सच के मुँह पर ताला

सच के मुँह पर ताला 

सच के मुँह पर जब ताला होगा,
तब झूठ का ही बोलबाला होगा।

मन का अंबर जब सूना होगा 
फिर कमरे में कहाँ उजाला होगा।

रिश्तों की कश्ती तब डूबेगी,
जब नफ़रत का बहता नाला होगा।

ग़ैरों से शिकवा क्या करना जब,,
खंजर अपनों ने सम्भाला होगा।

कोई उम्मीद करे इंसाफ की कैसे, 
जब कातिल ही रखवाला होगा।

यूँ ही नहीं गिरी नैतिकता,
कोई सिक्का कहीं उछाला होगा।

'देव' उनका झुकना ये जतलाता है,
मौसम चुनाव का आनेवाला होगा।


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