ऋणी रहेंगे गीत हमारे
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।
छंद-छंद आलोड़न करते पंक्ति-पंक्ति अमृत रस छलके,
सूने भावों के आँगन में अनुमानों का आँचल ढलके।
झाँझ मजीरे के स्वर गूँजे, गूँजे मीरा का इकतारा,
जैसे संध्या के आँगन में आये चंदा का उजियारा।
इस प्रीत भरे स्पर्श अधर के गीतों को नव प्राण दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।
चढ़ी हिंडोले रात आज ये शीतल पवन झुलाती तन को,
स्पंदित करती मृदुल तरंगें रति नव राग सुनाती मन को।
पोर-पोर रोमांचित करती अधरों से छलके मधु धारा,
पतझड़ का मौसम भी अब तो सावन से लगता है प्यारा।
स्पंदित भावों ने अंतस में पावस का परमान दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।
धुंध छँटा है मन के नभ का आज धवल आकाश दिखा है,
जाने कितनी सदियाँ बीतीं तब जाकर आभास जिया है।
कोना-कोना उर का महका पतझड़ भी मधुमास हुआ है,
अधरों का आलोड़न पाकर गीतों ने आकाश छुआ है।
ऋणी रहेंगे गीत हमारे अधरों ने वो मान दिया है,
शब्द-शब्द आह्लादित मेरे एक नया प्रतिमान दिया है।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
24 सितंबर, 2025
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