप निहार।काम रूप रिपु जीतिये, करि विवेक अधिकार॥
निष्काम कर्म सार है, गीता का उपदेश। कर्म करत जो हरि भजै, मिटत सकल दुख-क्लेश॥
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श्रीमद्भगवद्गीता चौथा अध्याय 'ज्ञानकर्मसंन्यासयोग' अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान, कर्म और दिव्य जन्म-कर्म के रहस्यों को समझाया है।
दोहा
आदि देव उपदेस प्रभु, दीन्हा रवि कहँ ज्ञान।परंपरा पुनि लुप्त भइ, अर्जुन कहँ भगवान॥
ज्ञान अग्नि परजालि के, कर्म भस्म करि डार। योग युक्त जो नर रहै, सो पावै भव पार॥
चौपाई
आदि देव रबि कहँ यह गावा। मनु इक्ष्वाकु वंश बढ़ि आवा॥
काल संग यह योग बिलाना। तब अर्जुन कहँ कृष्ण बखाना॥
जब-जब धर्म ग्लानि जग होई। तब-तब देह धरूँ प्रभु सोई॥
परित्राण हित साधु अपारा। असुर विनाश सृजउँ अवतारा॥
दिव्य जन्म मम कर्म अनूपा। जो जानै सो तजइ स्वरूपा॥
वीतराग भय क्रोध बिहीना। मन्मय मोहि भजहिं लवलीना॥
जस विधि मोहि भजहिं नर जोई। तस विधि फल पावत सब कोई॥
वर्ण विभाग कीन्ह मैं भाई। गुण अरु कर्म भेद बिलगाई॥
कर्म अकर्म भेद किमि जानै। मुनि जन भी नहिं सत्य बखानै॥
कर्म माहिं जो देख अकर्मा। अकर्म माहिं कर्म निज धर्मा॥
सोइ बुधिमान योगी सोई। कर्म फलहु आसक्ति न होई॥
आसक्ति त्यागि कर्म जो करिइ। कबहुँ न लिप्त सो भव जल तरइ।।
काम संकल्प बिन जो कर्मा। ज्ञान अग्नि दग्ध भये धर्मा॥
निराश्रय जन अरु नित्य तृप्ता। कर्म करै पर बंध न लिप्ता॥
जितचित जेहि परिग्रह नाहीं। दोष न व्यापे ताके माहीं॥
इच्छा रहित सदा संतोषी। द्वंद्व रहित नहि ईर्ष्या दोषी॥
ब्रह्म अर्पण ब्रह्म हवि जानो। ब्रह्म अग्नि महुँ ब्रह्म बखानो॥
ब्रह्म कर्म महुँ समाधि जेही। ब्रह्म प्राप्त होवत है तेही॥
देवन्ह करहिं यज्ञ उपासा।कोउ योगाग्नि आहुति दासा॥
प्राणायाम परायण कोई। पवन प्राण महुँ रोकत सोई॥
द्रव्य यज्ञ सों ज्ञानहि श्रेष्ठा। सब कर्मन की यहि महुँ निष्टा॥
गुर पद जाई करहिं प्रणामा।प्रश्न सेव ते पावहिं ज्ञाना॥
तत्वदर्शी जो ज्ञान सुनावैं। मोह जाल सों तोहि छुड़ावैं॥
पुनि न मोह अस होइहि ताता। लखिहहिं सब महुँ एक विधाता॥
पापिन महुँ जो अति ही पापी। ज्ञान तरई भावसागर आपी॥
यथा ईंधनो अग्नि जलावे। त्यों ज्ञान कर्म भस्म करावे॥
ज्ञान समान न पावन कोऊ।सिद्ध जन पावहि आपु सोऊ॥
श्रद्धावान जन पावहि ज्ञाना।तत्पर रहि संयम सुख धामा॥
अज्ञ अश्रद्ध संशयधारी। नास होइ ते नर दुख भारी॥
संशय धारि लोक परलोका।सुख नहिं पावहि व्यापे शोका॥
तजि के भोग कर्म जे करई। ज्ञान काटि संशय सब हरई।।
आतम परायण प्रभु जो सँधई। सो नर नाहि कर्म से बँधई॥
मोह त्यागि जो रहत उदासा ( बैरागी )। विचरत जग जनु मुक्त अकासा॥
सिद्धि असिद्धि सम जेइ मानै। सच्चा सुख सो हृदय बखानै॥
भोग विषय सों प्रीति न राखै। ज्ञान सुधारस सोई चाखै॥
कर्म त्याग नहिं ज्ञान अधूरा। बिना कर्म नहिं होइ सपूरा॥
सब भूतन महुँ एकहिं देखै।सोइ पंडित ज्ञान सों लेखै॥
शांति परम सो शीघ्रहि पावै। संशय तजि जो हरि गुण गावै॥
मन अज्ञान जनित जो संशय।ज्ञान खड्ग सों करइ तहिं क्षय॥
उठहु पार्थ अब तजहु विषादा। योग युक्त हो मिटहि प्रमादा॥
कर्म करे पर फल नहिं चाहै। ज्ञान अग्नि महुँ जो अवगाहै॥
त्यागि असक्ति शांत मन होई। स्थितप्रज्ञ कहिए नर सोई॥
ब्रह्म ज्ञान अरु कर्म सुजोगा।यहि ज्ञान संन्यास सुजोगा॥
परम तत्व यह कृष्ण सुनावा। अर्जुन के मन मोह नसावा॥
जो अध्याय नित्य चित लावै। सो भव सागर पार लगावै॥
ज्ञान भक्ति अरु कर्महि सारा। गीता देति अमित सुख धारा॥
कृष्ण चरण महुँ प्रीति बढ़ावहु। जीवन सफल परम पद पावहु॥
जय जय माधव ज्ञान प्रदाता। भक्त वत्सल जगत सुखदाता॥
ज्ञान यज्ञ महिमा अति भारी, सकल कर्म जरि जस चिनगारी।
सम ज्ञानेन नाहिं जग आना, पावन परम सत्य यह जाना॥
श्रद्धावान लहे यह ज्ञाना, संयत इंद्रिय रहे सुजाना।
संयत इंद्रिय जेहिं कर होई, परम शांति पावत है सोई॥
जिन्हके मन संशय बसि जाई, तिन कहँ सुख कहुँ नाहिं सहाई।
पाये ज्ञान शांति अति पावे, भव-सागर से पार लगावे॥
संशय-आत्मा विनसत जाई, सुख नहिं इहँ नहिं उहाँ सहाई।
योग युक्त जो कर्म बिसारे, ज्ञान खड्ग संशय सब मारे॥
ताते ज्ञान खड्ग कर लीजै, संशय काटि योग मन दीजै॥
तजहु मोह अब उठहु धनंजय, तजहु अकर्म कर्म के संशय।
हृदय बसत अज्ञान अँधेरा, ज्ञान असि काटु करहु सबेरा॥
करहु योग मन प्रभु महँ लाई, युद्ध हेतु उठु अवध सहाई।
दुविधा-तजि जो कर्म कमावे, सो नर बंधन कबहुँ न पावे॥
मोह त्यागि उठु भारत बीरा, तजहु अविद्या भजहु सुधीरा।
सब अरपन प्रभु पद महँ कीन्हा, सोई पुरुष परम सुख चीन्हा।
मिटे सकल संशय अवसादा, जय चतुर्थ अध्याय प्रसादा॥
दोहा
संशय जनित अज्ञानता, होत जबहि बलवान। ज्ञान खड़ग से काटि प्रभु, दीन्ह अभय हरि दान।।
तजि प्रमाद उठि पार्थ अब, योग माहिं चित लाय।कर्म करत फल त्यागि के, परम मोक्ष कहँ पाय॥
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श्रीमद्भगवद्गीता
पाँचवाँ अध्याय- संन्यासयोग
हमें यह सिखाता है कि कर्मों का स्वरूप से त्याग करने की अपेक्षा, निष्काम भाव से कर्म करना श्रेष्ठ है। इसमें समदृष्टि और कर्तापन के अहंकार से मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
संन्यासयोग - प्रारंभ दोहा
सांख्य योग अरु कर्म विधि, पूछत पार्थ सुजान।कवन श्रेष्ठ है द्विविध महुँ, कहहु कृपा करि भान॥
ज्ञान और निष्काम पथ, एकहिं रूप बखान। ममता तजिहि कर्म करे, सोइ परम विद्वान॥
॥ चौपाई संग्रह॥
संन्यास कर्म द्विनऊ नीके। मुक्ति मार्ग जनु मंगल जी के॥
तदपि कर्म तजि योग सुहावा। कर्मयोग प्रभु श्रेष्ठ बढ़ावा॥
राग द्वेष तजि जो नर होई। नित्य संन्यासी कहिये सोई॥
सांख्य योग कहँ पृथक बखानै। बाल बुद्धि तिन कहँ नहिं जानै॥
एकहु महुँ जो निष्टा पावै। उभय लोक फल सो नर पावै॥
सांख्य योग सों पद जो लहहीं। योग युक्त जन सोई कहहीं॥
एक रूप जो देखइ भाई। देखत सत्य सोइ सुख दाई॥
योग बिना संन्यास न आवै। योग युक्त मुनि ब्रह्महिं पावै॥
शुद्ध आत्मा जितेन्द्री जेई । सर्वभूत प्रिय कहिये सोई॥
सब महिं जे निज आत्मा देखै। कर्म करत नहिं दोष विशेषै॥
देखत सुनत छुअत अरु खाई। गंध लेत अरु सोवत जाई॥
इन्द्रिय इन्द्रिय अर्थन माहीं। मैं न करत कछु संशय नाहीं॥
ब्रह्म माहिं करि अर्पण कर्मा। त्यागि संग बरते निज धर्मा॥
लिप्त न होइ पाप सों सोई। पद्म पत्र जनु जल महुँ होई॥
कायू मनसा बुद्धी चारी। केवल इन्द्रिय कर्म विचारी॥
आत्म शुद्धि हित कर्म कराहीं। ममता त्यागि योग मन माहीं॥
युक्त पुरुष फल त्यागिहि भाई। पावत शांति परम सुख दाई॥
अयुक्त फलहि आसक्ति मारे। बँधत जाइ भव सिन्धु किनारे॥
देही नव द्वारे पुर माहीं। वश करि मन सुख सों बस जाहीं॥
ना कछु करइ न काज करावइ। आतम महुँ सो सुख नित पावइ॥
६. ईश्वर की अकर्ता स्थिति
कर्तृत्व न कर्मा सृजइ गोसाईं। प्रभु नहिं रचत जगत के ताईं॥
राग द्वेष तजि जो नर होई। सो संन्यासी कहि सब कोई॥
तन मन बुद्धि करइ जो काजा। इन्द्रिय कर्म करइ बिनु साजा॥
युक्त पुरुष फल त्यागिहि भाई। शांति परम सोई नर पाई॥
न कर्म फल संयोग विधाता। स्वभाव ही बरतत सब नाता॥
पाप पुण्य कछु नहिं प्रभु लेई। ज्ञानहि अज्ञानहि ढँकि देई॥
ताते मोहित सब जग प्राणी। लखहिं न सत्य परम प्रभु वाणी॥
ज्ञान सों जेहि मोह नसावा। तिनके हृदय भानु प्रगटावा॥
तत-बुधि तत-मन सोइ लय लीना। बहुरि न जन्म भक्ति रस भीना॥
ज्ञान धूत कल्मष (पाप) जो होई। ब्रह्म परायण पावत सोई॥
परम पद सोइ प्राप्त कराहीं। संशय मन मँह रहत न माहीं॥
विद्यहि विनय युक्त जन होई। विप्र गऊ गज सम सब कोई॥
लघु-विशाल सब एकहिं रूपा। सम लखि ज्ञानी ब्रह्म स्वरूपा॥
समत्व मँह जो मन थिर राखा। जीतहि सर्ग वेद अस भाषा॥
निर्मल मन हो ब्रह्म समाना । ब्रह्महिं थिर सो पावत जाना॥
प्रिय पावे नहिं हर्षित होई। अप्रिय पाय न विचलित सोई॥
ब्रह्म विद् ब्रह्म महुँ थिर होई। संशय मोह सकल तजि सोई॥
बाह्य स्पर्श महुँ सुख नहिं पावै। आतम सुख महुँ जो मन लावै॥
ब्रह्म योग जुत आत्मा जेही। अक्षय सुख सो पावत तेही॥
विषय भोग जो भोगत भाई। दुःख योनि ते सब दुख दाई॥
आदि अंत वाले सब भोगा। तिन महुँ रमत न पंडित योगा॥
काम क्रोध के वेगहिं जोई। सहइ देह तजि पावै सोई॥
सोइ सुखिया सोइ नर योगी। विचरत जग महुँ परम वियोगी॥
अन्तः सुख अन्तः आरामा। अन्तः ज्योति जो आत्म धामा॥
ब्रह्म भूत सो योगी होई। ब्रह्म निर्वाण पावत सोई॥
क्षीण भये सब कल्मष(पाप) जाके। द्वंद्व मिटे सब संशय ताके॥
सर्वभूत हित रत जो प्राणी। पावत ब्रह्म परम सुख वाणी॥
काम क्रोध सों रहित जोई। यतचित सो आतम बिद सोई॥
तिनके निकट ब्रह्म निर्वाणा। सदा रहत अस वेद बखाना॥
प्राण अपान( वायु) समान नसाहीं। हृदय ध्यान प्रभु रूप सदाहीं॥
मुक्ति परायण मुनि जो होई। सदा मुक्त सो जानहु सोई॥
आदि अंत वाले सब भोगा। तिन महुँ रमत न पंडित योगा॥
जो सुख बिषय भोग से आवैं। अंत समय दुख अमित बढ़ावैं॥
ब्रह्म योग महुँ उत मन जेही। अक्षय सुख सो पावत तेही॥
बाहर के सुख झूठे जानो। आतम रस ही साँचो मानो॥
प्रिय पावै नहिं हरष बढ़ावै। अप्रिय महुँ नहिं मन मुरझावै॥
थिर बुद्धि जो ब्रह्म महुँ राता। सो जग माहीं जीवन पाता॥
ना कहुँ पाप न पुन्य विधाता। जीव धरत करमहिं सों नाता।।
अज्ञानहिं बस सब जग डोले। ग्यान बिन कोउ साँच न बोले॥
जीत लीन्ह सो जीते जी जग। समता महुँ जे धरे सदा पग॥
ब्रह्म दोष बिनु ब्रह्म समाना। तिनके हृदय बसत भगवाना॥
काम क्रोध के वेग नसाहीं। सहि ले जो ई देह दहाहीं॥
(दहाहीं -शरीर में उठने वाली वह तड़प या जलन जो विकारों से पैदा होती है।)
सो जोगी सो सुखी कहावा। जे आतम महुँ ध्यान लगावा॥
सब जीवन महुँ आतम देखै। कौनों को नहिं दूजा लेखै॥
ऋषि वहि जो सब कर हित चाहै। ब्रह्म ज्ञान की नदिया नाहै॥
पंचम पाठ सार यहु गाई। मुक्ति राह अब सुगम दिखाई॥
कृपा कृष्ण की जो जन पावै। भव सागर से सो तरि जावै॥
नाम जपें जो नित मन लाई।तिनके संकट प्रभु मिटाई॥
॥ दोहा ॥
भोक्ता यज्ञ तपस जेइ, लोक महेश्वर जान। सुहृद सबहिं भूतन के, पावत शांति महान।।
पंचम यह अध्याय है, कृष्ण ज्ञान भण्डार। ममता त्यागि कर्म करे, उतरै सो भव पार॥
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अध्याय छह
आत्मसंयमयोग:
दोहा
छठा अध्याय योग का, मन को करे सुजान। चंचल वृत्ति शांत करे, पावै पद निर्वाण॥
ज्ञान ध्यान की युक्ति अब, कहत कृष्ण करुणाध। साधक मन पावन करे, मिटे सकल मन व्याध॥
चौपाई
मन ही आपन मित्र कहावे,मन ही शत्रु बन दुःख पावे।
जे आपन मन जीतन कीन्हा।सो जग मँह सुख जीवन चीन्हा।।
मन वश मँह तो बंधु समाना।अनियंत्रित तो शत्रु महाना।
सीत घाम मानहुँ अपमाना।सम चित्त रहै सोइ सुजाना॥
माटी पत्थर कंचन जाना।योगी देखहिं एक समाना।
मित्र शत्रु और उदासीना।सबको देखे सम परवीना।
एकाकी रह ध्यान लगावे। आशा तृष्णा दूर भगावे।
रोकि मनहिं एकागर भावा। आतम सुद्धि परम सुख पावा॥
भाग 2: ध्यान की विधि और अनुशासन
ऊँचा नहिं नहिं नीचा आसन। कुश मृगछाला मृदु हो वासन।।
स्थिर होकर आसन पर ठाटे। इंद्रिय मन के जाले काटे।।
(ठाटे -सजावट, व्यवस्था )
काया शिर अरु ग्रीवा सीधी। अचल रहे पावे सुख सिद्धी।।
दृष्टि रहै नासा के अग्रा। मन नहिं भटकै होइ न व्यग्रा॥
ब्रह्मचर्य व्रत मन में धारे। भय का त्याग हृदय से वारे।।
भोजन संयम अति सुखकारी।जागे सोए नियम विचारी।।
जो अति खाता सो नहिं योगी। जो नहिं सोता वह अति रोगी।।
दुख का नाश योग से होवे। संयम से जो निद्रा खोवे।।
भाग 3: मन का निग्रह और अभ्यास
दीपक जैसे वायु विहीना। विचलित नहिं हो योग प्रवीणा।।
जहाँ रुके मन आत्म अधारा।वहां बहे नित सुख की धारा।।
विषय वासना मन से त्यागे।आत्म तत्व मँह जो जन जागे।।
चंचल मन जब बाहर जाए।बुद्धि पकड़ फिर वापस लाए।।
बार-बार अभ्यास बढ़ाओ।भटके मन को राह दिखाओ।।
शांत चित्त पावे सुख भारी।पाप रहित हो ब्रह्म विचारी।।
सब भूतों में प्रभु को देखे। प्रभु में सब संसार विशेषे।।
दुख सुख सबको अपना जाने। श्रेष्ठ योग की महिमा माने।।
भाग 4: अर्जुन की शंका और कृष्ण का समाधान
पार्थ कहहिं प्रभु मन अति चंचल। जैसे वायु चले अति परबल।।
यहिके रोकब दुष्कर स्वामी। आप कहो हे अंतर्यामी।।
कृष्ण कहहिं अभ्यास बढ़ावा। संग बैराग यहि समुझावा।।
जेकर मन नहिं वश में भाई। योग सिद्धि उसने नहिं पाई।।
श्रद्धा से जो योग लगावे। अंतिम काल परम गति पावे।।
योग नष्ट भ्रष्ट होइ जाई। प्रभु चरनन जब संशय लाई।।
कृष्ण कहहिं शुभ मारग राही। दुर्गति कबहुँ न पावइ भाई॥
शुभ कर्मन कै फल नहिं मिटता। जनम योगियन के घर मिलता।।
भाग 5: पुनर्जन्म और योग की श्रेष्ठता
पूरब जनम भाव जब जागे। फिरि सोइ जोग मारग भागे॥
जतन करै जो जनम अनेका, लहइ तबहिं पद परम विवेका।
तपसी ज्ञानी करमी सोई। योगी सब सों ऊँचो होई॥
श्रद्धावान जो मोहि ध्यावे। वह योगी सबसे सुख पावे।।
कर्म करे फल त्याग विचारी।वह सन्यासी वही विहारी।।
संकल्प का त्याग जो करता। योग शिखर पर वही विचरता।।
इंद्रिय भोग न मन को भावे।योगारूढ़ वो ही कहलावे।।
मन उद्धार स्वयं ही कीजे। खुद नीचे नहिं गिरने दीजे।।
भाग 6: उपसंहार - प्रभु भक्ति
ज्ञान विज्ञान तृप्त मन करे। कूटस्थ योग जीत मन हरे।।
समता भाव हृदय मँह आये। सबहि द्वंद्व से मुक्ती पाये।।
मन की चंचलता जे जीते। प्रेम भक्ति के अमृत पीते।।
ध्यान योग है साधन पावन। निर्मल करत मनुज का जीवन।।
जो मन जीते वही विजेता। गीता का यह मंत्र सुचैता।।
योग युक्त हो कर्म करइ जो। भव सागर से पार उतरि वो।।
आत्म बोध का दीप जलाये। कृष्ण शरण में वो मिल जाओ।।
यह अध्याय योग का सारा। आत्म ज्ञान की बहती धारा।।
दोहा
अभ्यास और बैराग, श्रेष्ठ करें परिणाम। समता जो भी धारते, वे ही श्रेष्ठ सुजान।।
षष्ठम भाग पूर्ण भयो, योग सार सुख नाम। आतम में परमातमा, देखत आठों धाम॥
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॥श्री गीता-सार-प्रवाह: प्रथम भाग समापन॥
कृष्ण चरन धरि मस्तक भाई। कहि गीता अवधी सुखदाई॥
मन वश में तो बंधु समाना। बिनु वश शत्रु होइ बलवाना॥
अनियंत्रित मन शत्रु महाना। संयम से पावै विज्ञाना॥
मनहिं जीत जो शांत रहाई। परमात्मा महँ सोइ समाई॥
सीत घाम या हो अपमाना। सम चित्त रहै सोइ सुजाना॥
ज्ञान ध्यान से पूरन होई।कहहि जितेन्द्री जोगी सोई॥
माटी पाथर कंचन जानी। देखत सम सब अंतर्ज्ञानी॥
अरि मीत उदासीना जोई। सम देखै प्रवीन नर सोई॥
एकाकी रहि चित्त लगावै। आशा तृष्णा दूर बहावै॥
ऊँच न नीच थिरक करि आसन। कुश मृगछाला मृदु बर वासन॥
थिर ह्वै आसन मनहीं डाँटे। इन्द्री बिषय जाल सब काटे॥
दृष्टि रहै नासा के अग्रा। मनहि न भटकै होइ न व्यग्रा॥
रोकि मनहिं एकागर भावा। आतम सुद्धि परम सुख पावा॥
ब्रह्मचर्य व्रत मन महँ धारे। निर्भय ह्वै प्रभु रूप निहारे॥
योग्य अहार बिहारु राखा। सोइ जोग फल अमृत चाखा॥
अति सोवत अति जागत जोई। जोग सिद्ध कदापि नहिं होई॥
दीप शिखा ज्यों थिर रहि भाई। त्यों जोगी निज ध्यान लगाई॥
जहाँ न दुख का लेश समाना। सोई असली जोग बखाना॥
कहि कृष्ण कल्यान पथ राही। दुर्गति कबहुँ न पावै भाई॥
पूरब जनम भाव जब जागे। फिरि सोइ जोग मारग भागे॥
तपसी ज्ञानी करमी सोई। योगी सब सों ऊँचो होई॥
श्रद्धावान भजै जो मोही। परम श्रेष्ठ जानहु तुम ओही॥
पूरन ज्ञान यहै सुखकारी। प्रथम भाग की विनय विचारी॥
कृष्ण चरन चित लाइ प्रनामा। पूर्ण भयो यह प्रथम विरामा॥
अजय हृदय राखहु यह ज्ञाना। ईस्वर भक्ति परम कल्याना॥
तजि सब आस भरोसो भारी। भजहु कृष्ण जग के हितकारी॥
ज्ञान पुंज यह रचउ अजय ने। सुनि पावैं सुख संत हृदय ने॥
प्रेम सहित जो सुमिरन करिहीं। भव सागर सो सहजहिं तरिहीं॥
दोहा
प्रथम खंड पूरन भयो, कृष्ण चरन चित लाइ। है सुगंधित अवधी महँ, गीता गाई सुनाइ॥
करम जोग अरु ग्यान का, सुंदर मिलन सुभाय।प्रथम भाग विश्राम लहि, मन आनंद समाय॥
पाँच तत्त्व मन इंद्रियाँ, जीतीं संयम धारि। प्रथम खंड यह कहि गयउ, सार शब्द विस्तारि॥
विनय विचारी दास की, कृष्ण करहु स्वीकार।प्रथम विराम लहत इहाँ, मंगलमय संसार॥
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खण्ड 2-भक्ति और ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness)
दोहा
निज स्वरूप को जान कर, हृदय जगाऊँ दीप।भक्ति मार्ग अनूप पर, मिलईं ब्रह्म समीप॥
अजय हृदय के कुंज में, बंसी मधुर बजाय। ज्ञान-कर्म की धार में, भक्ती हृदय समाय॥
चौपाई
भक्ति मार्ग अनूप सुखकारी।चेतन जागत अति उजियारी।।
अणु-अणु महँ जो ब्रह्म समाना। भक्त हृदय सोई पहचाना॥
जगत प्रपंच मिथ्या सब जाना। निज स्वरूप में मन लपटाना॥
घट-घट व्यापक चेतन राया। देखत भक्त मिटत सब माया।।
निज स्वरूप जब ब्रह्म समाई। बूँद मिले ज्यों सिंधु कहाई॥
ब्रह्म शक्ति जो अमित अपारा। बहे निरंतर भक्ती धारा।।
ज्ञान-कर्म जब भक्ति समागे। तुच्छ जगत तब मिथ्या लागे।।
चेतहि निर्मल भक्ति स्वरूपा। पावत जीव परम पद भूपा।।
वहाँ न द्वैत न कोई भेदा। गावत जे पुरान अरु वेदा॥
दोहा
मिटा द्वैत का द्वंद्व सब, हुआ ब्रह्म से मेल। देख रहा अब भक्त यह, जग प्रपंच का खेल॥
बूँद समाई सिंधु में, मिला परम पद सार। अजय परम सुख पाइया, मिटा मोह संसार॥
भावार्थ
* प्रथम चौपाई: भक्ति का मार्ग अत्यंत सुखद है, जो भीतर की चेतना को जागृत करता है। जो ब्रह्म ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है, भक्त उसे अपने हृदय में ही अनुभव कर लेता है।
* द्वितीय चौपाई: जैसे एक बूँद समुद्र में मिलकर समुद्र बन जाती है, वैसे ही जब भक्त की चेतना परमात्मा में विलीन होती है, तो सारा मायावी बंधन कट जाता है।
* तृतीय एवं चतुर्थ चौपाई: ब्रह्मांड की अनंत शक्ति प्रेम और भक्ति के माध्यम से ही सुलभ होती है। जब चेतना पूरी तरह शुद्ध हो जाती है, तब भेदभाव मिट जाता है और जीव उस 'परम पद' को प्राप्त कर लेता है जिसे वेदों ने 'अद्वैत' कहा है।
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अध्याय सात
ज्ञान विज्ञान योग
दोहा
ज्ञान-विज्ञान बखानहुँ, सुनहुँ पार्थ मन लाय।
जेहि जानत जग मा कछु, जानब शेष न राय।।
हजारन मँह कोउ एक, करत सिद्धि हित यत्न।
तिन मँह मोहि जे जानइ, पाय बोध को रत्न।।
चौपाई
श्री भगवान कहत सुनु पार्था।ज्ञान-विज्ञान कहुँ अनु स्वार्था।।
जो जानत सब संशय जाई। मोक्ष मार्ग जनु हृदय समाई।।
अगनित में कछु जतन कराहीं। सिद्धि हेतु नर यत्न लगाहीं।।
तिन सिद्धन महँ विरला कोई। मोंकहँ तत्त्वत जानत जोई॥
क्षिति जल पावक गगन समीरा। मन बुधि नभ अहंकारु धीरा॥
अष्ट रूप प्रकृति यह मेरी। 'अपरा' नाम जानु मति घेरी।
एहि से भिन 'परा' इक दूजी। जो जग जीवन शक्ति अनुजी।।
जिससे धरित सकल संसारा। जानहु कुन्तीपुत्र विचारा।।
जग उतपति प्रलय मोहि माहीं।मुझसे भिन कछु आन न नाहीं।।
सूत्र मँह मणी जेमि पिरोई। मों मँह गुँथा जगत सब कोई॥
जल में रस हूँ कुन्ती नन्दन। शशि सूरज में प्रभा अनन्दन।।
वेदन माहिं ओम् मैं पावन। नभ में शब्द सकल मन भावन।।
पौरुष नर मँह, गन्ध भूमि मँह। तेज तपन हूँ रवी रश्मि में।।
सब भूतन का बीज सनातन। बुद्धिमान की बुद्धि पुरातन।।
मैं जग कर उत्पत्ति निधाना। परलय काल मोहिं सत जाना ॥
मोंते पर कछु और न भाई। जिहि विधि मनिगन रहे सुताई ॥
रस हौं जल मँह कुन्ती नन्दन। ससि-रवि प्रभा करौ जग वन्दन ॥
वेदन मँह 'ओङ्कार' जानू। नभ मँह सबद, मनुज बल मानू ॥
पुन्य गन्ध मैं भूमि मझारी। अगिनि माहिं मैं तेज करारी ॥
सब भूतन कर बीज सनातनु। तपसी तप मैं, मैं ही चेतनु ॥
सात्विक राजस तामस भावा। सब मोंते उपजे यह नावा ॥
तदपि न तिनके वश मैं रहऊँ। सबहिं आपन मँह धारि लहऊँ ॥
त्रिगुणमयी यह माया मोरी। अति दुस्तर को सकइ न तोरी ॥
जे जन मोहे अनन्य भजहीं। तेई यहिं माया तें तरहीं ॥
माया बस जे मूढ़ न भजहीं। असुर भाव धरि नीच बिचरहीं ॥
तिनकर ज्ञान हरो माया ने। विमुख रहे प्रभु पद छाया ते ॥
सात्विक राजस तामस भावा, मुझसे ही सब होत प्रलावा।
तदपि न उनमें मैं हूँ वासा। मों महुँ बसइ सबइ परकासा।।
त्रिगुणमयी यह माया भारी, मोहित जिससे दुनिया सारी।
दैवमयी मम माया दस्तर, पार पावना अति ही दुष्कर।
जो मम शरण आवहीं प्राणी, माया तरत कहूँ सच वाणी।
नराधम मूढ़ भजन नहिं करइ। आसुरी भाव हृदय मँह भरइ।।
चतुर बिधि भजहिं मोहि सुजानी। भारत सुनु सुकृत सुभ बानी।।
आरत, अर्थार्थी, जिज्ञासू। ज्ञानी चहुँ प्रिय मम अभ्यासू।।
तिनमें ज्ञानी मो अति प्यारा। एक भक्ति हितु सदा सहारा।
ज्ञानी आत्मा रूपहि मेरा, ऐसा मत मम अटल सबेरा।
ज्ञानी भक्त सदा सुख पावै। एक भाव मोहिं नित्य ध्यावै ॥
मैं ज्ञानी कहँ अतिसय प्यारा। मो मन प्रिय जनु प्रान अधारा॥
सब उदार पै ज्ञानी मोरा। आतम रूप सोइ मति जोरा ॥
मुझमँह थिर सो दृढ़ मन होई। उत्तम गति पावत है सोई ॥
बहु जनमहिं अन्ते जो ज्ञानी। भजइ मोहिं वासुदेव जानी॥
सब वसुदेव कहइ जो संता। सो महात्मा दुर्लभ अनन्ता ॥
काम वसी जे सब जन ध्यावहिं। निज सुभाव वश नियम बनावहिं ॥
जो जिहिं विधि श्रद्धा धरि पूजा। मैं दृढ़ करौ भाव नहिं दूजा ॥
अन्तवन्त फल तिनकर होई। अल्प बुद्धि पावहिं जे कोई ॥
देव पूजि देवहिं वे जाहीं। भक्त मोर मो माहिं समाहीं ॥
जन्म अनेकन यत्न कराहीं। अन्त ज्ञान मम शरणे आहीं।।
'वासुदेव सर्वम्' जो जाना। तेहि महात्मा दुर्लभ माना।।
काम प्रेरित जो अन्य देवा। पूजत निज स्वभाव बस सेवा।।
जो जिस रूप करे मम श्रद्धा। मैं तिनकी दृढ़ करूँ सुसिद्धा।।
फल मिलता तिनको अति अल्पू। जो भजते सुर मूल विकल्पू।।
देव पूजने सुरपुर जाहीं। मम भक्त मोहि में मिल जाहीं।।
अव्यक्त व्यक्ति मो जन मानहिं। मम अविनाशी रूप न जानहिं।।
योगमया मँह ढका हुआ मैं। मूढ़ जगत को अजा हुआ मैं।।
भूत भविष्य वर्तमान मैं जानूँ। मोहि न जाने को अज्ञानूँ।।
इच्छा द्वेष जनित जो द्वन्द्वा। मोह फँसे जग मति के अन्द्वा।।
पुण्य पुंज जे करम कमावा। तिनकर मोह द्वन्द्व मिटि जावा।।
मम सरनागत जे नर आहीं। जरा मरन भय तिन कहँ नाहीं।।
पाप नष्ट करि पुण्य कमावा। द्वन्द मोह तजि मोही ध्यावा।।
जरा मरण मुक्ती जो चाहत। मम आश्रय तजि अन्य न राहत।।
वे ब्रह्म अध्यात्म सब जानहिं। कर्म अखण्डित उर पहचानहिं।।
अधिभूत अधिदैव मँह राखे। अधियज्ञ मोहि जो मन चाखे।।
अन्त काल मति मम सम होई। युक्त चित मोहि पावत सोई।
प्रकृति रहस्य समझत नीके। माया जाल होत सब फीके।
सप्तम भाग ज्ञान को सागर, भरत कृष्ण रस ज्ञान उजागर।
माया परदा जो जन टारे, माधव ताहि हृदय से धारे।
ज्ञान विज्ञान योग सुहावन, पढ़त सुनत मन होत सुपावन।
संशय तजि जो शरणे आवै, सो परमेश्वर पद को पावै।
रिद्धि सिद्धि सुख सम्पति पावै, जो हरि नाम निरंतर गावै।
भव बाधा सब दूर नसाहीं, कृष्ण कृपा मन संशय नाहीं।
प्रेम सहित जो पाठ कराहीं, तिनके कष्ट कृष्ण हर लेहीं।
इति श्री ज्ञानविज्ञान योगा, मिटे सकल जग मानस रोगा।
दोहा
अधिभूत अधिदैव अरु, अधियज्ञहिं जे जान।
अन्त काल मोहि पावहिं, तजि प्रपंच अभिमान।।
ज्ञान-विज्ञान योग यह, पूरन भयो सुजान।
कृष्ण चरन चित राखिये, पावन परम कल्यान।।
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॥ भगवदगीता: अष्टम अध्याय (अक्षरब्रह्मयोग सार) ॥
दोहा
अक्षर ब्रह्म परम अहै, अध्यातम निज भाव।
भूत भाव उद्भव करइ, विसर्ग कर्म प्रभाव।।
किमि जानहिं जन अन्त महँ, थिर करि आपन प्राण।
पूछत पार्थ अच्युत प्रभु, देहु परम कल्यान।।
अर्जुन के प्रश्न
अर्जुन बोले वचन सुजाना। किम स्वरूप वह ब्रह्म बखाना॥
अध्यात्म क्या है प्रभु कहिये। कर्म नाम किसका वह लहिये॥
अधिभूत किसे कहते स्वामी। अधिदैव कौन अंतरयामी॥
अधियज्ञ कौन है इस देही। कैसे जानत जनहिं सनेही॥
अन्त काल कैसे मन ध्यावे। कैसे माधव तुमको पावे॥
श्री भगवान कहें सुनु पारथ। अक्षर ब्रह्म परम परमारथ॥
अक्षर ब्रह्म परम अनुशासा। निज स्वभाव अध्यातम भासा।।
भूत भाव विसर्ग जो करई। सोई कर्म नाम चित धरई।।
अधिभूतहिं नस्वर जे जानहिं। सो मन अधिदैवहिं पहिचानहिं।।
अधियज्ञन मँह मैं हूँ देहा। सब यज्ञन मँह मैं फल गेहा।।
मन अरु बुद्धि मोहि महँ अर्पन। पावहु मोहि सत्य यह दरपन।।
अन्त काल मोहे चित धरई। तजि देहा मम पद अनुसरई।।
नहिं संसय कछु मानहु भाई। मिलिहौ मोहि सत्य सुखदाई।।
अन्त काल जो मोहे ध्यावे। तजकर देह मोहि में आवे॥
यहमें संशय एकहु नाहीं। जो ध्यावे सो मिले मुसाहीं॥
जो जेहिं भाव सुमिरन करई। अन्त काल देह सोइ धरई॥
सदा भाव जिस चित में राखे। सोई गति वह प्राणी चाखे॥
ताते हरदम मोहि सँभारू। कर्म करहु अरु पाप निवारू।।
अर्पन बुद्धि मोहि मँह करई। सो जातक भवजल सों तरई।।
चित नहिं डोलइ दूजी ओरा। मिलिहौ मोहि सत्य करि जोरा।।
अभ्यास योग मँह चित लावे। परम पुरुष दिव्य सो पावे॥
सब जानहिं पुरान अनुसासन। सूक्ष्महु सूक्ष्म जगत परसासन।।
अचिंत्य रूप करहि विधाता। सूर्य सतेज परम सुखदाता।।
भक्ति युक्त योगहिं बल धारे। भृकुटी मध्य प्राण विस्तारे॥
सोई दिव्य पुरुष को पावे। जन्म मरण के पार सिधावे॥
वेद विदित जो अक्षर कहहीं। वीतराग मुनि जिसमें रहहीं॥
ब्रह्मचर्य का पालन करते। सो पद संक्षेपहिं हम कहते॥
सब द्वारों को संयम करिके। मन को हृदय बीच में धरि के॥
मस्तक में निज प्राण चढ़ावे। योग धारणा में टिक जावे॥
'ओम्' ब्रह्म का नाम उचारे। तजकर देह मोहिं उर धारे॥
जो मुझको सुमिरे चित लाई। सुलभ तात मैं हूँ कपिराई॥
अनन भाव जो मनहि लावई। परम गति सोइ नर पावई॥
मोहि पाइ पुनि जनम न होई। दुखमय जग अनित्य यह सोई॥
महात्मा जन मोहि जब पावें। परम सिद्धि को वो पा जावें॥
ब्रह्म लोक तक जे भी जावे। पुनः लौट यहिं जग में आवे॥
मुझको पाकर जन्म न होई। सत्य वचन जानो सब कोई॥
सहस जुगन कर दिनु बिधि केरा। रैनिहु सहस जुगन कर फेरा॥
काल अवधि जो जन यह जानइ। दिवस रात कर मरमु पिछानइ॥
दिन आते सब भूत प्रकाशें। रात होत अव्यक्त विनाशें॥
वही भूत गण फिर फिर आवें। विवश होकर जन्म वो पावें॥
परम धाम का स्वरूप
अव्यकतहुँ ते पर जो दूजा। सोइ सनातन करियइ पूजा॥
सब भूतन कर होइ विनाशा। पर न मिटइ सो सत परकाशा।।
आखर नाम अव्यकत सोई। परम गतिहिं कहहीं सब कोई॥
जो पा बहुरि न आवन होई। सो ही परम धाम मम सोई॥
अनन्य भगति सो प्रभुहिं पावा। जा महँ सब संसार समावा॥
जेहिं काल तजि देही प्रानी। बहुरि न आवइ योगी ज्ञानी॥
अगिनि जोति दिन सुकल पखारा। उतरायन मग परम उजियारा॥
एहि मग चलि ब्रह्मविद जाहीं। ब्रह्म लोक ते पावन पाहीं॥
धूम रैनि अरु कसन पखारा। दखिनायन मग भव अँधियारा॥
यहि मग जाइ जो जोगी होई। चन्द्र जोति पाई फिरि सोई॥
सुकल कसन मग जगत मझारी। शाश्वत मानि गए मुनि भारी॥
एकहिं मग ते बहुरि न आवा। दूजे फिरि-फिरि जग भरमावा॥
यहु रहस्य जो जोगी पावै। सो न मोह के फंद फँसावै॥
जानि मरम जे मोह न आवा। योग जुगत सोई सुख पावा॥
बेदन मख तप दानन जेते। जोगी पावत सब सुख तेते॥
तजि फल सकल जाइ निज धामा। पावत ब्रह्म पदम अभिरामा॥
इहि विधि तत्व ज्ञान मन जागी। रहइ निरंतर प्रभु अनुरागी॥
अक्षर ब्रह्म माहिं मिलि जाई। अचल पदम सोइ अमित सहाई॥
दोहे
अक्षर ब्रह्म अनन्य गति, जानि लेहु मन माहिं। जो सुमिरत सो पद लहै, बहुरि जगत कहुँ नाहिं॥
बेदन मख तप दान फल, जोगी तजत सयान।अचल पदम पावत अमित, धरि हरि पद को ध्यान॥
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अध्याय नवम
राजविद्यायोग – अर्पण की शक्ति
राजविद्या है पावन, गुह्य ज्ञान की खान। कहत श्याम अर्जुन सुनहु, भक्ति सहित विज्ञान।।
बिन श्रद्धा जो नर रहें, मिलत नहिं मोहि पार्थ।जन्म-मरण के चक्र में, भटकें वे निज स्वार्थ।।
चौपाई
राजविद्या गुह्य अनूपा। अर्पण बल जानहु जग भूपा॥
प्रेम सहित जो वस्तु चढ़ावे। प्रभु सो सहर्ष हृदय लगावे॥
पतर पुष्प फल नीर लियावै। भक्ति भाव बस प्रभु मन भावै॥
धन अरु बल कछु काम न आवै। केवल प्रेम विमल मन भावै॥
शबरी भीलनि अति अनुरागी। राम मिलन हित जागी भागी॥
मतंग ऋषि की शिक्षा मानी। मार्ग बुहारित प्रेम दिवानी॥
खट्टे मीठे फल चुनि लावै। चखि-चखि प्रभु हित ढेर लगावै॥
मन में शंका तनिक न लावे। जूठे फल रघुवर को भावे॥
लक्ष्मण देखि चकित रहि जाहीं। जूठन प्रभु कैसे मुख पाहीं॥
राम हँसत अरु प्रेम बढ़ावत। कंद मूल के अमिय बतावत॥
स्वाद नहिं फल भक्ति में पावा। शबरी जन्म सफल करि गावा॥
जाति पांति कुल प्रभु नहिं चीन्हा। केवल प्रेम तत्व रस भीन्हा॥
अधमहु अधम भक्ति जो करई। भव सागर सो सहजहिं तरई॥
शबरी के बेरन की गाथा। प्रेम झुकावत प्रभु का माथा॥
प्रेम विवश रघुनाथ सिधावा। नवधा भक्ति का पाठ पढ़ावा॥
अरपन भाव हृदय मँह आई। सिद्ध योग सोई कहलाई॥
अब सुदाम के कथा सुहाई। दीन हीन कहँ बहुत सुखाई॥
द्वारक धीश सखा सुन पाये। फटे वसन द्विज द्वारे आये॥
तंदुल पोटल काँख छिपाये। संकोचवश न आगे लाये॥
प्रभु अंतरजामी सब जाना। सखा भाव अद्भुत पहचाना ॥
छीन लियो प्रभु पोटल छोटी। भक्त प्रीति नहिं देखत खोटी॥
एक मुष्टि मुख बीच चबावा। भू मंडल का राज थमावा॥
दूजी मुष्टि हाथ जब लीन्हा। स्वर्ग लोक अर्पण कर दीन्हा॥
तीजी मुठि जब गही भवानी। बस प्रभु अब सब दीन्ह निशानी॥
कहाँ सुदामा तंदुल आधा। कहाँ द्वारिका पति की बाधा॥
प्रेम वशहिं प्रभु झुक-झुक जाहीं। तंदुल सम जग में कछु नाहीं॥
अर्पण की महिमा अति भारी। रीझत कृष्ण भक्त हितकारी॥
तंदुल नहिं वो भाव अपारा। जिसने जीत लिया जग सारा॥
अहं त्याग जो अर्पण होई। राजयोग फल पावे सोई॥
श्रद्धा की सरिता मन डोले। प्रभु द्वार निज आपुही खोले॥
शबरी सुदाम साक्षी नीके। बिनु अनुराग सकल रस फीके॥
राजबिद्या जोग अति पावन। अरपन भाव सिखाय सुहावन ॥
छप्पन भोग न प्रभु को भाये। विदुर साग अरु बेर सुहाये॥
वस्तु बड़ी या छोटी नाहीं। हृदय भाव बस प्रभु के पाहीं॥
जो कछु करहु समर्पण कीजे। जीवन रस प्रभु पद में पीजे॥
यही योग की उत्तम धारा। उतरे भक्त भवाब्धिहि पारा॥
दीन हीन जो भाव सँजोवे। जनम जनम के कल्मष धोवे॥
तंदुल और बेर की वाणी। सुनहु सकल जग के सब प्राणी॥
समरस भाव भक्ति जब जागे। माया मोह दूर सब भागे॥
अर्पण ही जीवन का सारा। यही राजविद्या सुखकारा॥
ज्ञान ध्यान जप तप जो करई। अर्पण बिनु सब रीतहि भरई॥
भाव सहित अरपन जो कीन्हा। प्रभु अपना सर्वस्व दे दीन्हा॥
शबरी की कुटिया मन कीजे। राम नाम रस निसिदिन पीजे॥
सम सुदाम जे प्रीत लगावहिं। प्रभु कहँ अपना सखा बनावहिं॥
अर्पण बल घट घट उजियारा। भक्ति हेतु प्रभु लइ अवतारा॥
जय जय राम कृष्ण सुख रासी। अर्पण से कटती यम फाँसी॥
राजविद्या जेहि मन ध्यावे। परम धाम सोई जन पावे॥
प्रेम मगन हो सुमिरन कीजे। प्रभु चरनन में मन को दीजे॥
दोहे
राजबिद्या अति पावन, अरपन भाव सिखाय। जो सुदाम सम प्रीत करि, देवहि सखा कहाय॥
अनन भाव जो सुमिरई, तजि जग के सब काम।योग-क्षेम प्रभु वहि करहिं, पूरन हो सब काम॥
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अध्याय दशम
विभूति योग- हर सुंदर और श्रेष्ठ वस्तु में ईश्वर का दर्शन
दोहा
अजन्मा अरु अनादि प्रभु, सब लोकों के ईश।तत्व रूप जो जानिये, नमन करूँ धरि शीश॥
बुद्धि ज्ञान सम्मोह तज, क्षमा सत्य दम सार।उपजें सब मुझ से यहाँ, जग के भाव अपार॥
चौपाई
जय श्रीहरि अच्युत अविनाशी। घट-घट व्यापक ज्योति प्रकाशी॥
अर्जुन विनय करी कर जोरी। कहहु विभूति देव मति मोरी॥
सुनहु पार्थ मम कथा सुहावन। दिव्य विभूति परम मन भावन॥
अन्तः आदि मध्य मैं सोई। मुझसे भिन्न न दूजा कोई॥
अदिति सुतन में विष्णु कहाऊँ। तेजोमय रवि में दरशाऊँ॥
मरुतों में मैं मरीचि जानो। नक्षत्रन में शशि मन मानो॥
[ मरूत- वायु के देवता (वायु-शक्तियों में जो सबसे प्रमुख और तेजवान शक्ति है, उसे 'मरीचि' कहा गया है।)]
वेदों में सामवेद नीका। देवों में इंद्र जगत टीका॥
इंद्रिय बीच चेतना जानो। भूत प्राण में मन महँ मानो॥
रुद्रन में शंकर मैं देवा। कुबेर यक्ष करैं मम सेवा॥
वसुओं में पावक मैं पावन। मेरु शिखर मैं अति मनभावन॥
पुरोहित में बृहस्पति जानो। सेनापति में स्कंद बखानो॥
सरवर बीच सिंधु मैं भारी। भृगु ऋषि मुनि में महिमा न्यारी॥
शब्दों में ओंकार कहाऊँ। जप यज्ञों में मैं बस जाऊँ॥
स्थावर में हिमगिरि बलवाना। तरुवर में अश्वत्थ सुजाना॥
देवर्षिन में नारद जानो। गंधर्व चित्ररथ मन मानो॥
सिद्ध मुनीश्वर कपिल कहाऊँ। श्रेष्ठ जनों में मैं ही आऊँ॥
घोड़ों में उच्चैश्रव सारा। ऐरावत गजराज उदारा॥
नरों बीच मैं राजा सोहूँ। सब जग की मर्यादा मोहूँ॥
शस्त्रन महँ मैं वज्र कहाऊँ। गउअन मँह कमधेनु कहाऊँ॥
कामदेव मँह प्रजन सुहावा। सर्पन मँह वासुकि पद पावा॥
नागन मँह शेषनाग स्वामी। वरुण देव जल अंतरयामी॥
पितरन मँह अर्यम परधाना। यम नियमन मँह चतुर सुजाना॥
दैतन मँह प्रहलाद पियारा। काल चक्र मँह मैं ही सारा।।
पशुओं में मृगराज कहाऊँ। खग में गरुड़ वेग दरशाऊँ॥
पवन वेग पावन कर हारा। राम शस्त्रधारिन विस्तारा॥
मतसन मँह मैं झष(मगरमच्छ) मनहारी। गंगा नदियन मँह अति न्यारी॥
सृष्टि आदि अरु मध्य विधाता। अंत समय मैं ही फलदाता॥
विद्या में अध्यात्म सयानी। वाद विवाद जल्प मैं मानी॥
(जल्प का अर्थ है ऐसी बहस या चर्चा जहाँ सत्य को जानने से ज्यादा 'अपनी जीत' और 'दूसरे की हार')
अक्षर मँह अकार मैं सोई। द्वंद्व समास न दूजा कोई॥
अक्षय काल सर्व सुखकारी। धाता (धारण करने वाला) मँह विश्वतमुख भारी॥
मृत्यु सर्वहर मैं ही भाई। उद्भव भविष्य की चतुराई॥
नारिन मँह कीरति मति बानी। धृती क्षमा मेधा श्री मानी॥
छंदन मँह गायत्री जोई। साम बृहत् गानहि मँह सोई॥
मासन मँह मगशीर्ष कहाऊँ।ऋतुअन मँह कुसुमाकर जाऊँ।।
छलियन मँह मैं द्यूत कहाऊँ। तेजस्विन मँह तेज सुहाऊँ॥
जीतन मँह मैं विजय कहावा। निश्चय मँह मैं बुद्धि सुहावा॥
वृष्णि वंश मँह कृष्ण कहाऊँ। पांडव मँह अर्जुन बन जाऊँ॥
मुनियन मँह मैं व्यास सुजाना। कवि उशना मँह चतुर बखाना॥
दमन करन मँह दंड कहाऊँ। नीति विजय चाहत जो पाऊँ॥
गुप्त भाव मँह मैं हूँ मौना। ज्ञान ज्ञानियन चतुर सलोना॥
सब भूतन क बीज मैं सोई। चर अरु अचर भिन्न नहिं कोई॥
मोरि विभूति अंत नहिं पाई। यह संक्षेप कहा मैं भाई॥
जो जो विभूति जुत है प्रानी। सो लछमी बल मँह महरानी॥
तेज पुंज मम अंश सँझोये। जानहु पार्थ ताहि मन प्रोये॥
एकांशहिं जग धारन कीन्हा। जानहु पार्थ जो मोहि चीन्हा॥
जगत व्यापि मैं एक सहारा। अखिल विश्व मम अंश पसारा॥
यह विभूति गाथा जे गाई। हरि चरनन मँह प्रीत लगाई॥
विश्वरूप प्रभु ध्यान लगावो। जन्म मरण से मुक्ती पावो॥
दोहा
विभूति योग बखान यह, जे गावें चित लाय। हरि पद प्रीति बढ़े सदा, सब संशय मिटि जाय॥
अंश मात्र महँ जग बसा, पार न पावै कोय। कहै 'अजय' प्रभु रूप मँह, मगन निरंतर होय॥
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श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय 'विश्वरूपदर्शन योग'
विश्वरूपदर्शन: काल और विराट स्वरूप
दोहा
मोहरूप अज्ञान तम, गयउ पार्थ कर दूर। जब लखि प्रभु निज रूप में, ज्ञान भानु भरपूर।।
विनय करी तब पार्थ ने, देखन को विभु रूप।ऐस्वर जोग दिखाइये, आदि देव सुर-भूप।।
चौपाई
विश्वरूप प्रभु अचरज भारी। देखि पार्थ मति भई विचारी।
कोटि सूर्य सम तेज बिराजा। अद्भुत रूप अनूपम साजा।।
दिव्य चक्षु जब प्रभु ने दीन्हा। अर्जुन देखि परम सुख लीन्हा।।
अगणित मुख अरु नयन विशाला। रूप अनन्त परम विकराला।।
कर सहस्र आयुध कर धारे। चकित भये कपिध्वज निहारे॥
दिग-दिगन्त महँ व्याप्त शरीरा। देखि भये व्याकुल मति धीरा।।
ब्रह्मा शिव अरु देव अशेषा। देखि अंग महँ सकल विशेषा।।
स्वर्ग लोक पाताल समाना। प्रभु के तन महँ सब जग जाना।।
नाहिं आदि नहिं मध्य निहारा। नाहिं अन्त को मिलत किनारा।
अग्नि मुखन महँ दमकत ज्वाला। ग्रसत जगत को काल कराला।।
जइसे नदियाँ सिंधु समाहीं। तइसे शूरवीर प्रभु माहीं।
भीष्म द्रोण अरु कर्ण प्रतापी। प्रविशहिं मुख महँ पापी तापी।।
दंतन बीच चूर्ण सिर होई। काल चक्र नहिं देखत कोई॥
हाहाकार मच्यो सब लोके। कांपत देखि देव सब शोके।।
अर्जुन विनय करै कर जोरी। जानन चहूँ मैं शक्ति थोरी।
कौन रूप धरि उग्र बिराजो। निज परिचय प्रभु मोहि सुनाजो।।
भयाक्रांत हो पार्थ पुकारा। तुमहीं आदि देव जग धारा॥
तब बोले प्रभु गिरा गँभीरा। मैं हूँ काल मिटावन पीरा।।
प्रगट भयउँ जग नास निमित्ता। योद्धा सब अब होइहिं चित्ता॥
तू न लड़े तौ भी नहिं बचिहें। मृत्यु पाश महँ सब ही फँसिहें।।
तो फिर उठहु लहहु अब जसुवा। जीति शत्रु भुँजु राज सुजसुवा॥
हमरे मारे मरिहें सारे। बनु निमित्त तू केवल धारे॥
द्रोण भीष्म अरु जयदथ वीरा। मारहुँ मैं पहले करि धीरा।
शोक तजहु अरु युद्ध विचारी। जय पावत अरु संकट टारी।।
देखि काल का विकट स्वरूपा। कांपत पार्थ भूप के भूपा।
पुनि-पुनि नमत जोड़ि कर दोऊ। तुम सम देव न दूजा कोऊ।।
नमो नमो प्रभु वायु यमेशा। वरुण शशांक प्रजापति ईशा।
सहस बार प्रभु तोहि प्रणामा। कण-कण महँ तव दिव्य निवासा।।
अज्ञानवश सखा मैं माना। महिमा तव मैं नहिं पहचाना।।
हँसी खेल महँ कीन्ह ढिठाई। क्षमा करहु प्रभु मोरि बुराई।।
जैसे पितु सुत के दुख टारे। सखा सखा के दोष विसारे।
प्रिय प्रियतम को क्षमा कराहीं। तैसे मोहि राखि मन माहीं।।
देखि अदेखा अति हरषाना। भय सों व्याकुल मन अकुलाना॥
सौम्य रूप अब मोहि दिखावहु। मुकुट गदा धरि मनहिं रिझावहु।।
सुनि अर्जुन की विनय अपारा। प्रभु तब तजो रूप विकराला।।
चतुर्भुज रूप धरि मनभावन। भक्त हेतु प्रभु परम सुहावन।।
मानुष रूप देखि मुसुकाना। अर्जुन मन महँ धीरज आना।।
प्रभु बोले यह रूप अनूपा। दुर्लभ देखन परम स्वरूपा।।
वेद यज्ञ तप दान न पावै। जो मम विश्वरूप दरसावै।
केवल अनन भक्ति जो लावइ। सोई मोहि जानै अरु पावइ।।
मम काजहिं निज करमहिं जानै। मोहिं परम बस सब तें मानै॥
बैर न राखे काहू धीरा। पावे मोहिं मेटई पीरा॥
काल चक्र के गति अति न्यारी। प्रभु इच्छा सब पर है भारी।
जो प्रभु शरण निरंतर रहहीं। भव सागर सों पार उतरहीं।।
दोहा
विश्वरूप दरसाय प्रभु, तजहुँ रूप विकराल। सौम्य चतुर्भुज रूप धरि, शीतल किय तत्काल।।
अनन भक्ति जो जन करै, तजि ममता अरु बैर।सोई प्रभु पद पाइहै, करै मोद की सैर॥
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श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्याय
भक्तियोग
दोहा
सगुण रूप अति प्रिय लगे, निर्गुण अकथ अपार।अर्जुन संशय परिहरी, पूछा भक्ति विचार॥
भक्ति योग अति सुगम है, प्रेम मार्ग सुखधाम। परम शांति का पंथ यह, भज लें सुंदर श्याम॥
चौपाई
कृष्ण कहे सुन पार्थ सुजाता। भक्ति मार्ग सबसे सुखदाता।
नित मन जो महँ मोहि लगावैं। श्रद्धा-युत सो मोहि सुपावैं॥
तेइ योगजुत जग महँ कहहीं। परम सिध सोइ मानस लहहीं॥
अक्षर ब्रह्म जो मनहिं ध्यावैं। इंद्रिय जीति परम पद पावैं॥
निरगुन मार्ग कठिन अति भाई। देह धारि को कष्ट सहाई॥
जो सर्वस निज हमका मानैं। रक्षक सोई हमका जानैं॥
अनन भाव जे ध्यान लगावे। वे ही भवसागर तर जावे।
मुझमें अर्पित कर दे मन को, सौंप दे अपनी बुद्धि और तन को॥
निश्चय ही तू मुझमें रहेगा, सत्य वचन यह कभी न ढहेगा।
यदि मन स्थिर न रह पावे, अभ्यास योग तब चित्त लगावे॥
अभ्यास में भी जो असमर्था, कर्म करे सब मेरे अर्था।
मेरे हित सब कर्म सुहावे, तो भी तू फल निश्चित पावे॥
त्याग दे फल की इच्छा सारी, हो जा मन से तू निर्विकारी।
ज्ञान श्रेष्ठ अभ्यास से माना, ध्यान ज्ञान से ऊँचा जाना॥
कर्म फल का त्याग सुखकारी, शांति मिले तब अविकारी।
अद्वेष्टा सब भूतन केरा, मैत्री करुणा जिसका डेरा॥
निर्मम और निरहंकार जो, क्षमावान और सुख-दुख सम जो।
संतुष्ट सदा जो योगी होई, दृढ़ निश्चय वाला जन सोई॥
मन बुद्धि जो मुझको अर्पण, वह भक्त मुझे अति प्रिय पावन।
जिससे जग को कष्ट न पहुँचे, जो न किसी से डरकर सँकुचे॥
हर्ष अमर्ष भय और उद्वेगा, इनसे मुक्त रहे जो वेगा।
अनपेक्ष और शुचि दक्ष सुजाता, उदासी सब दुख का त्राता॥
सब आरंभों का त्यागी जो, प्रिय मेरा वह अनुरागी जो।
न द्वेष करे न हर्ष मनावे, न शोच करे न इच्छा लावे॥
शुभ और अशुभ का त्यागी ज्ञानी, वह भक्त मुझे प्रिय कल्याणी।
शत्रु मित्र जो सम कर जाने, मान और अपमान न माने॥
शीत उष्ण और सुख-दुख समता, सब संग दोष से जिसकी ममता।
तुल्य निंदा स्तुति जो राखे, मौन रहे अमृत रस चाखे॥
जिसका घर है सारा संसारा, स्थिर बुद्धि वह भक्त प्यारा।
अनिकेत और भक्ति में लीन, वह मेरा प्रिय भक्त प्रवीण॥
अमृतमयी धर्म का पालन, जो करते भव-भय का नसन।
श्रद्धा युक्त मुझे जो भजते, परायण हो सब दुख तजते॥
वे ही भक्त मुझे अति प्यारे, भवसागर से लगते किनारे।
भक्ति मार्ग है प्रेम की गंगा, निर्मल मन हो जाए चंगा॥
सगुण रूप की महिमा भारी, रीझ जाते हैं गिरधारी।
छोड़ कपट और तज चतुराई, प्रेम गलिन में सुख अधिकाई॥
अहंकार जब तक मन माहीं, तब तक प्रभु का दर्शन नाहीं।
दीन दयाल सुपाल भगवाना, भक्ति वश ही प्रभु ने जाना॥
योग युक्ति का सार है यही, भक्ति बिना सब व्यर्थ है देही।
बारहवें अध्याय की वाणी, मुक्ति मार्ग दिखलावे प्राणी॥
दोहा
अतिशय प्रिय वह भक्त है, जो तज सकल विकार। भक्ति सुधा रस जो पिए, उतरे भव जल पार॥
श्रीकृष्ण की करुणा लहे, तज कर सब अभिमान।भक्तियोग के मार्ग पर, पावे पद निर्वाण॥
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खंड 3: तत्वज्ञान और अंतिम विजय
दोहा
पूछत पार्थ विनय करि, सुनि प्रभु चित्त लगाय।
त्याग और संन्यास का, भेद कहहु समुझाय॥
परम तत्व क्या है प्रभु, विजय कहाँ विश्राम।
मोह नसावन वचन कहि, पूरण कीजे काम॥
चौपाई
(अर्जुन उवाच)
हे ऋषिकेश सुनो मम बानी, संन्यास त्याग भेद कहु ज्ञानी।
कर्म छोड़ना श्रेष्ठ कहावे, या फल तजना मुक्ति दिलावे॥
मोहे भरम भारी मन माही, तत्व ज्ञान मोहि सूझत नाही।
करहु कृपा प्रभु दीनदयाला, काटहु मोह जगत का जाला॥
(श्रीभगवान उवाच)
सुनु अर्जुन मम वचन अनूपा, त्याग और संन्यास स्वरूपा।
काम्य कर्म जो जग भरमावे, तजना उसे संन्यास कहावे॥
पर जो कर्म फल आस न राखे, त्याग तत्व वह अमृत चाखे।
यज्ञ दान तप कर्म विधाना, त्याग योग्य नहिं इन्हें सुजाना॥
तीन भाँति का त्याग बखाना, सात्विक तामस राजस जाना।
मोह वश जो कर्म बिसारे, तामस त्याग अधम वह प्यारे॥
दुख जानकर जो कर्म न ठानें, राजस त्याग उसे जग मानें।
कर्तव्य समझ जो कर्म कमावे, सात्विक त्याग वही पद पावे॥
सबके हृदय वास मम मोरा, मैं ही चालक चहुँदिशि तोरा।
अहंकार जब तक मन राखे, तब तक तत्व ज्ञान नहिं भाखे॥
बुद्धि और धृति सात्विक धारे, वही पुरुष भव बाधा तारे।
अमृत सम जो आदि में लागे, अंत में सुख सात्विक जागे॥
(अर्जुन उवाच)
नष्ट मोह स्मृति अब आई, प्रभु कृपा सब संशय जाई।
तत्व ज्ञान कर हृदय उजियारा, अब मैं शरण हूँ नाथ तुम्हारा॥
जो आज्ञा प्रभु आप सुनावें, दास वही अब कर दिखलावें।
मिटा द्वंद्व और मिटी मलिनाई, आपकी शरण परम सुख पाई॥
(संजय उवाच)
अदभुत संवाद सुना जब काना, पुलकित रोम-रोम हर्षाना।
व्यास कृपा से दिव्य यह ज्ञाना, देखि रूप प्रभु को पहचाना॥
यत्र योगेश्वर कृष्ण मुरारी, यत्र पार्थ धनुर्धर भारी।
श्री विजय विभूति अचल नीती, सत्य वहीं जहाँ प्रभु की प्रीती॥
दोहा
जहाँ ज्ञान की ज्योति है, जहाँ कर्म का साथ।विजय वहीं निश्चित खड़ी, जहाँ कृष्ण के हाथ॥
पढ़ै सुनै जो प्रेम से, यह संवाद अनूप। पावे सो तत्वज्ञान को, तजकर माया रूप॥
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अध्याय 13, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग,
प्रकृति, पुरुष और चेतना के गहरे रहस्य को समझाता है।
।। दोहा ।।
नमन करूँ गोपाल को, गुरु चरणों धरि शीश। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भेद अब, कहूँ सुमति जगदीश॥
यह शरीर ही क्षेत्र है, जानत पुरुष सुजान। क्षेत्रज्ञ जेहिं मन लखे, सोई प्रबुद्ध ज्ञान॥
।। चौपाई ।।
अर्जुन विनय करी कर जोरी। कहहु मोहि प्रभु शंका मोरी॥
प्रकृति पुरुष अरु क्षेत्र विचाऊ। ज्ञान ज्ञेय सब मोहि सिखाऊ॥
हँसि बोले तब श्री भगवाना। सुनु पार्थ तुम चतुर सुजाना॥
यह तन क्षेत्र कहावे भाई। जानन हारा क्षेत्रज्ञ कहाई॥
सब क्षेत्रन में वास मेरा। मैं ही क्षेत्रज्ञ जानु सबेरा॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को जो पहचाने। सत्य ज्ञान सोई जग माने॥
महाभूत अरु अहंकार बुद्धी। इन्द्रिय दश अरु मन की शुद्धी॥
इच्छा द्वेष सुख दुःख संधाता। यह सब क्षेत्र विकार विधाता॥
मान त्याग अरु दम्भ विहीना। क्षमा भाव आर्जव में लीना॥
आचार्य सेवा शौच स्थिरता। इन्द्रिय विषय विरति गम्भीरता॥
जन्म मृत्यु दुख दोष निहारी। अनसक्ति भाव हृदय सों धारी॥
पुत्र कलत्र गेह मम कारा। समचित रहि सब दुख सुख धारा॥
अनन्य भक्ति मोहि अति प्यारी। जन समूह तजि विचरत भारी॥
अध्यात्म ज्ञान में नित मन लावे। तत्व ज्ञान को जो सरसावे॥
यही ज्ञान है सत्य विचारी। अज्ञान कहावे बाकी संसारी॥
अब मैं ज्ञेय कहूँ विरतारा। जाहि जानि पावे भव पारा॥
परब्रह्म जो अनादि कहावे। सत् असत् सों परे रहावे॥
सब ओर हाथ पग शीश सुहाये। सब ओर कान जग में फैलाये॥
सब इन्द्रिय गुण आभास कराता। इन्द्रिय रहित सकल फल दाता॥
निर्गुण रहि गुण भोग विधाता। सबसे पृथक अरु सबका ज्ञाता॥
चराचर भूतन के बाहर भीतर। सूक्ष्म होन सों लखे न सत्वर॥
अविभक्त रहि जो विभक्त समाना। सकल भूत पालक भगवाना॥
ज्योतिन की भी ज्योति कहावे। तिमिर परे जो परम सुहावे॥
ज्ञान ज्ञेय अरु ज्ञान गम्य जो। हृदय माँहि सबके बसत सो॥
क्षेत्र ज्ञान अरु ज्ञेय बखानी। भक्त लखत मम भाव सुवानी॥
प्रकृति पुरुष जानहु बिनु आदी। विकार गुण उपजत संवादी॥
कार्य करण की हेतु प्रकृती। सुख दुख भोगन पुरुष आकृती॥
प्रकृति माँहि पुरुष जब राखे। प्रकृति जन्य गुण रस को चाखे॥
गुण संग कारण योनि विधाता। उत्तम अधम जन्म सो पाता॥
देही माँहि पुरुष पर सोई। दृष्टा अनुमन्ता प्रभु होई॥
भर्ता भोक्ता महेश्वर स्वामी। परमात्मा सो अन्तर्यामी॥
यो पुरुष अरु प्रकृति बिचारी। जानत जो सो मुक्त संसारी॥
ध्यान योग सों कोउ लख पावे। ज्ञान योग कोउ हृदय बसावे॥
कर्म योग सों कोउ तप धावे। जो नहिं जाने सो सुनि पावे॥
श्रवण परायण होय जो ध्यावे। मृत्यु पार सोई तर जावे॥
यावत स्थावर जंगम होई। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ मेल सों सोई॥
सब भूतन में सम प्रभु देखे। अविनाशी जो मन में लेखे॥
सम देखत सब ठौर मुरारी। आत्मा हनत न सोई विचारी॥
प्रकृति करै सब कर्म विधाना। अकर्ता आत्मा जो पहचाने॥
भूत पृथक भाव एक में देखे। ब्रह्म प्राप्ति तब सोई लेखे॥
परमात्मा अनादि निर्गुणा। देह रहि नहिं लिप्त सुपुणा॥
जैसे सर्वगत सूक्ष्म अकाशा। लिप्त न होय करिके निवासा॥
तैसे देह में आत्मा सोई। लिप्त न होय जानत सब कोई॥
जैसे एक सूर्य जग सारा। प्रकाशित करत सकल संसारा॥
तैसे एक क्षेत्रज्ञ विचारी। क्षेत्र प्रकाशित करे मुरारी॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भेद जो जाने। ज्ञान चक्षु सों सत्य पहचाने॥
भूत प्रकृति मोक्ष जो पावे। परम पद सोई जीव सिधावे॥
ब्रह्म रूप होवे सोई ज्ञानी। कहत 'अजय' प्रभु की अमृत वाणी॥
।। दोहा ।।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ भाव सों, मिटे सकल अज्ञान। हृदय बसै केशव जबहिं, प्रकटे आतम ज्ञान॥
भेद जानि प्रकृति पुरुष, जो जन सुमिरन लीन। भव सागर सों तरि गया, प्रभु पद भक्ति प्रवीण॥
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अध्याय 14: गुणत्रय विभाग – सत्व, रज और तम: अपने व्यक्तित्व को पहचानें
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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