कुछ मालूम नहीं।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
email-ajaykpandey197494@gmail.com
माँ का दरबार।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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विजयादशमी- आवाहन।
विजयादशमी- आवाहन।
आओ फिर कण कण में देखो पूण्य बेला खो रही
ढल रही है दीप्ति सारी धवल किरण है खो रही।
आज दिनकर भी धरा पर शांत है अब हो रहा
चांदनी का नेह शीतल जाने कैसे खो रहा।
प्रभु राम क्या तुमको हमारी याद अब आती नहीं
या हमारी प्रार्थना अब तुमतक पहुंच पाती नहीं।
हो गयी क्या भूल हमसे जो धरा को भूल गए
या यहां के त्रास में वो अहसास सारे भूल गए।
है नहीं अब और कोई ना ही कोई आस है
अंधड़ों का दौर दिखता, न दिख रहा प्रभात है।
आज हर मोड़ पे सीतायें कितनी विलख रहीं
उनके हृदय की वेदना आंखों से है छलक रही।
आ भी जाओ अब प्रभु एक तुमसे आस है
छोड़ तुम सकते नहीं हमको यही विश्वास है।
वेदना जब जब सतायी याद तुम आये प्रभु
अंधकार जब भी बढ़ा, प्रकाश तुम लाये प्रभु।
ये ना सोचो राष्ट्र तुमको भूल सकता है कभी
आज जो जीवन मिला है वो आपका ही है प्रभु।
अपने ही तो कहा था आप आओगे वहां
धर्म पर जहां चोट होगी आप जाओगे वहां।
आपके आने में प्रभु अभी और कितनी देर है
दुर्भाग्य है कैसा यहां या वक्त का ये फेर है।
दर्द में सब जी रहे हैं संजीवनी बस आप हो
इस देह रूपी पंचपात्र की आचमनी आप हो।
आज मानव ज्ञान, गुण, सम्मान सारा खो रहा
ऐसा लगता सत्य का अपमान है अब हो रहा।
आज कैसा वक्त है और कैसी आयी ये घड़ी
जिस तरफ भी देखिए निज स्वार्थ की सबको पड़ी।
ऐसे इन हालात में सब सम्मान सारे खो रहे
आपने जो भी बनाया प्रतिमान सारे खो रहे।
जो आ नहीं सकते प्रभु तो हमको ऐसी शक्ति दो
सम्मान फैले बस मनुज का हमको ऐसी भक्ति दो।
है यही विनती हमारी अब इसे स्वीकार करो
अवतरण हो ज्ञान का सबका प्रभु उद्धार हो।
धर्म की स्थापना हो, प्रेम हो कण कण यहां
ज्ञान का विस्तार हो धाम बन जाये जहां।।
✍️©अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
25अक्टूबर,2020
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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इक कसक।
इक कसक।
जो गुनगुनाया ना गया
वो राग बन गया हूँ मैं।
जल के भी जो ना बुझी
वो आग बन गया हूँ मैं।।
जिधर भी देखो धुंध का
इक आवरण लिपटा हुआ
दर्द भी नासूर बनकर
अब मौन है, चिपटा हुआ।
अपने ही इस देह में
वनवास बन गया हूँ मैं।
जल के भी जो ना बुझी
वो आग बन गया हूँ मैं।।
सूर्य से पहले सफर में
हर बार मैं तो चल पड़ा
साथ ना आया कोई
था देर तक फिर भी खड़ा।
जिंदगी में इंतज़ार की
पहचान बन गया हूँ मैं।
जल के भी जो ना बुझी
वो आग बन गया हूँ मैं।।
जज्बात की रौ में बह
फिर मौन जब कुछ कह उठा
रिश्ते कुछ ऐसे बुझे
बस थोड़ा सा धुंआ उठा।
बच गए जज्बातों की
राख बन रह गया हूँ मैं।
जल के भी जो ना बुझी
वो आग बन गया हूँ मैं।।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
24अक्टूबर,2020
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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विश्वास नहीं खोना।
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दहेज-एक अभिशाप।
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यूँ ही पाया तो क्या पाया।
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तुम आकार बने।
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फिर सोचना होगा।
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देश।
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आज कहना होगा।
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आभास तुम्हारा होता है।
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माँ तेरे दर पर आया हूँ।
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वोट की ताकत।
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मन होना नहीं उदास यहां।
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झुलसाया है इतना
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मेरा तो इतिहास बना।
मेरा तो इतिहास बना।
व्यथा लिखा जब जब पन्नों पर
इक नूतन अहसास लिखा।
मिली कहानी औरों को, पर
मेरा तो इतिहास बना।।
जीवन अपना मैंने खोया
पाप-पुण्य का बोझा ढोया
जीवन के आंगन में मैंने
पाया वैसा, जैसा बोया।
पाप पुण्य की गठरी लादे
मैंने बस अहसास लिखा।
मिली कहानी औरों को, पर
मेरा तो इतिहास बना।।
सबकी इच्छाओं की खातिर
अश्रु आचमन बहुत किया
आहुति देकर अपना जीवन
अमृत संग-संग गरल पिया।
तपकर जीवन की बेदी पर
मैंने इक विश्वास बुना।
मिली कहानी औरों को, पर
मेरा तो इतिहास बना।।
तोड़ चुका बंधन अब सारे
अहसानों का क्षोभ नहीं
ना ही कोई चाहत बाकी
और मुझे कोई लोभ नहीं।
जीवन के इस मौन सफर में
मैंने अपना मान लिखा।
मिली कहानी औरों को, पर
मेरा तो इतिहास बना।।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
14अक्टूबर,2020
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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फैली हों अपनी राहें।
फैली हों अपनी राहें।
चलो चलें उस ओर जहां तक
फैली हों अपनी राहें
चलो चलें हम आज वहां तक
फैलाकर अपनी बाहें।
चंद पलों के जीवन सारा
अवसादों में ना तोलो
मिलो आज तुम सबसे खुलकर
दिल की सारी बातें बोलो।
जब नेपथ्य में नहीं, कुछ भी
फिर क्यूँ आज झुकी निगाहें।
चलो चलें उस ओर जहां तक
फैली हों अपनी राहें।।
सीमित संसाधन हैं अपने
माना सब कुछ पास नहीं
मगर हौसलों की पाँखी है
थकने का अहसास नहीं।
लिए हौसले आज चलें तो
निकलेंगी नूतन राहें।
चलो चलें उस ओर जहां तक
फैली हों अपनी राहें।।
जीवन सारा खिल जाएगा
सपना भी सब मिल जाएगा
हँसकर जब इक बार उठेगा
उपवन सारा खिल जाएगा।
सपनीली इस दुनिया की
तब होंगी तेरी ओर निगाहें।
चलो चलें उस ओर जहां तक
फैली हों अपनी राहें।।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
14अक्टूबर,2020
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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इतना यकीं करो अपने पर।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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गीतों में मैं गाता हूँ।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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कैसे सुनाऊं कोई गीत तुमको।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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दिख रहा प्रभात है।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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अंबर में अब भी लाली है।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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फिर तुम कैसे पाओगे।
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के नींद से उठकर के
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राष्ट्रनीति के भाव जगाओ।
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चैन।
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स्थिर बनकर के रहना है।
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विकल मन।
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चुप को हथियार बना।
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जागो हे भारत।
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मन तो चातक ठहरा।
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इंतजार-आखिर कब तक।
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धैर्य व संयम।
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नव निर्माण का स्वप्न।
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तुझको ही प्यार करूं।
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सुहाने तराने सुनाओ।
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ओझल यहां उजाले हैं।
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तुमसे वादा मेरा।
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मुक्त गगन के पंछी हम।
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दिन बीते जाते हैं।
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बसा ले मुझको।
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जाना है कहाँ।
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बाकी है।
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झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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संगीत भर दिया।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
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टूटे दिल की पीड़ा।
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के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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लम्हे कब आएंगे।
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अब जग गया हूँ।।
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मैं लोकतंत्र बोल रहा हूँ।
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सूरज और जनता।
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हिंदी भारत की भाषा।
हिंदी भारत की भाषा।
हिंदी भारत की भाषा है
हिंदी ही हिंदुस्तान है।
हर भाषा से प्रेम सिखाती
सर्वोत्तम इसका स्थान है।
आदिकाल से हिंदी ने
जन जन में प्रेम जगाया है
संपर्क बनी जन मानस की
हर दिल में भाव जगाया है।
तुलसी, सूर, कबीर, रसखान
सबने हिंदी को अपनाया है
अपनी रचनाओं से सारे
जग में प्रकाश फैलाया है।
बिहारी, केशव, मीरा ने भी
हिंदी को अपनाया है
अपने भक्ति के गीतों से
प्रेम भाव समझाया है।
युगों युगों से लड़ती आयी
कितने ही तूफानों से
अटल अकंटक डटी रही
कैसे भी अंजामों से।
सब धर्मों औ ग्रंथों का
हिंदी से भाई चारा है
सबने इसको है अपनाया
औ इसको ही स्वीकारा है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
सबसे इसका नाता है
इसको सारे ही भाते हैं
सब इसको अपनाते हैं।
आओ इसका सम्मान करें
ये भारत की भाषा है
हिंदी है अभिमान हमारा
ये भारत की अभिलाषा है।
✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
13सितंबर,2020
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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रात का अंतिम पहर।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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रोटी की चाहत।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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जनमत के सरोकार।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
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के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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प्रतिवाद जरूरी है।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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खुद से प्यार करो।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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साथी की भी सुन लेना।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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प्रतीक्षा।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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स्वार्थ से लोभ।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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प्रत्यंचा।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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मील का पत्थर।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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मन के पट खोल।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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धीरे धीरे पांव बढ़ाये जा।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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सूरज भी है ढलता।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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गांव की खुशबू।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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मुझे याद है जरा जरा।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
मेरी सभी रचनाओं का सर्वाधिकार सुरक्षित है।
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बिटिया को आशीष।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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तुम्हारी याद।
राष्ट्रनीति का वाहक, एक राष्ट्र श्रेष्ठ राष्ट्र का समर्थक, बेबाकी से दिल की बातों को कहता हूँ।
झुलसाया है इतना
वक्त के थपेड़ों ने
के नींद से उठकर के
अब जग गया हूँ।।
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