हम भी सूबेदार हुए

हम भी सूबेदार हुए

अपनों की इस भीड़ में सबके बेगाने व्यवहार हुए
आँसू, नफरत, ताने मेरे हर दिन के त्यौहार हुए

नहीं समझ पाई ये दुनिया कोरों के बूँदों की पीड़ा
अब कहते हैं दुनियावाले के आँसू ही गद्दार हुए

सबके किस्से रोज नए थे नई-नई आशायें थीं
लेकिन जाने मेरे किस्से क्यूँ बासी अखबार हुए

नहीं जोड़ पाया धन दौलत अपनों की भी रही शिकायत
रिश्ते-नाते इस दुनिया में सारे ही व्यापार हुए

तब तक जग में रहा अकेला जब तक ये बेकारी थी
आज मिला जब वेतन मुझको हम भी सूबेदार हुए

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        22 सितंबर, 2025

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