गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में
गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में,
मौन बैठे गीत मेरे, वेदना की हर कली में।
स्वप्न सारे धूल ओढ़े, राह में सोते मिले हैं,
दीप सब उम्मीद मन के, आँधियों से ही छले हैं।
पंक्तियों के मध्य की भी, शून्यता कुछ कह रही है,
कौन आकर फिर जलाए, आस ये जो बुझ रही है।
रात ठहरी है उदासी, अश्रु हैं हर इक गली में।गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में।
दर्द ने जब गीत गाया, पंक्तियों में रक्त रोया,
भाव की निर्झर धरा ने, मौन का आकाश बोया।
कौन समझे मन यहाँ अब, कौन पढ़ पाए व्यथा को,
कौन समझेगा यहाँ अब, धूल खाती इस कथा को।
भीड़ होकर भी खड़े हैं, लोग अपनी ही गली में।गूँजती है पीर कैसी, आज शब्दों की गली में।
थाम मन विश्वास फिर भी, सत्य दीपक ले चला है,
चल रहा है राह अपनी, आँधियों ने पर छला है।
एक दिन मुस्कान फिर भी, फूल बनकर खिल उठेगी,
रोकते हैं आज जिसको, कल कहानी फिर कहेगी।
भोर उतरेगी स्वयं ही, रात की अंतिम गली में, गूँजते हों पीर चाहे , आज शब्दों की गली में।
✍️अजय कुमार पाण्डेय