ग़ज़ल- मनाने वाला



ग़ज़ल- मनाने वाला 

सिलसिला खत्म हुआ रूठों को मनाने वाला,
सच को सच और झूठ को झूठ बताने वाला।

अब कहाँ मिलते हैं रिश्तों को मनाने वाले,
हर तरफ़ दिखता है मतलब ही निभाने वाला।

अब तो हर दर्द नासूर बना जाता है 
अब नहीं मिलता है ज़ख्म सहलाने वाला।

जब अँधेरों ने शहर भर को बना डाला अपना,
दीप बनकर न मिला कोई राह दिखाने वाला।

लोग चेहरों की चमक देख के बहके ऐसे,
रह गया दूर ही किरदार बचाने वाला।

वक्त ने छीन लिया हौसला सच कहने का,
अब नहीं है कोई आईना दिखाने वाला।

दिल की बस्ती में अजब ख़ामुशी उतरी ऐसी,
घर में रहता है मगर कौन बुलाने वाला।

'देव' उम्मीद का दीपक तो जलाए रखना,
फिर भी आ सकता है इस दिल को मनाने वाला।

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