होठों से छू लेते

होठों से छू लेते

काश सखे मेरे गीतों को 
अपने होठों से छू लेते।

मेरे गीत हृदय को छूकर
नैनों से जब बह आये थे,
बिना कहे इक शब्द अधर से,
हाल हृदय के कह आये थे।
भरे हुए नयनों में कितने
भाव सिमट कर मचल रहे थे,
मौन काँपते इन अधरों के
भाव नयन में पिघल रहे थे।
तब मेरे मन के भावों को
अपने भावों से छू लेते।

क्यूँ हृदय कभी जब भर आया
पीर हृदय की गले लगाया,
क्यूँ सहे अकेले आरोपों को
पीड़ा को क्यूँ नहीं जताया।
अपने मन की पीड़ाओं में
मुझको भी शामिल कर लेते,
नैनों में जब आँसू आये
मेरे नैनों में भर देते।
मेरे साँसों के गीतों को
अपनी साँसों से छू लेते।

साथ नहीं जब कोई अपना
जब मन का दर्पण टूटा था,
हुए अकेले यहाँ भीड़ में
जब सभी समर्पण झूठा था।
जब जग के झूठे तानों से
मन का सागर भर आया था,
सूखे पतझड़ के मौसम में
नयनों में सावन छाया था।
नयनों की उन बरसातों को
बिसरे गीतों से छू लेते।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 सितंबर, 2025

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