मिलन का क्षण
निशि की नीरव छाया में थे सपनों के दीपक के घेरे।
मलय पवन के कोमल कर ने अलकों को जब-जब सहलाया,
सूने मन के निर्जन वन में भावों का सागर लहराया।
शशि किरणों के रजत पंख पर कुछ स्वप्न सुनहरे लहर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।
नियती की धूमिल रेखा कब संयोगों को रहने देती,
मधुऋतु के नव पल्लव में भी पतझर को वैभव दे देती।
जब स्मृतियों के दीप जलाकर ये रजनी काटी जाती है,
मन की मौन गुफाओं में बस यादों की ध्वनियाँ आती हैं।
तम के सागर में खोकर भी आशा के दीपक निखर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।
हर आँसू इक सर्ग बन गया हर इक धड़कन गुणगान हुई,
पीड़ा की चिर तप्त धरा पर विरह वेदना वरदान हुई।
जो गीत कंठ में ठहर गये निस्तब्ध गगन अब गाता है,
पलकों के मानसरोवर में वो गीतों को नहलाता है।
स्मृतियों के निर्जन उपवन से अब जाने कितने पहर गये,
उस एक मिलन के क्षण में जैसे सौ-सौ जीवन ठहर गए।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
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