उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।

उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।

उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ
कैसे बीत रहे हैं पल छिन कैसे मैं बतलाऊँ।।

आभासी हो गये सभी पल पास नहीं कुछ अपने
भोर नहीं होने पाए थे टूटे सारे सपने
पलकों ने था लाख सँभाला रोक नहीं पर पाये
आँसू बन सब शब्द गिरे अधरों को नहलाये
अधरों के उस कंपन को अब कैसे मैं समझाऊँ
उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।

कितना कुछ था कहने को पर तुमसे कह ना पाये
भावों का आँगन सूना था तुम बिन रह ना पाये
जाने थे वो कैसे बंधन जिसने मन उलझाया
जाने मन उन दहलीजों को लाँघ नहीं क्यूँ पाया
घुटी-घुटी थी चीख कंठ में कैसे कहो सुनाऊँ
उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।

कर लेता स्वीकार सभी आरोप लगे जो मुझपर
सह लेता मैं दंड सभी वो, जो तुम देती हँसकर
होती नहीं शिकायत जग से शिकवा क्यूँ कर करता
जो तुम मुझसे कह देती सब बात हृदय की खुलकर
कितने मन के दर्पण टूटे कैसे मैं दिखलाऊँ 
उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।

अपने मन की आहों को अब कैसे तुम सहती हो
बस इतना बतला दो कैसे मेरे बिन रहती हो
क्या अब भी बागों में कोयल कुहुक-कुहुक गाती है
क्या अब भी तेरी साँसों से मेरी खुशबू आती है
तुम बिन जीवन के प्रश्नों का उत्तर कैसे पाऊँ
उलझे-उलझे पल जीवन के कैसे मैं सुलझाऊँ।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        01सितंबर, 2022

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