तीर्थ मन का भाव

तीर्थ मन का भाव 

पत्थर की सीढ़ी पर कब तक मन खोजेगा विश्राम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।
अंतस में गंगा बहे जब और शांत हो हर इक शोर,
सच्चा तीर्थ वहीं है जग में जहाँ खींचे मन की डोर।
मिट जाये जब मन का पर्दा सौंप दें सब कुछ राम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।

​माथे पर चंदन का लेपन और तन पे भगवा वेश,
पर मन में यदि कपट बसा है बाकी रह गया क्लेश।
तीर्थ नहीं गंतव्य नहीं है कुछ नहीं है पक्का घाट,
है तीर्थ वही जहाँ करुणा की खुल जाए मन की हाट।
श्रद्धा के दो फूल चढ़ाकर पा लो प्रिय निज धाम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।

​दीन-दुखी के आंसू पोंछे हाथ वही तो प्रयाग है,
त्याग दे सारे स्वार्थ जगत के वो ही तो वैराग है।
पर्वत, नदियाँ, कुंड, सरोवर, सबका एक ही है सार,
शुद्ध हृदय का दर्पण ही है परमात्मा का सच्चा द्वार।
त्याग के सारे मोह पाश सब ,तज के लोभ-लगाम को,
तीर्थ तो वह भाव है मन का जोड़ दे जो निज नाम को।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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