अमर पहचान दे दें

 अमर पहचान दे दें

इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें,
अनकही इस गीतिका को इक नई पहचान दे दें।
जो ह्रदय में बह रही है मूक भावों की त्रिवेणी,
आज उस अंतर्ध्वनी को प्रीति का पैगाम दे दें।

शशि-किरण के जाल में है बँध गया आलोक सारा,
मौन के संसर्ग में है बह रही रस-धार धारा।
चुप खड़े हैं विटप सारे स्तब्ध है यह नील अंबर,
घुल रही है श्वास में अब नेह की नूतन धरोहर।

इस समर्पण के क्षणों को शाश्वती आयाम दे दें,
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।

है समय की चाल चंचल स्वप्न ओझल हो न जाएँ,
भोर की सिंदूरी बेला में कहीं ये खो न जाएँ।
ओस के कल्पित दृगों में वेदना का मंत्र जागा,
तारिका की अल्पना से प्राण का अनुबंध जागा।

इस क्षणिक अनुरागनी को हम नई पहचान दे दें, 
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।
द्वैत का अस्तित्व खोए अद्वैत की पावन घड़ी,
दो मनों के मध्य देखो हैं नेह की कड़ियाँ जुड़ी।
तुम समर्पण की ऋचा बन मैं प्रणय का गीत गाऊँ,
साँस के इन रेशमों में मैं मिलन के भाव लाऊँ।

आ चलो अनुरागिनी को भक्ति का ही नाम दे दें,
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।

मिट रहा है द्वैत का पट सत्य एकाकार होता,      
आधरों के मौन में फिर शब्द अपना भार खोता।    कह रही है शून्य में साँसों का धीमा सा मर्मर,    
खो न जाए इस निशा में रश्मियों की शुभ्र निर्झर।

आ चलो व्याकुल घड़ी को शाश्वती विश्राम दे दें, 
इस निशा की चाँदनी को भोर तक इक नाम दे दें।
अनकही इस गीतिका को इक नई पहचान दे दें,
हाँ अमर पहचान दे दें एक पावन नाम दे दें।

✍️अजय कुमार पाण्डेय


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