स्वर्णिम शाखों पर किसने यह
मधु-मुस्कान सजाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से
ऋतु ने छवि बिखराई है।
मधु-ऋतु की मृदु हँसी सुनहरी
पथ-पथ झरती जाती है,
स्मृति की कोमल श्यामल छाया
मन-वीणा खनकाती है।
निशि के नीरव प्रहरों में भी
आशा दीप जलाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से
ऋतु ने छवि बिखराई है।
सौरभ की निस्तब्ध लहर पर
किसका स्नेह तिराता है,
किस प्रियतम के मधुर मिलन से
अंतर आज नहाता है।
पात-पात पर स्वर्ण स्वप्न की
मंगल रेखा छाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से
ऋतु ने छवि बिखराई है।
बादल के आँचल से झाँके
चंद्र-किरण मुस्काती है,
सूनी पगडंडी पर खुशियाँ
पायल ध्वनि लहराती है।
दूर क्षितिज के धूमिल वन में
नई भोर मुस्काई है,
अमलतास के पीत पुष्प से
ऋतु ने छवि बिखराई है।
जब-जब मलय पवन बहती है,
स्वर्णिम राग जगाती है,
हर डाली के पीत अधर पर
मधु गाथा लिख जाती है।
जीवन के निर्जन उपवन में
बासंती ऋतु आई है,
अमलतास के पीत पुष्प से
ऋतु ने छवि बिखराई है।
स्वर्णिम शाखों पर किसने यह
मधु-मुस्कान सजाई है,
अमलतास के पीत पुष्प से
ऋतु ने छवि बिखराई है।
✍️ अजय कुमार पाण्डेय
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