निशब्द

निशब्द 

नि:शब्द अधर हैं नयन मगर, संवाद नया दे जाते हैं।
मन के निर्जन उपवन में वे, मधुमास नया दे जाते हैं।
शब्दों की सीमित सीमा में, ये प्रेम कहाँ बँध पाता है,
चुप रहकर भी हृदय-गगन में आकाश नया दे जाते हैं।

मिलो जो तुम तो लफ़्ज़ों को नया एक साज़ मिल जाए,
दबी जो दिल में है मुद्दत से फिर आवाज़ मिल जाए।
मगर तुम दूर रहकर भी जो हमें निःशब्द करते हो,
कभी ऐसे भी आओ कि मौन को आवाज मिल जाये।

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