गीत गजल जो रच न पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।

गीत गजल जो रच न पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।

शब्दों के पैमाने लेकर आज मिले हो मैखाने में
गीत गजल जो रच ना पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।

अनगिन लोग यहाँ मिलते हैं भावों का घट ले फिरते हैं
अंतस के सूने भावों को कुछ कहते हैं कुछ सुनते हैं
फिर भी कितने शब्द बिछड़ कर रह जाते हैं वहीं कहीं पर
जिनको मन ढूँढा करता है आशाओं में यहीं कहीं पर
जो भावों को समझ न पाये मोह भला उनसे क्यूँ करना
गीत गजल जो रच ना पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।

ऐसे कितने जीवन भी हैं पथ आसान नहीं जिनका
ऐसे कितने सपने भी हैं पलकों को भान नहीं जिनका
ऐसे जीवन के सपनों को छोड़ भला क्या रह पाओगे
छूट गिरा जो स्वप्न पलक से दर्द भला क्या सह पाओगे
जो स्वप्न सजे ही नहीं पलक पर चाह भला फिर क्यूँ करना
गीत गजल जो रच ना पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।

मौन पथ पर जीवन के माना चला रहा अब तक अकेला
कहो कौन है दुनिया में ऐसा मौन पल जिसने न झेला
अब तुम कहो है कौन ऐसा जिसने बस जीवन में पाया 
तुम ही कहो है कौन ऐसा कुछ भी नहीं जिसने गँवाया
खोना पाना रीत जगत की मोह यहाँ फिर क्यूँ कर करना
गीत गजल जो रच ना पाओ अफसोस यहाँ फिर क्यूँ करना।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       24जुलाई, 2022

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