अब तो आईना भी देख कर हैरान रहता है,
हर चेहरे में कोई छुपा अरमान रहता है।
रिश्तों की दुकानों में सब कुछ बिक रहा खुलकर,
अब तो हर मुस्कान के पीछे कोई सामान रहता है।
जब स्वार्थ की धूपें हर आँगन में उतरती हों,
तब प्रेम का हर वृक्ष भी वीरान रहता है।
रिश्ते भी जब लगाने लगें एक दूसरे की कीमत,
घर होकर भी हर दिल बहुत सुनसान रहता है।
सच बोलने वालों को मिलती हैं सज़ाएँ अकसर,
झूठों का मगर हर ओर सम्मान रहता है।
इंसाँ ही इंसाँ से अब इतना दूर हो बैठा है,
हर भीड़ के भीतर बड़ा श्मशान रहता है।
दौलत की चमक जब आँखों को अँधेरा दे दे,
तब आदमी होकर भी अनजान रहता है।
मत ढूँढ़ वफ़ा हर मोड़ पर इस दौर-ए-हाज़िर में,
अब तो आईना भी ये देख कर हैरान रहता है।
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