ग़ज़ल

​ग़ज़ल

​कही जाती यहाँ हर दम वही अपनी पुरानी है
किसी की भूख लफ़्ज़ों में, किसी की मेज़ फानी है

​अमीरी ओढ़ कर सोए सुनहरे रेशमी बिस्तर
ग़रीबी के लिए बस छत टपकती और पानी है

​मजबूरी ने पैरों में बिछाई है बिसासत ये
लाचारी के चेहरे पर लिखी गहरी कहानी है

​मगर ख़ुद्दार इंसान वो जिसे अपनी ख़बर भी हो
निभानी हर क़दम पर अब उसे अपनी जु़बानी है

​सुकूँ मिलता नहीं सोने के सिक्कों को खनक कर भी
मदद की इक दुआ ही बस असल दौलत निशानी है

​उठाया बोझ काँधों पर जो पूरे घर का हँस करके
यही ज़िम्मेदारी तो असली ज़ीस्त-ए-ज़िंदगानी है

नहीं है फ़र्क कुछ 'देव' अब अमीरी और ग़रीबी में
वही रूतबा है उसका जिसने ज़िम्मेदारी जानी है

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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