गीत मधुर कब बन पाया
लेकिन केवल लिखने भर से वो गीत मधुर कब बन पाया।।
मन की क्यारी में कितने ही पुष्प खिलाये हैं भावों के,
बड़े जतन से सींचा उनको अपनाये हैं सब दावों को।
वादों अरु दावों में घुलकर कितने सपने रीझ गए हैं,
और बचे जो स्वप्न कहीं पर हालातों में सीझ गये हैं।
दावों अरु वादों में जीवन खिलता आया सब सुन-सुन कर,
लेकिन केवल सुनने भर से गीत मधुर कब बन पाया।
रंगपट्ट पर चली तूलिका जब जब स्वप्न सजाए हमने,
रंग भरे इच्छाओं के अरु नूतन रूप सजाए हमने।
चली तूलिका जब-जब मन पर रंग सुनहरे खिल आये हैं,
श्याम पट्ट रंगीन हुए हैं चित्र उकेरे खिल आये हैं।
रंगपट्ट को इस जीवन के मन रँगता आया चुन-चुन कर,
रंग मनोहर यदि ना हों तो कब चित्र मनोहर बन पाया।
धन दौलत के पीछे भागे कितने जतन उपाय किये हैं,
कितने छोड़े कितने पकड़े कितनों को उपहार दिये हैं।
थाप पड़ी जब भी ढोलक पर बेसुध होकर मन गाया है,
अनुमानों को पाने खातिर अनुदानों को अपनाया है।
अनुदानों में मिले गीत ये बस बजते आये खन-खन कर,
बिना साज बस अनुदानों से ये गीत मधुर कब बन पाया।
©✍️अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद
02 सितंबर, 2025
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