शेर व मुक्तक
झूठ की मीनार ऊँची हो भले कुछ काल तक,
सत्य की इक धूप काफी है उसे ढहाने के लिए।
कुंठा के विष से जिसने अपना ही मन भर लिया,
औरों को क्या छीनेगा, जो अपना सुकून हर लिया।
कुसंस्कारों की अँधियारे में जिसका जीवन डूब गया,
ज्ञान का सूरज निकला भी तो अपनी आँखें मूँद गया।
मुख पर मधु, अंतर में विष, ऐसी कैसी रीत है ?
झूठ जहाँ सम्मान पाए, वहाँ मर जाती प्रीत है।
मुक्तक
झूठ के रंग से दर्पण कब तक चमकाया जायेगा।
मन की कुंठा से दोषों को कब तक गाया जायेगा।
सत्य आचरण भाव प्रवणता दीपक हैं इस जीवन के,
अँधियारे से सूरज को कब तक भरमाया जायेगा।
✍️अजय कुमार पाण्डेय
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