मुक्तक

सच की लौ बुझती नहीं लाख हवाएँ आयें।
आँधियाँ झूठ की टकरायें या चली जायें।
ये महल झूठ के एक रोज गिरेंगे खुद ही,
हौसला साथ तो पत्थर भी पिघलते जायें।

हर तरफ चेहरा वही दिल तो मगर पत्थर है।
नेह की नदियाँ भी तो अब सूख के बंजर हैं।
स्वार्थ की आँधी में कुछ ऐसे धँसे जाते हैं,
होंठों पर राम भले जेबों में पर खंजर है।

जिसने काँटों में सदा फूल ही बाँटे सबको।
दर्द अपने ही पिए और सुख लुटाए सबको।
जिसे दुनिया ने सदा गैर समझकर ठुकराया,
फिर भी उसने ही दिए प्रेम के साए सबको॥
 
ये वक्त की चाल कहाँ एक-सी रही है सदा।
हर रात के बाद नई भोर निकलती है सदा ।
ये सत्य के पाँव भले देर से मंज़िल छू लें,
मगर झूठ की दौड़ में साँस उखड़ती है सदा।
 
दीप जलते ही रहे आँधियों के घर में भी मगर।
और गीत गूँजे हैं दर्द भरे स्वर में भी अकसर।
हार को जीत बनाया है जहाँ साहस मन का,
फूल सी हो जाती है तब शूल से भरी ये डगर।


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