शायरी
वतन के दर्द पर भी लोग सौदा कर रहे देखे।
जो कल तक देश की ख़ातिर कसम खाया करते थे,
वही कुर्सी की ख़ातिर आज झुकते जा रहे देखे।
हवा ऐसी चली, सच बोलना भी जुर्म ठहरा अब,
झूठ के दरबार में सच को तड़पते देखे।
रिश्तों की भीड़ में तन्हा खड़ा था एक सच्चा दिल,
सभी अपने थे लेकिन सब किनारा कर गए।
वफ़ाओं की किताबों में कई पन्ने अधूरे हैं,
जिसे अपना समझ बैठे, वही धोखा लिख गया।
गरीबों की दुआओं से जिन्हें ऊँचाइयाँ मिलतीं,
वही महलों में जाकर उनकी बस्ती भूल बैठे।
सियासत ने अजब अंदाज़ से तक़सीम कर डाला,
पड़ोसी भी पड़ोसी से सवालों में बँट गया।
मुकद्दर से नहीं हारे, न आँधियों से शिकस्ता थे,
हमें अपनों की ख़ामोशी ने आखिर तोड़ डाला।
अदालत से बड़ी अब हो गई है भीड़ की आवाज़,
कई निर्दोष चेहरों को सज़ाएँ मिल गईं।
ज़माने ने सिखाया है मुखौटे ओढ़कर जीना,
यहाँ चेहरों से ज़्यादा लोग किरदार बदलते हैं।
जिसे ईमान समझकर उम्र भर सीने से रखा था,
वही सिक्कों की खनक पर हाथ अपना छोड़ बैठा।
नज़र में आदमी छोटा नहीं, सोचें हुई हैं छोटी,
इसी कारण मोहब्बत के नगर वीरान होते हैं।
हर इक रिश्ते के पीछे आज मतलब मुस्कुराता है,
कहाँ वो दौर था जब दिल से दिल का सिलसिला होता।
सलीके से जिन्होंने ज़िंदगी भर सच की बात कही,
उन्हीं के नाम पर सबसे अधिक पत्थर उछाले गए।
ग़रीबी रोज़ मरती है अमीरों की तरक्की में,
कोई आँकड़ों में खुश है, कोई रोटी ढूँढ़ता है।
बहुत आसान है इल्ज़ाम देना बेगुनाहों पर,
मुश्किल है आईने में ख़ुद का चेहरा देख पाना।
चराग़ों को बुझाने का हुनर सब सीख बैठे हैं,
मगर कोई अँधेरों से लड़ना नहीं चाहता।
बिछड़कर भी तुम्हारी याद का मौसम नहीं बदला,
मगर तुमने तो जैसे उम्र भर पहचान ही बदली।
जो अपनों के लिए हर दर्द हँसकर पी गया था,
उसी को आख़िरकार सबसे ज़्यादा दर्द मिला।
अभी उम्मीद ज़िंदा है, अभी ईमान बाकी है,
अँधेरों की हुकूमत है, मगर सूरज भी आएगा।
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