गीत — "साँझ ढले पर प्राण न माने"
साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।
सूनी राहें पूछ रही हैं,
किसके पग की आस बसी है।
बुझते दीपक की लौ जैसे,
मन में तेरी प्यास बसी है।
नींद रूठकर दूर खड़ी है,
नयनों का विराम न जाने।।
साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।
चंदा भी अब फीका लगता,
तारों में वह बात कहाँ है।
तेरे बिना हर फूल अधूरा,
मौसम में बरसात कहाँ है।
धड़कन हर पल तेरा नाम ले,
दिल अपना अंजाम न जाने।।
साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।
पत्र लिखे थे अश्रु स्याही,
हवा उन्हें पढ़कर रो आई।
तेरे मिलने की इक आशा,
अब तक मन में दीप जलाए।
टूटे सपनों की इन किरचों का,
दर्द कभी आराम न जाने।।
साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।
अंतरा (समापन)
यदि मिलना इस जन्म न लिखा,
अगले जन्म पुकारेंगे।
प्रेम अगर सच्चा है अपना,
फिर हर बंधन हारेंगे।
तन मिट जाए, समय बदल जाए,
सच्चा प्रेम अवसान न जाने।।
साँझ ढले पर प्राण न माने,
तेरी याद मगर न जाने।।
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