कुछ कहना है

कुछ कहना है 

कल तक जो कुछ मौन रहा था, 
उसको स्वर में बहना है,
अंतस का दीपक दहना है, 
आज अभी फिर कहना है।

पीत अमलतासों की छाया, 
पथ पर मधु बरसाती है,
मलय-पवन की कोमल चिट्ठी, 
तेरा नाम सुनाती है।
फिर स्मृतियों के नील गगन में, 
नव अरुणोदय गहना है,
नव आशाओं को सजना है, 
आज अभी फिर कहना है।


झील-तटों की शांत लहर पर, 
स्वप्न सुनहरे विचर रहे,
अनदेखे से मधुर मिलन के, 
भाव हृदय में ठहर रहे।
पलकों पर जो रुका हुआ है, 
गीतों में वो ढलना है,
गीतों में मोती गुहना है, 
आज अभी फिर कहना है।

चंद्र-किरण के रजत कणों ने, 
रजनी को नहलाया है,
तारों ने भी मौन नयन से, 
पथ का मन सहलाया है।
मन-वीणा के सुप्त तार को, 
मधुर राग में बजना है,
मधुर यामिनी को सजना है, 
आज अभी फिर कहना है।

जीवन के निर्जन उपवन में,
फिर वसंत मुस्काया है,
सूखे पत्तों ने आशाओं से, 
नव परिधान सजाया है।
प्रेम-धरा के हर कण में अब, 
स्वर्णिम सौरभ रहना है,
नव गीत प्रेम का रचना है, 
और नहीं कुछ कहना है।

✍️ अजय कुमार पाण्डेय

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