ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं

ग़ज़ल - आँखें भींग जाती हैं 

तुझे यादों में मिलता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तुझे मैं ख़त में लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तेरा चेहरा ही बस चारों तरफ़ महसूस होता है
कहीं भी जब मैं तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तेरी आहटें जब भी मैं धड़कन में पिरोता हूँ
लकीरों को परखता हूँ तो आँखें भींग जाती हैं 
सँभाले हैं किताबों में अभी भी जो फूल सूखें हैं
उन्हें छूकर जो रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
ज़माना पूछता है 'देव' क्यूँ ये हाल है तेरा
पलक जब भी झपकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

 ✍️अजय कुमार पाण्डेय

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