दीप उजाले के
उठो कि अब इतिहास नया लिखने का मौसम आया है,
सत्य पराजित हो सकता है, पर हार कभी न पाया है।
टूटे हुए विश्वासों में फिर से प्राण फूंकने आए हैं,
हम दीप उजाले के बनकर अँधियार मिटाने आए हैं।
सिंहासनों ने जब-जब जनता का स्वप्न जलाया है,
तब-तब किसी दीप ने तम का अभिमान झुकाया है।
पीड़ा की मौन नदी में जो आँसू बहते रहते हैं,
वे ही कल के सूरज बनकर हर अँधियारा ढहते हैं।।
हम पीड़ा की हर मौन नदी का गीत सुनाने आये हैं,
काले बादल बनकर छाई छल की गहरी परछाईं,
सत्य खड़ा है पथ के कोने ओढ़े अपनी तन्हाई।
लेकिन नभ के अंतिम तारे ने मुझसे यह कहा अभी,
अँधियारे के भाग्य में नहीं लिखी हुई है विजय अभी।
हम नभ के अंतिम तारे का अहसास जगाने आये हैं,
वन की निर्जन साँसों में भी विद्रोहों की गाथा है,
हर झरने के गायन में अब परिवर्तन की आशा है।
श्रम के हाथों से रोटी को जो छीन रहे हैं युग-युग से,
उनकी नींव हिलाती आई जन-पीड़ा ही युग-युग से।
हम श्रम की उस रोटी को फिर अधिकार दिलाने आये हैं,
अब चंदा की शीतल किरणों में अंगारों की भाषा है,
सूरज के रथ पर बैठी अब जनमन की अभिलाषा है।
सदियों से जो मौन खड़े थे अब वे भी स्वर दोहराएँगे,
हर टूटे बिखरे विश्वासों के दीप पुनः फिर जल जाएँगे।
हम अँधियारे को दूर हटा नव ज्योति जलाने आये हैं
हम दीप उजाले के बनकर, अँधियार मिटाने आए हैं।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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