मुक्तक

जमाना नीति नियमों का अगर पाबंद हो जाये।
अराजकता की सब राहें तुरंत बंद हो जाये।
तल्खियाँ भूल जायेंगे सभी इक दूसरे के प्रति,
कि कटुता भूल कर रिश्ते सभी गुलकंद हो जायें।

लिखूँ जब गीत यादें वो सुहानी लौट आती हैं।
निगाहों में वही रँगत पुरानी लौट आती है।
नहीं फिर होश रहता है जमाने के रवायत का,
वो बीते दौर की सारी कहानी लौट आती है।

मिले दौलत अचानक तो जमाना भूल जाते हैं।
नए रिश्तों बनाते ही पुराना भूल जाते हैं।
नहीं है खानदानी वो खुदा खुद को समझ बैठे,
नई दौलत मिली तो जो पुराना भूल जाते हैं।

न समझो माटी से हम रिश्ता अपना तोड़ आये हैं।
नहीं ऐसा के यादों से मुँह अपना मोड़ आये हैं,
महज कुछ दिन की दूरी है हमारे दरमियाँ जो है,
रही मजबूरियाँ कुछ तो जो घर को छोड़ आये हैं।

कि दुनिया चार दिन की है नहीं हरदम ठिकाना है।
सभी रिश्तों रिवाजों को यहाँ सबको निभाना है।
रहा है कौन ही हरदम यहाँ इस आशियाने में,
चुकाकर कर्ज हिस्से का सभी को लौट जाना है।

नहीं दौलत नहीं शोहरत नहीं जन्नत की चाहत है।
मैं खुश हूँ जो मिला मुझको नहीं कोई शिकायत है।
नहीं ख्वाहिश है महलों की नही है तख्त ताजों की,
सलीके से मिले जो भी उसी में मुझको राहत है।

मौन ही में कहीं न गुजर जाये

मौन ही में कहीं न गुजर जाये

आज की रात कह दो न गुमसुम रहो,
रात यूँ ही कहीं न गुजर जाये ये।
मुद्दतों बाद हम तुम मिले हैं यहाँ,
मौन ही में कहीं न गुजर जाये ये।

दो कदम साथ चलना न संभव हुआ,
टीस दिल को अभी तक सताती रही।
दिन गुजरता रहा रात ढलती रही,
चाँदनी आज तक मन जलाती रही।
तोड़ दो बंधनों को न घुटते रहो,
रात यूँ ही कहीं न बिखर जाये ये।
मुद्दतों बाद.......।।

गीत अपना अधूरा कहीं रह गया,
चाह कर भी उसे हम नहीं गा सके।
हाथ पूजा की थाली से कुछ दूर थे,
हाय, सिंदूर तक पर नहीं जा सके।
अब न मजबूरियों में उलझती रहो,
पास आई घड़ी न गुजर जाये ये।
मुद्दतों बाद........।।

कब रुका वक्त बोलो घड़ी देखकर,
न सँभले तो फिर से छले जायेंगे।
हाथ की रेख का क्या भरोसा करूँ,
क्या पता फिर हम तुम छले जायेंगे।
किंतु में यूँ न फिर से भटकती रहो,
उम्र बाकी बची न गुजर जाये ये।
मुद्दतों बाद.......।।

लोग कहते हैं कि प्रेम झुकता नहीं,
कि अवरोधों पर भी ये रुकता नहीं।
मुखर होकर भले झूठ कितना कहे,
पर सच तो निगाहों से छुपता नहीं।
झूठ में फँस के फिर न उलझती रहो,
सत्य फिर से कहीं न बिखर जाये ये।
मुद्दतों बाद.........।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        26 सितंबर, 2025

ऋणी रहेंगे गीत हमारे

ऋणी रहेंगे गीत हमारे

प्रिय तुम्हारे स्नेहिल स्वर ने गीतों को सम्मान दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।

छंद-छंद आलोड़न करते पंक्ति-पंक्ति अमृत रस छलके,
सूने भावों के आँगन में अनुमानों का आँचल ढलके।
झाँझ मजीरे के स्वर गूँजे, गूँजे मीरा का इकतारा,
जैसे संध्या के आँगन में आये चंदा का उजियारा।

इस प्रीत भरे स्पर्श अधर के गीतों को नव प्राण दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।

चढ़ी हिंडोले रात आज ये शीतल पवन झुलाती तन को,
स्पंदित करती मृदुल तरंगें रति नव राग सुनाती मन को।
पोर-पोर रोमांचित करती अधरों से छलके मधु धारा,
पतझड़ का मौसम भी अब तो सावन से लगता है प्यारा।

स्पंदित भावों ने अंतस में पावस का परमान दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।

धुंध छँटा है मन के नभ का आज धवल आकाश दिखा है,
जाने कितनी सदियाँ बीतीं तब जाकर आभास जिया है।
कोना-कोना उर का महका पतझड़ भी मधुमास हुआ है,
अधरों का आलोड़न पाकर गीतों ने आकाश छुआ है।

ऋणी रहेंगे गीत हमारे अधरों ने वो मान दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        24 सितंबर, 2025

हम भी सूबेदार हुए

हम भी सूबेदार हुए

अपनों की इस भीड़ में सबके बेगाने व्यवहार हुए
आँसू, नफरत, ताने मेरे हर दिन के त्यौहार हुए

नहीं समझ पाई ये दुनिया कोरों के बूँदों की पीड़ा
अब कहते हैं दुनियावाले के आँसू ही गद्दार हुए

सबके किस्से रोज नए थे नई-नई आशायें थीं
लेकिन जाने मेरे किस्से क्यूँ बासी अखबार हुए

नहीं जोड़ पाया धन दौलत अपनों की भी रही शिकायत
रिश्ते-नाते इस दुनिया में सारे ही व्यापार हुए

तब तक जग में रहा अकेला जब तक ये बेकारी थी
आज मिला जब वेतन मुझको हम भी सूबेदार हुए

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        22 सितंबर, 2025

इक सहारे के लिये

इक सहारे के लिये

ये मौन दिल चलता रहा इक सहारे के लिये
थे खड़े मँझधार में हम इक किनारे के लिये

जिंदगी के इस सफर की कौन सी मंजिल रुकी
सब सफर करते रहे हैं इक सितारे के लिये

जब थके थे पाँव पथ में जब रात ये गहरी हुई
सब क्षितिज को देखते थे इक इशारे के लिये

दो घड़ी ना रुक सके छोड़ सबकुछ चल दिये
सोचता है कौन आखिर इक बिचारे के लिये

जब तलक ताकत रहेगी लोग होंगे भीड़ होगी
रुक सका है कौन जग में इक बेसहारे के लिये

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        17 सितंबर, 2025

होठों से छू लेते

होठों से छू लेते

काश सखे मेरे गीतों को 
अपने होठों से छू लेते।

मेरे गीत हृदय को छूकर
नैनों से जब बह आये थे,
बिना कहे इक शब्द अधर से,
हाल हृदय के कह आये थे।
भरे हुए नयनों में कितने
भाव सिमट कर मचल रहे थे,
मौन काँपते इन अधरों के
भाव नयन में पिघल रहे थे।
तब मेरे मन के भावों को
अपने भावों से छू लेते।

क्यूँ हृदय कभी जब भर आया
पीर हृदय की गले लगाया,
क्यूँ सहे अकेले आरोपों को
पीड़ा को क्यूँ नहीं जताया।
अपने मन की पीड़ाओं में
मुझको भी शामिल कर लेते,
नैनों में जब आँसू आये
मेरे नैनों में भर देते।
मेरे साँसों के गीतों को
अपनी साँसों से छू लेते।

साथ नहीं जब कोई अपना
जब मन का दर्पण टूटा था,
हुए अकेले यहाँ भीड़ में
जब सभी समर्पण झूठा था।
जब जग के झूठे तानों से
मन का सागर भर आया था,
सूखे पतझड़ के मौसम में
नयनों में सावन छाया था।
नयनों की उन बरसातों को
बिसरे गीतों से छू लेते।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 सितंबर, 2025

बहाव देखते रहे

बहाव देखते रहे

क्या कहें के कौन सी डगर यहाँ सहज रही।
छंद-छंद बढ़ रहे हैं पंक्ति-पंक्ति सज रही।
भाव हैं अलग-अलग सभी के अपने रास्ते,
जो डगर गुजर गई वो ही डगर सहज रही।

चल रहे हैं सब यहाँ अपने स्वप्न के लिये।
जल रहे हैं नैनों में आस के कई दिये।
है स्वप्न सब अलग-अलग उद्देश्य मगर एक है,
लिख रहे हैं ग्रंथ कुछ, कुछ ने ग्रंथ लिख दिये।

कुछ से भावना जुड़ी कुछ रही मजबूरियाँ।
यूँ ही तो बनी नहीं बीच अपने दूरियाँ।
राह जब रुकी कहीं तुम और राह चल दिये,
इस तरह से बढ़ गईं अपने बीच दूरियाँ।

दूरियों के मध्य हम स्वभाव देखते रहे।
ढलती हुई उम्र का प्रभाव देखते रहे।
कुछ कहे बिना घड़ी जो पास से गुजर गई,
जा रही घड़ी का बस बहाव देखते रहे।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 सितंबर, 2025

इस जीवन की बस यही कहानी।

इस जीवन की बस यही कहानी

एक कोर में थोड़ी सी खुशियाँ 
एक कोर में थोड़ा सा पानी
इस जीवन की बस यही कहानी।

परबत से ऊँची सागर से गहरी कितनी यादें समेटे हुए,
अब कोई चले या न चले ये निगाहों में सबको समेटे हुए।
कभी मौन है कभी है मुखर ये कभी चल पड़ी कौन जाने डगर,
शुरू कब हुई खतम कब हुई राह खुद साथ करती रही है सफर।
सबके दिलों की सुनती है यहाँ देती है सबको एक जुबानी
इस जीवन की बस यही कहानी।

पल अभी भी वो ठहरा हुआ छोड़ कर दूर जिसको यहाँ आ गये,
मुड़ के जो देखा ऐसा लगा कहाँ से चले और कहाँ आ गये।
न जाने कैसे हालात में मन अब भी कहीं तो उलझा हुआ है,
कभी तो उलझी लगे ये कहानी कभी लगे सब सुलझा हुआ है।
कोई न जाने अगले पल की क्या जाने कैसी होगी निशानी,
इस जीवन की बस यही कहानी।

एक दिन खतम सब हो जाना है अगली सुबह का है किसको पता,
साँस भी साँस से यही पूछेगी कहो जिंदगी का क्या है पता।
संध्या ढले रात की गोद में पर धुँधला इशारा रहेगा कहीं,
सदियों ने लिखी जो दास्ताँ लम्हों में वो सहारा रहेगा कहीं।
हर अहसास को गीत दे जायेगी और यादों को इक कहानी।
इस जीवन की बस यही कहानी।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        04 सितंबर, 2025

गीत मधुर कब बन पाया

गीत मधुर कब बन पाया

आशाओं के पृष्ठभूमि पर कितने गीत लिखे चुन-चुन कर
लेकिन केवल लिखने भर से वो गीत मधुर कब बन पाया।।

मन की क्यारी में कितने ही पुष्प खिलाये हैं भावों के,
बड़े जतन से सींचा उनको अपनाये हैं सब दावों को।
वादों अरु दावों में घुलकर कितने सपने रीझ गए हैं,
और बचे जो स्वप्न कहीं पर हालातों में सीझ गये हैं।
दावों अरु वादों में जीवन खिलता आया सब सुन-सुन कर,
लेकिन केवल सुनने भर से गीत मधुर कब बन पाया।

रंगपट्ट पर चली तूलिका जब जब स्वप्न सजाए हमने,
रंग भरे इच्छाओं के अरु नूतन रूप सजाए हमने।
चली तूलिका जब-जब मन पर रंग सुनहरे खिल आये हैं,
श्याम पट्ट रंगीन हुए हैं चित्र उकेरे खिल आये हैं।
रंगपट्ट को इस जीवन के मन रँगता आया चुन-चुन कर,
रंग मनोहर यदि ना हों तो कब चित्र मनोहर बन पाया।

धन दौलत के पीछे भागे कितने जतन उपाय किये हैं,
कितने छोड़े कितने पकड़े कितनों को उपहार दिये हैं।
थाप पड़ी जब भी ढोलक पर बेसुध होकर मन गाया है,
अनुमानों को पाने खातिर अनुदानों को अपनाया है।
अनुदानों में मिले गीत ये बस बजते आये खन-खन कर,
बिना साज बस अनुदानों से ये गीत मधुर कब बन पाया।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        02 सितंबर, 2025

ख़याल करता हूँ

ख़याल करता हूँ वतन को बाँटने वालों से सवाल करता हूँ, मैं आज भी उसी भारत का ख़याल करता हूँ। जो सच की बात करे उसकी आवाज़ दबती है, मैं ऐसे हर सि...