स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर,
बूँद पलकों के कोरों पे जब भी रुके उनको मन में सजाता रहा रात भर।
दूर जब भी हुए पास महसूस कर, एक साया गले से लगाता रहा,
एक खामोश आहट की आवाज़ पर, रात भर द्वार मन का सजाता रहा,
जो नहीं आ सके तो उनकी महक, साँस में बन के खुशबू महकती रही,
मौन को चीर कर इक मधुर रागिनी, चाँदनी रात में भी चहकती रही।
द्वार अहसास का खुला छोडकर दीप उम्मीद का जलाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।
याद की धूप ने जब जलाया कभी, अश्रु की छाँव का ही सहारा मिला,
दर्द की रेत पर जब भी भटका यहाँ, आपकी याद से ही किनारा मिला।
राह मुश्किल थी पर हर कदम पर मुझे, रूप तेरा ही रस्ता दिखाता रहा,
दूरियों में भी सदा पास महसूस कर, एक साया गले से लगाता रहा।
परछाइयाँ याद की खो न जाये कहीं, दीपक जलाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।
गीत अधरों पे जब मौन हो के रुके, नाम हर पंक्तियों ने तुम्हारा लिया,
पृष्ठ पर जिंदगी के रुकी जब कलम, तब तेरे गीत ने ही सहारा दिया।
वक़्त का कारवाँ रुका जब कहीं, याद की खिड़कियाँ स्वयं खुलने लगीं,
मौन अँधियारे में खो गयी थी कहीं, उम्मीद की दीपिका फिर से जलने लगी।
आस के मोतियों से पिरो गीत की पंक्तियों को लुभाता रहा रात भर,
स्वप्न को गीत की पंक्तियों में सजा स्वयं को ही सुनाता रहा रात भर।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद