निशब्द
मन के निर्जन उपवन में वे, मधु-स्वप्न नया दे जाते हैं।
शब्दों की सीमित सीमा में, ये प्रेम कहाँ बँध पाता है,
वे चुप रहकर भी हृदय-गगन में गीत नया दे जाते हैं।
मिलो जो तुम तो लफ़्ज़ों को नया एक साज़ मिल जाए,
दबी जो दिल में है मुद्दत से फिर आवाज़ मिल जाए।
मगर तुम दूर रहकर भी जो हमें निःशब्द करते हो,
कभी ऐसे भी आओ कि मौन को आवाज मिल जाये।
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