सत्य ही लिखती रहे
राह की अब मुश्किलों से फिर भला अब क्यों टरूँ।
है नहीं कुछ मोह मन को, जीत हो या हार हो,
कर्म के इस पुण्य पथ में एक-सा व्यवहार हो।
कर रहे हैं पग हमारे पंथ का श्रृंगार जब,
क्या लिखूँ फिर गीतिका मैं यहाँ अनुपात की।
सत्य का संबल लिये बढ़ते रहें अविराम हम,
क्या पड़ी अब सोचने की लाभ या आघात की।
धूप ने जितना तपाया, देह ये कुंदन हुई,
आँधियों में जब घिरी है देह ये चंदन हुई।
जो है झुका सिद्धांत पर वो जिया तो क्या जिया,
जो अड़ा सत्यार्थ में उसने युगों को पा लिया।
लक्ष्य से पहले न रुकना, यह प्रणों का धर्म है,
शूल हों या फूल हों ये कर्म ही बस धर्म है।
आज का संघर्ष ये मौन हो जितना जलेगा,
कल यही अंगार बन मौन अंतस में खिलेगा।
पंथ चाहे हो कठिन पदचिह्न मिट सकते नहीं,
कर्म की पदधूलि के ये छाप मिट सकते नहीं।
हार केवल देह की, संकल्प कब हारा भला,
सत्य के पथ पर चला जो स्वयं से वो ही मिला।
फिर जीत का अभिमान क्या हार का संताप क्या,
चल पड़े जो धर्मपथ पर और फिर प्रतिघात क्या।
प्राण है जब तक कलम में सत्य ही लिखती रहे,
कर्म ही आराध्य हो जब और फिर सौगात क्या।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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