इस जीवन की बस यही कहानी
एक कोर में थोड़ा सा पानी
इस जीवन की बस यही कहानी।
परबत से ऊँची सागर से गहरी कितनी यादें समेटे हुए,
अब कोई चले या न चले ये निगाहों में सबको समेटे हुए।
कभी मौन है कभी है मुखर ये कभी चल पड़ी कौन जाने डगर,
शुरू कब हुई खतम कब हुई राह खुद साथ करती रही है सफर।
सबके दिलों की सुनती है यहाँ देती है सबको एक जुबानी
इस जीवन की बस यही कहानी।
पल अभी भी वो ठहरा हुआ छोड़ कर दूर जिसको यहाँ आ गये,
मुड़ के जो देखा ऐसा लगा कहाँ से चले और कहाँ आ गये।
न जाने कैसे हालात में मन अब भी कहीं तो उलझा हुआ है,
कभी तो उलझी लगे ये कहानी कभी लगे सब सुलझा हुआ है।
कोई न जाने अगले पल की क्या जाने कैसी होगी निशानी,
इस जीवन की बस यही कहानी।
एक दिन खतम सब हो जाना है अगली सुबह का है किसको पता,
साँस भी साँस से यही पूछेगी कहो जिंदगी का क्या है पता।
संध्या ढले रात की गोद में पर धुँधला इशारा रहेगा कहीं,
सदियों ने लिखी जो दास्ताँ लम्हों में वो सहारा रहेगा कहीं।
हर अहसास को गीत दे जायेगी और यादों को इक कहानी।
इस जीवन की बस यही कहानी।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
04 सितंबर, 2025
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