अच्छा ही था जो हम अजनबी थे कभी,
रिश्तों ने फ़ासलों को भी दर्द बना दिया।
रिश्तों की धूप में जब उम्मीदें पिघल गईं,
तब छाँव भी मिली तो सुकून न मिल सका।
जो लोग हर घड़ी वफ़ा की मिसाल थे,
वक़्त आया तो वही सबसे पहले बदल गए।
दिल ने जिन्हें ख़ुद से भी बढ़कर अज़ीज़ रखा,
वो नाम तक हमारा बड़ी आसानी से भूल गए।
रिश्तों का बोझ ढोते-ढोते ये समझ आया,
हर साथ चलने वाला हमसफ़र नहीं होता।
इल्ज़ाम देने वालों की भीड़ कम न थी,
सच बोलने वालों का मगर काफ़िला कम था।
हमने तो दिल के दरवाज़े खुले ही रखे,
लोग आए, ठहरे, और हमें तन्हा कर गए।
कुछ रिश्ते आईने थे, कुछ धुएँ के घर निकले,
जिसे अपना समझा, वही सबसे बेख़बर निकले।
अब किसी से गिला नहीं, न कोई शिकायत है,
अब खुद से मोहब्बत है, खुद से ही बगावत है।
अजनबी रहना शायद बेहतर ही होता,
रिश्तों ने अक्सर अपनों से ही दूर कर दिया।
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