तुम विस्मृत सपनों की आभा, मैं अलसित भोर विहँसता हूँ,
तुम नील गगन की शुचि करुणा, मैं चातक नित्य तरसता हूँ।
देख हृदय की सौम्य चपलता, दर्पण तुमसे शर्माता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।
नव किसलय का अंचल धारी, मलयज समीर ये डोल रहा,
अधरों की लाली को छूकर, वह मूक प्रणय-सुर बोल रहा।
नयनों में कज्जल-मेघ प्रिये, ज्यों सावन की घनी रात है,
जो साँस-साँस में गूँज रही, युग-युग की अनकही बात है।
प्रिय पलकों के मृदु कंपन से, मन में सावन अकुलाता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।
पद-चाप तिहारी सुन वन में, कलियाँ चुपचाप विकसती हैं,
कंचन काया को छूने को, ये तारा-तरणि तरसती हैं।
तुम मौन समर्पण की मूरत, मैं शाश्वत विरह-विराग प्रिये,
तुम वीणा की झंकार मधुर, मैं अंतर्मन का राग प्रिये।
मदिर मधुर मन मोहित महिमा, मन मानस गीत सुनाता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।
सिंदूरी संध्या के पल में, शशि रश्मि जाल फैलाती है,
सिंधु हृदय के व्याकुल पन में, आशाएँ स्वप्न सजाती हैं।
मिट जाए नश्वर जग चाहे, प्रेम हमारा अमर रहेगा,
पावन मन के मंदिर में प्रिय, नाम तुम्हारा सदा रहेगा।
मलय पवन के आलोड़न में, ये मन मधुमास सजाता है,
ये मानस-तट का विहग प्रिये, नव गीत सुहासित गाता है।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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