जरा देर लगेगी
चश्मा आँखों से हटेगा, ज़रा देर लगेगी,
धुंध छँट कर के रहेगा, ज़रा देर लगेगी।
झूठ का शोर अभी तो चौराहों पे रुकी है,
सच मगर घर-घर कहेगा, ज़रा देर लगेगी।
ताज वालों ने उजालों को गिरवी रखा है लेकिन
नया सूरज फिर से उगेगा, ज़रा देर लगेगी।
भूख के हाथों में अब भी है पसीने की कमाई,
हक़ का दरिया फिर से बहेगा, ज़रा देर लगेगी।
रोटियों से खेलेंगे सियासत के तमाशे कब तक,
ये मुखौटा भी गिरेगा, ज़रा देर लगेगी।
रिश्तों के बाज़ार में हर चेहरा सौदे में मिला है,
आदमी फिर आदमी बनेगा, ज़रा देर लगेगी।
भीड़ के नारों में दबकर जो सोया हा अभी तक,
वह स्वयं ही जागेगा फिर से, ज़रा देर लगेगी।
मौन का दर्द यूँ ही व्यर्थ नहीं होता देव,
अन्याय ये भी ढहेगा, ज़रा देर लगेगी।
वक़्त लिखता है हमेशा फ़ैसला कर्मों के हक़ में,
हर हिसाब अपना मिलेगा, ज़रा देर लगेगी।
✍️अजय कमार पाण्डेय
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