बहाव देखते रहे

बहाव देखते रहे

क्या कहें के कौन सी डगर यहाँ सहज रही।
छंद-छंद बढ़ रहे हैं पंक्ति-पंक्ति सज रही।
भाव हैं अलग-अलग सभी के अपने रास्ते,
जो डगर गुजर गई वो ही डगर सहज रही।

चल रहे हैं सब यहाँ अपने स्वप्न के लिये।
जल रहे हैं नैनों में आस के कई दिये।
है स्वप्न सब अलग-अलग उद्देश्य मगर एक है,
लिख रहे हैं ग्रंथ कुछ, कुछ ने ग्रंथ लिख दिये।

कुछ से भावना जुड़ी कुछ रही मजबूरियाँ।
यूँ ही तो बनी नहीं बीच अपने दूरियाँ।
राह जब रुकी कहीं तुम और राह चल दिये,
इस तरह से बढ़ गईं अपने बीच दूरियाँ।

दूरियों के मध्य हम स्वभाव देखते रहे।
ढलती हुई उम्र का प्रभाव देखते रहे।
कुछ कहे बिना घड़ी जो पास से गुजर गई,
जा रही घड़ी का बस बहाव देखते रहे।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        06 सितंबर, 2025

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