प्रतीक्षा।

प्रतीक्षा               

मौन प्रतीक्षारत जीवन
करता है स्वीकार यहां
पंथ चुनौती देता है
कर लो आंगिकार यहां।

इक विश्वास उमड़ता हर पल
पल पल प्रति जीवन पथ पर
और खींचता जाता हमको
मंगलकारी जीवन पथ पर।

जीवन अपना रेल की तरह
साथ-साथ चलते हैं सुख-दुःख
अगणित पड़ाव मिलते पथ में
पर जीवन नहीं बदलता रुख।

ठहरा जो भी पथ में इसके
लोक उसे फिर भुला है
चलना जिसने स्वीकार किया
जग की बाहों में झूला है।

ठहरे पल में रुक जाता है
हो जाता है जीवन वंचित
चलता रहता जो इस पथ में
धैर्य, पुण्य करता वो संचित।।

✍️©️अजय कुमार पाण्डेय
    हैदराबाद
    20अगस्त, 2020

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