ओसबूँद

ओसबूँद 

छोड़ चली अम्बर का आँचल, आई बहती धरा-धाम पर,
सतरंगे सपनों को बुनती, ओस-कणों के स्वच्छ नाम पर।
पहचान भले छोटी इसकी, पर जग की प्यास बुझाती है,
यह *जलबिंदु* सृष्टि के भीतर, नव-जीवन मंत्र जगाती है।

हरी घास की मखमली सेज पर रात ढले आकर सोती,
सूरज की प्रथम किरण से ये , चकाचौंध का बनती मोती।
क्षणभंगुर अस्तित्व है इसका, अनुपम रूप अनूठा पाती,
क्षणभर के इस छोटे तन में, मधुर मिलन का राग सुनाती।

नदियों की लहरों में मिलकर, सागर की गोदी में गिरती,
अपनी हस्ती को खोकर फिर, गहरे नीले जल में मिलती।
जो घट में भर जाए शीतल, नयनों से बहती तो सावन,
सूखे अधरों पर मुस्काये, तृप्त करे अंतस का उपवन।

लघुता में सामर्थ्य छुपाकर, चट्टानों की छाती चीरे,
तपकर रवि की प्रखर आँच में, उड़ती नभ को धीरे-धीरे।
मिट-मिटकर फिर से बन जाना, इसकी ही है अमर कहानी,
कण-कण में जो प्राण फूँक दे, ओसबूँद वह अनुपम पानी।

 ✍️अजय कुमार पाण्डेय


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