गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में

गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में

गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में,
मौन बैठे गीत मेरे, वेदना की हर कली में।

स्वप्न सारे धूल ओढ़े, राह में सोते मिले हैं,
दीप सब उम्मीद मन के, आँधियों से ही छले हैं।
पंक्तियों के मध्य की भी, शून्यता कुछ कह रही है,
कौन आकर फिर जलाए, आस ये जो बुझ रही है।

रात ठहरी है उदासी, अश्रु हैं हर इक गली में।गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में।

दर्द ने जब गीत गाया, पंक्तियों में रक्त रोया,
भाव की निर्झर धरा ने, मौन का आकाश बोया।
कौन समझे मन यहाँ अब, कौन पढ़ पाए व्यथा को,
कौन समझेगा यहाँ अब, धूल खाती इस कथा को।

भीड़ होकर भी खड़े हैं, लोग अपनी ही गली में।गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में।

थाम मन विश्वास फिर भी, सत्य दीपक ले चला है,
चल रहा है राह अपनी, आँधियों ने पर छला है।
एक दिन मुस्कान फिर भी, फूल बनकर खिल उठेगी,
रोकते हैं आज जिसको, कल कहानी फिर कहेगी।

भोर उतरेगी स्वयं ही, रात की अंतिम गली में,  गूँजते हों पीर चाहे , आज शब्दों की गली में।


✍️अजय कुमार पाण्डेय 




शायरी

शायरी 

सियासत बिक रही है आज हर इक मोड़ पर खुलकर,
वतन के दर्द पर भी लोग सौदा कर रहे देखे।

जो कल तक देश की ख़ातिर कसम खाया करते थे,
वही कुर्सी की ख़ातिर आज झुकते जा रहे देखे।

हवा ऐसी चली, सच बोलना भी जुर्म ठहरा अब,
झूठ के दरबार में सच को तड़पते देखा है।

रिश्तों की भीड़ में तन्हा खड़ा था एक सच्चा दिल,
सभी अपने थे लेकिन सब किनारा कर गए।

वफ़ाओं की किताबों में कई पन्ने अधूरे हैं,
जिसे अपना समझ बैठे, वही धोखा लिख गया।

गरीबों की दुआओं से जिन्हें ऊँचाइयाँ मिलतीं,
वही महलों में जाकर उनकी बस्ती भूल बैठे।

सियासत ने अजब अंदाज़ से तक़सीम कर डाला,
पड़ोसी भी पड़ोसी से सवालों में बँट गया।

मुकद्दर से नहीं हारे, न आँधियों से शिकस्ता थे,
हमें अपनों की ख़ामोशी ने आखिर तोड़ डाला।

अदालत से बड़ी अब हो गई है भीड़ की आवाज़,
कई निर्दोष चेहरों को सज़ाएँ मिल गईं।

ज़माने ने सिखाया है मुखौटे ओढ़कर जीना,
यहाँ चेहरों से ज़्यादा लोग किरदार बदलते हैं।

जिसे ईमान समझकर उम्र भर सीने से रखा था,
वही सिक्कों की खनक पर हाथ अपना छोड़ बैठा।

नज़र में आदमी छोटा नहीं, सोचें हुई हैं छोटी,
इसी कारण मोहब्बत के नगर वीरान होते हैं।

हर इक रिश्ते के पीछे आज मतलब मुस्कुराता है,
कहाँ वो दौर था जब दिल से दिल का सिलसिला होता।

सलीके से जिन्होंने ज़िंदगी भर सच की बात कही,
उन्हीं के नाम पर सबसे अधिक पत्थर उछाले गए।

ग़रीबी रोज़ मरती है अमीरों की तरक्की में,
कोई आँकड़ों में खुश है, कोई रोटी ढूँढ़ता है।

बहुत आसान है इल्ज़ाम देना बेगुनाहों पर,
मुश्किल है आईने में ख़ुद का चेहरा देख पाना।

चराग़ों को बुझाने का हुनर सब सीख बैठे हैं,
मगर कोई अँधेरों से लड़ना नहीं चाहता।

बिछड़कर भी तुम्हारी याद का मौसम नहीं बदला,
मगर तुमने तो जैसे उम्र भर पहचान ही बदली।

जो अपनों के लिए हर दर्द हँसकर पी गया था,
उसी को आख़िरकार सबसे ज़्यादा दर्द मिला।

अभी उम्मीद ज़िंदा है, अभी ईमान बाकी है,
अँधेरों की हुकूमत है, मगर सूरज भी आएगा।

अजनबी- शायरी

अजनबी- शायरी 

अच्छा ही था जो हम अजनबी थे कभी,
रिश्तों ने फ़ासलों को भी दर्द बना दिया।

रिश्तों की धूप में जब उम्मीदें पिघल गईं,
तब छाँव भी मिली तो सुकून न मिल सका।

जो लोग हर घड़ी वफ़ा की मिसाल थे,
वक़्त आया तो वही सबसे पहले बदल गए।

दिल ने जिन्हें ख़ुद से भी बढ़कर अज़ीज़ रखा,
वो नाम तक हमारा बड़ी आसानी से भूल गए।

रिश्तों का बोझ ढोते-ढोते ये समझ आया,
हर साथ चलने वाला हमसफ़र नहीं होता।

इल्ज़ाम देने वालों की भीड़ कम न थी,
सच बोलने वालों का मगर काफ़िला कम था।

हमने तो दिल के दरवाज़े खुले ही रखे,
लोग आए, ठहरे, और हमें तन्हा कर गए।

कुछ रिश्ते आईने थे, कुछ धुएँ के घर निकले,
जिसे अपना समझा, वही सबसे बेख़बर निकले।

अब किसी से गिला नहीं, न कोई शिकायत है,
अब खुद से मोहब्बत है, खुद से ही बगावत है।

अजनबी रहना शायद बेहतर ही होता,
रिश्तों ने अक्सर अपनों से ही दूर कर दिया।

मुक्तक

सच की लौ बुझती नहीं लाख हवाएँ आयें।
आँधियाँ झूठ की टकरायें या चली जायें।
ये महल झूठ के एक रोज गिरेंगे खुद ही,
हौसला साथ तो पत्थर भी पिघलते जायें।

हर तरफ चेहरा वही दिल तो मगर पत्थर है।
नेह की नदियाँ भी तो अब सूख के बंजर हैं।
स्वार्थ की आँधी में कुछ ऐसे धँसे जाते हैं,
होंठों पर राम भले जेबों में पर खंजर है।

जिसने काँटों में सदा फूल ही बाँटे सबको।
दर्द अपने ही पिए और सुख लुटाए सबको।
जिसे दुनिया ने सदा गैर समझकर ठुकराया,
फिर भी उसने ही दिए प्रेम के साए सबको॥
 
ये वक्त की चाल कहाँ एक-सी रही है सदा।
हर रात के बाद नई भोर निकलती है सदा ।
ये सत्य के पाँव भले देर से मंज़िल छू लें,
मगर झूठ की दौड़ में साँस उखड़ती है सदा।
 
दीप जलते ही रहे आँधियों के घर में भी मगर।
और गीत गूँजे हैं दर्द भरे स्वर में भी अकसर।
हार को जीत बनाया है जहाँ साहस मन का,
फूल सी हो जाती है तब शूल से भरी ये डगर।


ग़ज़ल- मनाने वाला



ग़ज़ल- मनाने वाला 

सिलसिला खत्म हुआ रूठों को मनाने वाला,
सच को सच और झूठ को झूठ बताने वाला।

अब कहाँ मिलते हैं रिश्तों को मनाने वाले,
हर तरफ़ दिखता है मतलब ही निभाने वाला।

अब तो हर दर्द नासूर बना जाता है 
अब नहीं मिलता है ज़ख्म सहलाने वाला।

जब अँधेरों ने शहर भर को बना डाला अपना,
दीप बनकर न मिला कोई राह दिखाने वाला।

लोग चेहरों की चमक देख के बहके ऐसे,
रह गया दूर ही किरदार बचाने वाला।

वक्त ने छीन लिया हौसला सच कहने का,
अब नहीं है कोई आईना दिखाने वाला।

दिल की बस्ती में अजब ख़ामुशी उतरी ऐसी,
घर में रहता है मगर कौन बुलाने वाला।

'देव' उम्मीद का दीपक तो जलाए रखना,
फिर भी आ सकता है इस दिल को मनाने वाला।

आईना हैरान रहता है

आईना हैरान रहता है 

अब तो आईना भी देख कर हैरान रहता है,
हर चेहरे में कोई छुपा अरमान रहता है।

रिश्तों की दुकानों में सब कुछ बिक रहा खुलकर,
अब तो हर मुस्कान के पीछे कोई सामान रहता है।

जब स्वार्थ की धूपें हर आँगन में उतरती हों,
तब प्रेम का हर वृक्ष भी वीरान रहता है।

रिश्ते भी जब लगाने लगें एक दूसरे की कीमत,
घर होकर भी हर दिल बहुत सुनसान रहता है।

सच बोलने वालों को मिलती हैं सज़ाएँ अकसर,
झूठों का मगर हर ओर सम्मान रहता है।

इंसाँ ही इंसाँ से अब इतना दूर हो बैठा है,
हर भीड़ के भीतर बड़ा श्मशान रहता है।

दौलत की चमक जब आँखों को अँधेरा दे दे,
तब आदमी होकर भी अनजान रहता है।

मत ढूँढ़ वफ़ा हर मोड़ पर इस दौर-ए-हाज़िर में,
अब तो आईना भी ये देख कर हैरान रहता है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

बादल और वर्षा

बादल और वर्षा

किस नभ से घिर आए बादल, श्यामल स्वप्न सजाए हैं।
किसके विरह-भरे उच्छ्वासों ने, मेघ यहाँ पहुँचाए हैं।
मौन दिशाएँ ध्यानमग्न हैं, पवन सुनाए मधुर तान,
सावन प्रिय का संदेशा बन, ले आया नव मधु-गान।

नील गगन की वीणा बजती, झंकृत होते मधुर राग।
दामिनि की चंचल मुस्कानों में, झलके विरह-मिलन अनुराग।
हरित लताओं के उर भीतर, जागी मधुमय अभिलाषा,
बूँद-बूँद में उतर रही है, जीवन की नव मधुभाषा।

पहली बूँद गिरी धरती पर, पुलक उठा सारा संसार।
तृषित धरा ने जैसे पाया, अमृत का अनुपम उपहार।
पल्लव-पल्लव हँसते डोले, कलियाँ गाएँ मधुर तान,
प्रकृति ज्यूँ लिखने बैठी हो, प्रेम-विरह का मदिर गान।

पीपल की हर डाल झूमती, लेकर नव उलास अपार।
कोयल ने भी खोल दिये फिर, मधुर स्वर का कोषागार।
सरिता के उर उमड़ी लहरें, गाने लगीं जीवन-गीत,
मेघ-बूँद के नेह मिलन से, पुलक उठा यह जग अतीत।

हे वर्षा! अपने कमलों से, मन का सारा मल धो दो।
सूखे अंतस-वन में आकर, फिर नव प्रेम-सुमन बो दो।
जब तक मेघ गगन में छाएँ, जीवित रहती है आशा,
हर तम के आँचल में छिपती, उषा सुनाती नव भाषा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

गीत — "साँझ ढले पर प्राण न माने"



गीत — "साँझ ढले पर प्राण न माने"

साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।

सूनी राहें पूछ रही हैं,
किसके पग की आस बसी है।
बुझते दीपक की लौ जैसे,
मन में तेरी प्यास बसी है।
नींद रूठकर दूर खड़ी है,
नयनों का विराम न जाने।।

साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।

चंदा भी अब फीका लगता,
तारों में वह बात कहाँ है।
तेरे बिना हर फूल अधूरा,
मौसम में बरसात कहाँ है।
धड़कन हर पल तेरा नाम ले,
दिल अपना अंजाम न जाने।।

साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।

पत्र लिखे थे अश्रु स्याही,
हवा उन्हें पढ़कर रो आई।
तेरे मिलने की इक आशा,
अब तक मन में दीप जलाए।
टूटे सपनों की इन किरचों का,
दर्द कभी आराम न जाने।।

साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।

यदि मिलना इस जन्म न लिखा,
अगले जन्म पुकारेंगे।
प्रेम अगर सच्चा है अपना,
फिर हर बंधन हारेंगे।
तन मिट जाए, समय बदल जाए,
सच्चा प्रेम अवसान न जाने।।

साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।

ग़ज़ल- कौन हमारा है

ग़ज़ल

क्या कहें कि कौन अब हमारा है,
ग़ैर तो ग़ैर, अपनों ने भी मारा है।

फूल राहों में बिछाए थे हमने जिनके,
आज उन्हीं हाथों में पत्थर ही सारा है।

जिसको सीने से लगाकर उम्र भर सींचा,
अब उसी शाख़ से टूटा हुआ नज़ारा है।

दर्द जब हद से गुज़रकर मुस्कुराने लगे,
तब समझ लेना कि दिल कितना बेचारा है।

जिसने हर मोड़ पर रिश्ते ही निभाए दिल से,
उसके हिस्से में फ़क़त अश्कों की धारा है।

हमने तूफ़ान से लड़ने की क़सम क्या खाई,
हर किनारे ने कहा, दूर ही किनारा है।

जिसने हर मोड़ पर रिश्तों को बचाना चाहा,
हर किसी ने यही समझा कि वो बेचारा है।

अब किसी नाम से क्या उम्मीद रखेगा कोई,
अब हर नया चेहरा भी इक और किनारा है।

ज़ख़्म इतने हैं कि अहसास भी पत्थर-सा हुआ,
दिल धड़कता तो है, लेकिन वो बड़ा हारा है।

वक़्त ने छीन लिए ख़्वाब, रिश्ते भी मगर,
हौसलों का मगर बाक़ी अभी सितारा है।

'देव' सच की हिफ़ाज़त का यही इनाम मिला,
ये सर झुकाया नहीं, इसलिए ही ये ख़सारा है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मन से कभी न हारूँगा

मन से कभी न हारूँगा 

आँधी चाहे प्रलय मचाए, दीप नहीं बुझने दूँगा।
घोर अँधेरा राह रोक ले, पग फिर भी बढ़ने दूँगा।
धैर्य बनेगा ढाल सदा ही, विजय स्वयं मुस्काएगी।
सत्य रहेगा साथ हमारे, किस्मत भी झुक जाएगी।

लक्ष्य मिले या देर लगे मै अपना सब कुछ वारूँगा, 
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

टूटे चाहे स्वप्न हजारों, फिर नव स्वप्न सजाऊँगा।
सूखे उपवन की डाली पर, आशा-पुष्प खिलाऊँगा।
श्रम की बूँदें व्यर्थ न होगी, मंजिल पास बुलाएगी।
धैर्य लगन की ज्योति निरंतर, जीवन राह दिखाएगी।

अपने श्रम के बल पर जग में, नव इतिहास बनाऊँगा,
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

विपदा यदि पर्वत बन जाए, उसको भी ललकारूँगा।
अग्निपथों की तपती धारा, हँसकर स्वयं निहारूँगा।
संघर्षों का एक-एक क्षण, ओज नया भर जाएगा।
साहस का विश्वास अटल हो, भाग्य स्वयं झुक जाएगा।

गिरकर फिर उठने की खातिर, संकल्पों को धारूँगा 
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

काँटे स्वागत में बिछ जायें, उनको फूल बनाऊँगा।
घाव समय जितने भी देगा, उनसे सीख उठाऊँगा।
हर ठोकर वरदान बनेगी, राह नई खुल जाएगी।
दृढ़ संकल्पों की नौका भी, हर धारा तर जाएगी।

सत्य पथों की धूल समेटे, जीवन सदा सँवारूँगा,
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

जरा देर लगेगी


जरा देर लगेगी 

चश्मा आँखों से हटेगा, ज़रा देर लगेगी,
धुंध छँट कर के रहेगा, ज़रा देर लगेगी।

झूठ का शोर अभी तो चौराहों पे रुका है,
सच मगर घर-घर कहेगा, ज़रा देर लगेगी।

ताज वालों ने उजालों को गिरवी रखा है भले,
नया सूरज फिर से उगेगा, ज़रा देर लगेगी।

भूख के हाथों में अब भी है पसीने की कमाई,
हक़ का दरिया फिर से बहेगा, ज़रा देर लगेगी।

रोटियों से खेलेंगे सियासत के तमाशे कब तक,
ये मुखौटा भी गिरेगा, ज़रा देर लगेगी।

रिश्तों के बाज़ार में हर चेहरा सौदे में मिला है,
आदमी फिर आदमी बनेगा, ज़रा देर लगेगी।

भीड़ के नारों में दबकर जो सोया है अभी तक,
वह स्वयं ही जाग कर के उठेगा, ज़रा देर लगेगी।

मौन का दर्द यूँ ही व्यर्थ नहीं होता देव,
अन्याय ये भी ढहेगा, ज़रा देर लगेगी।

वक़्त लिखता है हमेशा फ़ैसला कर्मों के हक़ में,
हर हिसाब सबका मिलेगा, ज़रा देर लगेगी।

✍️अजय कमार पाण्डेय 

सत्य ही लिखती रहे

सत्य ही लिखती रहे 

चल पड़े जब पग हमारे फिर व्यथा से क्यों डरूँ,
राह की अब मुश्किलों से फिर भला अब क्यों टरूँ।
है नहीं कुछ मोह मन को, जीत हो या हार हो,
कर्म के इस पुण्य पथ में एक-सा व्यवहार हो।

कर रहे हैं पग हमारे पंथ का श्रृंगार जब,
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की।
सत्य का संबल लिये बढ़ते रहें अविराम हम,
क्या पड़ी अब सोचने की लाभ या आघात की।

धूप ने जितना तपाया, देह ये कुंदन हुई,
आँधियों में जब घिरी है देह ये चंदन हुई।
जो है झुका सिद्धांत पर वो जिया तो क्या जिया,
जो अड़ा सत्यार्थ में उसने युगों को पा लिया। 

लक्ष्य से पहले न रुकना, यह प्रणों का धर्म है,
शूल हों या फूल हों ये कर्म ही बस धर्म है।
आज का संघर्ष ये मौन हो जितना जलेगा,
कल यही अंगार बन मौन अंतस में खिलेगा।

पंथ चाहे हो कठिन पदचिह्न मिट सकते नहीं,
कर्म की पदधूलि के ये छाप मिट सकते नहीं। 
हार केवल देह की, संकल्प कब हारा भला,
सत्य के पथ पर चला जो स्वयं से वो ही मिला। 

फिर जीत का अभिमान क्या हार का संताप क्या,
चल पड़े जो धर्मपथ पर और फिर प्रतिघात क्या।
प्राण है जब तक कलम में सत्य ही लिखती रहे,
कर्म ही आराध्य हो जब और फिर सौगात क्या।

✍️अजय कुमार पाण्डेय


मानसून


मानसून 

नील गगन की मौन शिला पर, मेघों ने संदेश लिखा,
प्यासी धरती के आँचल में, सावन ने परिवेश लिखा।

दूर क्षितिज की धुँधली रेखा, स्वप्निल होकर गाती है,
बूढ़े पीपल की हर डाली, नव यौवन अपनाती है।
शुष्क अधर पर बूँदों ने यूँ, प्रथम प्रणय का स्पर्श दिया,
सोई-सोई धड़कन को फिर, जीवन का उत्कर्ष दिया।

मंद पवन की उँगली थामे, भीनी-भीनी गंध चली,
वन की वीणा के तारों पर, मधुरिम पौन फुहार चली।
मोर मुकुट-सा नाच रहा है, पुलकित वन की साँस चली।
प्रकृति स्वयं आरती लेकर, मेघ-मुकुट की आस चली।

किसने आँसू मोती करके, नभ के आँचल में टाँके,
किसने विरही मन की पीड़ा, वर्षा-बिंदु बना आँके।
हर बूँदों में स्नेह धरा का, भूली स्मृतियाँ जाग चलीं।
टूटे सपनों की राखों से, नूतन कलियाँ जाग चलीं।

मौसम का ये रूप सुहाना, जीवन का संगीत बने,
टूटे मन के आँगन का ये, फिर से पावन मीत बने।
जब तक इस धरती पर मानव, प्रेम-सुधा का प्यासा है,
तब तक तेरी हर रिमझिम में, ईश्वर का ही वासा है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
    हैदराबाद 

लेखक परिचय



लेखक परिचय

अजय कुमार पाण्डेय

30 जुलाई 1974 को उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जनपद में जन्मे अजय कुमार पाण्डेय वर्तमान में हैदराबाद (तेलंगाना) में निवासरत हैं। भारतीय रेल के सिकंदराबाद मंडल, दक्षिण मध्य रेलवे में मेल एक्सप्रेस ट्रेन मैनेजर के पद पर कार्यरत रहते हुए भी साहित्य-साधना उनके जीवन का अभिन्न अंग रही है।

कविता, गीत, मुक्तक, छंद, खण्डकाव्य तथा भावप्रधान गद्य उनकी सृजन-यात्रा के प्रमुख आयाम हैं। उनके गीत-संग्रह "कुछ तुम चलो कुछ हम चलें" तथा "देख संध्या ढल रही है" साहित्य प्रेमियों के बीच विशेष रूप से सराहे गए हैं। इसके अतिरिक्त उनका चर्चित खण्डकाव्य "राधेय" भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय मूल्यों और कर्ण के व्यक्तित्व को नई दृष्टि से प्रस्तुत करता है।

साहित्य एवं समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है, जिनमें हिन्दी साहित्य वैभव सम्मान, रेड डायमंड अचीवर अवार्ड, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सम्मान, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रीय पुरस्कार, यशपाल साहित्य सम्मान, महात्मा गांधी ग्लोबल पीस अवार्ड, महाकवि नीरज सम्मान, पंडित रामनरेश त्रिपाठी सम्मान तथा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर स्मृति सम्मान प्रमुख हैं।

वे अवध चेतना मंच सोसाइटी, हैदराबाद के संस्थापक सदस्यों में से हैं तथा साहित्य और समाज सेवा के विविध आयामों में निरंतर सक्रिय हैं।

"अमलतास के आँसू" उनकी संवेदनशील लेखनी का एक ऐसा उपन्यास है, जो प्रेम, विरह, स्मृतियों और जीवन के अनकहे सत्य को भावनाओं की गहनता के साथ पाठकों तक पहुँचाने का विनम्र प्रयास है।





दीप उजाले के

दीप उजाले के 

उठो कि अब इतिहास नया लिखने का मौसम आया है,
सत्य पराजित हो सकता है, पर हार कभी न पाया है।
टूटे हुए विश्वासों में फिर से प्राण फूंकने आए हैं,
हम दीप उजाले के बनकर अँधियार मिटाने आए हैं।

सिंहासनों ने जब-जब जनता का स्वप्न जलाया है,
तब-तब किसी दीप ने तम का अभिमान झुकाया है।
पीड़ा की मौन नदी में जो आँसू बहते रहते हैं,
वे ही कल के सूरज बनकर हर अँधियारा ढहते हैं।।

हम पीड़ा की हर मौन नदी का गीत सुनाने आये हैं, 

काले बादल बनकर छाई छल की गहरी परछाईं,
सत्य खड़ा है पथ के कोने ओढ़े अपनी तन्हाई।
लेकिन नभ के अंतिम तारे ने मुझसे यह कहा अभी,
अँधियारे के भाग्य में नहीं लिखी हुई है विजय अभी।

हम नभ के अंतिम तारे का अहसास जगाने आये हैं,

वन की निर्जन साँसों में भी विद्रोहों की गाथा है,
हर झरने के गायन में अब परिवर्तन की आशा है।
श्रम के हाथों से रोटी को जो छीन रहे हैं युग-युग से,
उनकी नींव हिलाती आई जन-पीड़ा ही युग-युग से।

हम श्रम की उस रोटी को फिर अधिकार दिलाने आये हैं,

अब चंदा की शीतल किरणों में अंगारों की भाषा है,
सूरज के रथ पर बैठी अब जनमन की अभिलाषा है।
सदियों से जो मौन खड़े थे अब वे भी स्वर दोहराएँगे,
हर टूटे बिखरे विश्वासों के दीप पुनः फिर जल जाएँगे।

हम अँधियारे को दूर हटा नव ज्योति जलाने आये हैं 
हम दीप उजाले के बनकर, अँधियार मिटाने आए हैं।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मिलन का क्षण

मिलन का क्षण 

नील गगन की मौन शिला पर यादों ने कुछ चित्र उकेरे,
निशि की नीरव छाया में थे सपनों के दीपक के घेरे।
मलय पवन के कोमल कर ने अलकों को जब-जब सहलाया,
सूने मन के निर्जन वन में भावों का सागर लहराया।

शशि किरणों के रजत पंख पर कुछ स्वप्न सुनहरे लहर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।

नियती की धूमिल रेखा कब संयोगों को रहने देती,
मधुऋतु के नव पल्लव में भी पतझर को वैभव दे देती।
जब स्मृतियों के दीप जलाकर ये रजनी काटी जाती है,
मन की मौन गुफाओं में बस यादों की ध्वनियाँ आती हैं।

तम के सागर में खोकर भी आशा के दीपक निखर गये, 
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।

हर आँसू इक सर्ग बन गया हर इक धड़कन गुणगान हुई,
पीड़ा की चिर तप्त धरा पर विरह वेदना वरदान हुई।
जो गीत कंठ में ठहर गये निस्तब्ध गगन अब गाता है,
पलकों के मानसरोवर में वो गीतों को नहलाता है।

स्मृतियों के निर्जन उपवन से अब जाने कितने पहर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 


मोहक छवि

मदिर नयन के आलोड़न से मन मधुमास जगाती हो।
स्मृतियों को महक बनाकर इस मन को सदा लुभाती हो।
मोहक तेरी छवि ने छूकर मन को यूँ सहलाया है,
सूनी जीवन-वीणा में तुम मधुरिम राग सुनाती हो।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

मदिर नयन के आलोड़न से मन मधुमास उतरता है,
स्मृतियों के भोलेपन से उर का हर कोना भरता है।
मोहक तेरी छवि ने छूकर मन को यूँ सहलाया है 
सूनी जीवन-वीणा में भी प्रेमिल स्वर झंकृत करता है॥

अमर पहचान दे दें

 अमर पहचान दे दें

इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें,
अनकही इस गीतिका को इक नई पहचान दे दें।
जो ह्रदय में बह रही है मूक भावों की त्रिवेणी,
आज उस अंतर्ध्वनी को प्रीति का पैगाम दे दें।

शशि-किरण के जाल में है बँध गया आलोक सारा,
मौन के संसर्ग में है बह रही रस-धार धारा।
चुप खड़े हैं विटप सारे स्तब्ध है यह नील अंबर,
घुल रही है श्वास में अब नेह की नूतन धरोहर।

इस समर्पण के क्षणों को शाश्वती आयाम दे दें,
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।

है समय की चाल चंचल स्वप्न ओझल हो न जाएँ,
भोर की सिंदूरी बेला में कहीं ये खो न जाएँ।
ओस के कल्पित दृगों में वेदना का मंत्र जागा,
तारिका की अल्पना से प्राण का अनुबंध जागा।

इस क्षणिक अनुरागनी को हम नई पहचान दे दें, 
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।
द्वैत का अस्तित्व खोए अद्वैत की पावन घड़ी,
दो मनों के मध्य देखो हैं नेह की कड़ियाँ जुड़ी।
तुम समर्पण की ऋचा बन मैं प्रणय का गीत गाऊँ,
साँस के इन रेशमों में मैं मिलन के भाव लाऊँ।

आ चलो अनुरागिनी को भक्ति का ही नाम दे दें,
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।

मिट रहा है द्वैत का पट सत्य एकाकार होता,      
आधरों के मौन में फिर शब्द अपना भार खोता।    कह रही है शून्य में साँसों का धीमा सा मर्मर,    
खो न जाए इस निशा में रश्मियों की शुभ्र निर्झर।

आ चलो व्याकुल घड़ी को शाश्वती विश्राम दे दें, 
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।
अनकही इस गीतिका को इक नई पहचान दे दें,
हाँ अमर पहचान दे दें एक पावन नाम दे दें।

✍️अजय कुमार पाण्डेय


निशब्द

निशब्द 

नि:शब्द अधर हैं नयन मगर, संवाद नया दे जाते हैं।
मन के निर्जन उपवन में वे, मधुमास नया दे जाते हैं।
शब्दों की सीमित सीमा में, ये प्रेम कहाँ बँध पाता है,
चुप रहकर भी हृदय-गगन में आकाश नया दे जाते हैं।

मिलो जो तुम तो लफ़्ज़ों को नया एक साज़ मिल जाए,
दबी जो दिल में है मुद्दत से फिर आवाज़ मिल जाए।
मगर तुम दूर रहकर भी जो हमें निःशब्द करते हो,
कभी ऐसे भी आओ कि मौन को आवाज मिल जाये।

उजालों का आह्वान

उजालों का आह्वान

लेकर नवल प्रभात-किरण हम गाँवों के उस छोर चलें,
चलो उजालों को बाँहों में भर फिर अपनी ओर चलें।
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
जहाँ मौन एकाकी पन में लघु विस्मृत सी बस्ती है,
नित अम्बर के सूनेपन में सिसक-सिसक कर हँसती है।
दौड़ रही ये अंधी सड़कें निजता को पहचान रहीं,
पर गाँवों की पगडंडी शहरों का जीवन दान रहीं।
महानगर के कोलाहल तज झंकारों की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
सूख रही हैं बावड़ियाँ सब रोते हैं ताल-तलैया,
मूर्छित हुई धरा की माटी क्षीण हुई बरगद छइयाँ।
सूनी-सूनी राहें हैं सूने-सूने उत्सव सारे,
मौन पड़े खलिहान सभी चौपालों के टूटे तारे।
कंक्रीटों के तहखानों से फिर प्रकृति की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
मात्र शहर की मृगतृष्णा से, क्या वैभव आ पायेगा?
जो खलिहानों से विमुख हुआ जीवन कैसे पायेगा?
जर्जर तृण-कुटीर से अब भी निश्छल प्रेम प्रवाहित है,
अंचल में जिसके जन्मे हम माटी हृदय लुभाती है।
लोभ-मोह के कंचन तज सदव्यवहारों की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में

गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में, मौन बैठे गीत मेरे, वेदना की हर कली में। स्वप्न सारे धू...