अस्सी तट- लहरों का विरह-राग


अस्सी तट- लहरों का विरह-राग

गंगा की यह चंचल धारा, छूकर तट को मुड़ जाती है,
पर अंतस की व्याकुलता में, ये मिलने को अकुलाती है।
वीचि-वीचि में कंपित-शिल्पित, सुंदर सा मुखड़ा दिखता है,
जल की हर चंचल लहरों पर, विरह-काव्य कोई लिखता है।


गंगा की चंचल लहरों में इक आभास बहा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

शीतल मंद सुवासित मारुत, सुलग रही अंगारे जैसी,
घाटों की यह मरण-शरण भी, आज हुई चौबारे जैसी।
दीप तैरते जो लहरों पर, वे हर साँसों की राहत हैं,
सुलग रहे कुछ डूब रहे हैं, अरु कुछ यादों की चाहत हैं।

कोई मौन सुरीला झोंका, अंतस को हुलसा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

आरती की घंटियों में भी, गूँज रही है तान रुहानी,
अस्सी के एकांत क्षितिज पर, मौज लिख रही नई कहानी।
मज्जन करती दुनिया सारी, अपना अंतस धोने आती,
पर विरह-अग्नि की यह ज्वाला, कब गंगा-जल से बुझ पाती।

मौजों की मद्धम धारा से नव संगीत लिखा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

तुम पावन गंगा की धारा, मैं एक किनारे का पत्थर,
तुम लहरों का मधुर गीत हो, मैं हूँ सदियों का अंतर।
लहरों की यह मदिर चपलता, बस एक बहाना लगती है,
रात विरह की अस्सी तट पर, मुसकाती सिसकी लगती है।

अस्सी तट की विरह रात में इक अहसास जगा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।


दूर नदी के तटबंधों पे, ये रात अकेली रोती है,
हर आहट पे मधुर मिलन की, उम्मीदें मन में बोती है।
लौटोगे किस मोड़ प्रिये तुम, यही पूछने लहरें आती,
लेकिन तटबंधों को छूकर, चुपचाप स्वयं ही बह जाती।

मौन हृदय के आलोड़न से नव मधुमास रचा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा

 स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा

स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर,
बूँद पलकों के कोरों पे जब भी रुके उनको मन में सजाता रहा रात भर।

दूर जब भी हुए पास महसूस कर, एक साया गले से लगाता रहा,
एक खामोश आहट की आवाज़ पर, रात भर द्वार मन का सजाता रहा,
जो नहीं आ सके तो उनकी महक, साँस में बन के खुशबू महकती रही,
मौन को चीर कर इक मधुर रागिनी, चाँदनी रात में भी चहकती रही।

द्वार अहसास का खुला छोडकर दीप उम्मीद का जलाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।

याद की धूप ने जब जलाया कभी, अश्रु की छाँव का ही सहारा मिला,
दर्द की रेत पर जब भी भटका यहाँ, आपकी याद से ही किनारा मिला।
राह मुश्किल थी पर हर कदम पर मुझे, रूप तेरा ही रस्ता दिखाता रहा,
दूरियों में भी सदा पास महसूस कर, एक साया गले से लगाता रहा।

परछाइयाँ याद की खो न जाये कहीं, दीपक जलाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।


गीत अधरों पे जब मौन हो के रुके, नाम हर पंक्तियों ने तुम्हारा लिया,
पृष्ठ पर जिंदगी के रुकी जब कलम, तब तेरे गीत ने ही सहारा दिया।
वक़्त का कारवाँ रुका जब कहीं, याद की खिड़कियाँ स्वयं खुलने लगीं,
मौन अँधियारे में खो गयी थी कहीं, उम्मीद की दीपिका फिर से जलने लगी।


आस के मोतियों से पिरो गीत की पंक्तियों को लुभाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

दो किनारों के बीच

 दो किनारों के बीच
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी,
सांसों की कच्ची डोरी पर, यह कैसी आन पड़ी।
इधर महकती यादें हैं, उधर मौन का डेरा है
बीच भँवर अपना जीवन, संझा है न सवेरा है।
दूर क्षितिज को आँखें तकती यादों की किसे पड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।

खिले फूल की खुशबू कहती, पल भर का साथ यहाँ,
शीशे जैसे रिश्ते नाते , गहरा आघात यहाँ।
एक हाथ में खुशियाँ हैं, दूजे में है वीराना,
यहाँ अकेले आये सारे और अकेले जाना।
मिट्टी के इस महल में फिर भी उम्मीदों की झड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।
वक्त की बहती धारा में, एक दिन अब बह जाना,
राजा हो या रंक यहाँ, हाथ नहीं कुछ आना।
जो कल अपना लगता था, वो बेगाना मोड़ हुआ,
अपने मन का दर्पण ही सूनेपन का तोड़ हुआ। 
पलकों पर है स्वप्न सजे पर बेड़ी है पाँव पड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।
फिर क्यूँ ना इस पल को हम सब जी भर के अपना लें,
मौत अटल है इस जीवन में फिर क्यूँ ना इसको गा लें।
जब तक सुर हैं कंठ सजे गा लो हर पल राग नया, 
कल का क्या भरोसा है, जाने कब हो अंत गया।
गीतों के नर्म छाँव में यादों की है मौन लड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।

साँझ का सितारा


साँझ का सितारा 

​मेरे दर्द के साँझ का इक सितारा,
बहुत दूर है इस नदी का किनारा।

​भँवर में फँसी है मेरी नाव कब से,
मिलेगा कहाँ मौज को अब सहारा।

​अँधेरों ने ऐसा घेरा है मुझको,
कि चमका नहीं फिर वो उम्मीद-तारा।

​सदाएँ तो मैंने बहुत दीं मगर हाँ,
कभी लौट कर फिर न आया दुबारा।

​हवाओं ने बदला है रुख़ इस तरह से,
कि दिखाता नहीं कोई अब तो इशारा।

​किस्मत की राहों में चलते ही चलते,
हुआ ख़ुद से ही दिल ये मेरा अवारा।

​बिना तेरे ऐ ज़िंदगी अब तो हमदम,
है मुमकिन नहीं एक पल भी गुज़ारा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

साकेत की वेदना

साकेत की वेदना 

​शून्य क्षितिज पर सिमट रही है, आज मिलन की वह मधुर-रात,
बिछड़न के इस मरु-झंझा में, काँपती है साँसों की पाँत।
उमड़ रहा आँखों में सावन, हिय में सुलग रहा साकेत.
अमिट वेदना के नीरव में, विरह दे रहा अगणित प्रपात ।
चेतन की यह विकल रागिनी, शून्य गगन में मौन है आज,
पूछ रही इस मूक विरह में, किसे पुकारे हृदय का साज।

याद आ रहा वह स्वर्णिम पल, जब प्राणों में स्पंदन जागा,
प्रकृति के आलिंगन में जब, बँधा चेतना का नव धागा।
मलयज-पवन सुगंधित छूकर, कह रही थी जब कथा अनन्त,
पर निठुर नियति के हाथों में, पल भर था वह सपन अभागा।
टूट गये झंकार हृदय के, बिखरे सुर वीणा के सारे,
अब आँसू के इन मोती में, अलंकार जीवन के हारे।
तुम तो दूर गगन के तारे, मैं साकेत की विकल पुकार,
बीच विरह का सिंधु बह रहा, कैसे आऊँ वहाँ उस पार।
पलकों के सूने कोनों में, बैठी है इक मूक प्रतीक्षा,
चुपके-चुपके सिसक रहा है, इस उर का अपरिमित संसार।
इस निष्ठुर जीवन का मेरे, यह पीड़ा ही अब तो धन है,
मिलन गँवाकर जो पाया है, वही विरह अब अंतर्मन है।
सजल नयन, यह विकल चेतना, महाशून्य में खोई-खोई,
जैसे दीप-शिखा अलसाकर, अपनी ही छाया में सोई।
लो अंतस का राग सौंपकर, सब मौन विसर्जन करता हूँ,
तुम खुश रहना अपने नभ में, चाहे यहाँ बहे दृग-लोई।
यह विछोह ही चरम मिलन है, सब तार-तार अब टूट रहा,
साँस विदा की बेला में भी, अब सभी सहारा छूट रहा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

अमलतास के आँसू: एक अधूरी दास्तान

अमलतास के आँसू: एक अधूरी दास्तान

 स्मृतियों के गलियारे और जीवन का दर्शन

​कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन का लेखक स्वयं होता है, परंतु सच तो यह है कि वह केवल एक अभिनेता है। पटकथा तो उस परम नियति के हाथ में है, जो अदृश्य स्याही से हमारे भाग्य के पन्नों पर सुख और दुख के ऐसे अक्षर उकेरती है जिन्हें मिटाना किसी के वश में नहीं होता। जीवन कोई सीधी रेखा नहीं है। यह तो गंगा की उस धारा की तरह है जो पहाड़ों की ऊंचाइयों से उतरकर कभी शांत बहती है, तो कभी चट्टानों से टकराकर व्याकुल हो उठती है।
​यह कहानी किसी राजा या रानी की नहीं है। यह कहानी किसी अलौकिक नायक की भी नहीं है। यह कहानी है अजय की। यह कहानी है सुवर्णा की। यह कहानी है आपकी, मेरी और हर उस इंसान की जिसने कभी किसी से निश्छल प्रेम किया हो, जिसने कभी जिम्मेदारियों के बोझ तले अपनी इच्छाओं की बलि दी हो, और जिसने रात के सन्नाटे में तकिए को आंसुओं से भिगोते हुए खुद से पूछा हो—"आखिर मेरा दोष क्या था?"
​प्रेम क्या है? क्या प्रेम केवल पा लेने का नाम है? या प्रेम का दूसरा नाम त्याग है? आधुनिक समाज में जहाँ रिश्ते सहूलियत और समझौतों की तराजू पर तोले जाते हैं, वहाँ एक ऐसा प्रेम भी था जो मौन रहकर भी सदियों तक धड़कता रहा। एक ऐसा प्रेम जो न तो समय की धूल से धुंधला हुआ और न ही परिस्थितियों के थपेड़ों से टूटा।
​जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि हमारी जिंदगी के कुछ सबसे खूबसूरत फैसले अनजाने में लिए गए होते हैं। बनारस की गलियाँ, बीएचयू (BHU) का वो विशाल हरा-भरा परिसर, वसंत के मौसम में पलाश के लाल फूलों की चादर, और गंगा के घाटों पर बजती हुई शाम की आरती की घंटियाँ—ये केवल इस कहानी की पृष्ठभूमि नहीं हैं, ये इस प्रेम के मूक गवाह हैं।
​अजय, जो एक अत्यंत साधारण, मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था, जिसके पिता की रीढ़ की हड्डी पर पूरे परिवार का भविष्य टिका था। उसकी आँखों में सतरंगी सपने नहीं थे, बल्कि उन आँखों में एक डर था—पिता की गिरती हुई सेहत का डर, छोटी बहन की शादी की चिंता, और छोटे भाई की पढ़ाई का बोझ। वह जानता था कि उसके पास असफल होने का कोई विकल्प नहीं है। उसके लिए प्रेम एक ऐसी विलासिता थी जिसे वह चाहकर भी वहन नहीं कर सकता था।
​दूसरी ओर सुवर्णा थी। ज्ञान की साक्षात् प्रतिमूर्ति, जिसके भीतर साहित्य और दर्शन का एक अनूठा संगम था। वह अल्हड़ थी, पर संजीदा भी। उसकी हँसी में काशी की सुबह जैसा उजलापन था और उसकी आँखों में ज्ञान को पा लेने की एक गहरी तड़प। जब ये दो विपरीत धाराएं बीएचयू के परिसर में मिलीं, तो प्रकृति ने भी जैसे एक मौन सहमति दी थी। दोनों की दोस्ती कब सांसों की जरूरत बन गई, उन्हें पता ही नहीं चला। वे साथ घूमते, लंका की अड़ियों पर चाय पीते, अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठकर घंटों भविष्य की बातें करते, और विंध्याचल के झरनों के पास प्रकृति के संगीत में खो जाते।
​परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। कॉलेज की पढ़ाई समाप्त होते ही जब जीवन की कठोर वास्तविकता सामने आई, तो सारे सपने कांच के बर्तनों की तरह टूटकर बिखर गए। अजय को अपने परिवार को संभालने के लिए उस शहर को, उस यूनिवर्सिटी को और अपनी उस 'सुवर्णा' को छोड़ना पड़ा, जिसे उसने कभी अपने दिल की बात नहीं बताई थी। वह एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा जहाँ केवल संघर्ष था, रात-रात भर जागकर की जाने वाली पढ़ाई थी, और समाज के ताने थे।
​सुवर्णा ने भी अपनी राह चुनी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, अनुसंधान किया और एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफेसर बनी। उसका विवाह संजय से हुआ, जो कभी अजय का ही सहपाठी हुआ करता था। एक ऐसा विवाह जो बाहर से तो अत्यंत भव्य और प्रतिष्ठित था, परंतु जिसके भीतर केवल खोखलापन और अहंकार का वास था।
​यह उपन्यास केवल दो प्रेमियों के बिछोह की गाथा नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के उस कड़वे सच का आईना है जहाँ एक आम आदमी अपनी पूरी जिंदगी पारिवारिक कलह, कोर्ट-कचहरी, भाइयों के लालच और अपनों के धोखे से लड़ते हुए गुजार देता है। अजय ने नौकरी तो पा ली, वह समाज की नजरों में एक बड़ा 'अधिकारी' बन गया, लेकिन उस सफलता की कीमत क्या थी? एक खाली कोठी, अकेलापन, और दिल के किसी कोने में दबी हुई सुवर्णा की याद।

अध्याय 1: महामना की बगिया और गंगा की लहरें


भाग 1: काशी, बी.एच.यू. और पलाश के वे दिन


बनारस केवल एक शहर नहीं है, वह एक अहसास है, एक शाश्वत प्रवाह है जो समय के अस्तित्व को भी अपने भीतर समेटे हुए है। जहाँ गंगा अपनी अल्हड़ जवानी को शांत, गंभीर प्रौढ़ता में बदलकर अर्धचंद्राकार रूप में बहती है, उसी काशी के एक छोर पर स्थित है—काशी हिंदू विश्वविद्यालय। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की यह बगिया, जिसे लोग प्यार से बी.एच.यू. (BHU) कहते हैं, केवल ज्ञान का केंद्र नहीं है, बल्कि यह लाखों युवाओं की धड़कनों, सपनों और संघर्षों की मूक गवाह रही है।
वसंत का महीना था। मार्च की शुरुआत में ही बनारस की हवाओं में एक अजीब सी मादकता घुल जाती है। कैम्पस के सिंह द्वार से भीतर प्रवेश करते ही ऐसा लगता था मानो किसी ने प्रकृति के कैनवास पर सिंदूरी और पीले रंग बिखेर दिए हों। सड़कों के दोनों ओर खड़े अमलतास और पलाश के पेड़ फूलों के बोझ से झुके जा रहे थे। जब भी हवा का एक हल्का सा झोंका आता, तो पलाश के लाल-नारंगी फूल सड़क पर इस तरह बिखर जाते मानो धरती ने किसी नवविवाहिता की तरह लाल चुनर ओढ़ ली हो।

इसी कैम्पस के 'आर्ट्स फैकल्टी' (कला संकाय) की ओर जाने वाली सड़क पर, पत्तों की सरसराहट के बीच, अजय अपने भारी बस्ते को कंधे पर लटकाए धीरे-धीरे चल रहा था। अजय—दुबला-पतला शरीर, सांवला रंग, आँखों पर मद्धम सा चश्मा, और पैरों में घिसी हुई चप्पलें। उसके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता रहती थी, जो उसकी उम्र के लड़कों में अमूमन नहीं दिखती। वह सुल्तानपुर के एक छोटे से गाँव से एम.ए. इतिहास की पढ़ाई करने यहाँ आया था। उसके लिए यह यूनिवर्सिटी केवल डिग्री लेने की जगह नहीं थी, बल्कि उसके बूढ़े पिता की रीढ़ की हड्डी पर टिके परिवार को उबारने का इकलौता जरिया थी।

अजय के पिता एक प्राइमरी स्कूल के शिक्षक थे, जो अब रिटायर हो चुके थे और दमे की बीमारी से जूझ रहे थे। घर में एक छोटी बहन थी जिसकी शादी की चिंता पिता के चेहरे की झुर्रियों में साफ पढ़ी जा सकती थी, और एक छोटा भाई था जो अभी स्कूल में था। अजय जानता था कि उसके पास समय बहुत कम है और जिम्मेदारियां बहुत ज्यादा। वह हॉस्टल के अपने छोटे से कमरे में रात-रात भर लालटेन और टेबल लैंप की रोशनी में इस उम्मीद से पढ़ता था कि एक दिन वह इस गरीबी के चक्रव्यूह को तोड़ देगा।

उसी दिन, आर्ट्स फैकल्टी के नोटिस बोर्ड के पास विद्यार्थियों की भारी भीड़ जमा थी। अजय भी अपनी धुन में उधर बढ़ा। तभी अचानक, भीड़ के बीच से एक लड़की तेजी से पीछे मुड़ी और उसका सीधा टकराव अजय से हो गया। अजय के हाथ में पकड़े हुए इतिहास के मोटे नोट्स और कुछ किताबें छिटककर जमीन पर गिर गईं।

"ओह! आई एम सो सॉरी... मैंने देखा नहीं," 

एक खनकती हुई, सुरीली आवाज अजय के कानों में पड़ी। अजय ने चौंककर नीचे देखा और फिर अपनी नजरें ऊपर उठाईं। सामने सुवर्णा खड़ी थी। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और भूरी थीं, जिनमें एक अजीब सी चमक थी। उसने सूती कुर्ते के साथ एक सादा सा दुपट्टा डाल रखा था, और उसके बिखरे हुए बाल हवा में उड़कर उसके गालों को छू रहे थे। वह बनारस के ही एक संभ्रांत, सुशिक्षित परिवार से थी। उसके पिता शहर के जाने-माने वकील थे। सुवर्णा के स्वभाव में काशी की सुबह जैसा उजलापन और गंगा की लहरों जैसी चंचलता थी।

"कोई बात नहीं," अजय ने धीमे से कहा और नीचे झुककर अपनी किताबें उठाने लगा।

सुवर्णा भी तुरंत नीचे बैठी और किताबें समेटने में उसकी मदद करने लगी। जब उसने अजय के हाथ में 'सतीश चंद्र' की मध्यकालीन भारत की किताब देखी, तो उसकी आँखों में चमक और बढ़ गई।

"अरे! आप भी इतिहास के छात्र हैं? मैं भी इसी साल एम.ए. फर्स्ट ईयर में आई हूँ,"

 सुवर्णा ने किताबें अजय की ओर बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा।

अजय ने सिर्फ सिर हिलाया। वह स्वभाव से बेहद संकोची था, खासकर लड़कियों से बात करने में उसे एक अजीब सी झिझक होती थी। उसने किताबें लीं, एक बार सुवर्णा को देखा, और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया। सुवर्णा वहीं खड़ी उसे जाते हुए देखती रही। उसे अजय का यह रूखा, पर बेहद संजीदा व्यवहार कुछ अजीब और थोड़ा दिलचस्प लगा। महामना की इस बगिया में, जहाँ हवाएं भी गुनगुनाती थीं, वहाँ दो बिलकुल विपरीत स्वभाव के धागे एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगे थे।

भाग 2: विश्वनाथ मंदिर की शाम और दोस्ती की शुरुआत

बी.एच.यू. कैम्पस के ठीक बीचों-बीच स्थित 'नया विश्वनाथ मंदिर' केवल पूजा-पाठ का स्थल नहीं था, बल्कि वह छात्रों के मिलने, बहस करने, चाय पीने और सुस्ताने का सबसे बड़ा केंद्र था। शाम के समय जब मंदिर की विशाल सफेद मीनार पर डूबते सूरज की किरणें पड़तीं, तो वह सोने की तरह चमकने लगती थी। मंदिर के चारों ओर फैले हरे-भरे लॉन में घास पर बैठकर छात्र अपनी थकान मिटाते थे।

मुलाकात के करीब दो हफ्ते बीत चुके थे। अजय रोज लाइब्रेरी जाता, कक्षाएं लेता और सीधे अपने कमरे में बंद हो जाता। लेकिन सुवर्णा की नजरें अक्सर उसे क्लास के आखिरी बेंच पर बैठे या लाइब्रेरी के किसी कोने में नोट्स बनाते हुए ढूंढ ही लेती थीं।

एक शाम, जब आसमान में सिंदूरी रंग घुल रहा था और मंदिर से शंख की ध्वनि गूंजने वाली थी, अजय लॉन की एक बेंच पर अकेला बैठा 'क्रॉनिकल' पत्रिका पढ़ रहा था। तभी उसकी बेंच पर एक छाया पड़ी। उसने सिर उठाकर देखा, तो सामने सुवर्णा खड़ी थी, उसके हाथ में दो कुल्हड़ वाली चाय थी।

"इतनी गंभीर किताबें पढ़ते-पढ़ते दिमाग थक नहीं जाता आपका? लीजिए, बनारस की मशहूर कुल्हड़ वाली चाय," सुवर्णा ने एक कुल्हड़ अजय की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

अजय सकपका गया। उसने मना करना चाहा,

 "नहीं, इसकी क्या जरूरत..."

"जरूरत है।

 दोस्ती की शुरुआत चाय से ही होती है, और हम सहपाठी हैं, इतना हक तो बनता है मेरा," सुवर्णा ने अधिकार जताते हुए कहा और खुद भी बेंच के दूसरे कोने पर बैठ गई।

अजय ने संकोच के साथ कुल्हड़ थाम लिया।
 सोंधी महक वाली गर्म चाय की पहली चुस्की लेते ही उसके भीतर की झिझक थोड़ी कम हुई।

"आपका नाम क्या है? 

उस दिन तो आपने बताया भी नहीं और भाग खड़े हुए," सुवर्णा ने शरारत से पूछा।

"अजय... अजय कुमार पाण्डेय," उसने धीमे से कहा।
"और मैं सुवर्णा। सुवर्णा मिश्रा," 

उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा। अजय ने बस हाथ जोड़कर 'नमस्ते' कर दिया, जिस पर सुवर्णा खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसकी हँसी ऐसी थी जैसे मंदिर की छोटी-छोटी घंटियाँ एक साथ बज उठी हों।

"आप बहुत कम बोलते हैं अजय। क्लास में भी सबसे पीछे बैठते हैं और प्रोफेसर के सवाल का जवाब भी इस तरह देते हैं जैसे एहसान कर रहे हों। इतनी गंभीरता किसलिए?" सुवर्णा ने उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा।

अजय ने अपनी चाय के कुल्हड़ को देखा, जिसमें से भाप निकल रही थी। उसने एक ठंडी सांस ली और कहा, - "जिंदगी जब जिम्मेदारियों की तराजू पर तुली हो सुवर्णा, तो इंसान हँसना और बोलना भूल जाता है। मेरे पास यहाँ गंवाने के लिए एक पल भी नहीं है।"

अजय की इस बात ने सुवर्णा के भीतर के चंचल स्वभाव को थोड़ी देर के लिए शांत कर दिया। उसने अजय के चेहरे पर छाई उस उदासी और दृढ़ता को देखा। उसे अहसास हुआ कि यह लड़का अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बड़ा और परिपक्व है। उस शाम, मंदिर की घंटियों और मंत्रोच्चार के बीच, दो अलग-अलग दुनिया के लोग एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे थे। गंगा की लहरों की तरह, उनके बीच भी एक मूक संवाद शुरू हो चुका था।

भाग 3: अस्सी घाट की मखमली शाम और अनकहे जज्बात

बनारस की सुबह जितनी अलौकिक होती है, उसकी शाम उतनी ही रहस्यमयी और सुकून देने वाली होती है। बी.एच.यू. के पास ही स्थित 'अस्सी घाट' छात्रों का सबसे पसंदीदा ठिकाना था। यहाँ आकर ऐसा लगता था मानो वक्त ठहर गया हो। गंगा की विशाल धारा के पार रेतीला मैदान और इस पार पत्थरों की बनी सीढ़ियाँ, जिन पर बैठकर लोग घंटों लहरों को देखते रहते थे।

एक शनिवार की दोपहर, सुवर्णा ने अजय को जबरदस्ती राजी कर लिया कि वे अस्सी घाट चलेंगे। अजय पहले तो मना करता रहा कि उसे परीक्षा के लिए इतिहास के कुछ विशेष अध्यायों को तैयार करना है, लेकिन सुवर्णा की जिद के आगे उसे झुकना ही पड़ा।

जब वे दोनों अस्सी घाट पहुँचे, तो सूरज ढलने की तैयारी में था। गंगा का पानी सोने की चादर की तरह चमक रहा था। घाट की सीढ़ियों पर बैठकर ठंडी हवा के झोंके जब चेहरे को छूते, तो सारी मानसिक थकान पल भर में गायब हो जाती। नावें पानी में शांति से तैर रही थीं और माझी दूर कहीं कबीर के पद गा रहे थे।

"कितना अद्भुत है न यह दृश्य, अजय?" 

सुवर्णा ने अपने पैरों को पानी के करीब ले जाते हुए कहा। "ऐसा लगता है जैसे यह नदी हमारे सारे दुखों को अपने साथ बहाकर ले जा सकती है।"

अजय ने दूर क्षितिज को देखा, जहाँ आकाश और नदी एक हो रहे थे।

 "नदी का काम है बहना, सुवर्णा। वह रास्ते के पत्थरों से लड़ती है, किनारों को काटती है, पर रुकती नहीं। इंसान की जिंदगी भी ऐसी ही है। उसे भी बस बहते रहना पड़ता है, चाहे रास्ते में कितने ही पहाड़ क्यों न आएं।"

सुवर्णा ने अजय की तरफ देखा। 

"तुम हर बात में जीवन का इतना कड़वा दर्शन कहाँ से ले आते हो? कभी इस पल को खुलकर जीकर देखो। देखो इस हवा को, इस बहते पानी को। क्या तुम्हें कभी नहीं लगता कि तुम्हें भी थोड़ा ठहरना चाहिए? किसी के लिए... अपने लिए?"

अजय के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई। उसने सुवर्णा की भूरी आँखों में देखा, जिनमें डूबते सूरज की लालिमा साफ झलक रही थी। उन आँखों में एक ऐसा भाव था जो अजय को अपनी ओर खींच रहा था। लेकिन तभी उसके दिमाग में उसके बीमार पिता का चेहरा, माँ की उम्मीदें और भाई की पढ़ाई का खयाल आ गया। उसने तुरंत अपनी नजरें फेर लीं।

"मेरे पास ठहरने का ठिकाना नहीं है, सुवर्णा। जो मुसाफिर मंजिल से पहले ठहर जाते हैं, उनके पीछे का कारवां और परिवार दोनों तबाह हो जाते हैं," अजय की आवाज में एक अजीब सी बेबसी थी।

सुवर्णा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने धीरे से अपना हाथ अजय के हाथ के पास फर्श पर रख दिया। उनके हाथ एक-दूसरे को छू नहीं रहे थे, लेकिन उनके बीच की दूरी इतनी कम थी कि दोनों एक-दूसरे की सांसों की गर्माहट महसूस कर सकते थे। हवा तेज हो गई थी और गंगा की लहरें घाट की सीढ़ियों से टकराकर एक मधुर संगीत पैदा कर रही थीं। उस शाम, अस्सी घाट के उस मद्धम उजाले में, बिना किसी शब्द के, दोनों के दिलों ने एक-दूसरे के नाम का पहला अक्षर लिख दिया था, जिसे वे खुद भी स्वीकार करने से डर रहे थे।

भाग 4: विंध्याचल की वादियों में पिकनिक और झरने का संगीत

प्रथम वर्ष की परीक्षाएं समाप्त होने वाली थीं और कैम्पस में कुछ दिनों की छुट्टियां होने वाली थीं। इतिहास विभाग के कुछ छात्रों ने मिलकर मिर्जापुर के पास स्थित 'विंध्याचल' के पहाड़ी इलाकों और लखनिया दरी के झरनों के पास एक पिकनिक की योजना बनाई। सुवर्णा इस बात पर अड़ गई कि अजय को भी चलना ही होगा। अजय ने शुरू में पैसों की तंगी और समय की कमी का बहाना बनाया, लेकिन सुवर्णा ने उसकी सीट के पैसे खुद जमा कर दिए और कहा, "अगर तुम नहीं जाओगे, तो मैं भी नहीं जाऊंगी।" अजय को आखिरकार हार माननी पड़ी।

वह रविवार की एक बेहद खूबसूरत और खुशनुमा सुबह थी। विभाग के करीब बीस छात्र-छात्राएं एक निजी बस में सवार होकर बनारस से मिर्जापुर की ओर रवाना हुए। बस के भीतर गानों, अंताक्षरी और हंसी-मजाक का दौर चल रहा था। सुवर्णा खिड़की के पास बैठी थी और हवा में उड़ते उसके बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे। अजय उसके ठीक बगल वाली सीट पर बैठा चुपचाप बाहर के बदलते नजारों को देख रहा था। शहर की कंक्रीट की इमारतें पीछे छूट रही थीं और उनकी जगह हरी-भरी पहाड़ियों और खेतों ने ले ली थी।

लगभग दो घंटे के सफर के बाद बस लखनिया दरी के पास पहुँची। चारों ओर विंध्य की ऊंची-ऊंची पथरीली पहाड़ियाँ थीं, जिन पर घने पेड़-पौधे उगे हुए थे। पहाड़ियों के बीच से एक संकरा रास्ता नीचे की ओर जाता था, जहाँ से पानी के गिरने की कल-कल आवाज आ रही थी। जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, दृश्य और भी अलौकिक होता गया। एक विशाल चट्टान के ऊपर से दूधिया सफेद पानी का झरना नीचे एक प्राकृतिक कुंड में गिर रहा था। झरने के गिरने से पानी की जो महीन बूंदें हवा में उड़ रही थीं, वे पूरे माहौल को एक मखमली धुंध से भर रही थीं।

"अजय, देखो कितना सुंदर झरना है!"
 सुवर्णा बच्चे की तरह चहकती हुई झरने की ओर दौड़ी।

बाकी छात्र तुरंत पानी के कुंड में उतर गए और एक-दूसरे पर पानी फेंकने लगे। चारों ओर खिलखिलाहट और गूंज थी। अजय एक सूखी चट्टान पर बैठकर सब कुछ देख रहा था। वह इस प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत था, पर उसका स्वभाव उसे पानी में कूदने से रोक रहा था।
तभी सुवर्णा पानी से भीगती हुई उसके पास आई। उसके कुर्ते के किनारे पानी से गीले हो चुके थे और उसके चेहरे पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।

"तुम यहाँ भी मुनीम की तरह बही-खाता लेकर बैठ गए? चलो पानी में!" सुवर्णा ने उसका हाथ पकड़कर खींचना चाहा।

"नहीं सुवर्णा, मेरे पास बदलने के लिए दूसरे कपड़े नहीं हैं। तुम जाओ, खेलो," अजय ने संकोच से कहा।

"कपड़े सूख जाएंगे अजय, पर यह वक्त दोबारा नहीं आएगा। चलो!" सुवर्णा ने इस बार पूरी ताकत से उसका हाथ खींचा। अजय का संतुलन बिगड़ा और वह सीधे पानी के उथले कुंड में जा गिरा।

पूरे ग्रुप में एक जोरदार ठहाका गूंज उठा। अजय पूरी तरह भीग चुका था। उसका चश्मा धुंधला हो गया था। उसने अपना चश्मा हटाकर साफ किया और जब उसने सामने देखा, तो सुवर्णा अपनी उँगलियों से अपना मुंह छुपाकर हंस रही थी। अजय को पहले तो थोड़ा गुस्सा आया, लेकिन सुवर्णा की उस मासूम और निश्छल हँसी को देखकर उसके भीतर की सारी गंभीरता पिघल गई। उसने पहली बार खुलकर एक जोरदार ठहाका लगाया।

अजय को इस तरह हंसते देख सुवर्णा हैरान रह गई। उसने कहा, "वाह! तो मिस्टर सीरियस को हंसना भी आता है।"

दोपहर के समय, जब सब थककर चट्टानों पर बैठ गए, तो खाने का दौर शुरू हुआ। सुवर्णा अपने घर से पूरियां और आलू की सूखी सब्जी बनाकर लाई थी। उसने अजय को अपने हाथों से खाना परोसा। धूप अब पेड़ों की पत्तियों से छनकर नीचे आ रही थी, जिससे जमीन पर धूप-छांव का एक खूबसूरत पैटर्न बन रहा था।

शाम को वापसी के समय, जब सूरज पहाड़ियों के पीछे छुप रहा था और आसमान का रंग गहरा जामुनी हो रहा था, दोनों झरने के थोड़े ऊपरी हिस्से में एक एकांत चट्टान पर बैठ गए। नीचे पानी के बहने की निरंतर आवाज आ रही थी, जो किसी शास्त्रीय संगीत जैसी लग रही थी।

"अजय," सुवर्णा ने नीचे बहते पानी में एक छोटा सा पत्थर फेंकते हुए कहा। "इस पिकनिक को मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगी। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे इस झरने के पास आकर मैं पूरी तरह आजाद हो गई हूँ। क्या तुम्हें भी ऐसा लगता है?"

अजय ने सुवर्णा की तरफ देखा। पहाड़ी हवा के कारण सुवर्णा को हल्की सी ठंड लग रही थी और वह सिमट कर बैठी थी। अजय ने बिना कुछ सोचे अपना सूती शॉल उतारा और धीरे से सुवर्णा के कंधों पर डाल दिया।

सुवर्णा ने चौंककर अजय को देखा। उन दोनों की नजरें जब मिलीं, तो समय जैसे वहीं ठहर गया। झरने की आवाज मद्धम पड़ गई। पलाश के जंगलों से आती हुई हवा उनके बीच के अनकहे जज्बातों को और गहरा कर रही थी।

"सुवर्णा," अजय की आवाज गंभीर और भावुक थी। "जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं जिन्हें हम संभालकर एक डिब्बे में बंद कर लेना चाहते हैं, ताकि जब आगे का रास्ता बहुत अँधेरा और पथरीला हो, तो हम उस डिब्बे को खोलकर थोड़ी रोशनी पा सकें। मेरे लिए आज का यह दिन, यह झरना, और... और तुम्हारा साथ, उसी रोशनी की तरह है।"

सुवर्णा की आँखों में आंसू तैर आए। वह कुछ कहना चाहती थी, वह अजय के गले लगकर रोना चाहती थी, वह कहना चाहती थी कि वह हमेशा के लिए उसकी होना चाहती है। लेकिन अजय की आँखों की संजीदगी और उसके पीछे छिपे संघर्ष को देखकर वह चुप रही। नियति ने उस दिन विंध्य की उन वादियों में उनके प्रेम की कहानी को एक नए अध्याय में प्रवेश करा दिया था, जहाँ खुशियों की कुछ बूंदें थीं, पर बिछोह का एक गहरा सागर आने वाला था।

भाग 5: सारनाथ के खंडहर और काल का चक्र

वसंत अब अपनी विदाई ले रहा था और बनारस में गर्मियों की आहट होने लगी थी। दोपहर की हवाएं अब थोड़ी गर्म होने लगी थीं, लेकिन शामें अभी भी सुहावनी थीं। परीक्षाओं के परिणाम आ चुके थे और उम्मीद के मुताबिक अजय और सुवर्णा दोनों ने ही अपनी कक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। इस खुशी को मनाने के लिए दोनों ने 'सारनाथ' जाने का फैसला किया, जो बी.एच.यू. से थोड़ी दूरी पर स्थित एक शांत और ऐतिहासिक स्थल था।

सारनाथ—जहाँ महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। यहाँ के विशाल स्तूप, हरी-भरी घास के मैदान और सदियों पुराने बौद्ध भिक्षुओं के कमरों के खंडहर इंसानी वजूद के नश्वर होने की गवाही देते थे। दोपहर के समय जब वे सारनाथ पहुँचे, तो वहाँ सैलानियों की भीड़ कम थी। 

'धमेख स्तूप' की विशालकाय ईंटों की दीवारें धूप में तप रही थीं, लेकिन उसके आसपास के पार्कों में बड़े-बड़े पेड़ों की घनी छाया थी।

वे दोनों एक पुराने खंडहर की झुकी हुई दीवार के साए में बैठ गए। चारों ओर अजीब सी शांति थी, केवल गिलहरियों की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी।

"अजय, जब मैं इन खंडहरों को देखती हूँ, तो मुझे एक अजीब सा डर लगता है," 

सुवर्णा ने एक टूटे हुए पत्थर के खंभे पर अपना हाथ फेरते हुए कहा। 

"सोचो, सदियों पहले यहाँ कितना वैभव रहा होगा, कितने लोग रहते होंगे, उनके अपने सपने होंगे, उनका अपना प्यार होगा। पर आज... आज यहाँ सिर्फ ये बेजान पत्थर बचे हैं। क्या हमारी जिंदगी का भी यही हश्र होना है?"

अजय ने स्तूप की ओर देखा। "इतिहास हमें यही सिखाता है सुवर्णा कि समय से बड़ा बलवान कोई नहीं है। साम्राज्य बनते हैं और मिट जाते हैं। राजा और प्रजा सब मिट्टी में मिल जाते हैं। लेकिन इन खंडहरों को ध्यान से देखो... ये पत्थर भले ही बेजान हैं, पर ये आज भी चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ कभी कोई जिंदगी धड़कती थी। इंसानी जिस्म खत्म हो जाता है, पर उसके कर्म, उसके विचार और उसका सच्चा प्रेम कभी नष्ट नहीं होता। वह इन पत्थरों की तरह अमर हो जाता है।"

सुवर्णा ने अजय की बातों को बड़े ध्यान से सुना। उसने महसूस किया कि अजय केवल इतिहास का छात्र नहीं है, बल्कि उसने जीवन की कड़वी सच्चाइयों को बहुत करीब से देखा और भोगा है।

"तुम हमेशा अमरता और इतिहास की बातें करते हो अजय," सुवर्णा ने उसकी ओर थोड़ा खिसकते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी। "मुझे अमर नहीं होना है। मुझे किसी इतिहास के पन्नों में अपना नाम नहीं दर्ज कराना है। मुझे तो बस इस छोटे से जीवन में थोड़ी सी खुशियां चाहिए... थोड़ा सा अपनापन चाहिए। क्या मैं बहुत ज्यादा मांग रही हूँ?"

अजय ने सुवर्णा के चेहरे को देखा। दोपहर की धूप से उसका चेहरा थोड़ा लाल हो गया था और उसकी आँखों में एक ऐसी मांग थी जिसका जवाब अजय के पास नहीं था। वह जानता था कि सुवर्णा उससे क्या सुनना चाहती है। वह खुद भी अपने दिल के भीतर उस ज्वालामुखी को महसूस कर रहा था जो सुवर्णा के लिए धड़कता था। लेकिन उसकी जेब में रखे उसके पिता के आखिरी खत के शब्द उसे अपनी औकात याद दिला रहे थे। 
खत में लिखा था—"बेटा, इस बार फसल अच्छी नहीं हुई है। बहन की शादी के लिए जो गहने रखे थे, वे भी गिरवी रखने पड़े हैं। तुम्हारी पढ़ाई पूरी होते ही तुम्हें कोई न कोई नौकरी ढूंढनी होगी, वरना घर का चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा।"

अजय ने अपने हाथ की मुट्ठियों को भींच लिया। उसने अपने भीतर के प्रेमी को एक बार फिर बड़ी बेरहमी से कुचल दिया।

"सुवर्णा, खुशियां कोई खैरात नहीं हैं जो हर किसी को मिल जाएं," अजय ने अपनी आवाज को जानबूझकर कठोर बनाते हुए कहा। 
"कुछ लोगों के हिस्से में सिर्फ कर्तव्य आते हैं, और उन्हें अपनी पूरी जिंदगी उन्हीं कर्तव्यों की वेदी पर होम करनी होती है।"

सुवर्णा की आँखों से एक आंसू टपक कर उस पुराने पत्थर पर गिर गया। वह खड़ी हो गई और बिना कुछ कहे दूर स्तूप की ओर चलने लगी। अजय वहीं बैठा रहा, खंडहर की उस ठंडी दीवार के सहारे। उसे ऐसा लगा मानो काल का चक्र घूम चुका था और उसकी जिंदगी के सबसे खूबसूरत हिस्से को कुचलने की शुरुआत हो चुकी थी।

भाग 6: गंगा आरती का महासंगम और मौन विदाई का संकेत

एम.ए. का दूसरा और आखिरी वर्ष भी देखते ही देखते अपनी समाप्ति की ओर बढ़ने लगा। यह साल दोनों के लिए मानसिक रूप से बेहद उथल-पुथल वाला रहा। पढ़ाई का बोझ बढ़ गया था और साथ ही भविष्य का धुँधलका भी गहराने लगा था। अजय अब सिविल सर्विसेज (प्रशासनिक सेवा) की परीक्षाओं की तैयारी में चौबीसों घंटे लगा रहता था। उसने सुवर्णा से मिलना बहुत कम कर दिया था, पर जब भी वे मिलते, उनके बीच की खामोशी शब्दों से ज्यादा भारी होती थी।

मई का महीना था। कैम्पस में फाइनल एग्जाम्स खत्म हो चुके थे। हॉस्टल्स खाली हो रहे थे, छात्र अपने-अपने बक्से और बिस्तर बांधकर घरों की ओर लौट रहे थे। वह बनारस में अजय की आखिरी शाम थी। अगले दिन सुबह की ट्रेन से उसे हमेशा के लिए अपने गाँव सुल्तानपुर लौटना था।

सुवर्णा ने अजय से कहा कि वह आखिरी बार 'दशाश्वमेध घाट' पर गंगा आरती देखना चाहती है। अजय मना नहीं कर सका।

शाम के समय दशाश्वमेध घाट पर इंसानों का एक समंदर उमड़ा हुआ था। घाट की सीढ़ियों से लेकर पानी में खड़ी सैकड़ों नावों तक, हर जगह लोग ही लोग थे। चारों ओर पीतल के बड़े-बड़े दीयों की रोशनी, धूप और लोबान का धुआं, और हवा में गूंजते 'हर हर गंगे' के जयकारे महामाई की अलौकिक उपस्थिति का अहसास करा रहे थे।
अजय और सुवर्णा ने एक छोटी सी नाव किराये पर ली और वे घाट से थोड़ी दूर पानी के बीच चले गए। नाव की पतवार जब पानी को काटती, तो दीयों की रोशनी पानी में लहरों के साथ तैरती हुई दिखाई देती थी। सात पुजारी घाट पर ऊंचे मंचों पर खड़े होकर एक लय में विशाल दीयों से आरती कर रहे थे। घंटियों और शंखों की आवाज से पूरा ब्रह्मांड जैसे गूंज रहा था।

सुवर्णा नाव के किनारे बैठकर पानी में बहते हुए फूलों के दीयों को देख रही थी। उसने एक दीया खरीदा, उसे अपने हाथों में लिया, अपनी आँखें बंद कीं और कुछ मन्नत मांगी। फिर उसने धीरे से उस दीये को गंगा की लहरों पर छोड़ दिया। दीया टिमटिमाते हुए अंधेरे पानी में आगे बढ़ने लगा।

"क्या मांगा सुवर्णा?" अजय ने नाव के दूसरे छोर से पूछा।

सुवर्णा ने अपनी भीगी आँखें अजय पर टिका दीं।

 "मैंने मांगा कि समय का यह पहिया यहीं रुक जाए। न कल की सुबह आए, न तुम्हारी ट्रेन आए, और न हम कभी एक-दूसरे से दूर जाएं।"

अजय का दिल तड़प उठा। उसने चारों ओर देखा। गंगा की महा-आरती अपने चरम पर थी। रोशनी, धुआं, संगीत सब कुछ अलौकिक था, लेकिन उसके भीतर एक गहरा, स्याह अंधेरा था।

"समय नहीं रुकता सुवर्णा," अजय की आवाज कांप रही थी। 

"कल मुझे जाना ही होगा। मेरे बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है। मुझे गाँव जाकर तुरंत किसी न किसी काम में जुटना होगा। इस यूनिवर्सिटी की दुनिया बहुत खूबसूरत है, पर इसके बाहर एक बहुत क्रूर दुनिया है, जहाँ मुझे लड़ना है।"

"तो क्या इस लड़ाई में मेरा कोई स्थान नहीं है, अजय?" 
सुवर्णा ने सीधे उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया। 

इस बार उसके हाथों में कोई झिझक नहीं थी, सिर्फ एक आखिरी गुहार थी। 

"मैं तुम्हारे साथ हर मुश्किल झेलने को तैयार हूँ। मुझे तुम्हारी धन-दौलत या पद नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ तुम चाहिए।"

अजय ने सुवर्णा के कांपते हुए हाथों को देखा। उसका मन हुआ कि वह पूरी दुनिया को भूलकर सुवर्णा को अपनी बाहों में भर ले और कह दे कि वह भी उसके बिना नहीं जी सकता। लेकिन तभी उसके कानों में उसकी बहन की सिसकियाँ और पिता की खांसने की आवाज गूंज गई। उसने अपने हाथों को सुवर्णा की पकड़ से धीरे से छुड़ा लिया।

"नहीं सुवर्णा... तुम एक ऊंचे घराने की लड़की हो। तुम्हारे सपने बड़े हैं। मैं एक टूटते हुए घर का बड़ा बेटा हूँ। अगर मैंने अपनी खुशियों के बारे में सोचा, तो मेरा पूरा परिवार सड़क पर आ जाएगा। मुझे अपने जज्बातों का गला घोंटना ही होगा,"

 अजय ने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया ताकि सुवर्णा उसके आंसुओं को न देख सके।

आरती समाप्त हो चुकी थी। शंख की आखिरी ध्वनि हवा में विलीन हो गई। घाट पर जल रहे दीये धीरे-धीरे बुझने लगे थे और अँधेरा गहराने लगा था। नाव जब वापस किनारे पर लगी, तो दोनों के बीच कोई शब्द नहीं बचा था।

अजय ने सुवर्णा को उसके घर के मोड़ तक छोड़ा। जब सुवर्णा मुड़ने लगी, तो उसने पलटकर आखिरी बार अजय को देखा। उसकी आँखों में अब कोई शिकायत नहीं थी, सिर्फ एक अंतहीन दर्द और बिछोह की तड़प थी।

"अलविदा, अजय,"

 उसने बेहद धीमे से कहा।

"अपना खयाल रखना, सुवर्णा," 

अजय ने कहा और अंधेरी गली में तेजी से आगे बढ़ गया।

उस रात बनारस की सड़कों पर हवाएं बहुत तेज चल रही थीं। अमलतास के आखिरी बचे हुए पीले फूल भी पेड़ों से टूटकर धूल में मिल रहे थे। महामना की बगिया से शुरू हुई वह प्रेम-कहानी, गंगा की लहरों पर एक बुझते हुए दीये की तरह, अनकही और अधूरी रहकर अँधेरे में विलीन हो चुकी थी। यूँ तो एक अधूरा अध्याय समाप्त हो चुका था, लेकिन संघर्ष और तड़प का जो महासागर आने वाला था, उसकी स्क्रिप्ट नियति ने उसी रात तैयार कर दी थी।

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अध्याय 2: चौखट की मजबूरियाँ और धुआँ होती उम्मीदें

भाग 1: सुल्तानपुर की पगडंडियाँ और यथार्थ की धूप

बनारस से सुल्तानपुर की दूरी महज चंद घंटों की रेल यात्रा से नापी जा सकती है, लेकिन अजय के लिए यह सफर दो अलग-अलग ग्रहों के बीच की दूरी जैसा था। एक तरफ बी.एच.यू. का वह विशाल, हरा-भरा, कलात्मक परिसर था जहाँ ज्ञान और प्रेम की त्रिवेणी बहती थी; और दूसरी तरफ था उसका गाँव—धूल से सनी पगडंडियाँ, कड़कड़ाती धूप में सूखते हुए कुएँ और तंग गलियों में पसरा हुआ सन्नाटा।
सुबह की पैसेंजर ट्रेन जब सुल्तानपुर स्टेशन पर रुकी, तो अजय अपना पुराना वी.आई.पी. सूटकेस और किताबों से भरा बोरा लेकर नीचे उतरा। स्टेशन के बाहर निकलते ही उमस और धूल के झोंके ने उसका स्वागत किया। उसने एक खस्ताहाल बस पकड़ी और दोपहर होते-होते अपने गाँव की चौखट पर पहुँच गया।
अजय का घर गाँव के एक छोर पर था—मिट्टी की दीवारें, जिन पर खपरैल की छत झुकी हुई थी। बाहर एक छोटा सा दालान था जहाँ एक पुरानी लकड़ी की चारपाई बिछी थी। जैसे ही अजय ने दालान में कदम रखा, उसके कानों में एक भारी और घिसटती हुई खाँसने की आवाज पड़ी।
"बाबूजी..." अजय ने सूटकेस जमीन पर रखा और चारपाई की ओर दौड़ा।
चारपाई पर उसके पिता, रामशरण जी लेटे हुए थे। उनका शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। दमे की बीमारी ने उनकी छाती को धौंकनी की तरह बना दिया था। अजय को देखते ही उनकी धँसी हुई आँखों में पानी तैर आया। उन्होंने कांपते हुए हाथों से अजय के सिर को छुआ।
"आ गए बेटा? पढ़ाई पूरी हो गई न तुम्हारी?" रामशरण जी की आवाज बहुत मद्धम थी।
"हाँ बाबूजी, परीक्षा अच्छी हुई है। मैं आ गया हूँ, अब आप चिंता मत कीजिए," अजय ने उनके पैर छूते हुए कहा।
तभी भीतर से उसकी माँ और छोटी बहन, विभा बाहर आईं। विभा की उम्र अब बाईस बरस की हो चुकी थी। उसके चेहरे पर उम्र से पहले ही एक सयानापन और चिंता की लकीरें खिंच गई थीं। भारतीय समाज में एक जवान, अविवाहित बेटी का घर में होना माता-पिता के लिए किसी भारी दबाव से कम नहीं होता। माँ की आँखों में बेटे को देखकर थोड़ा सुकून तो आया, लेकिन वह सुकून भी घरेलू चिंताओं के मलबे के नीचे दबा हुआ था।
रात को जब घर की रसोई में मद्धम ढिबरी (मिट्टी के तेल का दीया) जली, तो थाली में सूखी रोटियाँ और नमक-तेल से सनी आलू की सब्जी परोसी गई। बनारस की हॉस्टल की लाइफ भले ही बहुत आलीशान नहीं थी, लेकिन वहाँ भविष्य की एक उम्मीद थी। यहाँ, यथार्थ अपनी पूरी नग्नता के साथ अजय के सामने खड़ा था।
"अजय," भोजन के बाद माँ ने उसके पास आकर धीमे से कहा। "तुम्हारे बाबूजी की दवाइयाँ अब उधार पर मिल रही हैं। बनिए का पिछला कर्जा भी बाकी है। विभा के लिए एक-दो जगह से रिश्ते आए हैं, लेकिन वे लोग दहेज में भारी रकम और मोटरसाइकिल मांग रहे हैं। छोटे भाई अमित की स्कूल की फीस तीन महीने से जमा नहीं हुई है। अब जो कुछ भी है, तुम्हारे ही भरोसे है बेटा।"
अजय ने खिड़की से बाहर देखा। आसमान में चाँद आधा था और उसकी मद्धम रोशनी मिट्टी के आंगन पर पड़ रही थी। उसे बनारस का अस्सी घाट याद आया, जहाँ उसने सुवर्णा से कहा था कि वह एक टूटते हुए घर का बड़ा बेटा है। माँ के एक-एक शब्द ने उसके दिल पर हथौड़े की तरह चोट की। उसने अपने भीतर के सारे अरमानों, सुवर्णा की उन भूरी आँखों, उसकी चंचल हँसी और पलाश के उन खूबसूरत दिनों को हमेशा के लिए एक गहरे कुएँ में धकेल दिया। उसने मन ही मन तय कर लिया कि अब उसकी जिंदगी उसकी अपनी नहीं है। वह केवल एक जरिया है—अपने परिवार को इस दलदल से निकालने का।

भाग 2: स्मृतियों का पिंजरा और सुवर्णा की व्याकुलता

इधर बनारस में, सुवर्णा के लिए जून का यह महीना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शहर में चिलचिलाती धूप थी और लू के थपेड़े चल रहे थे, लेकिन सुवर्णा के दिल के भीतर जो विरह की आग जल रही थी, उसके आगे यह मौसम भी फीका था।
वह अपने बड़े से घर के शांत कमरे में बैठी रहती। उसके सामने इतिहास की बड़ी-बड़ी किताबें खुली होती थीं, लेकिन पन्नों पर लिखे अक्षर धुंधले हो जाते और उनकी जगह अजय का गंभीर, सांवला चेहरा उभर आता था। वह बार-बार अपनी कलाई घड़ी को देखती, यह सोचते हुए कि इस वक्त अजय क्या कर रहा होगा। क्या वह पढ़ रहा होगा? क्या उसने खाना खाया होगा? क्या उसे एक बार भी अपनी इस 'सुवर्णा' का खयाल आया होगा?
एक शाम, सुवर्णा अपने घर की छत पर टहल रही थी। शाम की हवा में थोड़ी सी ठंडक आने लगी थी, लेकिन आसमान का रंग वैसा ही जामुनी था जैसा लखनिया दरी के झरने के पास था। उसने अपने कंधों पर हाथ फेरा, जहाँ अजय ने अपनी सूती शॉल डाली थी। उसे लगा कि वह शॉल आज भी उसके बदन को छू रही है।

"तुमने मुझसे मुख मोड़ लिया अजय, पर मेरे दिल से खुद को कैसे निकालोगे?" उसने बुदबुदाते हुए आसमान की तरफ देखा।

सुवर्णा का स्वभाव चंचल जरूर था, लेकिन उसका प्रेम अत्यंत गहरा और अनन्य था। उसने तय किया कि वह अजय को एक खत लिखेगी। उसने एक कोरा कागज निकाला और उस पर अपने दिल के जज्बातों को स्याही के रूप में उड़ेलना शुरू कर दिया:

"प्रिय अजय,

 काशी की सुबह अब वैसी उजली नहीं लगती जैसी तुम्हारे साथ लगती थी। वी.टी. मंदिर की घंटियों की आवाज में अब एक अजीब सी उदासी महसूस होती है। तुम तो चले गए, पर अपनी यादों का जो समंदर मेरे पास छोड़ गए हो, उसमें मैं हर रोज डूबती और उतराती हूँ। मैं जानती हूँ तुम्हारे ऊपर जिम्मेदारियों का बोझ है, मैं यह भी जानती हूँ कि तुम स्वाभिमानी हो। लेकिन क्या प्रेम जिम्मेदारियों का दुश्मन होता है? क्या हम मिलकर इस बोझ को नहीं उठा सकते थे? मुझे तुम्हारी खामोशी से डर लगता है अजय। एक बार... बस एक बार मुझे लिख देना कि तुम ठीक हो। तुम्हारी सुवर्णा।"

उसने खत को लिफाफे में बंद किया और अजय के गाँव के पते पर भेज दिया, जो उसने यूनिवर्सिटी के रजिस्टर से नोट किया था। खत भेजने के बाद सुवर्णा रोज सुबह डाकिया का इंतजार करने लगी। हर रोज जब डाकिया उसकी गली से गुजरता और उसके घर का दरवाजा नहीं खटखटाता, तो उसका दिल टूटकर बिखर जाता। जुदाई का यह पहला साल सुवर्णा को एक संजीदा, गंभीर और भीतर से अकेली औरत में बदल रहा था।

भाग 3: ढिबरी की रोशनी में तपस्या और समाज के ताने

गाँव आने के बाद अजय ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने गाँव से तीन किलोमीटर दूर कस्बे के एक छोटे से कोचिंग संस्थान में सुबह और शाम को बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इससे जो थोड़े-बहुत पैसे मिलते, उससे घर का राशन और बाबूजी की दवाइयों का खर्च चलने लगा।
लेकिन अजय का असली लक्ष्य कुछ और था। वह जानता था कि छोटी-मोटी नौकरी से इस परिवार का कायाकल्प नहीं होने वाला। उसे 'प्रशासनिक सेवा' की परीक्षा पास करनी ही होगी।
अजय की दिनचर्या किसी कठिन तपस्वी जैसी हो गई थी:

 सुबह 4 बजे उठना: खेतों की तरफ जाना, फिर लौटकर खुद चाय बनाना और पढ़ाई में जुट जाना।

 सुबह 9 से दोपहर 2 बजे तक:कस्बे के कोचिंग में बच्चों को पढ़ाना और नोट्स तैयार करना।

 दोपहर 3 से रात 10 बजे तक:घर के एक कोने में, जहाँ सिर्फ एक टूटी हुई मेज और कुर्सी थी, प्रशासनिक सेवा की मोटी-मोटी किताबों के बीच खो जाना।

गाँव में बिजली का कोई ठिकाना नहीं रहता था। गर्मियों की रातों में जब उमस के मारे बदन से पसीना बहता था, तब अजय हाथ के पंखे से खुद को हवा झेलता हुआ मिट्टी के तेल की ढिबरी की मद्धम, पीली रोशनी में पढ़ता रहता। दीये के धुएँ से उसकी आँखें लाल हो जाती थीं, नाक के पास कालिख जम जाती थी, लेकिन उसकी एकाग्रता भंग नहीं होती थी।
लेकिन इस संघर्ष के बीच समाज का रवैया बहुत क्रूर था। गाँव के लोग, रिश्तेदार और पड़ोसी जब भी दालान से गुजरते, तो तंज कसने से बाज नहीं आते थे।
"अरे रामशरण जी, लड़का बनारस से पढ़के लौट आया है, पर अभी तक कोई पक्की नौकरी नहीं लगी क्या? सुना है कौनों बड़ी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। अरे भाई, सीधे-सीधे कलेक्ट्रेट में मुंशी की नौकरी देख लो, काहे लड़का का उमर बर्बाद कर रहे हो," पड़ोस के सुखदेव चाचा ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा।
अजय के कानों में ये बातें पड़ती थीं, तो उसका खून खौल उठता था। लेकिन वह चुप रहता। वह जानता था कि सफलता ही इन तानों का इकलौता जवाब है।
उसी दौरान उसे सुवर्णा का वह खत मिला। जब डाकिया ने उसे वह लिफाफा दिया, तो सुवर्णा की लिखावट देखकर अजय के हाथ कांपने लगे। वह उस खत को लेकर खेतों की तरफ एकांत में चला गया। एक बड़े महुए के पेड़ की छांव में बैठकर उसने खत खोला। सुवर्णा का एक-एक शब्द उसके दिल को चीर रहा था। खत पर सूखी हुई आंसुओं की बूंदों के निशान थे।
अजय ने उस खत को अपने सीने से लगा लिया और फूट-फूटकर रो पड़ा। "मैं कैसे बताऊं सुवर्णा कि मैं किस नरक में जी रहा हूँ। मैं तुम्हें इस दलदल में नहीं खींच सकता। तुम्हारी जगह महलों में है, इस मिट्टी के ढहते हुए मकान में नहीं।"
उसने तय किया कि वह इस खत का कोई जवाब नहीं देगा। वह चाहता था कि सुवर्णा उसे निष्ठुर समझे, पत्थर दिल समझे, ताकि वह उसे भूलकर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सके। प्रेम का यह कैसा रूप था, जहाँ एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को खुश देखने के लिए खुद उसकी नजरों में विलेन बनने को तैयार था।

भाग 4: वर्षा ऋतु का आगमन और स्मृतियों का ज्वार

जुलाई का महीना आते ही आसमान में काले-कलोटे बादलों का डेरा जम गया। बनारस और जौनपुर के इलाकों में मॉनसून की पहली बारिश ने दस्तक दी। सूखी, तपती धरती पर जब पानी की पहली बूंदें गिरीं, तो मिट्टी से एक सोंधी सी खुशबू उठी। यह वही खुशबू थी जो बी.एच.यू. के कैम्पस में पहली बारिश के दौरान आती थी।
गाँव के खेतों में पानी भर गया था। मेंढक टर्रा रहे थे और मोर जंगलों में नाच रहे थे। प्रकृति सुंदर हो चुकी थी, लेकिन अजय के लिए यह मौसम उसकी यादों के जख्मों को हरा करने वाला था।
एक दोपहर तेज बारिश हो रही थी। खपरैल की छत से पानी की बूंदें टप-टप करके आंगन में गिर रही थीं। अजय अपनी मेज पर बैठा 'भारतीय अर्थव्यवस्था' के नोट्स बना रहा था। तभी पानी की एक बूंद सीधे उसकी कॉपी पर गिरी और स्याही फैल गई। अजय ने ऊपर देखा, छत से पानी चू रहा था। वह उठा और एक प्लास्टिक की बाल्टी को उस जगह पर रख दिया।
बाल्टी में पानी के गिरने की आवाज—*टपक, टपक, टपक*—बिल्कुल वैसी ही थी जैसी लखनिया दरी के झरने के पानी की थी। अजय ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे याद आया कि कैसे सुवर्णा ने उसका हाथ पकड़कर पानी में खींचा था, कैसे वह भीगकर हंस रही थी।

"कपड़े सूख जाएंगे अजय, पर यह वक्त दोबारा नहीं आएगा..." सुवर्णा के वे शब्द उसके कानों में गूंज उठे।

अजय ने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया। "क्यों नहीं जाती तुम मेरे दिमाग से सुवर्णा? क्यों मुझे कमजोर कर रही हो?" वह व्याकुल होकर कमरे में टहलने लगा। जुदाई का दर्द जब अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो इंसान को अपने ही वजूद से नफरत होने लगती है।
उधर बनारस में, सुवर्णा अपने कॉलेज की खिड़की के पास खड़ी बारिश को देख रही थी। उसने जे.आर.एफ. (JRF) की तैयारी शुरू कर दी थी, ताकि वह रिसर्च कर सके। बारिश की बूंदें कांच की खिड़की से फिसल रही थीं। सुवर्णा ने अपनी उंगली से कांच पर जमी धुंध पर एक नाम लिखा—'अजय'। और फिर तुरंत ही उसे अपने आंसुओं से मिटा दिया। उसे अजय का कोई जवाब नहीं मिला था। उसका दिल अब धीरे-धीरे इस सच को स्वीकार कर रहा था कि अजय ने उससे दूरी बना ली है, लेकिन उसका प्यार कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

भाग 5: त्योहारों की उदासी और टूटती दीवारें

वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा। बारिश के बाद शरद ऋतु आई और अपने साथ त्योहारों का मौसम लेकर आई। दशहरा, दिवाली और फिर छठ पूजा। पूरे गाँव में एक उल्लास का माहौल था। लोगों के घरों की पुताई हो रही थी, नए कपड़े खरीदे जा रहे थे, और पकवानों की खुशबू हवा में तैर रही थी।
लेकिन अजय के घर में इस बार दिवाली पर सिर्फ दो मिट्टी के दीये जलाए गए—एक तुलसी के पौधे के पास और एक दालान में। नए कपड़े खरीदना तो दूर, बाबूजी की इस महीने की दवाई के पैसे भी पूरे नहीं हो पा रहे थे।
दिवाली की रात, जब पूरा गाँव पटाखों की आवाज और रोशनी से सराबोर था, अजय अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था। तभी अचानक दालान से एक भारी आवाज आई, जैसे कुछ गिरा हो। अजय तेजी से बाहर भागा। उसने देखा कि बाबूजी चारपाई से नीचे फर्श पर गिरे पड़े थे और उनके मुंह से झाग निकल रहा था। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।
"बाबूजी! बाबूजी!" अजय ने उन्हें अपनी बाहों में उठाया। माँ और विभा रोने लगीं।
रात के बारह बजे, अजय अपने दोस्त की साइकिल पर बाबूजी को पीछे लादकर कस्बे के सरकारी अस्पताल की ओर भागा। रास्ता कच्चा था और चारों ओर अंधेरा था। अजय के पैरों में चप्पल नहीं थी, पत्थर उसके पैरों में चुभ रहे थे, खून निकल रहा था, पर उसे सिर्फ अपने पिता की सांसों की चिंता थी।
अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टरों ने उन्हें आईसीयू में भर्ती किया और कहा कि तुरंत पाँच हजार रुपये जमा कराने होंगे। पाँच हजार रुपये! उस दौर में अजय के लिए यह रकम किसी पहाड़ जैसी थी। उसने अपने आत्मसम्मान को ताक पर रख कर अपनी माँ के सोने के कंगन गिरवी रखकर वो पैसे चुकाए।
बाबूजी की जान तो बच गई, लेकिन इस घटना ने अजय को आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। अब उसके ऊपर ठाकुर का कर्ज था, जिसका ब्याज हर महीने बढ़ रहा था। परीक्षा के दिन नजदीक आ रहे थे और अजय के पास पढ़ने के लिए शांत दिमाग नहीं था। परिस्थितियाँ उसे चारों ओर से घेर रही थीं, जैसे कोई शिकारी किसी हिरण को जाल में फंसा लेता है।

भाग 6: पहली परीक्षा का परिणाम और नया संकल्प

सर्दियों के अंत में, फरवरी के महीने में प्रशासनिक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा (प्रिलिम्स) आयोजित हुई। अजय परीक्षा देने शहर गया। परीक्षा के दौरान उसके दिमाग में एक तरफ इतिहास के सवाल थे और दूसरी तरफ घर के हालात। फिर भी, उसने अपनी पूरी एकाग्रता समेटी और पेपर दिया।
परीक्षा के दो महीने बाद जब परिणाम आया, तो अजय का नाम क्वालिफाइड उम्मीदवारों की सूची में था। उसने प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली थी। यह पूरे परिवार के लिए अंधेरे में एक दीये के जलने जैसा था। माँ ने रोते हुए भगवान के सामने माथा टेका।
लेकिन अजय जानता था कि असली लड़ाई अब शुरू होनी थी—मुख्य परीक्षा (मेंस) और साक्षात्कार (इंटरव्यू)। इसके लिए उसे और ज्यादा मेहनत करनी थी।
उसी दिन, कस्बे के बाजार में अजय को यूनिवर्सिटी का एक पुराना दोस्त, रमेश मिल गया। रमेश बनारस से ही आ रहा था। चाय की दुकान पर बैठते ही रमेश ने अजय को बी.एच.यू. की खबरें देनी शुरू कीं।
"यार अजय, तुम तो बिल्कुल गायब ही हो गए। पता है, सुवर्णा ने जे.आर.एफ. टॉप किया है। वह अब यूनिवर्सिटी में ही रिसर्च कर रही है। बहुत गंभीर हो गई है यार वो, किसी से बात नहीं करती। सब कहते हैं कि उसका कोई बहुत करीबी उसे धोखा दे गया," रमेश ने अनजाने में अजय के जख्मों पर नमक छिड़क दिया।
अजय ने अपनी चाय का कुल्हड़ कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखों में आंसू आ गए, पर उसने उन्हें पी लिया। उसने रमेश से कहा, "अच्छा है, वह आगे बढ़ रही है। उसे आसमान छूना चाहिए।"
रमेश के जाने के बाद अजय काफी देर तक वहीं बैठा रहा। उसे अहसास हुआ कि उसकी खामोशी सुवर्णा को तड़पा रही है, पर वह बेबस था। उसने आसमान की तरफ देखकर एक नया संकल्प लिया—"सुवर्णा, अगर मैं तुम्हारी जिंदगी में वापस आऊंगा, तो एक हारा हुआ इंसान बनकर नहीं, बल्कि एक विजेता बनकर आऊंगा। तब तक के लिए, तुम्हें इस दर्द को सहना ही होगा।"
अपन्यास का यह दूसरा पड़ाव दोनों प्रेमियों को जुदाई के एक ऐसे मोड़ पर छोड़ जाता है, जहाँ एक तरफ जिम्मेदारियों का क्रूर यथार्थ है और दूसरी तरफ अनकहे प्रेम की अंतहीन तड़प। समय का पहिया घूम रहा था, और इसके साथ ही दोनों के भाग्य की रेखाएं और जटिल होती जा रही थीं।
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अध्याय 3: काँटों का ताज और तपस्या की अग्नि

भाग 1: मुख्य परीक्षा का महासंग्राम और वाराणसी का शीतकाल

प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम तो महज एक झरोखा था, जिसके पार अजय ने सफलता की धुंधली सी मुंडेर देखी थी। असली चुनौती तो मुख्य परीक्षा (मेंस) की थी, जहाँ देश और प्रदेश के सबसे मेधावी मस्तिष्क अपने ज्ञान की धार का प्रदर्शन करने आते थे। इस परीक्षा के लिए केवल सतही ज्ञान काफी नहीं था; इसके लिए इतिहास के दर्शन की गहरी समझ, समसामयिक विषयों पर तीक्ष्ण दृष्टिकोण और सबसे बढ़कर, घंटों तक लगातार लिखने का अदम्य साहस चाहिए था।
अजय के पास वाराणसी जाकर किसी बड़े कोचिंग संस्थान में दाखिला लेने या शहर के किसी भी इलाके में कमरा लेकर रहने के पैसे नहीं थे। जहाँ अन्य छात्र दिल्ली के करोल बाग या इलाहाबाद, वाराणसी के पुस्तकालयों में बैठकर आधुनिकतम अध्ययन सामग्री से तैयारी कर रहे थे, वहीं अजय का एकमात्र सहारा उसकी बी.एच.यू. की पुरानी कॉपियाँ, सतीश चंद्र, बिपिन चंद्र और डी.डी. बसु की घिसी हुई किताबें थीं।
ठंड का मौसम आ चुका था। दिसंबर की शुरुआत में ही पूर्वांचल के गाँवों में कड़ाके की शीत लहर चलने लगती थी। कोहरा इतना घना होता था कि सुबह के आठ-नौ बजे तक हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। अजय की दिनचर्या इस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में और भी कठोर हो गई।
वह सुबह चार बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सोया होता था और सन्नाटा इतना गहरा होता था कि दूर पटरियों से गुजरने वाली मालगाड़ी की छुक-छुक भी साफ सुनाई देती थी, अपनी चटाई पर बैठ जाता था। ठंड से उंगलियाँ सुन्न हो जाती थीं, कलम पकड़ना दूभर हो जाता था। अजय के पास कमरे को गर्म रखने के लिए कोई हीटर नहीं था। वह एक पुरानी बोरी को अपने पैरों पर लपेट लेता, माँ के हाथ की बुनी हुई फटी स्वेटर पहनता और अपने कांपते हाथों से पन्नों पर उत्तर लिखना शुरू करता।
 "जब तक हाथ की नसें जवाब न दे दें, तब तक लिखते रहना है," वह खुद से कहता। वह हर रोज समय सीमा तय करके तीन-तीन घंटे के दो मॉक पेपर लिखता था। उसकी उंगलियों पर कलम के घर्षण से काले गट्टे पड़ गए थे, जिनमें अक्सर दर्द रहता था, लेकिन उस दर्द से कहीं ज्यादा गहरा दर्द उसके भीतर चल रहे वक्त का था।

अजय के सर पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था। हर महीने का ब्याज चुकाने के लिए माँ को घर के बचे-कुचे बर्तन भी बेचने पड़े थे। घर में सुबह चूल्हा जलता, तो शाम को केवल चाय और सत्तू के सहारे रात काटनी पड़ती थी। विभा अपने भाई की इस हालत को देखकर अक्सर छुपकर रोती थी। वह एक दिन अजय के पास आई और उसने अपनी पतली कलाई से कांच की चूड़ियाँ हटाते हुए कहा, "भैया, मेरी शादी की चिंता में आप खुद को मार रहे हैं। आप मत पढ़िए, मैं किसी भी साधारण मजदूर या किसान से शादी कर लूंगी, आप बस आराम कीजिए।"
अजय ने विभा के सिर पर हाथ रखा। उसकी आँखों में एक ऐसी दृढ़ता थी जो केवल उन लोगों में आती है जो अपनी आखिरी बाजी खेलने जा रहे हों। "विभा, तुम्हारी शादी किसी मजदूर से नहीं होगी। तुम्हारी शादी एक सम्मानजनक घर में होगी, और तुम्हारा भाई खुद तुम्हें डोली में बिठाएगा। बस मुझे कुछ महीनों का समय दे दे।"
मुख्य परीक्षा का केंद्र प्रयागराज पड़ा था। परीक्षा के उन दस दिनों में अजय प्रयागराज के में अपने एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ रुका। वह एक छोटा सा कमरा था, जहाँ रोशनी भी ठीक से नहीं आती थी। परीक्षा के दौरान अजय केवल उबले हुए आलू और बिस्कुट खाकर केंद्र पर जाता था। कड़ाके की ठंड में, जब यूनिवर्सिटी रोड पर कोहरे की चादर बिछी होती, अजय पैदल ही परीक्षा केंद्र की ओर बढ़ता। उसके दिमाग में केवल एक ही धुन सवार थी—"यह जीवन का आखिरी मौका है। इसके बाद या तो अंधकार है, या फिर नया सवेरा।"

भाग 2: नियति का क्रूर प्रहार — पिता का साया उठना

मुख्य परीक्षा समाप्त होने के बाद अजय गाँव लौटा। परीक्षा बहुत अच्छी गई थी, और उसके भीतर एक धीमा सा विश्वास जगने लगा था कि वह इस बार इतिहास रच देगा। लेकिन नियति कभी भी सीधे रास्ते पर नहीं चलती; वह हमेशा अपने सबसे क्रूर मोड़ तब लाती है जब इंसान को लगता है कि रास्ता साफ हो चुका है।
फरवरी का आखिरी हफ्ता था। वसंत की बयार चलने लगी थी, और खेतों में सरसों के पीले फूल लहलहा रहे थे। इन फूलों को देखकर अजय को बी.एच.यू. के वे दिन याद आ जाते, जब सुवर्णा के साथ उसने पलाश के फूल देखे थे। वह अपनी मेज पर बैठा साक्षात्कार की तैयारी के लिए अखबार पढ़ रहा था, तभी अचानक भीतर के कमरे से माँ की एक चीख गूंजी।
अजय कलम छोड़कर भीतर भागा। उसने देखा कि चारपाई पर लेटे बाबूजी का शरीर बिल्कुल शांत था। उनकी आँखें आधी खुली थीं, लेकिन उनमें अब कोई चेतना नहीं थी। दमे के उस आखिरी और भयानक दौरे ने उनके कमजोर फेफड़ों की सांसों को हमेशा के लिए छीन लिया था। रामशरण जी, जिन्होंने पूरी जिंदगी ईमानदारी से बच्चों को पढ़ाया और गरीबी से संघर्ष किया, अपने बेटे को अधिकारी बनते देखने से ठीक पहले इस दुनिया से विदा हो गए।
पूरे घर में कोहराम मच गया। माँ फर्श पर बैठकर अपनी छाती पीट-पीटकर रोने लगी। विभा बाबूजी के पैरों से लिपटकर सिसक रही थी। अजय जैसे जड़ हो गया। उसकी आँखों से आंसू नहीं निकले। उसका गला सूख चुका था। वह धीरे से चारपाई के पास बैठा और बाबूजी के उस ठंडे, कठोर हाथ को अपने हाथ में ले लिया।
"बाबूजी... आपने कहा था न कि जब मैं अफसर बनूँगा, तो आप मेरे साथ शहर की कोठी में रहेंगे? आप इतनी जल्दी क्यों चले गए?" अजय ने मन ही मन चीखकर कहा, पर उसके होंठ हिले तक नहीं। उसका दुख इतना गहरा था कि आंसुओं की धारा भी सूख चुकी थी।
गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। अंतिम संस्कार की तैयारियां होने लगीं। लेकिन यहाँ भी गरीबी ने अजय का उपहास उड़ाया। कफन और लकड़ी खरीदने के लिए घर में एक रुपया भी नहीं था। ठाकुर साहब ने साफ मना कर दिया कि जब तक पिछला कर्ज नहीं चुकाया जाता, वे और पैसे नहीं देंगे। अंत में, अजय के कुछ सहपाठियों और कस्बे के उस कोचिंग संचालक ने, जहाँ अजय पढ़ाता था, पैसे इकठ्ठा करके अंतिम संस्कार का प्रबंध किया।
गंगा के घाट पर, जब अजय ने बाबूजी की चिता को मुखाग्नि दी, तो जलती हुई लपटों को देखते हुए उसे लगा कि केवल बाबूजी का शरीर नहीं जल रहा, बल्कि उसके बचपन का वो सुरक्षा कवच भी जलकर राख हो रहा है। अब वह पूरी तरह अकेला था। माँ, बहन और भाई की पूरी जिम्मेदारी अब उसके इन कमजोर कंधों पर थी। चिता की राख जब गंगा के ठंडे पानी में विलीन हो रही थी, अजय ने वहीं खड़े होकर गंगा जल हाथ में लिया और संकल्प लिया—"बाबूजी, आपकी आत्मा को शांति तभी मिलेगी, जब मैं इस परिवार को सम्मान और खुशियों के उस मुकाम पर पहुँचा दूंगा जिसके आप हकदार थे।"

भाग 3: बनारस की गलियों में सुवर्णा का मौन विलाप

जब सुल्तानपुर के एक गाँव में अजय दुखों के पहाड़ से टकरा रहा था, तब बनारस के बी.एच.यू. कैम्पस में वसंत अपने पूरे शबाब पर था। केंद्रीय पुस्तकालय की सीढ़ियों पर आज भी वैसे ही छात्र बैठते थे, वैसे ही नोट्स शेयर होते थे, पर वह जोड़ी गायब थी जिसने पिछले साल इस परिसर को अपनी उपस्थिति से जीवंत किया था।
सुवर्णा ने जे.आर.एफ. के तहत अपना रिसर्च कार्य शुरू कर दिया था। उसका विषय था—'मध्यकालीन भारत में सामाजिक और आर्थिक संरचना'। यह वही विषय था जिस पर अजय घंटों अधिकार के साथ बोला करता था। सुवर्णा अक्सर रिसर्च स्कॉलर्स के केबिन में बैठी रहती, बड़ी-बड़ी संदर्भ पुस्तकें उसके सामने खुली होतीं, लेकिन उसका ध्यान किताबों पर कम और खिड़की से दिखने वाले उस रास्ते पर ज्यादा रहता था, जहाँ से कभी अजय अपनी घिसी हुई चप्पलों की आवाज के साथ आता दिखाई देता था।
उसे अजय का कोई समाचार नहीं मिला था। उसने कई बार सोचा कि वह सुल्तानपुर चली जाए, लेकिन उसका स्त्री-सुलभ स्वाभिमान और सामाजिक मर्यादाएं उसे रोक देती थीं। वह सोचती कि जब अजय ने खुद ही उससे नाता तोड़ लिया है, जब उसने उसके भावुक पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया, तो वह क्यों उसके जीवन में जबरदस्ती दखल दे?
एक दिन, सुवर्णा अस्सी घाट की सीढ़ियों पर अकेली बैठी थी। शाम की आरती शुरू होने वाली थी। गंगा की लहरें घाट के पत्थरों से टकराकर वही पुराना संगीत पैदा कर रही थीं। सुवर्णा ने अपनी डायरी निकाली और उसमें एक कविता लिखी, जो उसके दिल की तड़प को बयां कर रही थी:
तुम नदी के उस पार के यथार्थ हो अजय,
और मैं इस पार की एक अधूरी कल्पना।
तुमने कर्तव्यों को चुना, मैंने तुम्हें चुना,
पर समय की इस अदालत में,
दोषी सिर्फ हमारा प्रेम ठहरा।"

तभी उसके पीछे से एक आवाज आई, "सुवर्णा? तुम यहाँ अकेली?"
सुवर्णा ने चौंककर पीछे देखा। वह संजय था। संजय—यूनिवर्सिटी के दिनों में उनका सहपाठी, जो एक अमीर और रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखता था। संजय हमेशा महंगे कपड़ों में रहता, उसके पास अपनी गाड़ी थी, और वह स्वभाव से थोड़ा वाचाल और आत्ममुग्ध था। यूनिवर्सिटी के दिनों में वह अक्सर सुवर्णा के आसपास मंडराने की कोशिश करता था, लेकिन सुवर्णा ने कभी उसे भाव नहीं दिया था।
"हाँ संजय, बस ऐसे ही बैठी थी," सुवर्णा ने अपनी डायरी बंद करते हुए औपचारिकता वश कहा।
"सुना है तुम रिसर्च कर रही हो? बहुत अच्छी बात है। वैसे मेरे डैड कह रहे थे कि अब मुझे भी बिजनेस संभालना चाहिए। बनारस में हमारा नया होटल प्रोजेक्ट शुरू हो रहा है," संजय ने बड़े गर्व से अपने परिवार के वैभव की चर्चा शुरू कर दी।
सुवर्णा ने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिला दिया। वह संजय की बातों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं ले रही थी। उसकी आँखें तो उस गंगा की धारा में बहते हुए दीयों को ढूंढ रही थीं, जिन्हें कभी अजय ने निहारा था। संजय उसे देखता रहा। वह सुवर्णा के इस शांत और गंभीर रूप पर मोहित था। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह अपने परिवार के माध्यम से सुवर्णा के घर शादी का प्रस्ताव भिजवाएगा। उसे पूरा विश्वास था कि शहर का कोई भी मध्यमवर्गीय परिवार उसके जैसे अमीर लड़के को मना नहीं कर पाएगा। सुवर्णा इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि नियति उसके जीवन के पन्नों पर एक ऐसा मोड़ लिखने जा रही थी, जो उसे अजय से और दूर ले जाएगा।

भाग 4: साक्षात्कार की कॉल और भाग्य का अंतिम जुआ

बाबूजी के श्राद्ध कर्म और तेरहवीं के बाद घर में अजीब सी खामोशी छा गई थी। अजय दिन-भर चुपचाप बैठा रहता। गाँव के लोग अब खुलकर कहने लगे थे कि रामशरण की मौत के बाद यह परिवार पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। कर्जदार रोज़ सुबह दालान में आकर बैठ जाते और कड़े शब्दों में अपने पैसे मांगते। अजय उनसे हाथ जोड़कर समय मांगता, पर उसकी बर्दाश्त की सीमा भी अब समाप्त हो रही थी।
उसी मानसिक तनाव के बीच, अप्रैल के एक दोपहर डाकिया दौड़ता हुआ अजय के घर आया। उसके हाथ में एक बड़ा, सरकारी लिफाफा था।
"अजय बाबू! अजय बाबू! कलेक्ट्रेट से कौनों बड़ा चिट्ठी आया है आपके नाम का!" डाकिया ने चिल्लाकर कहा।
अजय कमरे से बाहर निकला। उसने कांपते हाथों से लिफाफा लिया। भीतर मुख्य परीक्षा का परिणाम था। अजय ने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी, और उसे साक्षात्कार के लिए लखनऊ के लोक सेवा आयोग के कार्यालय में उपस्थित होने का बुलावा आया था।
यह खबर पूरे गाँव में आग की तरह फैल गई। जो लोग कल तक ताने मार रहे थे, वे अचानक अजय के दालान में आकर बैठ गए और उसकी तारीफों के पुल बांधने लगे। माँ ने रोते हुए बाबूजी की तस्वीर के सामने दीया जलाया और कहा, "सुन रहे हो जी? तुम्हारे बेटे का बुलावा आ गया है। अब हमारी गरीबी के दिन खत्म होने वाले हैं।"
लेकिन अजय के सामने एक और व्यावहारिक समस्या खड़ी थी। साक्षात्कार में जाने के लिए उसके पास पहनने को एक ढंग का सूट या फॉर्मल कपड़े तक नहीं थे। साक्षात्कारों में वेशभूषा और व्यक्तित्व का बहुत बड़ा महत्व होता है। इसके अलावा लखनऊ आने-जाने और वहाँ रुकने के लिए भी पैसों की आवश्यकता थी।
माँ ने अपनी अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने से एक छोटा सा कपड़ा निकाला। उसमें एक पुरानी, पतली सोने की चेन बंधी हुई थी। यह माँ का आखिरी आभूषण था, जो उनकी शादी में उनके मायके से मिला था।
"यह ले अजय, इसे कस्बे के सुनार के यहाँ बेच दे। इससे अपने लिए अच्छे कपड़े खरीद ले और लखनऊ जा। तेरे बाबूजी का सपना पूरा होना चाहिए," माँ ने वह चेन अजय के हाथ पर रख दी।
अजय की आँखों में आँसू आ गए। "नहीं माँ, यह तुम्हारी आखिरी निशानी है। मैं इसे नहीं बेचूँगा।"
"मूर्ख मत बन बेटा," माँ ने उसके गालों को चूमा। "आभूषण तो फिर बन जाएंगे, पर यह समय दोबारा नहीं आएगा। अगर तू अफसर बन गया, तो ऐसी सौ चेन मेरे पास होंगी। जा, अपने भविष्य को जीत कर आ।"
अजय ने भारी मन से वह चेन ली। उसने कस्बे जाकर उसे बेचा, जिससे उसे दस हजार रुपये मिले। उसने एक साधारण सा रेडीमेड सूट खरीदा, जूते लिए और बचे हुए पैसों से लखनऊ का टिकट कटवाया। लखनऊ जाने वाली बस में बैठते हुए अजय ने खिड़की से बाहर देखा। उसे लगा कि वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा और आखिरी जुआ खेलने जा रहा है। अगर इस बार सफलता नहीं मिली, तो वह खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगा।

भाग 5: लखनऊ का वह कमरा और साक्षात्कार का तनाव

लखनऊ का लोक सेवा आयोग भवन—एक ऐसी इमारत जिसके भीतर कदम रखते ही अच्छे-अच्छे मेधावियों के पैर कांपने लगते थे। ऊंचे-ऊंचे गलियारे, गंभीर चेहरे वाले सुरक्षाकर्मी और फाइलों को लेकर दौड़ते कर्मचारी।
अजय का साक्षात्कार सुबह के सत्र में था। वह सुबह आठ बजे ही आयोग के गेट पर पहुँच गया था। गलियारे में कई अन्य उम्मीदवार बैठे थे। कोई महंगी गाड़ियों से आया था, किसी के पास विलायती सूट थे, और कुछ लोग अंग्रेजी में बड़े आत्म-विश्वास के साथ बातें कर रहे थे। उनके बीच अजय खुद को थोड़ा असहज महसूस कर रहा था। उसका सूट बहुत महंगा नहीं था, और उसके चेहरे पर गाँव के संघर्ष की थकान साफ दिख रही थी।
तभी उसका नाम पुकारा गया—"अजय कुमार, कमरा नंबर 3।"
अजय ने गहरी सांस ली, मन ही मन बाबूजी और महामना का ध्यान किया, और कमरे के भीतर प्रवेश किया। कमरे के बीच में एक बड़ी गोलाकार मेज थी, जिसके पीछे पाँच वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और शिक्षाविद बैठे थे। बोर्ड के अध्यक्ष एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी थे, जिनकी आँखें बेहद तीक्ष्ण थीं।
"बैठिए, अजय," अध्यक्ष ने गंभीर आवाज में कहा।
"धन्यवाद, श्रीमान," अजय ने अत्यंत विनम्रता के साथ कहा और कुर्सी पर बैठ गया।
शुरुआती सवाल उसके व्यक्तिगत विवरण और जौनपुर जिले की भौगोलिक और सामाजिक समस्याओं पर थे। अजय ने पूरी संजीदगी और यथार्थ के साथ जवाब दिए। उसने कोई हवाई बातें नहीं कीं, बल्कि जमीन की हकीकत को बयां किया।
तभी बोर्ड के एक सदस्य, जो इतिहास के प्रोफेसर लग रहे थे, ने उसकी फाइल देखते हुए पूछा, "अजय, आपने बी.एच.यू. से इतिहास में एम.ए. किया है। आप गोल्ड मेडलिस्ट बनने से चूक गए, जबकि आपका अकादमिक रिकॉर्ड बहुत शानदार है। अंतिम वर्ष में आपकी एकाग्रता क्यों भंग हुई?"
यह सवाल सीधे अजय के दिल पर लगा। अंतिम वर्ष... वही साल जब सुवर्णा उसकी जिंदगी में आई थी, वही साल जब वह जिम्मेदारियों और जज्बातों के बीच पीस रहा था। कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। अजय ने अपनी नजरें नीची कीं, फिर अत्यंत ईमानदारी के साथ बोर्ड के सदस्य की आँखों में देखते हुए कहा:
"श्रीमान, जीवन कभी-कभी आपको एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ आपकी व्यक्तिगत इच्छाएं और आपके परिवार की मजबूरियाँ एक-दूसरे के सामने युद्ध के मैदान में खड़ी होती हैं। अंतिम वर्ष में मेरे पिता बहुत बीमार थे, घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। मुझे पढ़ाई के साथ-साथ परिवार को संभालने के लिए काम भी करना पड़ा। मेरी एकाग्रता किसी भटकाव के कारण नहीं, बल्कि यथार्थ के थपेड़ों के कारण थोड़ी प्रभावित हुई थी। पर मुझे गर्व है कि मैंने हार नहीं मानी।"

अजय के इस अत्यंत ईमानदार और गरिमापूर्ण जवाब ने बोर्ड के सभी सदस्यों को भीतर तक प्रभावित कर दिया। अध्यक्ष के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई। उन्होंने कुछ और सवाल पूछे, जिनका अजय ने बहुत तार्किक उत्तर दिया।
"धन्यवाद अजय, आपका साक्षात्कार समाप्त हुआ। आप जा सकते हैं," अध्यक्ष ने कहा।
जब अजय कमरे से बाहर निकला, तो उसे ऐसा लगा जैसे उसके कंधों से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो। उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर दी थी। अब सब कुछ उस परम सत्ता और उसकी किस्मत के हाथ में था।

भाग 6: परिणाम की रात और अधिकारी अजय का उदय

साक्षात्कार के करीब एक महीने बाद, जून की एक उमस भरी शाम को प्रशासनिक सेवा का अंतिम परिणाम घोषित होने वाला था। गाँव में बिजली कटी हुई थी। अजय अपने घर के दालान में बैठा रेडियो और अपने एक मित्र के मोबाइल फोन पर नजरें टिकाए हुए था, जिसने शहर के साइबर कैफे से परिणाम देखकर बताने का वादा किया था।
घर का माहौल ऐसा था जैसे कोर्ट का फैसला आने वाला हो। माँ अंदर पूजा के कमरे में बैठी लगातार हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थी। विभा और अमित दालान के खंभे से टिके चुपचाप खड़े थे। समय जैसे रेंग रहा था। शाम के सात बजे... फिर साढ़े सात... और आखिरकार रात के आठ बजे अजय के मित्र का फोन आया।
अजय ने कांपते हाथों से फोन कान से लगाया। "हेलो... रमेश? क्या हुआ?"
दूसरी तरफ से रमेश की चीख सुनाई दी, "अजय! भाई! तूने कमाल कर दिया! तू सिलेक्ट हो गया है भाई! और सुन... सिर्फ सिलेक्ट नहीं हुआ है, तेरी राज्य में 'दसवीं रैंक'आई है! तुझे प्रशासनिक विभाग में 'राजपत्रित अधिकारी' का पद मिला है! बधाई हो भाई!"
अजय के हाथ से फोन छूटकर जमीन पर गिर गया। उसके कान सूं-सूं करने लगे। दसवीं रैंक! अधिकारी की नौकरी!
विभा ने तड़पकर पूछा, "क्या हुआ भैया? बताइए न!"
अजय ने विभा और अमित को अपनी बाहों में भींच लिया और उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। "विभा... तेरा भाई अफसर बन गया! माँ... मैं पास हो गया!"
माँ दौड़ती हुई पूजा के कमरे से बाहर आईं। उसने अजय को अपने गले से लगा लिया। पूरे घर में आंसुओं और खुशियों का एक ऐसा महासंगम हुआ जिसने पिछले तीन सालों के सारे दुखों, भूखों, तानों और अपमानों को एक पल में धो दिया।
गाँव के लोग, जो कभी बुराई करते थे, अब ढोल-नगाड़ों के साथ अजय के घर की तरफ दौड़ पड़े। पूरे घर को लोगों ने घेर लिया। हर कोई 'अधिकारी साहब' से हाथ मिलाने को बेताब था। अजय को फूलों के हार पहनाए जा रहे थे, मिठाइयाँ बांटी जा रही थीं। लेकिन इस अपार भीड़ और शोर-शराबे के बीच, अजय की आँखें धीरे से अपने पिता की उस तस्वीर की ओर गईं, जो दीवार पर टंगी थी। तस्वीर पर एक ताजा माला चढ़ी थी। अजय ने मन ही मन कहा—"बाबूजी, देखिए, आपका बेटा हार कर नहीं लौटा। मैंने अपना वचन पूरा किया।"
भीड़ जब धीरे-धीरे कम हुई और रात का सन्नाटा गहराया, अजय अपनी छत पर अकेला गया। उसने आसमान के चमकते तारों को देखा। आज वह समाज की नजरों में एक सफल, ताकतवर और प्रतिष्ठित व्यक्ति बन चुका था। उसकी गरीबी का अंत हो चुका था। लेकिन जैसे ही उसने ठंडी हवा के झोंके को महसूस किया, उसके दिल के किसी बंद कोने से एक सिसकी उठी—"सुवर्णा... मैं जीत तो गया, पर इस जीत की खुशी को साझा करने के लिए तुम मेरे पास नहीं हो। काश... काश तुम आज यहाँ होतीं।"
अजय की आँखों से एक आंसू टपका और उसकी नई सफ़ेद कमीज़ पर गिर गया। सफलता का यह काँटों भरा ताज उसके सिर पर सज चुका था, लेकिन उसके भीतर का प्रेमी आज भी उस बनारस के घाट पर अकेला खड़ा रो रहा था।
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अध्याय 4: शहनाइयों का शोर और सिसकता सिंदूर

भाग 1: डॉ. सुवर्णा का उदय और लंका की वो अंतिम चाय

समय अपनी गति से चलता रहा। वह किसी के दुख के लिए ठहरता नहीं और न ही किसी के सुख के लिए अपनी रफ्तार को मद्धम करता है। अजय के बनारस छोड़ने के बाद जो दो साल बीते, वे सुवर्णा के जीवन में अकादमिक उपलब्धियों के वर्ष रहे। उसने दिन-रात एक करके अपने शोध प्रबंध को पूरा किया। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के बड़े-बड़े प्रोफ़ेसर उसकी मेधा और लेखन शैली के कायल थे। जब उसके नाम के आगे 'डॉक्टर' शब्द जुड़ा, तो उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
उसी वर्ष, शहर के एक बेहद प्रतिष्ठित डिग्री कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर का स्थायी पद निकला। सुवर्णा ने आवेदन किया। साक्षात्कार बोर्ड में बैठे विशेषज्ञों ने जब उसके शोध की गहराई और उसके विचारों की स्पष्टता को देखा, तो वे अचंभित रह गए। बाईस वर्ष की उम्र में सुवर्णा उस कॉलेज की सबसे युवा प्रोफ़ेसर बन गई।
नौकरी की पहली सुबह जब उसने सूती साड़ी पहनकर, कंधे पर चमड़े का बैग लटकाए कॉलेज के गेट में प्रवेश किया, तो छात्रों ने सम्मान में अपने सिर झुका दिए। वह मंच पर खड़ी होकर जब लेक्चर देती, तो पूरा क्लासरूम मंत्रमुग्ध होकर सुनता। लेकिन इस बाहरी सफलता के पीछे सुवर्णा का अंतर्मन कैसा था? वह केवल वही जानती थी।
कॉलेज से छूटने के बाद, वह अक्सर अपनी स्कूटी से 'लंका' (BHU का मुख्य व्यावसायिक इलाका) की ओर निकल जाती। वहाँ एक पुरानी चाय की अड़ी थी, जहाँ कभी वह और अजय परीक्षाओं के दिनों में बैठकर चाय पिया करते थे।
एक शाम, जब नवंबर की गुलाबी ठंड ने बनारस में दस्तक दी थी, सुवर्णा उस दुकान के सामने रुकी। उसने दुकानदार बूढ़े काका से कहा, "काका, दो कुल्हड़ चाय बनाना।"
काका ने चाय बनाई और दो कुल्हड़ आगे बढ़ा दिए। सुवर्णा ने एक कुल्हड़ अपने हाथ में लिया और दूसरा कुल्हड़ अपने सामने की खाली बेंच पर रख दिया, जैसे वहाँ कोई अदृश्य रूप में बैठा हो।
 "तुम कहते थे न अजय कि मुसाफिर मंजिल से पहले नहीं ठहरते? देखो, मैंने मंजिल पा ली। मैं प्रोफ़ेसर बन गई हूँ। पर इस मंजिल पर खड़े होकर जब मैं पीछे देखती हूँ, तो मुझे सिर्फ तुम्हारा वो सांवला, संजीदा चेहरा ही दिखाई देता है। कहाँ हो तुम? क्या तुम्हें मेरी एक भी सिसकी सुनाई नहीं देती?" सुवर्णा ने मन ही मन कहा। उसकी आँखों से एक आँसू टपक कर चाय के गर्म कुल्हड़ में गिर गया और छन से विलीन हो गया।

तभी दुकान के सामने एक चमचमाती हुई सफ़ेद गाड़ी रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से संजय उतरा। संजय अब अपने पिता के रियल एस्टेट और होटल के बिजनेस को पूरी तरह संभाल चुका था। उसके गले में सोने की पतली चेन थी, कलाई पर महंगी घड़ी थी और उसके चेहरे पर पैसे का रसूख साफ झलकता था।
"अरे सुवर्णा! तुम यहाँ इस धूल-धूसरित दुकान पर क्या कर रही हो? चलो, तुम्हें शहर के सबसे बेहतरीन कैफ़े में ले चलता हूँ," संजय ने बड़े अधिकार के साथ कहा।
सुवर्णा ने बेंच पर रखे दूसरे कुल्हड़ को देखा और फिर संजय को। उसने ठंडे स्वर में कहा, "नहीं संजय, मुझे बनारस के इस कुल्हड़ की सोंधी महक ज्यादा पसंद है। कैफ़े की कृत्रिम खुशबू मुझे रास नहीं आती।"
संजय को उसकी यह बात थोड़ी अजीब लगी, पर उसने हंसकर टाल दिया। वह सुवर्णा के इस स्वाभिमानी और अलग स्वभाव पर अंदर ही अंदर और ज्यादा लट्टू हो रहा था। वह जानता था कि सुवर्णा को पाना उसके स्टेटस के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी—एक खूबसूरत, पढ़ी-लिखी प्रोफ़ेसर पत्नी, जिसे वह अपने समाज में गर्व से दिखा सके।

भाग 2: प्रतिष्ठित चौखट का प्रस्ताव और पिता का फैसला

सुवर्णा के पिता, पंडित दीनानाथ मिश्रा, शहर के सिविल कोर्ट के सबसे सम्मानित वकीलों में से थे। वे अपनी ईमानदारी और रसूख के लिए जाने जाते थे। लेकिन अपनी बेटी की बढ़ती उम्र और उसकी आँखों में छाई रहने वाली उदासी उन्हें अंदर ही अंदर चिंतित करती थी। वे कई दिनों से सुवर्णा के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश में थे।
उसी हफ्ते, संजय के पिता—जो शहर के एक बहुत बड़े उद्योगपति और दीनानाथ जी के पुराने मुवक्किल भी थे—दीनानाथ जी के चैंबर में आए। औपचारिकता की बातों के बाद उन्होंने मुख्य मुद्दा रखा।
"दीनानाथ जी, हमारी और आपकी दोस्ती तो बरसों पुरानी है। क्यों न इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया जाए? मेरा बेटा संजय आपके सामने ही बढ़ा हुआ है। वह हमारा पूरा बिजनेस संभाल रहा है। और आपकी बेटी सुवर्णा तो साक्षात सरस्वती का रूप है। अगर आप इजाजत दें, तो हम संजय और सुवर्णा का हाथ मांगना चाहते हैं," संजय के पिता ने बड़े आदर से कहा।
दीनानाथ जी के लिए यह किसी लॉटरी के लगने जैसा था। शहर का इतना बड़ा और प्रतिष्ठित परिवार, जहाँ पैसों की कोई कमी नहीं थी, लड़का भी पढ़ा-लिखा और संस्कारी दिखता था। उन्होंने तुरंत मुस्कुराकर कहा, "भाई साहब, यह तो मेरा सौभाग्य होगा। भला संजय जैसे लड़के को कौन मना करेगा। मैं आज ही घर पर बात करता हूँ।"
रात को जब दीनानाथ जी ने घर के डाइनिंग टेबल पर सुवर्णा और उसकी माँ के सामने यह बात रखी, तो सुवर्णा के हाथ से निवाला छूट गया।
"संजय? पर पापा, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती। मैं अपने रिसर्च और कॉलेज पर ध्यान देना चाहती हूँ," सुवर्णा ने अपनी घबराहट छुपाते हुए कहा।
"बेटा, तुम प्रोफ़ेसर बन चुकी हो, रिसर्च भी साथ में चलती रहेगी। पर संजय जैसा लड़का और ऐसा प्रतिष्ठित परिवार बार-बार नहीं मिलता। उनके पास गाड़ियों, मकानों और नौकर-चाकरों की भरमार है। तुम वहाँ रानी बनकर रहोगी। एक पिता होने के नाते मेरी भी कुछ जिम्मेदारियाँ हैं सुवर्णा। मैं चाहता हूँ कि मेरे जीते-जी तुम्हारी शादी एक ऐसे घर में हो जाए जहाँ तुम्हें कभी किसी चीज की कमी न खले," दीनानाथ जी की आवाज में एक पिता का स्नेह और दृढ़ता दोनों थे।
सुवर्णा अपने कमरे में आ गई और उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसने अपनी डायरी निकाली, जिसमें उसने अजय की यादों को संजोकर रखा था। वह फूट-फूटकर रोने लगी।
"अजय... तुम कहाँ हो? देखो, ये लोग मुझे किसी और के हवाले करने जा रहे हैं। अगर तुमने एक बार भी आकर मेरा हाथ थाम लिया होता, तो मैं पापा के सामने बगावत कर देती। पर तुम तो पत्थर बन चुके हो। तुमने मुझे पूरी तरह भुला दिया। अगर तुम नहीं, तो फिर जिंदगी में कोई भी आए, मुझे क्या फर्क पड़ता है," उसने अपनी डायरी के पन्नों को अपने आंसुओं से भिगोते हुए कहा।
 
जब इंसान प्रेम में पूरी तरह हताश हो जाता है और सामने कोई रास्ता नहीं दिखता, तो वह अपनी नियति के आगे आत्मसमर्पण कर देता है। सुवर्णा ने भी यही किया। अगले दिन सुबह, उसने भारी मन से अपने पिता से कह दिया, "जैसी आपकी इच्छा, पापा।"

भाग 3: अजय की मजबूरी और वो अनचाहा निमंत्रण पत्र

इधर, जौनपुर के कलेक्ट्रेट में अजय ने कार्यभार संभाल लिया था। उसकी नई कोठी, सरकारी गाड़ी और चारों ओर अर्दलियों की फौज देखकर माँ और विभा की आँखों में जो सुकून था, वह अजय की सबसे बड़ी कमाई थी। उसने सबसे पहले परिवार का पूरा कर्ज ब्याज समेत चुकाया और अपनी माँ के कंगन और चेन वापस लेकर आया। घर की मरम्मत का काम शुरू हो चुका था, और विभा के लिए एक बहुत अच्छे सुशिक्षित घराने से रिश्ता भी पक्का हो गया था।
अजय समाज की नजरों में एक सफल और कड़क अधिकारी था। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठा रहा था, फाइलों का निपटारा तेजी से कर रहा था। लेकिन दफ़्तर की इस भाग-दौड़ के बाद जब वह रात को अपनी विशाल सरकारी कोठी के अकेले बेडरूम में बैठता, तो चारों ओर फैला सन्नाटा उसे डसने को दौड़ता।
एक सुबह, जब वह अपने दफ़्तर की मेज पर बैठा कुछ जरूरी फाइलों पर दस्तखत कर रहा था, उसका अर्दली एक लाल रंग का लिफाफा लेकर भीतर आया।
"साहब, बनारस से कोई रजिस्ट्री आई है। आपके किसी मित्र ने भेजा है," अर्दली ने कहा।
अजय ने फाइल किनारे रखी और लिफाफा लिया। जैसे ही उसने भेजने वाले का नाम देखा—'संजय सिंघानिया'—उसका दिल जोर से धड़कने लगा। उसने लिफाफा खोला। भीतर एक अत्यंत महंगा, मखमली शादी का कार्ड था, जिस पर सोने के अक्षरों से लिखा था:
```
|| शुभ विवाह ||
संजय (सुपुत्र श्री आर.के. सिंघानिया)
संग
डॉ. सुवर्णा (सुपुत्री श्री दीनानाथ मिश्रा, एडवर्टाइज़र)

```
कार्ड पर तारीख लिखी थी—'12 दिसंबर'।
यह कार्ड नहीं था, यह अजय के दिल के आर-पार होने वाला एक खंजर था। 'संजय संग सुवर्णा'। उसकी सुवर्णा, जिसके साथ उसने विंध्याचल के झरनों का संगीत सुना था, जिसके हाथ की गर्माहट उसने अस्सी घाट की सीढ़ियों पर महसूस की थी, वह अब उसके ही मित्र संजय की पत्नी बनने जा रही थी।
अजय की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसके हाथ कांपने लगे और पेन की स्याही फाइल पर फैल गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। कमरे की दीवारें जैसे उसे चिढ़ा रही थीं—"देख अजय, तू अफसर तो बन गया, पर अपनी मोहब्बत को हार गया।"
उसी समय उसके सरकारी फोन की घंटी बजी। फोन संजय का था।
"हेलो, अजय भाई! कार्ड मिला कि नहीं? यार, तू तो इतना बड़ा अफसर बन गया कि हम जैसों को भूल ही गया," संजय की आवाज में वही पुराना आत्म-विश्वास था।
अजय ने अपनी आवाज को सामान्य करने की पूरी कोशिश की, "हाँ संजय... कार्ड मिल गया। बहुत-बहुत बधाई तुम्हें।"
"सुन भाई, कोई बहाना नहीं चलेगा। तुझे शादी में आना ही होगा। आखिरकार तू मेरा यूनिवर्सिटी का यार है, और सुवर्णा भी तो तुम्हारी क्लास में थी। जब उसे पता चला कि मैंने तुम्हें इनवाइट किया है, तो वह भी कह रही थी कि अजय को जरूर बुलाना," संजय ने अनजाने में झूठ कहा, क्योंकि सुवर्णा को तो यह भी नहीं पता था कि संजय ने अजय को कार्ड भेजा है।
"संजय... मैं पूरी कोशिश करूँगा। पर तुम्हें तो पता है, इस वक्त मेरे जिले में कानून-व्यवस्था की स्थिति थोड़ी नाजुक है। मुख्यमंत्री का दौरा भी होने वाला है। अगर ड्यूटी की मजबूरी न हुई, तो मैं जरूर आऊंगा," अजय ने भारी गले से कहा।
फोन काटने के बाद अजय अपनी कुर्सी से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर धूप तेज थी, पर उसके भीतर एक बर्फीला सन्नाटा पसर गया था। वह जानता था कि वह उस शादी में कभी नहीं जा पाएगा। वह अपनी आँखों के सामने सुवर्णा के गले में किसी और के नाम का मंगलसूत्र और मांग में किसी और के नाम का सिंदूर सजते हुए नहीं देख सकता था। उसने दूर से ही अपनी उस अधूरी मोहब्बत की खुशियों के लिए हाथ जोड़ लिए।

भाग 4: शादी का मंडप और सिसकती शहनाइयाँ

12 दिसंबर की वह रात बनारस के इतिहास की सबसे भव्य रातों में से एक थी। शहर के सबसे आलीशान मैरिज लॉन को सफेद गेंदे और थाईलैंड से मंगाए गए ऑर्किड के फूलों से सजाया गया था। लॉन के चारों ओर लगीं दूधिया रोशनियों से ऐसा लग रहा था मानो जमीन पर कोई तारा उतर आया हो। शहर के बड़े-बड़े राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति शादी में शामिल होने पहुँचे थे।
एक कोने में खड़े शहनाई वादक राग 'भैरवी' और 'मांड' की मर्मस्पर्शी धुनें बजा रहे थे। शहनाई की वह आवाज बाहर से तो उत्सव की लग रही थी, पर सुवर्णा के कानों में वह किसी के रोने की आवाज जैसी चुभ रही थी।
भीतर के सैंडलवुड रूम में सुवर्णा को दुल्हन के रूप में सजाया जा रहा था। उसने लाल रंग का भारी बनारसी लहंगा पहना था, जिस पर सोने के तारों से नक्काशी की गई थी। गले में हीरों का हार, हाथों में कुंदन की चूड़ियाँ और सिर पर लंबा घूंघट। जब उसकी सहेलियों ने उसे आईने के सामने खड़ा किया, तो वह साक्षात कोई अप्सरा लग रही थी। पर उस अप्सरा के चेहरे पर कोई लाली नहीं थी, आँखों में कोई चमक नहीं थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, जो यह बयां कर रही थीं कि वह रात भर सोई नहीं है।
"वाह सुवर्णा! तुम कितनी किस्मत वाली हो। इतना अमीर पति, इतना बड़ा घर। सचमुच तुम्हारी तो किस्मत खुल गई," उसकी एक कलीग ने ईर्ष्या मिश्रित लहजे में कहा।
सुवर्णा ने सिर्फ एक फीकी मुस्कान दी। वह मन ही मन सोच रही थी—*'इस सोने के पिंजरे की कीमत सिर्फ मैं जानती हूँ।'* वह बार-बार वीआईपी गेट की तरफ देख रही थी। उसके दिल के किसी पागल कोने में एक आखिरी उम्मीद बची थी कि शायद अजय अपनी लाल बत्ती वाली गाड़ी से आएगा, मंडप में घुसेगा और उसका हाथ पकड़कर कहेगा—"यह सिर्फ मेरी है।"
लेकिन समय बीतता गया। जयमाला का वक्त आ गया। संजय शेरवानी पहने, हाथ में तलवार लिए, स्टेज पर खड़ा मुस्कुरा रहा था। जब सुवर्णा को स्टेज पर लाया गया, तो कैमरों की फ्लैश लाइटें एक साथ चमक उठीं। संजय ने सुवर्णा के गले में जयमाला डाली, तो चारों ओर तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। सुवर्णा ने भी भारी हाथों से माला संजय के गले में डाल दी। उस पल, उसे लगा कि उसने अपने अतीत के ताबूत पर आखिरी कील ठोंक दी है।

भाग 5: फेरों की अग्नि और विदाई का अंतहीन दर्द

रात के तीसरे पहर, जब मेहमान जा चुके थे और सिर्फ परिवार के कुछ करीबी लोग बचे थे, फेरों की रस्म शुरू हुई। मंडप के बीचों-बीच हवन कुंड में पवित्र अग्नि प्रज्वलित थी। पंडित जी वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, और घी की आहुति से उठने वाला धुआं पूरे मंडप में फैल रहा था।
सुवर्णा और संजय को फेरों के लिए खड़ा किया गया। संजय आगे-आगे चल रहा था और सुवर्णा उसका पल्लू थामे पीछे-पीछे।
 
पहला फेरा: सुवर्णा को याद आया बी.एच.यू. कैम्पस का वो पलाश का पेड़।
 
दूसरा फेरा: उसकी आँखों के सामने घूम गया विश्वनाथ मंदिर का वो लॉन और कुल्हड़ वाली चाय।
 
तीसरा फेरा: उसे महसूस हुई अस्सी घाट की वो सर्द हवा और अजय का वो अनकहा स्पर्श।
 
चौथा फेरा:विंध्याचल का वो झरना और अजय की वो खिलखिलाकर हंसने वाली आवाज।
जैसे-जैसे फेरे बढ़ रहे थे, सुवर्णा को लग रहा था कि वह एक-एक करके अपनी स्मृतियों की आहुति उस अग्नि में दे रही है। जब सातवां फेरा पूरा हुआ, तो पंडित जी ने कहा, "अब वर, वधू की मांग में सिंदूर भरे।"
संजय ने चुटकी में सिंदूर लिया और सुवर्णा के घूंघट को थोड़ा पीछे हटाकर उसकी मांग में भर दिया। वह सिंदूर सुवर्णा की मांग में सज तो गया, पर उसके भीतर के सारे रंग हमेशा के लिए उड़ गए। वह अब कानूनी और सामाजिक रूप से किसी और की हो चुकी थी।
सुबह की पहली किरण के साथ विदाई की बेला आई। शहनाई की धुन अब राग 'जौनपुरी' में बदल चुकी थी, जो विदाई के दर्द को और गहरा कर रही थी। सुवर्णा अपने पिता के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी। दीनानाथ जी की आँखें भी नम थीं, पर वे संतुष्ट थे कि उन्होंने अपनी बेटी का कन्यादान एक सुरक्षित और अमीर घर में कर दिया था।
जब सुवर्णा की फूलों से सजी गाड़ी सिंघानिया हवेली की ओर बढ़ी, तो उसने खिड़की का कांच थोड़ा नीचे किया। बनारस की सुबह की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसने पीछे छूटते हुए अपने शहर, अपनी यूनिवर्सिटी और अपनी अधूरी मोहब्बत को आखिरी बार देखा। गाड़ी आगे बढ़ गई, और पीछे छोड़ गई आंसुओं की एक ऐसी लकीर जिसे वक्त की कोई भी बारिश कभी मिटा नहीं पाएगी।

भाग 6: कोठी का सन्नाटा और दो किनारों का भाग्य

उसी सुबह, जौनपुर की सरकारी कोठी के लॉन में अजय अकेला टहल रहा था। रात भर वह सो नहीं पाया था। उसने पूरी रात अपनी कोठी की छत पर बैठकर आसमान के तारों को गिनते हुए गुजारी थी। उसे पता था कि इस वक्त मंडप में क्या हो रहा होगा, किस वक्त फेरे हुए होंगे और किस वक्त सुवर्णा की विदाई हुई होगी।
उसका अर्दली उसके लिए सुबह की चाय लेकर आया। "साहब, आज आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही? चेहरा बहुत उतरा हुआ है।"
"कोई बात नहीं संतोख, बस रात में नींद नहीं आई। तुम गाड़ी तैयार करो, आज कलेक्ट्रेट जल्दी जाना है," अजय ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।
उसने चाय के कुल्हड़ को देखा (जो उसने विशेष रूप से अपने लिए मंगवाया था)। आज उस चाय में कोई मिठास नहीं थी, न ही उसमें बनारस की सोंधी खुशबू थी।
अजय और सुवर्णा। दोनों ने समाज की नजरों में वह सब कुछ पा लिया था जिसे लोग 'सफलता' कहते हैं। अजय एक बड़ा अधिकारी बन चुका था, जिसका सम्मान पूरा जिला करता था। सुवर्णा एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर बन चुकी थी और शहर के सबसे अमीर घराने की बहू। लेकिन उनके भीतर जो अकेलापन था, जो रिक्तता थी, उसे दुनिया की कोई भी धन-दौलत या पद कभी भर नहीं सकता था।
नियति ने उन्हें दो अलग-अलग किनारों पर लाकर खड़ा कर दिया था, जिनके बीच मर्यादाओं, बंधनों और समझौतों की एक गहरी और चौड़ी नदी बह रही थी। दोनों ही इस बात से अनजान थे कि यह तो सिर्फ उनके जीवन के मध्य काल की शुरुआत थी। अभी उन दोनों को अपनी-अपनी दुनिया में ऐसे तूफानों का सामना करना था, जो उनके बचे-कुचे वजूद को भी हिलाकर रख देने वाले थे। शहनाइयों का शोर तो थम गया था, पर जिंदगी का जो असली महाभारत था, उसकी रणभेरी बज चुकी थी।
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अध्याय 5: दरकते रिश्ते और अपनों का छलावा

भाग 1: सिंघानिया हवेली का सोने का पिंजरा

सिंघानिया हवेली बनारस के सबसे पॉश इलाके में स्थित थी। ऊंचे और नक्काशीदार लोहे के गेट, लंबा बगीचा जहाँ विदेशी नस्ल के गुलाब खिले रहते थे, और इतालवी संगमरमर से बना वह तीन मंजिला मकान बाहर से देखने वाले किसी भी आम इंसान की आँखें चौंधिया देने के लिए काफी था। समाज की नजरों में डॉ. सुवर्णा इस साम्राज्य की रानी बनकर आई थी। लेकिन महलों की भी अपनी एक भाषा होती है, जो अक्सर सन्नाटे और घुटन की स्याही से लिखी जाती है।
विवाह के शुरुआती दो-तीन महीने किसी तरह औपचारिकताओं की ओट में कट गए। संजय शुरू-शुरू में एक बेहद आधुनिक, प्रगतिशील और प्यार करने वाले पति की भूमिका में रहा। वह सुवर्णा को महंगे उपहार देता, शहर के बड़े होटलों में डिनर के लिए ले जाता और अपने अमीर दोस्तों के सामने अपनी खूबसूरत, प्रोफेसर पत्नी का परिचय बड़े गर्व से कराता। लेकिन इस दिखावे के पीछे जो कड़वा सच था, वह धीरे-धीरे सतह पर आने लगा।
फरवरी की एक सुहावनी शाम थी। सुवर्णा कॉलेज से लौटकर अपने कमरे में बैठी छात्रों की असाइनमेंट कॉपियाँ जांच रही थी। तभी संजय कमरे में आया। वह किसी बिजनेस डील के सफल होने की खुशी में थोड़ा उत्साहित था। उसके हाथ में एक नामी ब्रांड के गहनों का डिब्बा था।
"लुक सुवर्णा, तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ! प्योर डायमंड का नेकलेस। कल हमारे नए मॉल के उद्घाटन की पार्टी है, मैं चाहता हूँ कि तुम इसे पहनो और ब्लैक गाउन में मेरे साथ चलो," संजय ने वह डिब्बा उसकी मेज पर कॉपियों के ऊपर रखते हुए कहा।
सुवर्णा ने कॉपियों को एक तरफ किया और मुस्कुराकर कहा, "गहने बहुत खूबसूरत हैं संजय, थैंक यू। लेकिन कल शाम को कॉलेज में हमारे विभाग का एक सेमिनार है, जिसकी अध्यक्षता मुझे करनी है। मुख्य अतिथि वाइस चांसलर हैं, इसलिए मेरा वहाँ रहना बहुत जरूरी है। मैं पार्टी में थोड़ा लेट पहुँच पाऊंगी।"
संजय के चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई। उसने अपनी जेब में हाथ डाले और उसकी कॉपियों को घूरते हुए कहा, "सेमिनार? वाइस चांसलर? सुवर्णा, तुम शायद भूल रही हो कि तुम अब सिंघानिया परिवार की बहू हो। इस शहर के सबसे बड़े बिजनेस टायकून की पत्नी। तुम्हारी यह दो कौड़ी की नौकरी और इन कॉपियों को जांचने से जो महीने की सैलरी आती है, उतना मैं अपने ऑफिस के चपरासियों को बोनस में बांट देता हूँ। मेरी पार्टी में तुम्हारा होना मेरे स्टेटस का हिस्सा है। कॉलेज को कल के लिए मना कर दो।"
सुवर्णा जैसे स्तब्ध रह गई। 'दो कौड़ी की नौकरी'। उसकी शिक्षा, उसकी मेहनत, उसकी रातों की तपस्या, जिसके दम पर उसने जेआरएफ टॉप किया था और प्रोफेसर बनी थी, उसे संजय ने एक पल में अपनी दौलत के तराजू पर तौलकर शून्य कर दिया था।
उसने अपनी कलम मेज पर रखी और उठकर संजय के सामने खड़ी हो गई। उसकी आँखों में बीएचयू के दिनों वाला वही पुराना स्वाभिमान जाग उठा था।
 "संजय, यह नौकरी मेरे लिए पैसों का जरिया नहीं है। यह मेरी पहचान है, मेरा आत्मसम्मान है। इस मुकाम तक पहुँचने के लिए मैंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत साल किताबों को दिए हैं। मैं तुम्हारी पार्टियों में चलने को तैयार हूँ, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों की बलि देकर नहीं। मेरी शिक्षा और मेरे छात्रों का सम्मान मेरे लिए सर्वोपरि है।"

"आत्मसम्मान?" संजय ने एक क्रूर ठहाका लगाया। "सुवर्णा, इस व्यावहारिक दुनिया में आत्मसम्मान सिर्फ पैसों से नापा जाता है। अगर कल तुम मेरी पार्टी में समय पर नहीं दिखीं, तो याद रखना कि मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
संजय पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया और दरवाजा इतनी जोर से बंद किया कि दीवार पर टंगी घड़ी हिल गई। सुवर्णा वहीं कुर्सी पर बैठ गई। उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ चाँद की मद्धम रोशनी संगमरमर के फर्श पर पड़ रही थी। उसे लगा कि वह एक ऐसे सोने के पिंजरे में कैद हो चुकी है, जहाँ उसकी आत्मा का दम घुट रहा था। उसे उस पल अजय की याद आई, जिसने कभी उसकी शिक्षा और उसके विचारों का सम्मान किया था। लेकिन अब यादों के सहारे जिंदगी का इतना बड़ा सफर काटना असंभव सा लग रहा था।

भाग 2: अहंकार का टकराव और रातों का सन्नाटा

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, संजय और सुवर्णा के बीच का वैचारिक मतभेद एक गहरे विवाद का रूप लेने लगा। संजय स्वभाव से शंकालु, क्रोधी और अत्यधिक अहंकारी था। वह चाहता था कि सुवर्णा पूरी तरह उसके नियंत्रण में रहे। जब भी सुवर्णा कॉलेज के किसी पुरुष सहकर्मी या प्रोफेसर से रिसर्च के सिलसिले में बात करती, तो संजय का चेहरा ईर्ष्या से काला पड़ जाता।
वह अक्सर देर रात तक बिजनेस पार्टियों में शराब पीकर घर लौटता। सुवर्णा जब उसे समझाने की कोशिश करती, तो बात विवाद और गाली-गलौज तक पहुँच जाती।
एक रात, करीब बारह बजे संजय नशे में धुत होकर घर लौटा। सुवर्णा हॉल में बैठी उसका इंतजार कर रही थी। संजय के कदम लड़खड़ा रहे थे और उसके कोट से सस्ती परफ्यूम और शराब की बदबू आ रही थी।
"संजय, यह क्या हालत बना रखी है आपने? रोज-रोज का यह तमाशा अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता," सुवर्णा ने उसे संभालते हुए कहा।
संजय ने झटके से उसका हाथ झटक दिया। "तुम... तुम मुझे सिखाओगी कि मुझे कैसे रहना है? एक मामूली वकील की बेटी, जिसे मैंने इस महल में लाकर रानी बना दिया, वह अब मेरे ऊपर हुक्म चलाएगी?"
"संजय! अपनी जुबान संभालो। मेरे माता-पिता और मेरे परिवार पर जाने की जरूरत नहीं है," सुवर्णा की आवाज में कड़वाहट घुल गई।
"क्यों न जाऊं?" संजय ने सोफे पर गिरते हुए चिल्लाकर कहा। "मुझे सब पता है सुवर्णा। तुम यूनिवर्सिटी के दिनों में उस भिखारी अजय के पीछे-पीछे घूमती थीं। मुझे लगता है कि आज भी तुम्हारे दिमाग से वह भूत उतरा नहीं है। इसीलिए तुम मुझसे कटी-कटी रहती हो न? बोलो!"
यह आरोप सुवर्णा के चरित्र पर एक सीधा और गहरा प्रहार था। उसका चेहरा गुस्से और अपमान से लाल हो गया। उसने अपनी जिंदगी में कभी किसी को अपने चरित्र पर उंगली उठाने का मौका नहीं दिया था। अजय उसका पवित्र प्रेम था, जिसे उसने अपने दिल के सबसे सुरक्षित कोने में दफन कर दिया था। संजय ने उस पवित्र याद को अपनी गंदी सोच से दूषित कर दिया था।
"संजय, तुम गिर चुके हो। तुम्हारी सोच इतनी घटिया होगी, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। अजय एक स्वाभिमानी इंसान था और आज एक बड़ा अधिकारी है। वह तुम्हारी तरह पैसों के नशे में अंधा नहीं था," सुवर्णा ने रोते हुए कहा।
"अधिकारी? हाँ, होगा अपने दफ्तर का साहब। पर मेरे सामने उसकी औकात कुछ भी नहीं है। और तुम... तुम आज से उस कॉलेज नहीं जाओगी। मैं कल ही तुम्हारे प्रिंसिपल को तुम्हारा इस्तीफा भिजवा रहा हूँ," संजय ने अपनी उंगली उठाते हुए धमकी दी।
"मैं इस्तीफा नहीं दूंगी। तुम जो चाहे कर लो," सुवर्णा ने दृढ़ता से कहा और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
उस रात सुवर्णा बिस्तर पर लेटी सिसकती रही। उसे अहसास हो गया था कि इस शादीशुदा रिश्ते की इमारत अब ढहने की कगार पर थी। जहाँ विश्वास न हो, सम्मान न हो, वहाँ केवल एक छत के नीचे रहने से कोई रिश्ता जिंदा नहीं रहता। सिंघानिया हवेली का वह विशाल बेडरूम सुवर्णा के लिए एक कसाईखाना बन चुका था, जहाँ हर रोज उसके स्वाभिमान की बलि दी जा रही थी।

भाग 3: जौनपुर में विश्वासघात की भूमिका और भाई का लालच

जबकि सुवर्णा बनारस के महलों में अपने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रही थी, जौनपुर में अजय की जिंदगी में एक अलग ही तूफान आकार ले रहा था। अजय अब जिले का एक बेहद सम्मानित और कड़क अधिकारी बन चुका था। उसकी ईमानदारी की चर्चा पूरे महकमे में थी। उसने अपने छोटे भाई अमित को इलाहाबाद भेजकर सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए दाखिला कराया था और बहन विभा की शादी एक बहुत ही सुशिक्षित और संभ्रांत परिवार के लड़के से तय कर दी थी, जो खुद एक सरकारी बैंक में मैनेजर था।
अजय को लगता था कि उसके जीवन के सारे संघर्ष अब समाप्त हो चुके हैं। घर की माली हालत सुधर चुकी थी। गाँव का मिट्टी का घर अब एक सुंदर, पक्के मकान में बदल चुका था। पिता का कर्ज चुकाया जा चुका था। लेकिन वह इस कड़वे सच से अनजान था कि जब घर में पैसा और समृद्धि आती है, तो अपने ही खून के भीतर लालच और ईर्ष्या के कीड़े भी पनपने लगते हैं।
अमित, जिसे अजय ने अपनी छाती का दूध पिलाकर, खुद भूखा रहकर पढ़ाया-लिखाया था, इलाहाबाद की चकाचौंध में आकर भटक गया था। वह पढ़ाई के नाम पर अजय से हर महीने मोटी रकम मंगवाता, जिसे वह अपने आवारा दोस्तों, जुए और शराब में उड़ा देता था। जब अजय को इस बात की भनक लगी, तो उसने अमित को जौनपुर बुलाया और कड़े शब्दों में डांटा।
"अमित, तुम्हें अंदाजा भी है कि यह पैसा कितनी मेहनत से आता है? बाबूजी की मौत के बाद मैंने किस तरह रातें काट कर पढ़ाई की है, तुम जानते हो? अगर तुम्हारा यही रवैया रहा, तो मैं तुम्हें एक पैसा भी नहीं दूंगा," अजय ने गुस्से में कहा था।
यह डांट अमित के दिल में सुलगती हुई ईर्ष्या की आग में घी का काम कर गई। उसे लगा कि अजय बड़ा भाई होने के नाते उस पर हुक्म चला रहा है और सारी संपत्ति तथा पैसे पर अकेले कब्जा करके बैठा है।
उसी दौरान गाँव के कुछ असामाजिक तत्वों और उनके सगे पट्टीदारों (रिश्तेदारों) ने अमित के कान भरने शुरू कर दिए। पट्टीदारों में एक चाचा थे—भानु प्रताप सिंह, जो हमेशा से अजय के परिवार की तरक्की से जलते थे।
"अरे अमित बाबू, तुम तो सीधे हो। तुम्हारा भाई अफसर बन गया, शहर में कोठी मिल गई, लाखों की ऊपरी कमाई है (जो कि अजय कभी नहीं करता था)। और तुम्हें क्या मिल रहा है? बस डांट-फटकार। गाँव की जो पाँच बीघे की पुश्तैनी जमीन है, रोड के किनारे वाली, उसकी कीमत आज करोड़ों में है। अगर तुमने अभी अपना हिस्सा नहीं मांगा, तो अजय सब अपनी बहन की शादी में उड़ा देगा और तुम्हें ठेंगा दिखा देगा," भानु प्रताप ने हुक्के का धुआं छोड़ते हुए अमित के कान में जहर घोला।
अमित के दिमाग पर लालच का पर्दा पड़ चुका था। उसने अपनी विवेकशीलता खो दी। उसने सोचा कि विभा की शादी से पहले ही उसे जमीन और जायदाद का अपना आधा हिस्सा नकद या अपने नाम करवा लेना चाहिए, वरना अजय सारी संपत्ति पर कुंडली मारकर बैठ जाएगा। एक आम भारतीय परिवार में संपत्ति का यह विवाद किस तरह भाइयों को एक-दूसरे का जानी दुश्मन बना देता है, इसकी पटकथा अब अजय के ही घर में लिखी जा रही थी।

भाग 4: विभा की शादी का मंडप और सगे भाई का विश्वासघात

विभा की शादी की तारीख तय हो चुकी थी—25 अप्रैल। अजय ने अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी, अपनी प्रोविडेंट फंड की रकम और कुछ व्यक्तिगत कर्ज लेकर बहन की शादी को यादगार बनाने की तैयारी की थी। वह चाहता था कि विभा की विदाई इतनी धूमधाम से हो कि बाबूजी की आत्मा को स्वर्ग में सुकून मिले।
शादी का मंडप सज चुका था। बारात आ चुकी थी। द्वारपूजा की रस्म चल रही थी, और चारों ओर उत्सव का माहौल था। अजय सरकारी कपड़ों को छोड़कर धोती-कुर्ता पहने, सिर पर पगड़ी बांधे, बरातियों के स्वागत में हाथ जोड़े खड़ा था। माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे।
तभी, जब जयमाला की रस्म होने वाली थी, अमित अपने कुछ आवारा दोस्तों और गाँव के पटवारी को लेकर सीधे मंडप के पीछे वाले वीआईपी कमरे में पहुँचा, जहाँ अजय बैठा कुछ पैसों का हिसाब-किताब देख रहा था।
अमित का चेहरा तमतमाया हुआ था। उसने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
"भैया, मुझे आपसे अभी एक बहुत जरूरी बात करनी है," अमित ने रूखे स्वर में कहा।
अजय ने चौंककर उसे देखा। "अमित? इस वक्त क्या बात करनी है? बाहर बारात खड़ी है, रस्में हो रही हैं। जो भी बात है, कल करेंगे।"
"नहीं, बात आज और अभी होगी," अमित ने अपनी जेब से एक स्टांप पेपर निकाला और अजय के सामने मेज पर पटक दिया। "यह गाँव की रोड किनारे वाली जमीन के बंटवारे के कागजात हैं। इस पर लिखा है कि आप उस जमीन का अपना हिस्सा मेरे नाम ट्रांसफर कर रहे हैं। इस पर अभी दस्तखत कीजिए, वरना मैं बाहर जाकर बारात लौटा दूंगा और विभा के ससुराल वालों को बता दूंगा कि यह शादी जिस पैसे से हो रही है, वह विवादित है।"
अजय के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई। उसे लगा कि उसकी छाती पर किसी ने साक्षात त्रिशूल से वार कर दिया हो। उसका अपना छोटा भाई, जिसे उसने बेटे की तरह पाला था, वह उसकी सगी बहन की शादी के मंडप में, विदाई के ठीक पहले उसकी गर्दन पर छुरी रख रहा था।
"अमित... तुम होश में तो हो? यह तुम क्या कह रहे हो? विभा तुम्हारी भी बहन है। अगर आज बारात लौट गई, तो उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा। माँ सदमे से मर जाएगी। तुम्हें जमीन चाहिए न? मैं शादी के बाद सब कुछ तुम्हारे नाम कर दूंगा। पर भगवान के लिए आज यह तमाशा मत करो," अजय ने हाथ जोड़कर अपने छोटे भाई के सामने घुटने टेक दिए। एक जिले का बड़ा अधिकारी, जिसके सामने बड़े-बड़े अपराधी कांपते थे, आज अपने ही भाई के लालच के सामने बेबस खड़ा रो रहा था।
"मुझे आपकी किसी बात पर भरोसा नहीं है। दस्तखत कीजिए, वरना मैं बाहर जा रहा हूँ," अमित ने निष्ठुरता से कहा।
अजय ने रोते हुए, कांपते हाथों से कलम उठाई और उस स्टांप पेपर पर अपने दस्तखत कर दिए। उसने अपने भाई को जमीन तो दे दी, लेकिन उस पल उसके भीतर का भाई मर चुका था। वह पूरी तरह टूट चुका था।
शादी की रस्में पूरी हुईं, विभा की विदाई भी हो गई। लेकिन अजय के दिल पर जो घाव उसका भाई दे गया था, वह कभी भरने वाला नहीं था। जब विदाई की गाड़ी आगे बढ़ी, तो अजय कलेक्ट्रेट की अपनी कोठी पर लौटा और कमरे का दरवाजा बंद करके रात भर फूट-फूटकर रोता रहा। उसे लगा कि इस दुनिया में रिश्ते-नाते सब झूठ हैं, सब पैसे और स्वार्थ के भूखे हैं।

भाग 5: अदालती कलह और दीवानी मुकदमे का जाल

अमित का लालच स्टांप पेपर पर दस्तखत कराने के बाद भी शांत नहीं हुआ। भानु प्रताप और गाँव के वकीलों ने उसे समझाया कि स्टांप पेपर पर दबाव में लिए गए दस्तखत कोर्ट में चुनौती दिए जा सकते हैं, इसलिए उसे कोर्ट में बकायदा 'दीवानी मुकदमा' दायर करना चाहिए ताकि पूरी पैतृक संपत्ति, जिसमें अजय की सरकारी कोठी के अलावा गाँव का मकान और अन्य खेत शामिल थे, उसका पूरा हिसाब-किताब हो सके।
अमित ने जौनपुर की दीवानी अदालत में अजय और अपनी बूढ़ी माँ के खिलाफ मुकदमा ठोंक दिया। उसने आरोप लगाया कि अजय ने अपने पद का दुरुपयोग करके पुश्तैनी पैसों से बेनामी संपत्ति बनाई है और छोटे भाई को उसके अधिकारों से वंचित कर रहा है।
एक सरकारी अधिकारी के लिए कोर्ट का नोटिस आना और वह भी अपने ही सगे भाई द्वारा, किसी बड़े सामाजिक अपमान से कम नहीं था। कलेक्ट्रेट के गलियारों में सुगबुगाहट शुरू हो गई।
"सुना है साहब के भाई ने ही उन पर केस कर दिया है। बड़े ईमानदार बनते थे, अब कोर्ट के चक्कर काटेंगे," दफ्तर के बाबू आपस में कानाफूसी करने लगे।
अजय को हर तारीख पर अदालत जाना पड़ता था। वह दीवानी कचहरी के उस धूल भरे माहौल, वकीलों की जिरह और तारीख-पर-तारीख के चक्रव्यूह में फंस गया। कचहरी की वो तंग गलियाँ, जहाँ मुंशी टाइपराइटर खटखटा रहे थे, स्टांप वेंडर चिल्ला रहे थे, और चारों ओर मुकदमों से परेशान आम लोगों की भीड़ थी—अब अजय भी उसी भीड़ का एक हिस्सा बन चुका था।
माँ इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं। अदालत का नोटिस देखते ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे बिस्तर पर गिर गईं। अजय एक तरफ दफ्तर की फाइलें संभालता, दूसरी तरफ अस्पताल में माँ की तीमारदारी करता, और तीसरी तरफ कोर्ट में अपने ही भाई के वकीलों के तीखे और झूठे सवालों का सामना करता।

इस दीवानी मुकदमे ने अजय की रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह छीन लिया था। उसकी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा वकीलों की फीस और माँ की दवाइयों में जाने लगा था। वह अंदर से खोखला हो चुका था। उसे लगता था कि कानून की जिन किताबों को पढ़कर वह अधिकारी बना था, आज वही कानून उसके अपने घर को नीलाम करने पर उतारू था।

भाग 6: रिश्तों की अंतिम कतरन और तबाही का मंजर

बनारस की सिंघानिया हवेली में भी अब तबाही का मंजर साफ दिखने लगा था। संजय ने सुवर्णा का कॉलेज जाना पूरी तरह बंद करवाने के लिए अपने गुंडों से कॉलेज के रास्ते में सुवर्णा को डराने की कोशिश की थी। जब सुवर्णा को इस बात का पता चला कि उसके रास्ते में जो लड़के फब्तियां कसते थे, वे किसी और के नहीं बल्कि संजय के भेजे हुए थे, तो उसका सब्र का बांध टूट गया।
वह एक शाम सीधे सिंघानिया के ऑफिस पहुँची। उस वक्त संजय अपने कुछ बिजनेस पार्टनर्स के साथ बैठा शराब पी रहा था।
"संजय! मुझे तुमसे अकेले में बात करनी है," सुवर्णा ने चिल्लाकर कहा।
संजय ने अपने दोस्तों को बाहर जाने का इशारा किया। "क्या बात है सुवर्णा? इतना गुस्सा क्यों?"
"तुमने मेरे रास्ते में गुंडे भेजे? तुम इस हद तक गिर सकते हो? तुम मेरी नौकरी छुड़ाने के लिए मेरी जान और आबरू से खिलवाड़ कर रहे हो?" सुवर्णा की आँखें आग उगल रही थीं।
संजय खड़ा हुआ और उसने सुवर्णा को थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया। लेकिन सुवर्णा ने उसका हाथ बीच में ही पकड़ लिया।
"अब बहुत हो चुका संजय। तुमने आज तक जो ज़िल्लत दी, मैंने चुपचाप सही। लेकिन अब मैं इस घर में एक पल भी नहीं रहूंगी। मैं तुम्हारे खिलाफ घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न का केस दर्ज कराऊंगी और मुझे तुमसे तलाक चाहिए," सुवर्णा ने उसका हाथ झटकते हुए कहा।

"तलाक?" संजय का अहंकार चरम पर था। "तुम सिंघानिया परिवार से तलाक लोगी? इस शहर में तुम्हारी औकात क्या रह जाएगी? तुम सड़क पर आ जाओगी सुवर्णा।"
"मुझे सड़क मंजूर है, पर तुम्हारी यह बदबूदार दौलत नहीं," सुवर्णा ने अपने गले से मंगलसूत्र निकाला और संजय के मुंह पर दे मारा। वह उसी वक्त बिना किसी सामान के, सिर्फ अपनी साड़ी में उस हवेली से बाहर निकल गई।
वह सीधे अपने पिता के घर पहुँचे। दीनानाथ जी अपनी बेटी की यह हालत देखकर फूट-फूटकर रो पड़े। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था कि उन्होंने दौलत के फेर में अपनी फूल जैसी बेटी को एक कसाई के हाथ में सौंप दिया था।
अगले ही हफ्ते, सुवर्णा ने कोर्ट में तलाक और भरण-पोषण का मुकदमा दायर कर दिया। इधर अजय जौनपुर की अदालत में अपने भाई से लड़ रहा था, और उधर सुवर्णा बनारस की अदालत में अपने पति के अहंकार से लड़ रही थी। नियति ने दोनों प्रेमियों को एक ही समय में अदालतों के दो अलग-अलग कोनों में लाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ रिश्ते अपनी अंतिम सांसें ले रहे थे और चारों ओर केवल कलह, दर्द और तड़प का राज था। आम आदमी की जिंदगी को तबाह कर देने वाले ये पारिवारिक विवाद अब उनके जीवन के सबसे बड़े यथार्थ बन चुके थे।
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अध्याय 6: सन्नाटे की प्रतिध्वनि और आंसुओं का अर्घ्य

भाग 1: अस्पताल की सफ़ेद दीवारें और माँ का अंतिम स्पर्श

जौनपुर के जिला अस्पताल का स्पेशल वार्ड नंबर ४। हवा में फिनाइल की तीखी गंध और मद्धम सी सीलन घुली हुई थी। दीवार पर लगा पुराना पंखा एक सुस्त लय में चरमराते हुए घूम रहा था, मानो वह भी समय की इस भारी रफ्तार से थक चुका हो। बेड पर अजय की माँ, सुमित्रा देवी लेटी हुई थीं। उनका चेहरा, जो कभी गाँव के आंगन में ममता की छांव बिखेरता था, अब ऑक्सीजन मास्क के नीचे पूरी तरह बेजान और पीला पड़ चुका था। मशीनों की बीप-बीप की आवाज़ कमरे के सन्नाटे को और अधिक डरावना बना रही थी।
अजय बेड के पास एक लोहे की स्टूल पर बैठा था। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे साफ दिखाई दे रहे थे, जो कई रातों के रतजगे और भीतर चल रहे मानसिक महाभारत की गवाही दे रहे थे। वह अपनी माँ के सूखे, झुर्रियों से भरे हाथ को दोनों हथेलियों में थामे हुए था। उस हाथ की मद्धम पड़ती गर्माहट अजय के वजूद को अंदर तक कँपा रही थी।
"माँ... एक बार आँखें खोलो माँ। देखो, तुम्हारा अजय तुम्हारे पास बैठा है," अजय ने अत्यंत मद्धम, रुंधे हुए गले से कहा।
सुमित्रा देवी ने बहुत मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। उनकी आँखों में अब इस नश्वर संसार को छोड़ने की छटपटाहट साफ दिख रही थी, लेकिन उस धुंधली दृष्टि में अपने छोटे बेटे अमित के लिए एक आख़िरी तड़प भी थी। पुश्तैनी जमीन के मुकदमे और कोर्ट के नोटिस ने उनके बुजुर्ग दिल पर जो चोट की थी, वह किसी भी दवा से बड़ी थी। उनका अपना ही बेटा, जिसे उन्होंने अपनी छाती से दूध पिलाकर पाला था, वह उनके और बड़े भाई के खिलाफ अदालत में खड़ा था। इस आत्मग्लानि और दुख ने उनके भीतर जीने की इच्छा को ही मार डाला था।
"अ... अजय..." माँ ने मास्क के भीतर से बहुत धीमे से बुदबुदाया।
अजय ने तुरंत अपना कान उनके होंठों के करीब ला दिया। "हाँ माँ, बोलो। मैं सुन रहा हूँ।"
"अमित... अमित को माफ कर देना बेटा। वह नासमझ है... दुनिया के बहकावे में आ गया है। भाइयों को... भाइयों को कभी अलग मत होने देना..." माँ की सांसें उखड़ने लगी थीं। मॉनिटर की सुइयाँ तेजी से ऊपर-नीचे होने लगीं।
अजय के दिल पर जैसे किसी ने तपता हुआ लोहा रख दिया हो। जिस भाई ने उसकी पीठ में छुरा घोंपा, जिसने बहन की शादी के मंडप में उसकी इज्जत का सौदा किया, माँ अपनी अंतिम सांसों में भी उसी भाई की सलामती और माफी की भीख मांग रही थी। यही तो माँ का दिल होता है, जो बच्चों के सौ अपराधों के बाद भी सिर्फ दुआएं देना जानता है।
"हाँ माँ... मैं उसे माफ कर दूँगा। तुम चिंता मत करो, तुम बस ठीक हो जाओ," अजय के आँसू उसकी आँखों की कोर से बहकर उसकी माँ की हथेली पर टपक गए।
सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक अंतिम, सुकून भरी मुस्कान आई। उन्होंने अजय के हाथ को थोड़ा सा भींचा, जैसे वे अपनी पूरी ममता और आशीर्वाद उस एक स्पर्श में उड़ेल देना चाहती हों। और फिर... अचानक उनकी पकड़ ढीली हो गई। मॉनिटर की आवाज़ एक लंबी, सपाट तान में बदल गई—*टीइइइइइ...*
कमरे का समय जैसे ठहर गया। डॉक्टर दौड़े आए, उन्होंने स्टेथॉस्कोप माँ की छाती पर रखा, उनकी आँखें जांचीं और फिर अत्यंत उदास चेहरे से अजय की तरफ देखा।
"आई एम सो सॉरी, डिप्टी साहब। माता जी अब नहीं रहीं।"
अजय ने डॉक्टर की बात सुनी, पर वह हिला तक नहीं। वह वैसे ही घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया और अपना सिर माँ के सीने पर रख दिया। वह चिल्लाया नहीं, वह रोया नहीं। उसका दुख उस सीमा को पार कर चुका था जहाँ आंसुओं का बहना भी छोटा पड़ जाता है। इस दुनिया में उसकी उंगली पकड़कर चलना सिखाने वाली, उसके संघर्ष के दिनों में सूखी रोटी खाकर उसे पढ़ाने वाली माँ आज उसे इस क्रूर संसार में पूरी तरह अकेला छोड़कर जा चुकी थी।

भाग 2: श्मशान का सन्नाटा और सगे भाई की बेरुखी

माँ के पार्थिव शरीर को जब एम्बुलेंस से गाँव लाया गया, तो पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया था। मिट्टी के उस घर के सामने, जिसकी दीवारों पर अभी भी भाई के मुकदमे की कड़वाहट पुती थी, माँ की देह रखी थी। विभा ससुराल से भागती हुई आई थी और माँ के पैरों से लिपटकर बेसुध रो रही थी।
अजय दरवाजे पर बैठा शून्य में ताक रहा था। उसकी पगड़ी के नीचे छिपा उसका माथा और उसकी झुकी हुई पीठ उसके चरम अकेलेपन को बयां कर रही थी। लोग आ रहे थे, औपचारिकता निभा रहे थे, पर अजय की नजरें बार-बार रास्ते की ओर जा रही थीं। वह अपने पद, अपने स्वाभिमान को भूलकर सिर्फ एक उम्मीद लगाए बैठा था कि शायद माँ की मौत की खबर सुनकर अमित दौड़कर आएगा, अपने भाई के गले लगकर रोएगा और कहेगा—"भैया, मुझे माफ कर दो, मुझसे बड़ी भूल हुई।"
लेकिन दोपहर ढल गई, अंतिम संस्कार का समय हो गया, पर अमित नहीं आया। पता चला कि वह शहर के एक होटल में अपने वकीलों के साथ बैठा कोर्ट की अगली तारीख की रणनीति बना रहा था। उसे डर था कि अगर वह गाँव गया, तो अजय उस पर दवाब बनाकर मुकदमे के कागजात पर दस्तखत करवा लेगा। लालच जब इंसान के खून में घुल जाता है, तो वह सबसे पहले उसकी संवेदनाओं को मार देता है। अमित के लिए उसकी सगी माँ की लाश भी एक कानूनी रुकावट जैसी लग रही थी।
नदी के घाट पर, जहाँ ठीक दो साल पहले अजय ने अपने पिता को मुखाग्नि दी थी, आज उसी पवित्र अग्नि के हवाले वह अपनी माँ को करने जा रहा था। चिता तैयार थी। अजय ने हाथ में जलती हुई लकड़ी ली। उसके हाथ कांप रहे थे।
"माँ... बाबूजी के पास जा रही हो न? उन्हें बताना कि तुम्हारा बेटा हारा नहीं है, पर वह बहुत थक गया है माँ... बहुत थक गया है," अजय ने मन ही मन कहा और चिता को आग दे दी।
लपटें आसमान छूने लगीं। धुआं हवा में फैल रहा था। अजय घाट के एक ठंडे पत्थर पर बैठ गया। उसके साथ कलेक्ट्रेट के कुछ कर्मचारी और गाँव के गिने-चुने लोग थे। कोई उसका अपना नहीं था। जो लोग उसके चारों ओर मंडराते थे, वे उसकी लाल बत्ती और उसके पद के गुलाम थे, अजय कुमार सिंह नाम के उस अकेले इंसान से किसी को कोई सरोकार नहीं था। जब चिता पूरी तरह जल गई और राख ठंडी हो गई, अजय ने उस राख को गंगा की लहरों में प्रवाहित कर दिया। माँ का साया उठने के साथ ही अजय के जीवन का वह अंतिम कोमल कोना भी हमेशा के लिए बंद हो गया, जहाँ वह कभी बच्चा बनकर रो सकता था।

भाग 3: दफ्तर की राजनीति और कूटनीति का चक्रव्यूह

माँ के क्रिया-कर्म और तेरहवीं के बाद जब अजय कलेक्ट्रेट लौटा, तो उसकी जिंदगी का एक और स्याह पहलू उसका इंतजार कर रहा था। सरकारी महकमा बाहर से जितना अनुशासित और भव्य दिखता है, भीतर से वह ईर्ष्या, गुटबाजी और कूटनीति का उतना ही गंदा दलदल होता है।
अजय की ईमानदारी और उसकी कड़क कार्यशैली से जिले के कई बड़े ठेकेदार, खनन माफिया और भ्रष्ट राजनेता परेशान थे। वे लंबे समय से अजय को रास्ते से हटाने या उसे बदनाम करने का मौका ढूंढ रहे थे। अजय के भाई अमित द्वारा किए गए दीवानी मुकदमे ने उन्हें एक सुनहरा हथियार दे दिया था।
जिले के भू-माफिया और सत्ताधारी दल के एक रसूखदार नेता, ठाकुर वीरेंद्र सिंह ने कलेक्ट्रेट के ही कुछ भ्रष्ट बाबू और अजय के अधीनस्थ अधिकारियों के साथ मिलकर एक गहरी साजिश रची।
एक सुबह, जब अजय अपने चैंबर में बैठा फाइलों का अवलोकन कर रहा था, उसका स्टेनो एक गोपनीय पत्र लेकर आया।
"साहब, कमिश्नर ऑफिस से यह स्पेशल नोटिस आया है। आपके खिलाफ कोई बेनामी शिकायत दर्ज की गई है," स्टेनो ने सहमते हुए कहा।
अजय ने पत्र खोला। पत्र में लिखा था कि अजय कुमार सिंह ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने भाई अमित सिंह को पुश्तैनी संपत्ति से बेदखल करने की धमकी दी है और अपने पद के रसूख का इस्तेमाल करके राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में हेरफेर करने की कोशिश की है। चूंकि मामला अदालत में लंबित है, इसलिए शासन ने इस विषय पर एक 'विभागीय जांच' (Departmental Enquiry) के आदेश दिए हैं।
अजय ने एक ठंडी सांस ली और पत्र को मेज पर रख दिया। उसने हंसने की कोशिश की, पर उसके होंठों पर सिर्फ एक कड़वाहट उभर आई। जिस जमीन के लिए उसने अपनी बहन की शादी के मंडप में घुटने टेके, जिस भाई के लिए उसने अपनी सुख-सुविधाएं कुर्बान कर दीं, आज उसी भाई के नाम का इस्तेमाल करके व्यवस्था उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल रही थी।
दफ्तर का माहौल रातों-रात बदल गया। जो कर्मचारी कल तक अजय को देखते ही खड़े हो जाते थे, वे अब उसे देखकर कन्नी काटने लगे। फाइलों की रफ्तार मद्धम हो गई। जिले के कलेक्टर (DM) भी, जो पहले अजय की पीठ थपथपाते थे, अब उससे दूरी बनाकर बात करने लगे थे।
"अजय जी, देखिए... मामला थोड़ा संवेदनशील है। आपके भाई ने कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, उसमें आपके ऊपर सीधे आरोप हैं। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, मैं चाहूंगा कि आप राजस्व से जुड़ी फाइलों को न छुएं," कलेक्टर ने एक मीटिंग के बाद अजय से अकेले में कहा।
"सर, आप तो जानते हैं कि सच क्या है। मैंने कभी एक रुपया भी गलत तरीके से नहीं कमाया," अजय ने अपनी सफ़ेद कमीज़ की आस्तीन को देखते हुए कहा, जो अब थोड़ी घिस चुकी थी।
"मैं जानता हूँ अजय, पर व्यवस्था सच नहीं, सबूत देखती है। और इस वक्त हवा आपके खिलाफ बह रही है," कलेक्टर ने सहानुभूति पूर्वक पर ठंडे स्वर में कहा।
अजय अपने चैंबर में वापस आ गया। दोपहर की तेज धूप खिड़की के कांच से छनकर उसकी मेज पर आ रही थी। मेज पर फाइलों का अंबार था, पर अजय की नजरें अपने हाथ की उंगलियों पर टिक गईं। कलम पकड़ते-पकड़ते उंगलियों पर जो काले गट्टे पड़े थे, वे चीख-चीखकर उसकी ईमानदारी की गवाही दे रहे थे। पर इस व्यवस्था के पास आँखें थीं, दिल नहीं। वह चारों ओर से रची गई राजनीति के चक्रव्यूह में अकेला खड़ा था, जहाँ हर कोई उस पर तीर चलाने को तैयार बैठा था।

भाग 4: कोठी का चरम अकेलापन और रात का अंधकार

शाम के सात बजे जब दफ्तर का काम खत्म होता, तो अजय अपनी सरकारी गाड़ी से कोठी लौट आता। गाड़ी का ड्राइवर गाड़ी पार्क करके चला जाता, अर्दली खाना टेबल पर रखकर अपने क्वार्टर में सो जाता। उसके बाद शुरू होता था अजय के जीवन का असली नरक—वह कोठी का चरम अकेलापन।
वह विशाल कोठी, जिसके ऊंचे कमरों में मद्धम पीली रोशनियाँ जलती थीं, अजय के लिए एक कब्रगाह जैसी लगने लगती थी। वह डाइनिंग टेबल पर बैठता। थाली में रोटी और दाल रखी होती, पर उसे उठाने की ताकत उसके हाथों में नहीं होती थी। उसे याद आती थी माँ, जो कहती थी—*"बेटा, थोड़ा और खा ले, दिन भर भाग-दौड़ करता है, कमजोर हो जाएगा।"* अब वह खुद को कितना भी थका ले, कोई उसके सिर पर हाथ फेरने वाला नहीं था।
वह बिना खाए ही उठ जाता और कोठी के लंबे बरामदे में टहलने लगता। रात के सन्नाटे में उसके जूतों की आवाज़ गूंजती—*खट, खट, खट*—जैसे कोई अदृश्य पहरेदार उसकी तन्हाई का पहरा दे रहा हो।
एक रात बहुत तेज आंधी और बारिश आई। बिजली गुल हो गई। पूरी कोठी अंधेरे के गहरे सागर में डूब गई। अजय ने एक मोमबत्ती जलाई और उसे अपनी मेज पर रख दिया। मोमबत्ती की मद्धम, कांपती हुई लौ ने दीवार पर अजय की एक विशाल, डरावनी परछाई बना दी।
अजय ने खिड़की के किवाड़ खोले। बाहर तेज हवाओं के कारण पेड़ झूम रहे थे और बारिश की बौछारें सीधे उसके चेहरे पर आ रही थीं। पानी की वो ठंडी बूंदें जब उसके गालों से फिसलकर नीचे गिरीं, तो अजय को लगा कि प्रकृति भी उसके भाग्य पर रो रही है।
उसने जेब से अपना पुराना बटुआ निकाला। उस बटुए के सबसे अंदरूनी हिस्से में, प्लास्टिक के कवर के पीछे, एक छोटा सा कागज का टुकड़ा मुड़ा हुआ रखा था। यह बीएचयू के दिनों में सुवर्णा द्वारा लिखा गया एक छोटा सा नोट था, जिसमें उसने किसी परीक्षा के नोट्स के लिए 'थैंक यू' लिखा था। वह नोट अब पीला पड़ चुका था और उसके अक्षर धुंधले हो रहे थे।
अजय ने उस कागज को अपनी आँखों से लगा लिया।
 "सुवर्णा... तुम तो महलों में हो, तुम्हारे पास तो खुशियों का संसार होगा। क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारा वो 'अजय' आज इस आलीशान कोठी में एक भिखारी से भी ज्यादा बदतर जिंदगी जी रहा है? लोग मुझे 'साहब' कहते हैं, मेरे सामने झुकते हैं, पर मेरे भीतर का इंसान हर रोज घुट-घुटकर मर रहा है। मैं सब कुछ पाकर भी सब कुछ हार गया सुवर्णा... सब कुछ हार गया।"
 
वह फर्श पर बैठ गया, उसका सिर घुटनों के बीच था। मोमबत्ती धीरे-धीरे पिघल रही थी और उसका मोम मेज पर फैल रहा था। उस अंधेरी, तूफानी रात में कलेक्ट्रेट की उस कोठी के भीतर कोई अधिकारी नहीं था; वहाँ सिर्फ एक टूटा हुआ, बिखरा हुआ आशिक था, जिसका पूरा जीवन जिम्मेदारियों और अपनों के धोखे की भेंट चढ़ चुका था। पाठकों के मन को झकझोर देने वाला यह अकेलापन अजय की नियति बन चुका था।

भाग 5: बनारस के कोर्ट का दृश्य और सुवर्णा की जंग

जब जौनपुर में अजय अकेलेपन के आंसू रो रहा था, उसी समय बनारस की फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के गलियारे में एक अलग ही जंग चल रही थी। सुवर्णा, जिसने सिंघानिया परिवार के वैभव को लात मार दी थी, अब अपने आत्मसम्मान की अंतिम लड़ाई कोर्ट के कमरों में लड़ रही थी।
कचहरी का वह माहौल किसी भी संभ्रांत महिला के लिए अत्यंत अपमानजनक होता है। चारों ओर वकीलों के काले कोट, मुवक्किलों की चीख-पुकार, और गवाहों की कतारें। सुवर्णा सूती साड़ी पहने, चेहरे पर एक दृढ़ता ओढ़े अपने पिता पंडित दीनानाथ जी के साथ कोर्ट रूम नंबर ५ के बाहर खड़ी थी।
संजय सिंघानिया अपने महंगे वकीलों की फौज और बाउंसरों के साथ वहाँ पहुँचा। उसके चेहरे पर आज भी वही पुराना अहंकार और रसूख की धमक थी। उसने सुवर्णा के पास आकर धीमे से कहा, "सुवर्णा, अभी भी वक्त है, केस वापस ले लो और घर लौट चलो। वरना मेरे वकील कोर्ट में तुम्हारे चरित्र के ऐसे-ऐसे पन्ने खोलेंगे कि तुम समाज में मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहोगी।"
सुवर्णा ने अपनी नजरें उठाईं। उसकी भूरी आँखों में अब वो पुरानी चंचलता नहीं थी, अब वहाँ गंगा की बाढ़ जैसी विनाशकारी शांति थी।
 "संजय, जिसके चरित्र का महल झूठ और अहंकार की बुनियाद पर टिका हो, वह दूसरों के चरित्र पर उंगली नहीं उठाया करते। तुम्हारी धमकियाँ कलेक्ट्रेट की फाइलों में काम आती होंगी, इस सुवर्णा के सामने नहीं। मैं कोर्ट के भीतर तुम्हारे हर झूठ का सामना करने को तैयार हूँ।"
 
कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई। संजय के वकील ने सुवर्णा पर आरोप लगाया कि वह एक आधुनिक, जिद्दी औरत है जो परिवार के मूल्यों का सम्मान नहीं करती और अपने पति की संपत्ति में से एक बड़ा हिस्सा (Alimony) ऐंठने के लिए यह झूठा केस कर रही है। उसने यूनिवर्सिटी के दिनों के अजय के नाम को भी उछालने की कोशिश की।
"योर ऑनर, वधू का कॉलेज के दिनों में एक लड़के के साथ अफेयर था, जिसका भूत आज भी इनके दिमाग पर सवार है। इसी मानसिक भटकाव के कारण यह अपने पति के साथ वैवाहिक संबंध नहीं रख पा रही हैं," वकील ने तीखे स्वर में कहा।
सुवर्णा के पिता दीनानाथ जी तुरंत खड़े हुए। "ऑब्जेक्शन, योर ऑनर! विपक्षी वकील बिना किसी सबूत के मेरी मुवक्किल के अतीत पर कीचड़ उछाल रहे हैं। यह पूरी तरह से घरेलू हिंसा के मामले से ध्यान भटकाने की कोशिश है।"
जज ने ऑब्जेक्शन सस्टेन किया, लेकिन उन शब्दों ने सुवर्णा के दिल को अंदर तक छलनी कर दिया। उसे लगा कि इस पुरुष प्रधान समाज में एक औरत का अपनी गरिमा के लिए लड़ना कितना कठिन है। हर कोई उसके अतीत को कुरेदने के लिए तैयार बैठा था। लेकिन वह झुकी नहीं। उसने गवाह के बॉक्स में खड़े होकर पूरी मजबूती और तार्किकता के साथ संजय के हर अत्याचार, उसकी शराब की लत और उसके द्वारा दिए गए मानसिक टॉर्चर का ब्योरा जज के सामने रखा।
अदालत की कार्यवाही शाम को स्थगित हुई। जब सुवर्णा कोर्ट से बाहर निकली, तो आसमान में डूबते सूरज की लालिमा फैल रही थी। वह पूरी तरह थक चुकी थी। कंक्रीट के इस शहर में उसे अब कोई अपना नहीं दिख रहा था। वह घर लौटने के बजाय अपनी गाड़ी लेकर सीधे 'अस्सी घाट' की ओर निकल गई।

भाग 6: दो टूटे हुए दिलों की मूक पुकार

अस्सी घाट पर शाम की ठंडी हवाएं चल रही थीं। गंगा की लहरें हमेशा की तरह शांत और गंभीर थीं। सुवर्णा घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर बैठ गई। उसने अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक लिया और उसकी उंगलियों के बीच से आंसुओं की धार बह निकली।
"जिंदगी... तूने मुझसे क्या बदला लिया?" उसने सिसकते हुए कहा। "मैंने जिस प्रेम को पूजा, उसे व्यवस्था ने तमाशा बना दिया। जिसे पति माना, उसने चरित्र पर दाग लगा दिया। अब इस जीवन में क्या बचा है?"
उसी समय, जौनपुर की कोठी में अजय भी अपनी मेज पर सिर रखे बैठा था। विभागीय जांच के कागजात उसके सामने बिखरे पड़े थे। दोनों प्रेमी, जो कभी बीएचयू की बगिया में बैठकर भविष्य के सुनहरे ताने-बाने बुनते थे, आज अपनी-अपनी जिंदगी के सबसे स्याह मोड़ पर खड़े थे।
 अजय:अपनों के धोखे, माँ की मृत्यु और दफ्तर की गंदी राजनीति से त्रस्त।

 सुवर्णा:वैवाहिक नरक, कोर्ट-कचहरी के अपमान और अकेलेपन से जूझती हुई।

दोनों के बीच मील की दूरी थी, दोनों के रास्ते अलग थे, पर उनके दिलों का दर्द बिल्कुल एक जैसा था। वे समाज की नजरों में भले ही 'डिप्टी साहब' और 'डॉक्टर साहिबा' थे, पर हकीकत में वे समय के पहिए के नीचे कुचले गए दो ऐसे बटोही थे जिनका सब कुछ लुट चुका था। पाठकों के दिलों को पिघला देने वाला यह मर्मस्पर्शी अध्याय यहाँ समाप्त होता है, जहाँ दोनों पात्र अपने-अपने आंसुओं के अर्घ्य से अपनी तकदीर लिख रहे थे। नियति का चौराहा अब ज्यादा दूर नहीं था, जहाँ इन दो टूटे हुए किनारों को एक बार फिर आमने-सामने आना था।
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अध्याय 7: नियति का चौराहा और मौन की महागाथा

भाग 1: समय का क्रूर चक्र और बनारस का नया सवेरा

कहते हैं कि जब इंसान अपने जीवन के सारे रास्ते बंद मान लेता है, तब नियति चुपके से एक ऐसा झरोखा खोलती है जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होती। वक्त की नदी में पंद्रह साल का लंबा अरसा बह चुका था। यह पंद्रह साल कोई आम समय नहीं था; यह दोनों के चेहरों पर झुर्रियों की लकीरें, बालों में सफेदी की चांदी और दिलों में एक अंतहीन खामोशी बोने का कालखंड था।
अजय कुमार अब जौनपुर से स्थानांतरित होकर बनारस मंडल में 'अपर जिलाधिकारी' (ADM) के पद पर तैनात हो चुके थे। उनका कद प्रशासनिक गलियारों में बहुत ऊंचा था, लेकिन उनका शरीर और मन अब थकने लगा था। माँ-बाप के जाने के बाद भाई अमित से उनका रिश्ता हमेशा के लिए कोर्ट के दीवानी मुकदमों की फाइलों में दफन हो गया था। अमित ने जमीन तो ले ली, पर वह कभी सुखी नहीं रहा। जुए और सट्टे में वह सब कुछ हारकर अब दर-दर की ठोकरें खा रहा था। अजय ने उसे माफ तो कर दिया था, पर अब उस रिश्ते में कोई गर्माहट नहीं बची थी। अजय की सरकारी कोठी में अब भी वही सन्नाटा पसरा रहता था, जहाँ शाम को सिर्फ उनकी घिसी हुई फाइलें और चाय का अकेला कुल्हड़ उनका इंतजार करता था।
उधर सुवर्णा सिंघानिया परिवार के उस नरक से पांच साल की लंबी अदालती लड़ाई के बाद कानूनी रूप से आजाद हो चुकी थी। उसने संजय से कोई गुजारा भत्ता नहीं लिया। वह अपने स्वाभिमान के साथ शहर के एक छोटे से, शांत इलाके में दो कमरों के फ्लैट में अकेली रहती थी। अब वह कॉलेज में 'हेड ऑफ डिपार्टमेंट' (HOD) बन चुकी थी। उसकी आँखों की चंचलता अब एक गंभीर, गहरे वैराग्य में बदल चुकी थी। उसने अपनी पूरी जिंदगी अपने छात्रों और अपनी किताबों के नाम कर दी थी।
लेकिन इस अकेलेपन के बीच, सुवर्णा की सेहत ने उसका साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। पिछले कुछ महीनों से उसे छाती में तेज दर्द और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत थी। जब उसने बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल में जांच कराई, तो डॉक्टरों के चेहरे गंभीर हो गए। कार्डियोलॉजिस्ट ने उसे केबिन में बुलाकर बेहद धीमे स्वर में कहा:
 "डॉ. सुवर्णा, आपके दिल के मुख्य वॉल्व में एक गंभीर ब्लॉकेज है। आपकी स्थिति ऐसी है कि इस उम्र में सर्जरी भी बेहद जोखिम भरी है। आपके पास समय बहुत कम है... शायद कुछ ही महीने। हमारी सलाह है कि आप खुद को किसी भी तरह के तनाव से दूर रखें और जितना हो सके शांत रहें।"

सुवर्णा ने डॉक्टर की बात सुनी और उसके होंठों पर एक शांत, अलौकिक मुस्कान तैर गई। "धन्यवाद डॉक्टर। जिस दिल ने सदियों पहले धड़कना छोड़ दिया हो, उसके रुकने की खबर सुनकर मुझे कोई अचरज नहीं हो रहा। मैं तैयार हूँ।"
वह अस्पताल से बाहर निकली। बाहर अक्टूबर की गुनगुनी धूप फैली थी। पेड़ों से सूखे पत्ते धीरे-धीरे गिर रहे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसकी जिंदगी के दिन एक-एक करके गिर रहे थे। उसने मन ही मन सोचा कि मरने से पहले, क्या वह अपनी उस अधूरी दास्तान के नायक को एक बार देख पाएगी? उसे नहीं पता था कि नियति ने इसके लिए पहले ही एक चौराहा तैयार कर रखा था।

भाग 2: कलेक्ट्री का औचक दौरा और वह ऐतिहासिक गलियारा

वसंत और शरद के संधिकाल का वह एक बेहद व्यस्त मंगलवार था। बनारस के कलेक्ट्रेट परिसर में सुबह से ही भारी गहमा-गहमी थी। नए एडीएम साहब यानी अजय कुमार को आज शहर के कुछ प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों और महिला कॉलेजों का औचक निरीक्षण करना था, ताकि वहां की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था का जायजा लिया जा सके।
अजय अपनी नीली बत्ती वाली सरकारी गाड़ी में पीछे बैठे थे। उन्होंने सफ़ेद कुर्ता-पायजामा और ऊपर से गहरे रंग की बंडी पहन रखी थी। उनके हाथों में फाइलों का पुलिंदा था, पर उनकी आँखें गाड़ी की खिड़की से बाहर बनारस की बदलती सड़कों को देख रही थीं। यह वही शहर था जहाँ उन्होंने अपनी जवानी के सबसे खूबसूरत दिन बिताए थे। कलेक्ट्रेट से निकलकर उनकी गाड़ी का काफिला सीधे उस प्रतिष्ठित डिग्री कॉलेज की ओर बढ़ा, जहाँ सुवर्णा कार्यरत थी।
कलेक्ट्रेट की गाड़ी जब कॉलेज के परिसर में घुसी, तो हड़कंप मच गया। प्रिंसिपल और अन्य स्टाफ तुरंत स्वागत के लिए गेट पर दौड़ पड़े।
"अरे, एडीएम साहब आए हैं! जल्दी चलिए!" वाइस प्रिंसिपल ने स्टाफ रूम में चिल्लाकर कहा।
सुवर्णा उस वक्त अपने केबिन में बैठी अटेंडेंस रजिस्टर देख रही थी। उसके सीने में सुबह से ही एक मद्धम सा दर्द उठ रहा था, पर उसने दवा खाकर उसे दबा दिया था। शोर सुनकर वह भी धीरे से उठी और अपनी सूती साड़ी के पल्लू को ठीक करती हुई मुख्य प्रशासनिक गलियारे की ओर बढ़ी।
अजय प्रिंसिपल के साथ कॉरिडोर से गुजर रहे थे। वे कॉलेज की लाइब्रेरी और कक्षाओं का मुआयना कर रहे थे। उनका चेहरा सख्त था, और वे अधिकारियों को जरूरी निर्देश दे रहे थे।
तभी, उस लंबे, औपनिवेशिक काल के बने गलियारे के मोड़ पर, जहाँ धूप एक रोशनदान से छनकर जमीन पर पीले चौकोर टुकड़े बना रही थी, अजय के कदम अचानक ठिठक गए। उनके हाथ में पकड़ी हुई फाइल धीरे से उनकी पकड़ से ढीली हो गई।
सामने से सुवर्णा आ रही थी।
पंद्रह साल... पांच हजार चार सौ पचहत्तर दिन। इतना लंबा समय एक पल में ढहकर राख हो गया। अजय ने सुवर्णा को देखा। उसके बाल जो कभी हवा में उड़ते थे, अब उनमें चांदी के धागे साफ झलक रहे थे। उसके चेहरे पर झुर्रियों की एक बेहद महीन, सम्मानजनक लकीर थी, पर उसकी भूरी आँखें आज भी वही थीं—वही आँखें जो कभी अस्सी घाट की लहरों को निहारती थीं।
सुवर्णा ने भी अपनी नजरें उठाईं। सामने कड़क अधिकारी की वेशभूषा में अजय खड़ा था। उसका सांवला रंग थोड़ा और गहरा गया था, माथे पर वक्त के संघर्ष के गहरे निशान थे, और आँखों पर सोने के फ्रेम का चश्मा था। पर सुवर्णा के लिए वह एडीएम साहब नहीं थे; वह तो वही 'अजय' था जो बीएचयू की लाइब्रेरी में फटी चप्पलों के साथ नोट्स बनाता था।
पूरे गलियारे में जैसे हवा का चलना बंद हो गया। प्रिंसिपल कुछ बोल रहे थे, "सर, यह हमारा इतिहास विभाग है..." पर अजय को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उनके कानों में सिर्फ उनके अपने दिल की धड़कन गूंज रही थी। दो किनारे, जो सदियों पहले समय की धारा में बहकर अलग हो गए थे, आज व्यवस्था के एक संकरे गलियारे में आमने-सामने खड़े थे।

भाग 3: जज्बातों का मूक विस्फोट और आँखों का सावन

"सुवर्णा..." अजय के होंठ हिले, पर आवाज गले के भीतर ही घुटकर रह गई।
सुवर्णा के पैरों ने जैसे जमीन छोड़ दी। उसके सीने का दर्द अचानक तेज हुआ, और उसने सहारा लेने के लिए गलियारे की ठंडी दीवार पर अपना हाथ रख दिया। उसकी आँखों के कोने पल भर में भीग गए, और एक बड़ा सा आँसू उसकी पलकों को पार करता हुआ उसके गाल पर फिसल गया।
प्रिंसिपल ने दोनों के बीच के इस सन्नाटे को भांप लिया। वे कुशल प्रशासक थे, वे भांप गए कि इन दो शख्सियतों के बीच कोई बहुत पुराना, अनकहा अतीत छिपा है।
"अ... एडीएम साहब, यह हमारी एचओडी डॉ. सुवर्णा हैं," प्रिंसिपल ने परिचय कराया।
अजय ने बहुत मुश्किल से अपने प्रशासनिक आत्म-नियंत्रण को बटोरा। उन्होंने अपने हाथ जोड़े, "नमस्ते, डॉ. सुवर्णा।"
सुवर्णा ने भी कांपते हुए हाथ जोड़े, "नमस्ते... सर।" 'सर' शब्द कहते हुए सुवर्णा के कलेजे से जैसे खून की एक बूंद टपक गई। वह लड़का जिसे उसने अपनी आत्मा का स्वामी माना था, आज उसे 'सर' कहना पड़ रहा था।
"प्रिंसिपल साहब, मैं डॉ. सुवर्णा के साथ विभाग की कुछ आंतरिक व्यवस्था पर अकेले में बात करना चाहता हूँ। आप लोग कृपया बाहर रुकें," अजय ने अपनी आवाज को कड़ा करने की नाकाम कोशिश करते हुए आदेश दिया।
"जी जरूर, सर। चलिए सब लोग बाहर चलिए," प्रिंसिपल ने बाकी स्टाफ को हटाया।
गलियारे का वह कमरा खाली हो गया। कमरा क्या था, वह स्मृतियों का एक बंद बक्सा था जो अचानक खुल गया था। कमरे का दरवाजा बंद होते ही अजय का पूरा प्रशासनिक रसूख, उनकी लाल बत्ती का घमंड और उनकी कड़क वेशभूषा का मुखौटा ताश के पत्तों की तरह ढह गया। वे सीधे सुवर्णा के पास पहुंचे।

 "सुवर्णा! तुम... तुम्हारी यह क्या हालत हो गई है?" अजय की आवाज में पंद्रह साल का पूरा दर्द एक साथ बह निकला। वे फफक कर रो पड़े।

सुवर्णा ने जब अजय को इस तरह बच्चों की तरह रोते देखा, तो उसका भी सब्र का बांध टूट गया। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से अपना मुंह ढका और उसकी सिसकियाँ कमरे की दीवारों से टकराकर प्रतिध्वनित होने लगीं।
"तुमने क्यों किया ऐसा अजय? क्यों मुझे इस तरह अकेला छोड़ दिया?" सुवर्णा ने रोते हुए सीधे उसकी बंडी को अपने हाथों से पकड़ लिया। "तुम अफसर बन गए, बड़े साहब बन गए, पर क्या तुम्हें एक बार भी अपनी इस सुवर्णा का खयाल नहीं आया? तुमने मेरे खत का जवाब क्यों नहीं दिया?"
अजय ने सुवर्णा के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उनके हाथ कांप रहे थे। "मैं मजबूर था सुवर्णा! मेरा घर ढह रहा था, बाबूजी मर चुके थे, भाई ने मेरी पीठ में छुरा घोंप दिया था। मैं तुम्हें उस गरीबी और अदालतों के नरक में नहीं खींचना चाहता था। मुझे लगा तुम सिंघानिया परिवार में सुखी रहोगी... महलों में रानी बनकर रहोगी।"
"रानी?" सुवर्णा ने एक अत्यंत दर्दनाक मुस्कान के साथ अपनी भीगी आँखें उठाईं। "अजय, उस महल में हर रोज मेरे आत्मसम्मान का कत्ल किया जाता था। मुझे तुम्हारे नाम के ताने दिए जाते थे। मैंने पांच साल तक कोर्ट के जो चक्कर काटे हैं, वह सिर्फ मैं जानती हूँ। मैं आज अकेली हूँ अजय... बिल्कुल अकेली।"
अजय ने अपना सिर सुवर्णा के कांपते कंधों पर रख दिया। दो बुजुर्ग होते प्रेमी, जो अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन साल समाज और जिम्मेदारियों की वेदी पर होम कर चुके थे, आज एक सरकारी कमरे में एक-दूसरे के आंसुओं से अपने जख्मों को धो रहे थे। यह जज्बातों का ऐसा विस्फोट था जिसे देखकर पत्थर का दिल भी पिघल जाए। पाठकों की आँखें नम कर देने वाला यह दृश्य उस कमरे की दीवारों में हमेशा के लिए कैद हो रहा था।

भाग 4: अस्सी घाट का पुनर्मिलन और ढलती धूप का सच

उस औचक दौरे के बाद अजय ने दफ्तर की सारी बैठकें रद्द कर दीं। उन्होंने अपनी सरकारी गाड़ी को वापस कलेक्ट्रेट भेज दिया और अपने अर्दली से कहा कि वे आज पैदल ही कुछ काम से जाएंगे। शाम के चार बज रहे थे। आकाश का रंग हल्का पीला और नारंगी हो रहा था।
अजय और सुवर्णा चुपचाप, बिना किसी सुरक्षाकर्मी के, 'अस्सी घाट' की ओर बढ़ रहे थे। वे एक-दूसरे से थोड़ी दूरी बनाकर चल रहे थे, जैसे समाज की मर्यादाएं आज भी उनके बीच एक मूक दीवार बनकर खड़ी हों। पर उनके साए जमीन पर एक-दूसरे को छू रहे थे।
जब वे अस्सी घाट की उसी पुरानी सीढ़ी पर बैठे, जहाँ वे पंद्रह साल पहले बैठे थे, तो गंगा की लहरें वैसी ही थीं। नावें वैसी ही तैर रही थीं। पर बैठने वाले अब वो युवा छात्र नहीं थे; वे वक्त के थपेड़ों से चूरे जा चुके दो मुसाफिर थे।
अजय ने जेब से अपना पुराना, घिसा हुआ बटुआ निकाला। उन्होंने उसके भीतर से वह पीला पड़ चुका नोट निकाला जो सुवर्णा ने उन्हें यूनिवर्सिटी के दिनों में दिया था।
"देखो सुवर्णा... तुमने सोचा कि मैं तुम्हें भूल गया? इस कागज के टुकड़े को मैंने अपनी सांसों की तरह संभाल कर रखा है। जब भी जिंदगी मुझे तोड़ने की कोशिश करती थी, मैं इसे देखता था और मुझे लड़ने की ताकत मिल जाती थी," अजय ने वह कागज सुवर्णा की हथेली पर रख दिया।
सुवर्णा ने उस नोट को देखा। उसकी अपनी लिखावट अब वक्त की धूल से धुंधली हो चुकी थी। उसकी आँखों से आँसू टपक कर उस कागज पर गिरे, जिससे वह नोट और भी भीग गया।
"अजय..." सुवर्णा ने धीरे से अपना सिर अजय के मजबूत कंधे पर रख दिया। इस बार अजय ने खुद को नहीं रोका। उन्होंने अपना हाथ सुवर्णा के कांपते हुए कंधे पर टिका दिया। "जिंदगी ने हमें बहुत भटकाया न? हम समाज की नजरों में कितने सफल हैं, पर भीतर से कितने खोखले हैं।"
"हाँ सुवर्णा," अजय ने दूर क्षितिज को देखा, जहाँ सूरज गंगा के पानी में डूबने की तैयारी कर रहा था। "हमने दूसरों के घर बसाने में, दूसरों के सपने पूरे करने में अपनी पूरी जवानी खर्च कर दी। पर आज जब हम इस मोड़ पर खड़े हैं, तो हमारे पास हमारा कहने को कुछ भी नहीं है।"
धूप धीरे-धीरे मद्धम हो रही थी। घाट पर दीये जलाए जा रहे थे। शंख की ध्वनि हवा में गूंजने लगी थी। सुवर्णा को अपने सीने में एक अजीब सी भारीपन महसूस हो रहा था, पर अजय के कंधे का वह सुकून उस दर्द से कहीं ज्यादा बड़ा था। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और मन ही मन कहा—*'हे गंगा मैया, अगर मेरा अंत इसी कंधे पर हो, तो मुझे इस जीवन से कोई शिकायत नहीं होगी।'* नियति का यह चौराहा उन्हें एक ऐसी मंजिल की ओर ले जा रहा था, जहाँ मिलन तो था, पर वह मिलन आंसुओं के एक ऐसे समंदर से होकर गुजरने वाला था जो उन्हें भी नहीं पता था, काश कि मनुष्य नियति कि चक्र को समझ पाता तो शायद परिस्थिति कुछ और होती, बहरहाल चाहत तो कुछ और होती है और लकीरें कुछ और रास्ते ले जाती हैं।
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अध्याय 8: महाशून्य का संगीत और शाश्वत मिलन


भाग 1: नियति का अंतिम पत्र और बिखरती हुई देह

कहते हैं कि जब परमात्मा किसी आत्मा को इस मृत्युलोक के बंधनों से पूरी तरह मुक्त करने का मन बना लेता है, तो वह उसके सारे सांसारिक तंतुओं को एक-एक करके काटने लगता है। अस्सी घाट की उस शाम के बाद, जब शरद ऋतु ने अपनी विदाई ली और बनारस में कड़ाके की ठंड ने दस्तक दी, सुवर्णा की देह एक ढहती हुई पुरानी इमारत की तरह चरमराने लगी थी। चिकित्सा विज्ञान जिसे 'कंजस्टिव हार्ट फेल्योर' कहता है, वह अध्यात्म की दृष्टि से उस पवित्र आत्मा की छटपटाहट थी, जो अपने अंतिम गंतव्य को पा लेने के लिए व्याकुल थी।
सुवर्णा का वह छोटा सा फ्लैट, जो कभी उसकी किताबों की खुशबू और छात्रों के शोध-पत्रों से जीवंत रहता था, अब दवाइयों की तीखी गंध और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की निरंतर चलने वाली भारी आवाज़ से भर चुका था। खिड़की के कांच पर कोहरे की एक मोटी परत जम गई थी, जिसके पार बाहर की दुनिया बिल्कुल धुंधली और अवास्तविक दिखाई देती थी। कमरे के कोने में रखी मेज पर इतिहास की वे मोटी-मोटी किताबें वैसी ही पड़ी थीं, पर अब उन्हें खोलने वाले हाथों में पन्नों को पलटने की ताकत नहीं बची थी।
सुवर्णा बेड पर लेटी हुई थी। उसका वह सोने जैसा दमकता चेहरा अब एक सफेद मखमली चादर की तरह निष्प्रभ हो चुका था। उसकी भूरी आँखें, जिनमें कभी काशी की सुबह का उजलापन तैरता था, अब गहरी धंस चुकी थीं और उनके चारों ओर दुख की नीली लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं। उसकी सांसें बहुत छोटी और कष्टदायक हो चुकी थीं। जब भी वह सांस लेने की कोशिश करती, उसकी छाती में एक असहनीय दर्द उठता, जैसे कोई तप्त त्रिशूल उसके दिल के पार हो रहा हो।
उसके सिरहाने बैठे थे उसके बुजुर्ग पिता—पंडित दीनानाथ मिश्रा। कलाई पर बंधी घड़ी की टिक-टिक और ऑक्सीजन मशीन की *घूं-घूं* के बीच दीनानाथ जी अपनी बेटी के सूखे, पीले पड़ चुके हाथ को सहला रहे थे। उनके अपने हाथ कांप रहे थे। सिविल कोर्ट के जिस सबसे सम्मानित वकील के सामने बड़े-बड़े अपराधी और गवाह कांपते थे, आज वह कानून का पंडित अपनी इकलौती बेटी के सामने पूरी तरह असहाय, पराजित और घुटनों के बल बैठा था। उनकी सफेद दाढ़ी और आँखों से बहते आंसुओं ने उनके चेहरे की झुर्रियों को और गहरा कर दिया था।
"सुवर्णा... बेटा, थोड़ा सा पानी पी लो। देखो, तुम्हारी पसंद का तुलसी का अर्क बनाया है," दीनानाथ जी की आवाज में एक पिता की बेबसी और पश्चाताप का महासागर उमड़ रहा था।
सुवर्णा ने बहुत मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। उसने अपने पिता को देखा और उसके सूखे, पपड़ी जमे होंठों पर एक अत्यंत मद्धम, करुणामयी मुस्कान तैर गई। "पापा... अब इस प्यास का अंत होने वाला है। अब इस पानी से यह तृप्ति नहीं होगी। आप... आप क्यों रो रहे हैं? आपने तो मुझे विदा किया था न महलों में? देखिए... मैं लौट आई हूँ... अपने आत्मसम्मान के साथ।"
सुवर्णा के ये शब्द दीनानाथ जी के कलेजे में तीर की तरह चुभ गए। यह कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि यह उस सत्य का साक्षात्कार था जिसे वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और पैसे के अहंकार में कभी देख नहीं पाए थे। उन्हें याद आया वह दिन जब यूनिवर्सिटी के दिनों में उन्होंने अजय को अपने घर के बाहर खड़ा देखा था। अजय, जो फटी चप्पलों और सादे कुर्ते में सुवर्णा को इतिहास के नोट्स देने आया था। दीनानाथ जी ने उस दिन अपने रसूख के घमंड में अजय को दुत्कारा था, उसे उसकी औकात याद दिलाई थी और सुवर्णा को सख्त हिदायत दी थी कि वह उस 'भिखारी' से कभी बात न करे।
"मुझे माफ कर दे सुवर्णा! मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची!" दीनानाथ जी ने अपना सिर सुवर्णा के बेड की मुंडेर पर रख दिया और फफक-फफक कर रो पड़े। "मैं अंधा था। मुझे लगा कि सिंघानिया परिवार की दौलत, उनकी गाड़ियां और उनका नाम तुम्हें दुनिया की हर खुशी दे देंगे। मैंने तुम्हारे दिल की पवित्रता को नहीं समझा। मैंने उस लड़के की मेधा और उसके निश्छल प्रेम को अपनी वकालत की तराजू पर तौला। मेरी प्रतिष्ठा ने मेरी ही बेटी की जिंदगी को लील लिया। मैं गुनहगार हूँ सुवर्णा... मैं समाज का सबसे बड़ा अपराधी हूँ।"
सुवर्णा ने कांपते हुए हाथ उठाकर अपने पिता के सफेद बालों पर रखा। "ना पापा... आप दोषी नहीं हैं। यह तो नियति का खेल था। अजय को कर्तव्य की अग्नि में तपना था और मुझे विरह के कुंड में। अगर हम उस वक्त मिल जाते, तो शायद समाज को 'अधिकारी अजय' न मिलता और न ही दुनिया को 'डॉ. सुवर्णा' मिलती। हमने अपनी जवानी तो गंवा दी, पर... पर हमने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। पापा... मेरी एक आखिरी इच्छा है..."
"बोल बेटा! तू जो कहेगी, मैं अपनी जान दांव पर लगा दूँगा। बोल मेरी बच्ची!" दीनानाथ जी ने व्याकुल होकर कहा।
"मुझे... मुझे अजय से मिलना है। आखिरी बार... मैं उसके कंधे पर सिर रखकर इस सांसों के पिंजरे को छोड़ना चाहती हूँ। पापा... क्या आप उसे बुलाएंगे? क्या आप अपने उस पुराने अहंकार को भूलकर मेरे अजय को ला पाएंगे?" सुवर्णा की आँखों से दो बड़े-बड़े आँसू निकलकर तकिए पर फैल गए।
दीनानाथ जी तुरंत खड़े हो गए। उनकी आँखों में अब कोई संकोच नहीं था, कोई सामाजिक डर नहीं था। उन्होंने अपनी जेब से कांपते हाथों से फोन निकाला। वे जानते थे कि अजय अब इस शहर का एडीएम (ADM) है। वे उसके पद के सामने नहीं, बल्कि उस निश्छल प्रेमी की आत्मा के सामने आत्मसमर्पण करने जा रहे थे जिसने उनकी बेटी के लिए अपनी पूरी जिंदगी कुंवारी रख दी थी।

भाग 2: पश्चाताप की दहलीज और बुजुर्ग पिता की पुकार

कलेक्ट्रेट की विशाल कोठी के भीतर शाम का धुंधलका छा रहा था। अजय अपने स्टडी रूम में बैठे कुछ बेहद जरूरी फाइलों पर दस्तखत कर रहे थे। मेज पर रखी टेबल लैंप की मद्धम रोशनी उनके गंभीर, सांवले चेहरे पर पड़ रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर आकर उनका चेहरा और भी शांत और अंतर्मुखी हो गया था। दफ्तर के लोग उन्हें एक 'निर्मोही अधिकारी' कहते थे, जो न कभी किसी पार्टी में जाता था और न ही किसी सामाजिक उत्सव का हिस्सा बनता था।
तभी उनके व्यक्तिगत मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आई। अमूमन अजय दफ्तर के समय के बाद अनजान नंबर नहीं उठाते थे, पर उस नंबर की बार-बार आती घंटी ने उन्हें फोन उठाने पर मजबूर कर दिया।
"हेलो, मैं अजय कुमार बोल रहा हूँ," उन्होंने अपने प्रशासनिक, गंभीर स्वर में कहा।
दूसरी तरफ से कोई शब्द नहीं आया, सिर्फ एक भारी, सिसकती हुई खाँसने और रोने की आवाज आई। अजय चौंक गए। "हेलो? कौन है?"
"अजय बाबू... मैं... मैं दीनानाथ मिश्रा बोल रहा हूँ। सुवर्णा का अभागा पिता..."
यह नाम सुनते ही अजय के हाथ से पेन छूटकर सीधे फाइल पर गिर गया। पंद्रह साल पहले की वो सारी कड़वी यादें, जब वे इस बुजुर्ग वकील के बंगले के बाहर खड़े अपमानित हुए थे, उनके जेहन में कौंध गईं। उनका स्वर थोड़ा कड़ा हो गया, "जी कहिए, मिश्रा जी। इस समय आपने मुझे कैसे याद किया? क्या सिंघानिया परिवार से जुड़ा कोई नया कानूनी मामला है?"
"नहीं अजय बाबू! नहीं!" दीनानाथ जी की आवाज में चीख निकल गई। "मैं आज आपसे कोई कानूनी बात करने नहीं आया हूँ। मैं आज एक हारा हुआ, लाचार और मरणासन्न पिता बनकर आपके पैरों में गिर रहा हूँ। अजय बाबू... मेरी सुवर्णा... मेरी बच्ची अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। वह... वह सिर्फ आपका नाम ले रही है। वह मर रही है अजय बाबू... वह मर रही है।"
अजय के कानों में जैसे बिजली कड़क गई। 'सुवर्णा मर रही है'। इन तीन शब्दों ने उनके भीतर के प्रशासनिक अधिकारी को एक पल में मार दिया। उनकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
"आप... आप क्या कह रहे हैं? उसे क्या हुआ है?" अजय की आवाज कांपने लगी, उनका पूरा शरीर पसीने से भीग गया।
"उसे दिल की गंभीर बीमारी है। उसने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ आपके वियोग में गुजार दी। सिंघानिया के घर में उसने जो नरक झेला, वह सिर्फ आपके प्रेम के भरोसे झेल गई। अजय बाबू, मैंने उस दिन आपके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया था। मैंने आपकी गरीबी का मजाक उड़ाया था। आज मेरी वह सारी दौलत, मेरी वकालत, मेरी प्रतिष्ठा मेरी बेटी की सांसों को वापस नहीं ला पा रही है। मुझे सजा दे दीजिए, मुझ पर थूक दीजिए, पर... पर एक बार मेरी बच्ची को जीवनदान दे दीजिए। वह आपके बिना नहीं मरेगी, वह तड़प रही है। कृपया आ जाइए..." दीनानाथ जी फोन पर ही फफक कर रोने लगे।
अजय फोन हाथ में लिए अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उन्होंने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। वे न तो अपनी सरकारी गाड़ी का इंतजार करने रुके और न ही अपने अर्दली को आवाज दी। वे अपनी कोठी के दरवाजे से बाहर की ओर दौड़े।
बाहर कड़ाके की ठंड थी और कोहरे की सफेद चादर चारों ओर बिछी थी। अजय अपनी सादी चप्पलें पहने, बिना स्वेटर या शॉल के, बनारस की सड़कों पर अपनी व्यक्तिगत कार की ओर भागे। गाड़ी स्टार्ट करते हुए उनके हाथ कांप रहे थे। स्टीयरिंग व्हील पर उनके आंसुओं की बूंदें गिर रही थीं।
 "सुवर्णा! तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं। मैंने यह सफलता, यह पद, यह लाल बत्ती सिर्फ इसलिए पाई थी ताकि एक दिन मैं तुम्हारे सामने खड़ा होकर कह सकूं कि मैं हारा नहीं हूँ। अगर तुम ही नहीं रहोगी, तो इस कलेक्ट्रेट की कोठी और इस एडीएम के पद को लेकर मैं क्या करूँगा? रुक जाओ सुवर्णा... मैं आ रहा हूँ," अजय ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी। कोहरे को चीरती हुई उनकी गाड़ी सीधे सुवर्णा के फ्लैट की ओर दौड़ रही थी।

भाग 3: जीवन का दर्शन और वैराग्य की छाया

जब अजय रास्ते में थे, सुवर्णा के कमरे में जीवन और मृत्यु के बीच की वह मूक बहस अपने चरम पर थी जो हर इंसान को एक न एक दिन सुननी पड़ती है। सुवर्णा खिड़की की तरफ देख रही थी, जहाँ से कोहरे के बीच टिमटिमाते हुए कुछ दीये दिखाई दे रहे थे।
उसके भीतर विचारों का एक महासागर उमड़ रहा था। इतिहास की प्रोफेसर होने के नाते उसने दुनिया के बड़े-बड़े साम्राज्यों के उत्थान और पतन को पढ़ाया था। उसने सिकंदर, जूलियस सीज़र और शाहजहाँ की कहानियाँ अपनी उंगलियों पर रट रखी थीं। पर आज, इस आखिरी घड़ी में आकर उसे अहसास हुआ कि इतिहास के वे सारे पन्ने, वे सारे युद्ध, वे सारी धन-दौलत कितनी निरर्थक थीं।
इंसान पूरी जिंदगी किस चीज के लिए भागता है?

 पैसा:जो अंत में केवल बैंकों के खातों और वसीयत के कागजों में सिमट कर रह जाता है।

 पद और प्रतिष्ठा:जो रिटायरमेंट या मौत के पहले ही दिन इंसान से छीन लिए जाते हैं।

 अहंकार:जो मिट्टी की एक छोटी सी ढेरी में मिलकर राख हो जाता है।

जिंदगी का असली सच तो केवल वह 'प्रेम' है जो आपने किसी को दिया हो, या जो आपने किसी से पाया हो। वही एक शुद्ध ऊर्जा है जो आत्मा के साथ इस लोक से उस लोक तक यात्रा करती है।
सुवर्णा ने अपने कमजोर हाथों से बेड के पास रखी अपनी डायरी को छुआ। उस डायरी में उसने बीएचयू के दिनों से लेकर आज तक की अपनी पूरी अंतर्यात्रा लिखी थी। उसने मन ही मन सोचा:
"अजय और मेरा मिलना कोई इत्तेफाक नहीं था। हम तो समय की उस अनंत धारा के दो मुसाफिर थे जिन्हें कुछ समय के लिए एक साथ चलना था। हमने समाज को दिखाया कि प्रेम केवल जिस्मों का मिलन नहीं है; प्रेम तो दो आत्माओं का वह मौन समझौता है जिसमें दूर रहकर भी दूरियाँ खत्म हो जाती हैं। मैंने अपनी नौकरी की, उसने अपना फर्ज निभाया। हमने दुनिया की नजरों में सब कुछ पा लिया, पर ईश्वर की नजरों में हम कितने अमीर रहे? क्योंकि हमारे पास हमारा निश्छल प्रेम था, जिसमें कोई खोट नहीं था, कोई वासना नहीं थी।"

तभी कमरे का दरवाजा बहुत जोर से खुला।
ठंडी हवा का एक तेज झोंका कमरे के भीतर आया, जिससे टेबल पर रखी मोमबत्ती की लौ तेजी से कांपने लगी। सुवर्णा ने अपनी आँखें घुमाईं। दरवाजे पर अजय खड़ा था।
उसका सूट अस्त-व्यस्त था, बाल बिखरे हुए थे, और चेहरे पर एक आदिम भय साफ दिख रहा था—अपनी आत्मा को खो देने का भय। दीनानाथ जी जो एक कोने में बैठे थे, तुरंत खड़े हो गए। उन्होंने अजय को देखा। आज उस बूढ़े पिता के भीतर का सारा अहंकार पूरी तरह गल चुका था। उन्होंने आगे बढ़कर अजय के दोनों हाथ पकड़ लिए और बिना कुछ कहे अपना सिर अजय के हाथों पर झुका दिया। उनके आंसू अजय की हथेलियों को भिगो रहे थे। यह एक पिता का मूक पश्चाताप था, जिसके लिए किसी शब्द की आवश्यकता नहीं थी।
अजय ने धीरे से दीनानाथ जी को संभाला और उन्हें दूसरे कमरे में जाने का इशारा किया। वे चाहते थे कि समय की इस आखिरी चौखट पर, उनके और सुवर्णा के बीच कोई तीसरा न हो। दीनानाथ जी रोते हुए कमरे से बाहर निकल गए और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया।

भाग 4: अंतिम अश्रुपूर्ण मिलन — दिल की अंतिम बीप

कमरे में अब केवल अजय और सुवर्णा थे। और उनके बीच बहती हुई पंद्रह साल की वह अंतहीन जुदाई, जो अब ख़त्म होने वाली थी।
अजय भारी, कांपते कदमों से बेड की ओर बढ़े। हर एक कदम जैसे उनके जीवन के एक-एक साल का बोझ उठा रहा था। वे बेड के किनारे घुटनों के बल बैठ गए, बिल्कुल वैसे ही जैसे बीएचयू के वीटी मंदिर के लॉन में बैठते थे। उन्होंने सुवर्णा के उस ठंडे, कमजोर हाथ को अपने दोनों हाथों में ले लिया।
"सुवर्णा..." अजय की आवाज इतनी भारी थी जैसे किसी गहरे कुएँ से आ रही हो। उनकी आँखों से आंसुओं की मोटी-मोटी बूंदें लगातार गिर रही थीं।
सुवर्णा ने धीरे से अपनी आँखें पूरी खोलीं। अजय को अपने इतने करीब देखकर, उसका हाथ अपने हाथों में पाकर उसकी आँखों में एक अलौकिक, स्वर्गीय चमक लौट आई। ऐसा लगा मानो उसकी सारी बीमारियाँ, उसका सारा दर्द उस एक स्पर्श से गायब हो गया हो।
"तुम... तुम आ गए अजय... मुझे पता था... मेरी सांसें तुम्हें खींचे बिना रुक नहीं सकती थीं," सुवर्णा ने बहुत मद्धम, पर स्पष्ट आवाज में कहा। ऑक्सीजन मास्क के भीतर से उसकी सांसों की गर्माहट अजय महसूस कर सकते थे।
अजय ने उसका हाथ अपने माथे से लगा लिया। "मुझे माफ कर देना सुवर्णा! मैं अपनी जिम्मेदारियों के चक्रव्यूह में ऐसा फंसा कि तुम्हारी सुध नहीं ले सका। मैं अफसर तो बन गया, पर मैं तुम्हारे काम नहीं आ सका। इस लाल बत्ती और इस पद का मैं क्या करूँ सुवर्णा, जब मैं अपनी सबसे बड़ी खुशी को ही नहीं बचा पाया?" अजय फफक-फफक कर रो पड़े, उनका पूरा शरीर हिल रहा था।
"ना मेरे पगले... रोते नहीं," सुवर्णा ने अपने दूसरे हाथ को उठाने की कोशिश की। अजय ने तुरंत उसकी मदद की और उसके हाथ को अपने गाल पर रख लिया। सुवर्णा की उंगलियों ने अजय के आंसुओं को पोंछा। "तुमने जो किया, वही धर्म था। तुमने अपने परिवार को संभाला, अपनी बहन की डोली उठाई, अपनी माँ की अंतिम सेवा की। अगर तुम सब कुछ छोड़कर मेरे पास आ जाते, तो क्या मैं उस 'कमजोर अजय' से प्यार कर पाती? मुझे गर्व है तुम्हारे ऊपर... तुम मेरे वही स्वाभिमानी अजय हो।"
"लेकिन सुवर्णा, अब तो मैं आजाद हूँ। मेरी जिम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी हैं। अब हमारे बीच कोई दीवार नहीं है। तुम ठीक हो जाओ, हम दूर किसी शांत पहाड़ी पर चले जाएंगे... जहाँ सिर्फ तुम होगी, मैं हूँगा और विंध्याचल के झरनों जैसा संगीत होगा," अजय ने एक बच्चे जैसी मासूमियत और जिद के साथ कहा।
सुवर्णा ने आसमान की तरफ देखा, जहाँ कोहरा अब धीरे-धीरे छंट रहा था और सुबह की पहली उजली किरण खिड़की के कांच को छू रही थी।
"अजय... वह पहाड़ी... वह झरना अब इस लोक में नहीं मिलेगा," सुवर्णा की आवाज अब और धीमी, सुदूर अंतरिक्ष से आती हुई लग रही थी। "मेरा बुलावा आ चुका है। देखो... बाबूजी और तुम्हारी माँ मुझे बुला रहे हैं। वे कह रहे हैं कि तुमने अपना फर्ज पूरा कर दिया।"
"नहीं सुवर्णा! तुम नहीं जा सकतीं! डॉक्टर! डॉक्टर!" अजय व्याकुल होकर चिल्लाने लगे।
"चुप... बिल्कुल चुप," सुवर्णा ने अपनी उंगली उसके होंठों पर रख दी। "इस आखिरी वक्त को डॉक्टरों के शोर में मत गंवाओ अजय। मुझे... मुझे अपने करीब आने दो।"
अजय ने धीरे से सुवर्णा को अपनी बाहों में उठा लिया। उसका सिर अपने मजबूत, चौड़े कंधे पर रख लिया—वही कंधा जहाँ पंद्रह साल पहले उसने अस्सी घाट पर सिर रखा था। सुवर्णा ने गहरी सांस ली। उसे ऐसा सुकून मिला जो उसे दुनिया के किसी महल में नहीं मिला था।
 "कितना सुंदर है न अजय... तुम्हारी इस बंडी से आज भी वही बीएचयू की मिट्टी और पलाश के फूलों की खुशबू आ रही है... अजय... अगली बार... जब हम मिलेंगे... तो कोई समय... कोई समाज... हमारे बीच नहीं आएगा न?" उसने पूछा।

"नहीं आएगा सुवर्णा... कभी नहीं आएगा। मैं हर जनम में सिर्फ तुम्हारा इंतजार करूँगा," अजय ने उसके सिर को चूमते हुए कहा। उनके आंसू सुवर्णा के सफेद बालों में मोतियों की तरह चमक रहे थे।
मॉनिटर की बीप-बीप की आवाज़ अब बहुत धीमी और लंबी होने लगी थी। सुवर्णा की सांसों की रफ्तार मद्धम पड़ रही थी। उसने आखिरी बार अपनी आँखें खोलीं, अजय के चेहरे को जी भरकर निहारा, जैसे वह इस चेहरे को अपनी आत्मा के कैनवास पर हमेशा के लिए पेंट कर रही हो।
​...मॉनिटर की बीप-बीप की आवाज़ अब और मद्धम हो रही थी। सुवर्णा का सिर अजय के मजबूत कंधे पर टिका था। उसने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं और अजय के आंसुओं से भीगे चेहरे को देखा। उसके कांपते हुए होंठों से बहुत ही मद्धम, हवा जैसी हल्की आवाज़ निकली।
​"अजय... तुमने अपनी डायरी में मेरे लिए बहुत से विरह के गीत लिखे हैं न? मुझे पता है, तुम्हारी कविताओं में सिर्फ मेरा और तुम्हारा दर्द बहता है। पर आज... इस आख़िरी घड़ी में... मैं तुमसे बिछोह की कोई बात नहीं सुनना चाहती। मुझे एक ऐसी कविता सुनाओ अजय... जिसमें हम कभी अलग न हों... जहाँ सिर्फ तुम हो, मैं हूँ... और हमारा अंतहीन मिलन हो। सुनाओगे न मेरे कवि?" सुवर्णा की आँखों में एक याचना थी, एक पवित्र भूख थी।

​अजय ने अपने भीतर उमड़ते आंसुओं के समंदर को रोका। उन्होंने सुवर्णा के दोनों हाथों को चूमकर अपनी हथेलियों में समेटा। उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी रूह की गहराइयों से उस कविता को निकाला, जो समय, समाज और मृत्यु की सीमाओं से बहुत ऊपर थी। उन्होंने सुवर्णा के कान के पास झुककर अत्यंत काव्यात्मक और भावुक स्वर में सुनाना शुरू किया:
​अब न कोई रात होगी, अब न कोई भोर होगी,
इस मिलन की बेला में न दुनिया की कोई शोर होगी।
तुम नदी का रूप तजकर, अब समंदर हो रही हो,
मैं ठहर जाऊं जहाँ, तुम वो मुकद्दर हो रही हो।
​पलाश के उस फूल पर, जो नाम हमने था लिखा,
काल के उस चक्र से भी, वो कभी ना मिट सका।
तुम मेरी हर सांस के, भीतर सदा बहती रही,
दूर होकर भी तुम मेरे, पास ही रहती रही।
​अब न कोई फर्ज होगा, अब न कोई दीवार होगी,
इस जनम के पार अपनी, प्रीत की सरकार होगी।
मृत्यु तो बस एक झीनी, कांच की दीवार है,
इसके पार देखो सुवर्णा, सिर्फ अपना प्यार है।
​हाथ में ले हाथ तेरा, अब अनंत में चलना है,
धूप-छांव के इस जहां से, दूर हमको मिलना है।
तुम समा जाओ मुझमें, मैं तुममें खो जाऊं,
तुम बनो राधा मेरी, मैं तुम्हारा श्याम हो जाऊं।
​अब बिछड़ना ही नहीं है, यह कसम खाती है रात,
लो हमारे अंतहीन, मिलन की आई बारात...
सिर्फ तुम... सिर्फ मैं... और ये शाश्वत साथ।
​अजय की आवाज़ जैसे ही थमी, उन्होंने महसूस किया कि सुवर्णा के चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक, स्वर्गीय तृप्ति छा गई थी, जिसकी कल्पना भी इस धरती पर नहीं की जा सकती। उसके चेहरे की सारी झुर्रियाँ जैसे गायब हो गई थीं, और वह वापस बीएचयू कैम्पस की उसी बीस साल की अल्हड़, मुस्कुराती हुई सुवर्णा जैसी लग रही थी।
​"अंतहीन मिलन... सिर्फ... तुम... और... मैं..." सुवर्णा ने आखिरी बार अजय के कंधे पर अपना सिर थोड़ा और सँभाला, एक गहरी, सुखी सांस ली और उसकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
​उसकी आत्मा उस कविता के धागे को पकड़कर समय और मृत्यु के इस पार से उस पार अजय के साथ हमेशा के लिए एकाकार हो चुकी थी। अजय वैसे ही बैठे रहे, कविता के शब्द अभी भी कमरे की हवा में तैर रहे थे, और बाहर बनारस की सुबह की पहली उजली किरण ने उस शाश्वत मिलन पर अपनी मूक स्वीकृति दे दी थी।
"आई... लव... यू... अजय..."
यह उसकी आखिरी सांस थी। सुवर्णा की आँखें धीरे से बंद हो गईं। उसका हाथ, जो अजय के गाल पर था, धीरे से फिसलकर बेड पर गिर गया। मॉनिटर ने अपनी आखिरी, लंबी तान खींची—*टीइइइइइ...*
कमरे में पूर्ण, महाशून्य पसर गया।
अजय वैसे ही बैठे रहे। उन्होंने सुवर्णा के शरीर को अपनी बाहों से अलग नहीं किया। वे उसके ठंडे पड़ चुके माथे को चूमते रहे। उनकी आँखों से आंसू अब थम चुके थे, क्योंकि उनके भीतर का प्रेमी भी उस आखिरी सांस के साथ हमेशा के लिए शांत हो चुका था।
बाहर, बनारस की सुबह की पहली किरण कोहरे को चीरकर कमरे के भीतर आई और सुवर्णा के शांत, मुस्कुराते हुए चेहरे पर पड़ गई। ऐसा लग रहा था मानो वह सो रही हो और कोई बहुत खूबसूरत सपना देख रही हो। दीनानाथ जी ने जब कमरे का दरवाजा खोला, तो सामने का दृश्य देखकर वे वहीं चौखट पर बैठ गए।
विंध्याचल के जंगलों से उठी एक ठंडी हवा का झोंका खिड़की से आया और सुवर्णा की डायरी के पन्नों को पलटने लगा। डायरी का आखिरी पन्ना खुला, जिस पर लिखा था:

 "प्रेम कोई मुकाम नहीं है जहाँ पहुंचकर ठहरा जाए। प्रेम तो वह अंतहीन यात्रा है जो मृत्यु की चौखट पर खत्म नहीं होती, बल्कि वहीं से अपनी असली शुरुआत करती है। मैं जा रही हूँ, पर मैं अजय के भीतर हमेशा जिंदा रहूंगी।"
 
गंगा की लहरें और शाश्वत मौन

सुवर्णा के अंतिम संस्कार के बाद, जब उसकी राख को मणिकर्णिका घाट पर गंगा की पवित्र धारा में वि प्रवाहित कर दिया गया, अजय ने कलेक्ट्रेट से लंबी छुट्टी ले ली। उन्होंने अपनी कोठी, अपनी सरकारी गाड़ी और अपने सारे प्रशासनिक ठाट-बाट को पीछे छोड़ दिया।
अब वे रोज़ शाम को 'अस्सी घाट' की उसी सीढ़ी पर आकर बैठते थे। उन्होंने सादा सूती कुर्ता और धोती पहनना शुरू कर दिया था। उनके हाथों में अब कोई सरकारी फाइल नहीं होती थी, बल्कि उनके पास होती थी सुवर्णा की वह पुरानी डायरी।
सूरज ढल जाता, गंगा की महा-आरती शुरू होती, शंख बजते, हजारों दीये पानी में तैरते, पर अजय की नजरें सिर्फ उस पानी की लहरों पर टिकी रहती थीं। उन्हें लगता था कि हर एक लहर में सुवर्णा की हँसी गूंज रही है, हर एक दीये की लौ में उसकी भूरी आँखों की चमक है।
लोग आते, उन्हें देखते और कानाफूसी करते—"देखो, यह वही कड़क एडीएम साहब हैं न? अपनी प्रेमिका के वियोग में सन्यासी बन गए।"
पर अजय को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वे जानते थे कि वे अकेले नहीं हैं। जब भी हवा का एक ठंडा झोंका उनके चेहरे को छूता, वे अपनी आँखें बंद कर लेते और उन्हें महसूस होता कि सुवर्णा ने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया है।
यह कहानी यहाँ समाप्त नहीं होती। यह कहानी तो हर उस इंसान के दिल में एक नई शुरुआत करती है जो सच्चे प्रेम की पवित्रता पर विश्वास करता है। समाज बदल जाएगा, व्यवस्थाएं बदल जाएंगी, इतिहास के पन्ने धूल में मिल जाएंगे; पर महामना की उस बगिया से शुरू हुई और गंगा की लहरों पर समाप्त हुई अजय और सुवर्णा की यह महागाथा समय के वजूद पर हमेशा के लिए अमर रहेगी। आंसुओं की स्याही से लिखी गई यह दास्तान आने वाले कई युगों तक प्रेमियों के दिलों को झकझोरती रहेगी और उन्हें सिखाती रहेगी कि पा लेने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे में विलीन हो जाने का नाम ही 'प्रेम' है।














अस्सी तट- लहरों का विरह-राग

अस्सी तट- लहरों का विरह-राग गंगा की यह चंचल धारा, छूकर तट को मुड़ जाती है, पर अंतस की व्याकुलता में, ये मिलने को अकुलाती है। वीचि-वीचि में क...