मौन ही में कहीं न गुजर जाये

मौन ही में कहीं न गुजर जाये

आज की रात कह दो न गुमसुम रहो,
रात यूँ ही कहीं न गुजर जाये ये।
मुद्दतों बाद हम तुम मिले हैं यहाँ,
मौन ही में कहीं न गुजर जाये ये।

दो कदम साथ चलना न संभव हुआ,
टीस दिल को अभी तक सताती रही।
दिन गुजरता रहा रात ढलती रही,
चाँदनी आज तक मन जलाती रही।
तोड़ दो बंधनों को न घुटते रहो,
रात यूँ ही कहीं न बिखर जाये ये।
मुद्दतों बाद.......।।

गीत अपना अधूरा कहीं रह गया,
चाह कर भी उसे हम नहीं गा सके।
हाथ पूजा की थाली से कुछ दूर थे,
हाय, सिंदूर तक पर नहीं जा सके।
अब न मजबूरियों में उलझती रहो,
पास आई घड़ी न गुजर जाये ये।
मुद्दतों बाद........।।

कब रुका वक्त बोलो घड़ी देखकर,
न सँभले तो फिर से छले जायेंगे।
हाथ की रेख का क्या भरोसा करूँ,
क्या पता फिर हम तुम छले जायेंगे।
किंतु में यूँ न फिर से भटकती रहो,
उम्र बाकी बची न गुजर जाये ये।
मुद्दतों बाद.......।।

लोग कहते हैं कि प्रेम झुकता नहीं,
कि अवरोधों पर भी ये रुकता नहीं।
मुखर होकर भले झूठ कितना कहे,
पर सच तो निगाहों से छुपता नहीं।
झूठ में फँस के फिर न उलझती रहो,
सत्य फिर से कहीं न बिखर जाये ये।
मुद्दतों बाद.........।।

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        26 सितंबर, 2025

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