इक सहारे के लिये

इक सहारे के लिये

ये मौन दिल चलता रहा इक सहारे के लिये
थे खड़े मँझधार में हम इक किनारे के लिये

जिंदगी के इस सफर की कौन सी मंजिल रुकी
सब सफर करते रहे हैं इक सितारे के लिये

जब थके थे पाँव पथ में जब रात ये गहरी हुई
सब क्षितिज को देखते थे इक इशारे के लिये

दो घड़ी ना रुक सके छोड़ सबकुछ चल दिये
सोचता है कौन आखिर इक बिचारे के लिये

जब तलक ताकत रहेगी लोग होंगे भीड़ होगी
रुक सका है कौन जग में इक बेसहारे के लिये

©✍️अजय कुमार पाण्डेय
        हैदराबाद
        17 सितंबर, 2025

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