उजालों का आह्वान

उजालों का आह्वान

लेकर नवल प्रभात-किरण हम गाँवों के उस छोर चलें,
चलो उजालों को बाँहों में भर फिर अपनी ओर चलें।
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
जहाँ मौन एकाकी पन में लघु विस्मृत सी बस्ती है,
नित अम्बर के सूनेपन में सिसक-सिसक कर हँसती है।
दौड़ रही ये अंधी सड़कें निजता को पहचान रहीं,
पर गाँवों की पगडंडी शहरों का जीवन दान रहीं।
महानगर के कोलाहल तज झंकारों की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
सूख रही हैं बावड़ियाँ सब रोते हैं ताल-तलैया,
मूर्छित हुई धरा की माटी क्षीण हुई बरगद छइयाँ।
सूनी-सूनी राहें हैं सूने-सूने उत्सव सारे,
मौन पड़े खलिहान सभी चौपालों के टूटे तारे।
कंक्रीटों के तहखानों से फिर प्रकृति की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।
मात्र शहर की मृगतृष्णा से, क्या वैभव आ पायेगा?
जो खलिहानों से विमुख हुआ जीवन कैसे पायेगा?
जर्जर तृण-कुटीर से अब भी निश्छल प्रेम प्रवाहित है,
अंचल में जिसके जन्मे हम माटी हृदय लुभाती है।
लोभ-मोह के कंचन तज सदव्यवहारों की ओर चलें,
चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँवों की ओर चलें।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 
     हैदराबाद 

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उजालों का आह्वान

उजालों का आह्वान लेकर नवल प्रभात-किरण हम गाँवों के उस छोर चलें, चलो उजालों को बाँहों में भर फिर अपनी ओर चलें। चलो उजालों को लेकर हम फिर गाँव...