चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही

चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही 

चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है,
और ख्वाब की आंच पे कब से उम्र पुरानी पक रही है।

यादों के सूखे ईंधन पे पलकों ने कुछ स्वप्न पकाये,
भावों के बरतन में रखकर उम्मीदों ने स्वाद सजाये।
पलकों के पानी से लेकिन उबल रही है कहीं जिंदगी,
और कड़ाही में प्रश्नों की सुलग रही है मौन बंदगी।

कहीं रसोई बाट जोहती कहीं रसोई महक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

धुँआ-धुँआ सा जीवन सारा अब आँखों में धुँधलापन है,
इच्छाओं की सिगड़ी पर क्यूँ झुलस रहा मन का आँगन है।
तपिश बढ़ी तो देखा हमने कुछ छलक रहा है भीतर से,
लाख छुपाये सिलवट लेकिन हर दर्द दिख रहा ऊपर से।

खाली कलछी की खन-खन से बेसब नन्ही चहक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

रिश्तों का घी मिला दिया है कुछ बातों का बना मसाला,
कड़वे सच के शोर में छुपा ख़ामोशी बन एक निवाला।
कोई परोस रहा है खुशियाँ कोई गम को चख रहा है,
वक़्त बना है मौन रसोइया सबका लेखा रख रहा है।

कड़वे सच की छौँक लगी जब बात हृदय को दहक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

पक जाएगी तब ये हांडी उस दिन होगी ये शांत आग,
इस माटी को मिल जायेगा जब नूतन कोई नेह राग।
तब तक जलना किस्मत में और तब तक इसका तपना काम,
चिंतन के चूल्हे पर जब तक हाँडी को हो पूर्ण विश्राम।

चहक रही है कहीं आग ये और कहीं पर लहक रही है,
चिंतन के चूल्हे पर जाने कितनी हांडी दहक रही है।

✍️अजय कुमार पाण्डेय 

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