बादल और वर्षा

बादल और वर्षा

किस नभ से घिर आए बादल, श्यामल स्वप्न सजाए हैं।
किसके विरह-भरे उच्छ्वासों ने, मेघ यहाँ पहुँचाए हैं।
मौन दिशाएँ ध्यानमग्न हैं, पवन सुनाए मधुर तान,
सावन प्रिय का संदेशा बन, ले आया नव मधु-गान।

नील गगन की वीणा बजती, झंकृत होते मधुर राग।
दामिनि की चंचल मुस्कानों में, झलके विरह-मिलन अनुराग।
हरित लताओं के उर भीतर, जागी मधुमय अभिलाषा,
बूँद-बूँद में उतर रही है, जीवन की नव मधुभाषा।

पहली बूँद गिरी धरती पर, पुलक उठा सारा संसार।
तृषित धरा ने जैसे पाया, अमृत का अनुपम उपहार।
पल्लव-पल्लव हँसते डोले, कलियाँ गाएँ मधुर तान,
प्रकृति ज्यूँ लिखने बैठी हो, प्रेम-विरह का मदिर गान।

पीपल की हर डाल झूमती, लेकर नव उलास अपार।
कोयल ने भी खोल दिये फिर, मधुर स्वर का कोषागार।
सरिता के उर उमड़ी लहरें, गाने लगीं जीवन-गीत,
मेघ-बूँद के नेह मिलन से, पुलक उठा यह जग अतीत।

हे वर्षा! अपने कमलों से, मन का सारा मल धो दो।
सूखे अंतस-वन में आकर, फिर नव प्रेम-सुमन बो दो।
जब तक मेघ गगन में छाएँ, जीवित रहती है आशा,
हर तम के आँचल में छिपती, उषा सुनाती नव भाषा।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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