ग़ज़ल- कौन हमारा है

ग़ज़ल

क्या कहें कि कौन अब हमारा है,
ग़ैर तो ग़ैर, अपनों ने भी मारा है।

फूल राहों में बिछाए थे हमने जिनके,
आज उन्हीं हाथों में पत्थर ही सारा है।

जिसको सीने से लगाकर उम्र भर सींचा,
अब उसी शाख़ से टूटा हुआ नज़ारा है।

दर्द जब हद से गुज़रकर मुस्कुराने लगे,
तब समझ लेना कि दिल कितना बेचारा है।

जिसने हर मोड़ पर रिश्ते ही निभाए दिल से,
उसके हिस्से में फ़क़त अश्कों की धारा है।

हमने तूफ़ान से लड़ने की क़सम क्या खाई,
हर किनारे ने कहा, दूर ही किनारा है।

जिसने हर मोड़ पर रिश्तों को बचाना चाहा,
हर किसी ने यही समझा कि वो बेचारा है।

अब किसी नाम से क्या उम्मीद रखेगा कोई,
अब हर नया चेहरा भी इक और किनारा है।

ज़ख़्म इतने हैं कि अहसास भी पत्थर-सा हुआ,
दिल धड़कता तो है, लेकिन वो बड़ा हारा है।

वक़्त ने छीन लिए ख़्वाब, रिश्ते भी मगर,
हौसलों का मगर बाक़ी अभी सितारा है।

'देव' सच की हिफ़ाज़त का यही इनाम मिला,
ये सर झुकाया नहीं, इसलिए ही ये ख़सारा है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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