मुक्तक

जमाना नीति नियमों का अगर पाबंद हो जाये।
अराजकता की सब राहें तुरंत बंद हो जाये।
तल्खियाँ भूल जायेंगे सभी इक दूसरे के प्रति,
कि कटुता भूल कर रिश्ते सभी गुलकंद हो जायें।

लिखूँ जब गीत यादें वो सुहानी लौट आती हैं।
निगाहों में वही रँगत पुरानी लौट आती है।
नहीं फिर होश रहता है जमाने के रवायत का,
वो बीते दौर की सारी कहानी लौट आती है।

मिले दौलत अचानक तो जमाना भूल जाते हैं।
नए रिश्तों बनाते ही पुराना भूल जाते हैं।
नहीं है खानदानी वो खुदा खुद को समझ बैठे,
नई दौलत मिली तो जो पुराना भूल जाते हैं।

न समझो माटी से हम रिश्ता अपना तोड़ आये हैं।
नहीं ऐसा के यादों से मुँह अपना मोड़ आये हैं,
महज कुछ दिन की दूरी है हमारे दरमियाँ जो है,
रही मजबूरियाँ कुछ तो जो घर को छोड़ आये हैं।

कि दुनिया चार दिन की है नहीं हरदम ठिकाना है।
सभी रिश्तों रिवाजों को यहाँ सबको निभाना है।
रहा है कौन ही हरदम यहाँ इस आशियाने में,
चुकाकर कर्ज हिस्से का सभी को लौट जाना है।

नहीं दौलत नहीं शोहरत नहीं जन्नत की चाहत है।
मैं खुश हूँ जो मिला मुझको नहीं कोई शिकायत है।
नहीं ख्वाहिश है महलों की नही है तख्त ताजों की,
सलीके से मिले जो भी उसी में मुझको राहत है।

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