लेखक परिचय



लेखक परिचय

अजय कुमार पाण्डेय

30 जुलाई 1974 को उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जनपद में जन्मे अजय कुमार पाण्डेय वर्तमान में हैदराबाद (तेलंगाना) में निवासरत हैं। भारतीय रेल के सिकंदराबाद मंडल, दक्षिण मध्य रेलवे में मेल एक्सप्रेस ट्रेन मैनेजर के पद पर कार्यरत रहते हुए भी साहित्य-साधना उनके जीवन का अभिन्न अंग रही है।

कविता, गीत, मुक्तक, छंद, खण्डकाव्य तथा भावप्रधान गद्य उनकी सृजन-यात्रा के प्रमुख आयाम हैं। उनके गीत-संग्रह "कुछ तुम चलो कुछ हम चलें" तथा "देख संध्या ढल रही है" साहित्य प्रेमियों के बीच विशेष रूप से सराहे गए हैं। इसके अतिरिक्त उनका चर्चित खण्डकाव्य "राधेय" भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय मूल्यों और कर्ण के व्यक्तित्व को नई दृष्टि से प्रस्तुत करता है।

साहित्य एवं समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है, जिनमें हिन्दी साहित्य वैभव सम्मान, रेड डायमंड अचीवर अवार्ड, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सम्मान, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रीय पुरस्कार, यशपाल साहित्य सम्मान, महात्मा गांधी ग्लोबल पीस अवार्ड, महाकवि नीरज सम्मान, पंडित रामनरेश त्रिपाठी सम्मान तथा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर स्मृति सम्मान प्रमुख हैं।

वे अवध चेतना मंच सोसाइटी, हैदराबाद के संस्थापक सदस्यों में से हैं तथा साहित्य और समाज सेवा के विविध आयामों में निरंतर सक्रिय हैं।

"अमलतास के आँसू" उनकी संवेदनशील लेखनी का एक ऐसा उपन्यास है, जो प्रेम, विरह, स्मृतियों और जीवन के अनकहे सत्य को भावनाओं की गहनता के साथ पाठकों तक पहुँचाने का विनम्र प्रयास है।





दीप उजाले के

दीप उजाले के 

उठो कि अब इतिहास नया लिखने का मौसम आया है,
सत्य पराजित हो सकता है, पर हार कभी न पाया है।
टूटे हुए विश्वासों में फिर से प्राण फूंकने आए हैं,
हम दीप उजाले के बनकर अँधियार मिटाने आए हैं।

सिंहासनों ने जब-जब जनता का स्वप्न जलाया है,
तब-तब किसी दीप ने तम का अभिमान झुकाया है।
पीड़ा की मौन नदी में जो आँसू बहते रहते हैं,
वे ही कल के सूरज बनकर हर अँधियारा ढहते हैं।।

हम पीड़ा की हर मौन नदी का गीत सुनाने आये हैं, 

काले बादल बनकर छाई छल की गहरी परछाईं,
सत्य खड़ा है पथ के कोने ओढ़े अपनी तन्हाई।
लेकिन नभ के अंतिम तारे ने मुझसे यह कहा अभी,
अँधियारे के भाग्य में नहीं लिखी हुई है विजय अभी।

हम नभ के अंतिम तारे का अहसास जगाने आये हैं,

वन की निर्जन साँसों में भी विद्रोहों की गाथा है,
हर झरने के गायन में अब परिवर्तन की आशा है।
श्रम के हाथों से रोटी को जो छीन रहे हैं युग-युग से,
उनकी नींव हिलाती आई जन-पीड़ा ही युग-युग से।

हम श्रम की उस रोटी को फिर अधिकार दिलाने आये हैं,

अब चंदा की शीतल किरणों में अंगारों की भाषा है,
सूरज के रथ पर बैठी अब जनमन की अभिलाषा है।
सदियों से जो मौन खड़े थे अब वे भी स्वर दोहराएँगे,
हर टूटे बिखरे विश्वासों के दीप पुनः फिर जल जाएँगे।

हम अँधियारे को दूर हटा नव ज्योति जलाने आये हैं 
हम दीप उजाले के बनकर, अँधियार मिटाने आए हैं।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मिलन का क्षण

मिलन का क्षण 

नील गगन की मौन शिला पर यादों ने कुछ चित्र उकेरे,
निशि की नीरव छाया में थे सपनों के दीपक के घेरे।
मलय पवन के कोमल कर ने अलकों को जब-जब सहलाया,
सूने मन के निर्जन वन में भावों का सागर लहराया।

शशि किरणों के रजत पंख पर कुछ स्वप्न सुनहरे लहर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।

नियती की धूमिल रेखा कब संयोगों को रहने देती,
मधुऋतु के नव पल्लव में भी पतझर को वैभव दे देती।
जब स्मृतियों के दीप जलाकर ये रजनी काटी जाती है,
मन की मौन गुफाओं में बस यादों की ध्वनियाँ आती हैं।

तम के सागर में खोकर भी आशा के दीपक निखर गये, 
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।

हर आँसू इक सर्ग बन गया हर इक धड़कन गुणगान हुई,
पीड़ा की चिर तप्त धरा पर विरह वेदना वरदान हुई।
जो गीत कंठ में ठहर गये निस्तब्ध गगन अब गाता है,
पलकों के मानसरोवर में वो गीतों को नहलाता है।

स्मृतियों के निर्जन उपवन से अब जाने कितने पहर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 


मोहक छवि

मदिर नयन के आलोड़न से मन मधुमास जगाती हो।
स्मृतियों को महक बनाकर इस मन को सदा लुभाती हो।
मोहक तेरी छवि ने छूकर मन को यूँ सहलाया है,
सूनी जीवन-वीणा में तुम मधुरिम राग सुनाती हो।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मदिर नयन के आलोड़न से मन मधुमास उतरता है,
स्मृतियों के भोलेपन से उर का हर कोना भरता है।
मोहक तेरी छवि ने छूकर मन को यूँ सहलाया है 
सूनी जीवन-वीणा में भी प्रेमिल स्वर झंकृत करता है॥

अमर पहचान दे दें

 अमर पहचान दे दें

इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें,
अनकही इस गीतिका को इक नई पहचान दे दें।
जो ह्रदय में बह रही है मूक भावों की त्रिवेणी,
आज उस अंतर्ध्वनी को प्रीति का पैगाम दे दें।

शशि-किरण के जाल में है बँध गया आलोक सारा,
मौन के संसर्ग में है बह रही रस-धार धारा।
चुप खड़े हैं विटप सारे स्तब्ध है यह नील अंबर,
घुल रही है श्वास में अब नेह की नूतन धरोहर।

इस समर्पण के क्षणों को शाश्वती आयाम दे दें,
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।

है समय की चाल चंचल स्वप्न ओझल हो न जाएँ,
भोर की सिंदूरी बेला में कहीं ये खो न जाएँ।
ओस के कल्पित दृगों में वेदना का मंत्र जागा,
तारिका की अल्पना से प्राण का अनुबंध जागा।

इस क्षणिक अनुरागनी को हम नई पहचान दे दें, 
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।
द्वैत का अस्तित्व खोए अद्वैत की पावन घड़ी,
दो मनों के मध्य देखो हैं नेह की कड़ियाँ जुड़ी।
तुम समर्पण की ऋचा बन मैं प्रणय का गीत गाऊँ,
साँस के इन रेशमों में मैं मिलन के भाव लाऊँ।

आ चलो अनुरागिनी को भक्ति का ही नाम दे दें,
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।

मिट रहा है द्वैत का पट सत्य एकाकार होता,      
आधरों के मौन में फिर शब्द अपना भार खोता।    कह रही है शून्य में साँसों का धीमा सा मर्मर,    
खो न जाए इस निशा में रश्मियों की शुभ्र निर्झर।

आ चलो व्याकुल घड़ी को शाश्वती विश्राम दे दें, 
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।
अनकही इस गीतिका को इक नई पहचान दे दें,
हाँ अमर पहचान दे दें एक पावन नाम दे दें।

✍️अजय कुमार पाण्डेय


निशब्द

निशब्द 

नि:शब्द अधर हैं नयन मगर, संवाद नया दे जाते हैं।
मन के निर्जन उपवन में वे, मधुमास नया दे जाते हैं।
शब्दों की सीमित सीमा में, ये प्रेम कहाँ बँध पाता है,
चुप रहकर भी हृदय-गगन में आकाश नया दे जाते हैं।

मिलो जो तुम तो लफ़्ज़ों को नया एक साज़ मिल जाए,
दबी जो दिल में है मुद्दत से फिर आवाज़ मिल जाए।
मगर तुम दूर रहकर भी जो हमें निःशब्द करते हो,
कभी ऐसे भी आओ कि मौन को आवाज मिल जाये।

उजालों का आह्वान

उजालों का आह्वान

लेकर नवल प्रभात-किरण हम गाँवों के उस छोर चलें,
चलो उजालों को बाँहों में भर फिर अपनी ओर चलें।
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
जहाँ मौन एकाकी पन में लघु विस्मृत सी बस्ती है,
नित अम्बर के सूनेपन में सिसक-सिसक कर हँसती है।
दौड़ रही ये अंधी सड़कें निजता को पहचान रहीं,
पर गाँवों की पगडंडी शहरों का जीवन दान रहीं।
महानगर के कोलाहल तज झंकारों की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
सूख रही हैं बावड़ियाँ सब रोते हैं ताल-तलैया,
मूर्छित हुई धरा की माटी क्षीण हुई बरगद छइयाँ।
सूनी-सूनी राहें हैं सूने-सूने उत्सव सारे,
मौन पड़े खलिहान सभी चौपालों के टूटे तारे।
कंक्रीटों के तहखानों से फिर प्रकृति की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
मात्र शहर की मृगतृष्णा से, क्या वैभव आ पायेगा?
जो खलिहानों से विमुख हुआ जीवन कैसे पायेगा?
जर्जर तृण-कुटीर से अब भी निश्छल प्रेम प्रवाहित है,
अंचल में जिसके जन्मे हम माटी हृदय लुभाती है।
लोभ-मोह के कंचन तज सदव्यवहारों की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

कुछ कहना है

कुछ कहना है 

कल तक जो कुछ मौन रहा था, 
उसको स्वर में बहना है,
अंतस का दीपक दहना है, 
आज अभी फिर कहना है।

पीत अमलतासों की छाया, 
पथ पर मधु बरसाती है,
मलय-पवन की कोमल चिट्ठी, 
तेरा नाम सुनाती है।
फिर स्मृतियों के नील गगन में, 
नव अरुणोदय गहना है,
नव आशाओं को सजना है, 
आज अभी फिर कहना है।


झील-तटों की शांत लहर पर, 
स्वप्न सुनहरे विचर रहे,
अनदेखे से मधुर मिलन के, 
भाव हृदय में ठहर रहे।
पलकों पर जो रुका हुआ है, 
गीतों में वो ढलना है,
गीतों में मोती गुहना है, 
आज अभी फिर कहना है।

चंद्र-किरण के रजत कणों ने, 
रजनी को नहलाया है,
तारों ने भी मौन नयन से, 
पथ का मन सहलाया है।
मन-वीणा के सुप्त तार को, 
मधुर राग में बजना है,
मधुर यामिनी को सजना है, 
आज अभी फिर कहना है।

जीवन के निर्जन उपवन में,
फिर वसंत मुस्काया है,
सूखे पत्तों ने आशाओं से, 
नव परिधान सजाया है।
प्रेम-धरा के हर कण में अब, 
स्वर्णिम सौरभ रहना है,
नव गीत प्रेम का रचना है, 
और नहीं कुछ कहना है।

✍️ अजय कुमार पाण्डेय

अमलतास

अमलतास 

स्वर्णिम शाखों पर किसने यह
मधु-मुस्कान सजाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से 
ऋतु ने छवि बिखराई है।

मधु-ऋतु की मृदु हँसी सुनहरी
पथ-पथ झरती जाती है,
स्मृति की कोमल श्यामल छाया
मन-वीणा खनकाती है।
निशि के नीरव प्रहरों में भी
आशा दीप जलाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से 
ऋतु ने छवि बिखराई है।

सौरभ की निस्तब्ध लहर पर
किसका स्नेह तिराता है,
किस प्रियतम के मधुर मिलन से
अंतर आज नहाता है।
पात-पात पर स्वर्ण स्वप्न की
मंगल रेखा छाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से 
ऋतु ने छवि बिखराई है।

बादल के आँचल से झाँके
चंद्र-किरण मुस्काती है,
सूनी पगडंडी पर खुशियाँ 
पायल ध्वनि लहराती है।
दूर क्षितिज के धूमिल वन में
नई भोर मुस्काई है,
अमलतास के पीत पुष्प से 
ऋतु ने छवि बिखराई है।

जब-जब मलय पवन बहती है,
स्वर्णिम राग जगाती है,
हर डाली के पीत अधर पर
मधु गाथा लिख जाती है।
जीवन के निर्जन उपवन में
बासंती ऋतु आई है,
अमलतास के पीत पुष्प से 
ऋतु ने छवि बिखराई है।

स्वर्णिम शाखों पर किसने यह
मधु-मुस्कान सजाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से 
ऋतु ने छवि बिखराई है।

✍️ अजय कुमार पाण्डेय

प्रिये तुम अनंत का मधुर काव्य

प्रिये तुम अनंत का मधुर काव्य
तुम विस्मृत सपनों की आभा, मैं अलसित भोर विहँसता हूँ,
तुम नील गगन की शुचि करुणा, मैं चातक नित्य तरसता हूँ।
देख हृदय की सौम्य चपलता, दर्पण तुमसे शर्माता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।

नव किसलय का अंचल धारी, मलयज समीर ये डोल रहा,
अधरों की लाली को छूकर, वह मूक प्रणय-सुर बोल रहा।
नयनों में कज्जल-मेघ प्रिये, ज्यों सावन की घनी रात है,
जो साँस-साँस में गूँज रही, युग-युग की अनकही बात है।

प्रिय पलकों के मृदु कंपन से, मन में सावन अकुलाता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।

पद-चाप तुम्हारी सुन वन में, कलियाँ चुपचाप विकसती हैं,
कंचन काया को छूने को, ये तारा-तरणि तरसती हैं।
तुम मौन समर्पण की मूरत, मैं शाश्वत विरह-विराग प्रिये,
तुम वीणा की झंकार मधुर, मैं अंतर्मन का राग प्रिये।
मदिर मधुर मन मोहित महिमा, मन मानस गीत सुनाता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।

सिंदूरी संध्या के पल में, शशि रश्मि जाल फैलाती है,
सिंधु हृदय के व्याकुल पन में, आशाएँ स्वप्न सजाती हैं।
मिट जाए नश्वर जग चाहे, प्रेम हमारा अमर रहेगा,
पावन मन के मंदिर में प्रिय, नाम तुम्हारा सदा रहेगा।

मलय पवन के आलोड़न में, ये मन मधुमास सजाता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

ओसबूँद

ओसबूँद 

छोड़ चली अम्बर का आँचल, आई बहती धरा-धाम पर,
सतरंगे सपनों को बुनती, ओस-कणों के स्वच्छ नाम पर।
पहचान भले छोटी इसकी, पर जग की प्यास बुझाती है,
यह जलबिंदु सृष्टि के भीतर, नव-जीवन मंत्र जगाती है।

हरी घास की मखमली सेज पर रात ढले आकर सोती,
सूरज की प्रथम किरण से ये , चकाचौंध का बनती मोती।
क्षणभंगुर अस्तित्व है इसका, अनुपम रूप अनूठा पाती,
क्षणभर के इस छोटे तन में, मधुर मिलन का राग सुनाती।

नदियों की लहरों में मिलकर, सागर की गोदी में गिरती,
अपनी हस्ती को खोकर फिर, गहरे नीले जल में मिलती।
जो घट में भर जाए शीतल, नयनों से बहती तो सावन,
सूखे अधरों पर मुस्काये, तृप्त करे अंतस का उपवन।

लघुता में सामर्थ्य छुपाकर, चट्टानों की छाती चीरे,
तपकर रवि की प्रखर आँच में, उड़ती नभ को धीरे-धीरे।
मिट-मिटकर फिर से बन जाना, इसकी ही है अमर कहानी,
कण-कण में जो प्राण फूँक दे, ओसबूँद वह अनुपम पानी।

 ✍️अजय कुमार पाण्डेय


सच के मुँह पर ताला

सच के मुँह पर ताला 

सच के मुँह पर जब ताला होगा,
तब झूठ का ही बोलबाला होगा।

मन का अंबर जब सूना होगा 
फिर कमरे में कहाँ उजाला होगा।

रिश्तों की कश्ती तब डूबेगी,
जब नफ़रत का बहता नाला होगा।

ग़ैरों से शिकवा क्या करना जब,,
खंजर अपनों ने सम्भाला होगा।

कोई उम्मीद करे इंसाफ की कैसे, 
जब कातिल ही रखवाला होगा।

यूँ ही नहीं गिरी नैतिकता,
कोई सिक्का कहीं उछाला होगा।

'देव' उनका झुकना ये जतलाता है,
मौसम चुनाव का आनेवाला होगा।


अस्सी तट- लहरों का विरह-राग


अस्सी तट- लहरों का विरह-राग

गंगा की यह चंचल धारा, छूकर तट को मुड़ जाती है,
पर अंतस की व्याकुलता में, ये मिलने को अकुलाती है।
वीचि-वीचि में कंपित-शिल्पित, सुंदर सा मुखड़ा दिखता है,
जल की हर चंचल लहरों पर, विरह-काव्य कोई लिखता है।

गंगा की चंचल लहरों में इक आभास बहा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

शीतल मंद सुवासित मारुत, सुलग रही अंगारे जैसी,
घाटों की यह मरण-शरण भी, आज हुई चौबारे जैसी।
दीप तैरते जो लहरों पर, वे हर साँसों की राहत हैं,
सुलग रहे कुछ डूब रहे हैं, अरु कुछ यादों की चाहत हैं।

कोई मौन सुरीला झोंका, अंतस को हुलसा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

आरती की घंटियों में भी, गूँज रही है तान रुहानी,
अस्सी के एकांत क्षितिज पर, मौज लिख रही नई कहानी।
मज्जन करती दुनिया सारी, अपना अंतस धोने आती,
पर विरह-अग्नि की यह ज्वाला, कब गंगा-जल से बुझ पाती।

मौजों की मद्धम धारा से नव संगीत लिखा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

तुम पावन गंगा की धारा, मैं एक किनारे का पत्थर,
तुम लहरों का मधुर गीत हो, मैं हूँ सदियों का अंतर।
लहरों की यह मदिर चपलता, बस एक बहाना लगती है,
रात विरह की अस्सी तट पर, मुसकाती सिसकी लगती है।

अस्सी तट की विरह रात में इक अहसास जगा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।


दूर नदी के तटबंधों पे, ये रात अकेली रोती है,
हर आहट पे मधुर मिलन की, उम्मीदें मन में बोती है।
लौटोगे किस मोड़ प्रिये तुम, यही पूछने लहरें आती,
लेकिन तटबंधों को छूकर, चुपचाप स्वयं ही बह जाती।

मौन हृदय के आलोड़न से नव मधुमास रचा जाता है,
सिक्त रेत पर मौन प्रतीक्षा का इतिहास लिखा जाता है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा

 स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा

स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर,
बूँद पलकों के कोरों पे जब भी रुके उनको मन में सजाता रहा रात भर।

दूर जब भी हुए पास महसूस कर, एक साया गले से लगाता रहा,
एक खामोश आहट की आवाज़ पर, रात भर द्वार मन का सजाता रहा,
जो नहीं आ सके तो उनकी महक, साँस में बन के खुशबू महकती रही,
मौन को चीर कर इक मधुर रागिनी, चाँदनी रात में भी चहकती रही।

द्वार अहसास का खुला छोडकर दीप उम्मीद का जलाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।

याद की धूप ने जब जलाया कभी, अश्रु की छाँव का ही सहारा मिला,
दर्द की रेत पर जब भी भटका यहाँ, आपकी याद से ही किनारा मिला।
राह मुश्किल थी पर हर कदम पर मुझे, रूप तेरा ही रस्ता दिखाता रहा,
दूरियों में भी सदा पास महसूस कर, एक साया गले से लगाता रहा।

परछाइयाँ याद की खो न जाये कहीं, दीपक जलाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।


गीत अधरों पे जब मौन हो के रुके, नाम हर पंक्तियों ने तुम्हारा लिया,
पृष्ठ पर जिंदगी के रुकी जब कलम, तब तेरे गीत ने ही सहारा दिया।
वक़्त का कारवाँ रुका जब कहीं, याद की खिड़कियाँ स्वयं खुलने लगीं,
मौन अँधियारे में खो गयी थी कहीं, उम्मीद की दीपिका फिर से जलने लगी।


आस के मोतियों से पिरो गीत की पंक्तियों को लुभाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

दो किनारों के बीच

 दो किनारों के बीच
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी,
सांसों की कच्ची डोरी पर, यह कैसी आन पड़ी।
इधर महकती यादें हैं, उधर मौन का डेरा है
बीच भँवर अपना जीवन, संझा है न सवेरा है।
दूर क्षितिज को आँखें तकती यादों की किसे पड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।

खिले फूल की खुशबू कहती, पल भर का साथ यहाँ,
शीशे जैसे रिश्ते नाते ,है गहरा आघात यहाँ।
एक हाथ में खुशियाँ हैं, दूजे में है वीराना,
यहाँ अकेले आये सारे और अकेले जाना।
मिट्टी के इस महल में फिर भी उम्मीदों की झड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।
वक्त की बहती धारा में, एक दिन अब बह जाना,
राजा हो या रंक यहाँ, हाथ नहीं कुछ आना।
जो कल अपना लगता था, वो बेगाना मोड़ हुआ,
अपने मन का दर्पण ही सूनेपन का तोड़ हुआ। 
पलकों पर है स्वप्न सजे पर बेड़ी है पाँव पड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।
फिर क्यूँ ना इस पल को हम सब जी भर के अपना लें,
मौत अटल है इस जीवन में फिर क्यूँ ना इसको गा लें।
जब तक सुर हैं कंठ सजे गा लो हर पल राग नया, 
कल का क्या भरोसा है, जाने कब हो अंत गया।
गीतों के नर्म छाँव में यादों की है मौन लड़ी,
इधर झूम के गाये जिंदगी, उधर है मौत खड़ी।

मुक्तक

सच की लौ बुझती नहीं लाख हवाएँ आयें। आँधियाँ झूठ की टकरायें या चली जायें। ये महल झूठ के एक रोज गिरेंगे खुद ही, हौसला साथ तो पत्थर भी पिघलते ज...