सँभल जाये

सँभल जाये

तुझको देखे न तो  मचल जाये
देख ले तुझको तो सँभल जाये

यूँ तो सँभले हैं गिर-गिर के यहाँ
तू जो देखे तो फिर फिसल जायें

बाँध रक्खा है यहाँ ख्वाहिशें कितनी
तू जो कह दे तो सब निकल जायें

जब से देखा है तुम्हें दूर हुआ है खुद से
तू जो मिल जाये तो ये भी मिल जाये

यूँ तो मुश्किल है बदलना इसको
तुझको पाए तो फिर बदल जाये

क्या पता दूर कहाँ तक अँधेरी गलियाँ
साथ जो चल दे  शमा खिल जाये

"देव" बिखरा है कई बार जमाने में 
तू जो दे हाथ तो सँभल जाये

✍️©अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
       21नवंबर, 2023

करवा चौथ

करवा चौथ

अच्छा लगता संग तुम्हारे आसमान को तकना
अच्छा लगता प्रिये मुझे बस साथ तुम्हारे रहना

एक जनम क्या जनम-जनम का रिश्ता तेरा-मेरा
अच्छा लगता प्रिये मुझे बस तुमसे जुड़ कर रहना

तन भी सुंदर मन भी सुंदर सुंदरता की मूरत हो
अच्छा लगता प्रिये देखना तुमको ऐसे सजना

छत पर रात चाँद देखना धीरे से मुस्काना
अच्छा लगता प्रिये तुम्हारा फिर से दुल्हन बनना

छलनी के पीछे चुपके से नयनों का मुस्काना
अच्छा लगता अर्पित जल से व्रत का पारन करना

प्रेम भावना त्याग समर्पण विश्वासों की डोरी
अच्छा लगता प्रिये हमारे रिश्ते का यूँ बढ़ना

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        02नवंबर, 2023


ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं  तुझे यादों में मिलता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुझे मैं ख़त में लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं ​ तेरा चेहरा ही ब...