मन से कभी न हारूँगा

मन से कभी न हारूँगा 

आँधी चाहे प्रलय मचाए, दीप नहीं बुझने दूँगा।
घोर अँधेरा राह रोक ले, पग फिर भी बढ़ने दूँगा।
धैर्य बनेगा ढाल सदा ही, विजय स्वयं मुस्काएगी।
सत्य रहेगा साथ हमारे, किस्मत भी झुक जाएगी।

लक्ष्य मिले या देर लगे मै अपना सब कुछ वारूँगा, 
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

टूटे चाहे स्वप्न हजारों, फिर नव स्वप्न सजाऊँगा।
सूखे उपवन की डाली पर, आशा-पुष्प खिलाऊँगा।
श्रम की बूँदें व्यर्थ न होगी, मंजिल पास बुलाएगी।
धैर्य लगन की ज्योति निरंतर, जीवन राह दिखाएगी।

अपने श्रम के बल पर जग में, नव इतिहास बनाऊँगा,
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

विपदा यदि पर्वत बन जाए, उसको भी ललकारूँगा।
अग्निपथों की तपती धारा, हँसकर स्वयं निहारूँगा।
संघर्षों का एक-एक क्षण, ओज नया भर जाएगा।
साहस का विश्वास अटल हो, भाग्य स्वयं झुक जाएगा।

गिरकर फिर उठने की खातिर, संकल्पों को धारूँगा 
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

काँटे स्वागत में बिछ जायें, उनको फूल बनाऊँगा।
घाव समय जितने भी देगा, उनसे सीख उठाऊँगा।
हर ठोकर वरदान बनेगी, राह नई खुल जाएगी।
दृढ़ संकल्पों की नौका भी, हर धारा तर जाएगी।

सत्य पथों की धूल समेटे, जीवन सदा सँवारूँगा,
शूल भरे हों कितने पथ में, मन से कभी न हारूँगा॥

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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